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VIP
 29 August 2019  
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हाल ही में मोदी सरकार ने जिस तरह लालबत्ती की चलन को समाप्त कर एक नई सोच का पहल किया है वह सराहनीय है और VIP के जगह EIP यानी every important person का जिक्र किया हैं मानवीय  प्रधानमंत्री ने मन की बात में कही थी वह शायद देश की जनता के अहमियत को दर्शाता है ।इस प्रकार के निर्णय से यह तो तय हो गया है कि छोटे लेकिन महत्वपूर्ण परिवर्तन देश में किए गए हैं लेकिन सरकार को  कैबिनेट मंत्रियों के लिए भी एक  महत्वपूर्ण निर्णय लेने की आवश्यकता है जो योग्यता को दर्शाए कम से कम कैबिनेट मंत्री होने के लिए स्नातक तक की पढ़ाई की गई हो ताकि योग्य एवं कुशल लोगों की फौज तैयार की जा सके जिसके तहत अफसरशाही व्यवस्था के अंतर्गत आने वाले अफसरों को भी स्वाभिमान से कार्य करने का मौका मिल सके !~ Mayank kumar ( singh ) 

# संबंध
 29 August 2019  
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अच्छे संबंध , स्वस्थ विचार और पवित्र गठबंधन का गला घोटा जाता है तो इंसान अंदर से टूट जाता है क्योंकि कहीं न कहीं उसके विश्वास का क़त्ल किया जाता हैं और साथ ही साथ ऐसा महसूस होता हैं कि किसी घनिष्ट मित्र जिसे हम अपना सबसे अच्छा हमसफ़र मानते हैं वो ही जयचन्द बनकर विश्वासघाट करता हैं !हम किसी की प्रतिष्ठा बचाने के लिए सरेआम बदलाम होते रहते हैं और वो इंसान हमें पागल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते , वो हमें दुनिया की नज़र में एक पागल एवं सनकी इंसान की संज्ञा दिलवाना चाहते हैं । उन्हें लगता हैं वो दो चेहरे वाला इंसान बनकर हमारे नज़र में कुछ और समाज की नजर में कुछ और रहेंगे !! दिल से दिया सम्मान को वो एक सीधे व्यक्ति का बेवकूफ़ी समझते हैं ! और उन्हें लगता हैं वो बातों के भूल-भुलैया में हमें घुमा देंगे ! समझते तो हम सब पहले थे और सब आज भी .......! पर हमें रिश्तों का सम्मान करना आता हैं ,किसी से किया वादा का मान रखना आता हैं ।पर , उनका फिदरत गिरगिट जैसे रंग बदलने का था और हैं इसलिए तो वो खुद को मौके की तराजू में तौलते हैं !!- स्वलिखित

आईने भी क्या झूठ बोलते हैं
 29 August 2019  
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आईने भी क्या झूठ बोलते हैं ! अनेक चेहरा अपने अंदर हमें दिखाते हैं , हर एक आईना कुछ कहता है । हमारे साथ शायद कुछ साजिश भी करता है ।कोई आईना हमें उत्कृष्ट बताता तो कुछ आईने हमें औसत तो कई आईने तो इस शक में डाल देते हैं कि हम औसत से भी कम हैं 😊 शायद आईने झूठ बोलते हैं 😉 वह कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ रोज साजिश करते हैं हमारी ही चेहरे के साथ अनेक उलझन के घोसले लटका देते हैं ।कितने बेचारे तो इसी चिंता में 24 घंटे गुजार देते हैं कि हमारा चेहरा कहीं हमारा ही श्राप ना बन जाए किसी और चेहरे का हम शिकार ना बन जाए जिसके लिए इंप्रेशन झाड़ना था कहीं वह किसी का प्रॉपर्टी ना बन जाए और हम किसी गरीब किसान  की तरह दिन रात किसानी करें और मुनाफा कोई और ले जाए !!शायद यह सब सोच एक आईना के चलते ही होता है क्योंकि कोई आईना तो वास्तविकता से हमारा भेंट करवा देता है तो कोई आईना मृगतृष्णा की भांति हमसे दिन रात छलावा करता है जिसके कारण हम प्रायः दुखी होते हैं । तो जीवन में हमें ऐसे आईने के साथ होना चाहिये जो हमारे आलोचक हो !!वैसे क्या हमें सब कुछ आईने पर ही छोड़ना चाहिए या उन पर भी जो हमारी वास्तविक सुंदरता को पहचानते हैं । क्योंकि आईना हमारा एक रुप ही दिखा सकता है । वास्तविक रूप तो हमारे आस पास के लोग ही ; लेकिन अगर वह आईने से थोड़ा अलग हो तो ! क्योंकि आसपास का समाज जिसे वास्तव में हम समाज समझ रहे हैं वह भी कई आईनों में बटा है तो आईनो से सावधान ! ☺️- स्वलिखित

अखण्ड भारत का एक नया दौर - अंकित भोई 'अद्वितीय'
 8 August 2019  
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देश के इतिहास में विगत 05 अगस्त 2019 की तिथि स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गयी। सालों से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे वैश्विक संघ में चन्द देशों के वीटो पॉवर का दंश झेल रहा देश यथार्थतः आन्तरिक तौर पर भी हितों की असमानता से संघर्ष कर रहा था। प्राकृतिक दृष्टि से देश का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन का बेजोड़ मसौदा तैयार कर सरकार ने स्थानीय आवाम के साथ-साथ पूरे देश को खुलकर जीने का मौका दे दिया। इससे न केवल भौगोलिक बदलाव हुए बल्कि सार्वभौमिक तौर पर यह एक क्रान्तिकारी घटना के रूप में इतिहास में दर्ज हो गया। एकल नागरिकता, एक ही पताका, राज्य व केन्द्र शासित प्रदेशों के लोक हितैषी विभाजन समेत अन्य निर्णयों से निश्चय ही देश को वो मान मिला जिसका वो वर्षों से हक़दार था।      भारतीय संविधान में देश को सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न, लोकतंत्रात्मक, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी गणराज्य की संज्ञा दी गयी है किन्तु माँ भारती का महिमामण्डन करती ये पंक्तियाँ वास्तव में अब जाकर सार्थक सिद्ध हुयी हैं। आतंक के खिलाफ पहले भी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक समेत अनेक सराहनीय कदम उठाये हैं पर यह निर्णय बिना किसी हथियार के एक घातक प्रहार के समान है जो निश्चय ही पाकिस्तान के नापाक इरादों पर नकेल कसने में सफल साबित होगा।           इतिहास के पन्ने पलट कर देखा जाये तो भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी खासियत रही है कि जब-जब राष्ट्रहित की बात आती है तो विभिन्न दलों के प्रतिनिधि वैयक्तिक हितों का परित्याग कर एक ही मंच पर आ खड़े होते हैं। कश्मीर को लेकर हुए  इस बड़े फैसले के नए राजनीतिक मायने भी खुलकर सामने आये, बसपा और आप जैसे राष्ट्रीय दलों ने भी इस फैसले की सराहना की और सरकार के साथ खड़े नज़र आये। देश की आवाम को भी इस बात पर फक्र होगा कि उनके मत ने समानता के उस मौलिक अधिकार पर जमे उस धूल को साफ कर दिया जो सालों से जमे हुए थे और किसी ने इसके नैतिक सफाई की जहमत नहीं उठाई थी। वर्तमान भारतीय राजनीति भी संक्रमणकाल से गुजर रही है, आवाम भी आशा व आशंका के मिश्रित मनोभावों से नवीन भारत में अपना भविष्य तलाश रही है। नवीन सरकार के स्थापना के चन्द महीनों बाद ही यह ऐतिहासिक फैसला निश्चित रूप से सुकून देने वाला है।           सरकार के इस फैसले से निश्चित तौर पर पाकिस्तान और उसकी कुख्यात ख़ुफ़िया संगठनों के खतरनाक मंसूबों को तगड़ा झटका लगा है और वो पलटवार के लिए तैयार होंगे। अंग्रेजी में एक कहावत है "Prevention is better than Cure" अर्थात् सुरक्षा से सतर्कता बेहतर होती है, इस बात को नज़रअंदाज़ न करते हुए सरकार को आतंरिक तौर प्रत्येक भावी सामरिक परिस्थितियों की लिए भी तैयार रहना चाहिए। राष्ट्रीय स्वाभिमान का स्तर इतना उच्च हो कि देश का प्रत्येक व्यक्ति आन-बान-शान से सिर उठाकर कह सके "सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं मिटने दूंगा, मैं देश नहीं मिटने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा।"                                                                              - अंकित भोई 'अद्वितीय' महासमुन्द (छत्तीसगढ़)

जीवन जीने की कला
 31 July 2019  
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कुछ लोग तो जीते जी मर जाया करते हैं पर ऐ यार हम तो मरने के बाद भी जीने की तमन्ना रखते हैं यह तभी संभव है जब हम खुद में शांति बनाए रखें।खुशी और शांति तो हममें ही होती है पर हम उसकी उपेक्षा करके उसे बाहर ढूंढते रहते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कौवे के मुंह में दांतों को ढूंढना हमारी एक खोज तभी सार्थक होगी जब हम लोग मृग मरीचिका की ओर दौड़ना छोड़कर स्वयं में स्वयं को ढूंढने का प्रयास करें। हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि, पीस भगवान की दी हुई गिफ्ट नहीं है यह तो हमारी गिफ्ट है दूसरों के लिए और हमें बाह्य सौंदर्य से आकर्षित न होकर आध्यात्मिक सुंदरता से प्रभावित होना चाहिए तभी हमारा किसी के प्रति प्यार अपनापन चिरकाल तक रह सकता है। जीवन जीना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि यह कई बाधाओं से ,कष्टों से भरा हुआ है और यह कहना कि इनकी उपेक्षा करनी चाहिए तो यह इसका हल नहीं है अगर किसी समस्या का हल निकालना है तो जिस स्तर पर समस्या उत्पन्न हुई है उसी स्तर पर रहकर उसका हल नहीं निकल सकता ।उसका हल निकालने के लिए हमें उससे एक स्तर ऊपर आना होगा और यह मुश्किल भी नहीं है, अगर हमारे जीने का उद्देश्य हमारा लक्ष्य बड़ा है हमारी महत्वाकांक्षा ऊंची है हमारे किसी को किए हुए वादों में गहराई है और हमारे प्रयत्न किसी के पथ प्रदर्शक हैं। यह सब तभी संभव है जब मानसिक स्तर पर शांति हो और शांति तभी संभव है जब हमारा शरीर रिलैक्स्ड हो ,काम हो और यह तब संभव है जब हम योग आदि गतिविधियों से जुड़े। आज की व्यस्त जिंदगी ने हमें इतना मशगूल कर दिया है कि हमारे लिए हमारे शरीर की कोई अहमियत ही नहीं रह गई है पर समझने की बात यह है कि, अगर मशीन भी चलाते हैं तो उसे भी सर्विसिंग की जरूरत होती है सिर्फ पैट्रोल, ऑयल से काम नहीं चलता वैसे ही हमारा शरीर भी सर्विसिंग चाहता है । योग व्यायाम के रूप में क्योंकि यही है जो शरीर के सारे कल पुर्जों को चुस्त-दुरुस्त रखता है ।आप सोच रहे होंगे कि जीवन जीने की कला पर बोलना है और यह कहां पहुंच गईं । पर मेरे मित्रों अगर हम मकान को आलीशान बनाने की बात करें पर उसकी नींव  की मजबूती की उपेक्षा करें तो वह मकान कब तक मकान बना रहेगा। तो मैं अपनी बातों को यही कहते हुए विराम देती हूं कि शांति, धैर्य,खुशी ,योग यही मूल मंत्र है जीवन को सफल बनाने के श्री श्री रविशंकर ने क्या खूब कहा है -"खुद के घर को भगवान का घर बनाओ वहां हमेशा प्रकाश प्यार और उन्नति होगी ।खुद के शरीर को भगवान का मंदिर बनाओ और वहां हमेशा शांति और आध्यात्मिक खुशी होगी। खुद के माइंड को भगवान का खिलौना समझो तो हम उसके सारे खेल को देख और एंजॉय कर सकते हैं।

snjha- baati poetry book ka review
 24 July 2019  
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संझा -बातीपारुल तोमर                                                                     apn publication                                                                                         उत्तम नगर ,दिल्ली -५९                                                                                     मूल्य -२६० डॉ पारुल द्वारा रचित संझा -बाती पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भारतीय संस्कृति में रची -बसी ,संवेदनाओं के सुरों से सुसज्जित पहली बारिश सी की यादों सी पारुल जी की कवितायेँ कहीं खनकती हैं कहीं सावन सा बरसती हैं।  संझा -बाती की सभी कविताएं एक जीवन को जीते हुए मानवता का सन्देश देती है। गाँव की मिटटी की खुशबू ,आत्मीय रिश्ते ,मिश्री सी घोलती ,ग्रामीण परिवेश की शब्दावली ,ऐसा लगता है आंखों के आगे कोई पिक्चर चल रही हो। चूँकि डॉ पारुल एक श्रेष्ट चित्रकार भी हैं अतः चित्रात्मकता उनके काव्य का विशिष्ट गुण है। हालांकि चित्र खींचने में कही -कहीं काव्य की लय गद्य का रूप लेती हुई प्रतीत होती है। प्रकृति प्रेमी पारुल जी कविताएं जड़ों से जुड़ी संस्कार को पोषती है। सहज -सरल बोधगम्य शैली पाठको के दिल को छू जाती है। कहीं -कहीं दर्शन ज्ञान भी चमत्कार उत्पन्न करता है। जो पारुल जी के विषयगत असीम ज्ञान व् असीमित शब्दावली को दर्शाता है। संग्रह में 'जब तुम आ जाते हो ', 'हम सावंली सी लड़कियां ', 'तुम ही तुम ', एक ऐसा ख्वाब रचाये ,'बेटी जब पीहर जाती है ', ईश्वर , 'मैं नायिका हूँ ', शक के अंकुर ', उसने कहा ,' बिखर रही हूँ मैं ', आदि समय ,समाज और संवेदनाओ को कैनवास पर उकेरती कविताएं हैं। पारुल जी की कविताओं में स्त्री विमर्श ,प्रकृति प्रेम ,मानवीय सम्बन्धो की ऊष्मा ,दलित -व् दबे कुचले वर्ग के लिए सहानुभूति ,मानवता ,सामाजिक सरोकारों से जुड़ी एक लय है जो पाठकों को अंत तक बांधे रखती है। पारुल जी का सकरात्मक नजरिया ,जीवन में आशावाद ,उनकी जिजीविषा ,उन्हें खास बनाती है। उसने कहा शीर्षक कविता किशोरावस्था पर लिखी अनेक रंगो को समेटती सुन्दर कविता है -"उसने कहा फूलो से खिलो वह हँसी बन खनक गयी "'तुम ही तुम ' रचना की निम्न पंक्तियाँ प्रेम से पूर्ण दाम्पत्य जीवन की सफलता को दर्शाती है -" हर शब्द में तुम ,हर भाव में तुम मैं सरगम चाहे कोई रचूं हर गीत में तुम ही तुम मुस्कराते हो "पारुल जी की शब्दावली व् लेखन शैली से जो माटी की खुशबु आती है ,मन को उसी समय में यत्र कराती ,गाँव का भोलापन याद दिलाती है -" पूस की फूस के छप्पर के नीचे बान की खुर्री खाट पर बैठकर राब को गुड़ में तब्दील होते देखकर नारंगी चाशनी में खदबदाते बुलबुलों के फूटने की आवाज़ पर लड़की मचलने लगी थी "संझा -बाती परम्परा का महत्व बताती ,मुझे भी मेरे गाँव की गलियों में ले गयी। आज की पीढ़ी क्या जाने संझा -बाती ,दीप और ढिबरी ,घर के आले और दलान। वैसे भी आजकल गाँव भी शहरीकरण की चपेट में आ गए हैं। वो गाँव का भोलापन बंद मकानों और शहरी सुविधाओं में कही खो गया है -दीप और ढिबरी जला जलाकर घर के मंदिर और आले में सजाते सुरमई सांझ से डरा सुना सा घर प्रकाश के अर्थ और संदर्भ पाकर खिल खिल हॅसने लगता "पारुल जी का स्त्री विमर्श गजब का है। सिर्फ आदर्शवादिता के नाम पर स्त्री का सदियों से शोषण होता आया है। आधुनिक नारी परम्पराओं के नाम पर सटी नहीं होती बल्कि संघर्ष करते हुए अपनी जमीं अपना आसमां पाना चाहती है।  मुझे प्रेम करना और निभाना दोनों ही बखूबी आता है मैं जीवन जीना जानती हूँ क्यूंकि मैं एक स्त्री हूँ 'नदी खुश रहती है ' में पारुल जी का दर्शन साफ़ झलकता है। स्वतंत्रता कभी कभी उच्श्रंखल हो जाती है,सीमाओं में रहकर ही अस्तित्व बना रहता है -किनारे कभी नहीं समझ पाए कोई दायरों में और पराधीनता में कैसे खुश रह सकता है वे अस्तित्व को लेकर आज भी अकुलाये हैं स्तब्ध हैं कि हमारी पहचान नदी से है या नदी हमसे है कुछ पंक्तिया मुझे बहुत अच्छी लगी जो निम्न हैं -" प्यार और विश्वास भी ज़रूरी होता है कभी -कभी जीतने के लिए किसी अपने को पाने के लिए "+++++++++++++++++जीत जाये हम जीवन संघर्ष तो कविता है सृष्टि की श्रेष्ठ करती शेष है तो कविता है +++++++++++++++++++++कभी -कभी कविता सुनने -बुनने और गढ़ने से कहीं अधिक कठिन हो जाता है खुद कविता का हिस्सा होना __-----------------------------------सुनो हे धरती पुत्र देवी मत बनाओ मुझे माँ ,बेटी ,बहन ,पत्नी ,और प्रेयसी रहने दो देवी पूजन और विसर्जन के लिए होती है देवी घर में हमेशा कोण रखता है भला और अंत में आओ फिर एक ऐसा ख्वाब रचाये भारतवर्ष को शीर्ष पर पहुंचाए। 

डियर एक्स

डियर एक्सअब मुझे तेरी खामोशी सता रही है।कई अरसे बाद तेरी याद आ रही है।सुना है आजकल तू भी सिंगल है।या फिर तू मुझसे कुछ छिपा रही है।डियर एक्सबोल न चुप क्यों हैखुद पर मुझे इतना भरोसा है किकभी न कभी मैं तम्हें जरूर याद आता होऊंगा।बहाना कोई भी हो,चाहे मेरा जन्मदिन हो याफिर मेरे इंस्टाग्राम पर डला स्टेटस हो।बोल न चुप क्यों हैडियर एक्समुझे पता है तुम भूली नहीं होगी।इतना कमजोर प्यार नहीं था तुम्हारा।वो बारिश के दिन,तेरे मेरा छत पर आ जाना।फिर पागलों की तरह हरकतें करना।उस वक्त हम एक दूसरे को पागल नहीं लगते थेबल्कि इन हरकतों से हमारा प्यार बढ़ रहा था।हम छत की मुंडेरों से बेख्याली से एक दूसरे को देखते थे।फिर अचानक जब नज़रें मिलती तो तुम्हारे होठों पर एक हंसी, एक शरम होती थी।तमाम बातें जो तुमने मोबाइल से मेसेज की थी।तुम भूली नहीं होगी.....बोल न चुप क्यों हैडियर एक्सतुम्हें सब याद होगा मुझसे भी ज्यादामगर शायद तुम याद करना नहीं चाहतीतुम्हें लगता होगा कि मैं तुम्हारी सबसे बड़ी गलती रहा हूँ।सुना था नया यार मिला था तुम्हें।फिर से कोई सच्चा वाला प्यार मिलाथा तुम्हें।बोल न चुप क्यों हैडियर एक्सतुम्हें उस वक्त जरूरत थी प्यार की।उसने तुम्हे बहलाया होगा।तेरे आँसू पोंछे होगें, तुझे अपनाया होगा।फिर तुझे कोई सपना दिखाकर तुमसे दूर हो गया होगा.....बोल न चुप क्यों हैडियर एक्सतूने अपनी सारी फोटोज उसे भी दिख दी होंगी।जो तूने मुझे फेसबुक पर ये कहकर दिन थी कि किसी को मत बताना.....उसे भी तूने कहा होगा कि मुझे कुछ नहीं चाहिए तेरे प्यार के अलावा...हैं नबोल न चुप क्यों हैडियर एक्सक्या वो भी मेरी तरह तेरे तसव्वुर के लिए हर पल बेचैन रहता होगा।क्या वो भी तेरे घर के सामने घंटो तेरा इंतज़ार करता होगा।इस उम्मीद से कि कब तू खिड़की खोलेगी और तेरा दीदार उसे होगा।बोल न चुप क्यों हैडियर एक्सउसने भी कहा होगा तेरी सूरत से नहीं तेरी सीरत से प्यार करता हूँ।तेरी औकात से नहीं तेर जज्बात से प्यार करता हूँ उसने ये भी कहा होगा।अच्छा छोड़,क्या तू भी उसके कॉल का इंतज़ार करती होगी जैसा मेरा किया करती थी।तू उसे भी इतने सारे फ़ोन कॉल्स करती होगी जितने मेरे मोबाइल पर रिंग करते थे।उसने भी किये होंगे साथ जीने मरने के वादे....झूठी कसमें भी खाई होंगी....बोल न चुप क्यों हैडियर एक्समगर सुन,एक वक्त वो भी आया होगा जब उससे तेरी बात नहीं होती होगी।वो तुम्हें छोड़ गया होगा या फिर तुम किसी की हो गई होगी।फिर तुमने किसी और से भी ये उसके बारे में वही कहती होगी जो मेरे बारे में उससे कहती थीं।बुरा सपना......गलती या फिर कुछ था ही नहींबोल न चुप क्यों हैडियर एक्सशिकायत नहीं तुझसे, बुरा भी नहीं कह रहा हूँसबसे अच्छी सीख दी है तुमने मुझेतुम खुश रहो,आजाद रहोबस जैसे अभी as a friend कहकर बात करती हो तो अच्छा लगता हैतू बेबफा है ये नहीं कह सकताबात ये है कि मैं ही वफ़ा के लायक नहीं था।परवाह नहीं है, फर्क नहीं पड़ता ये भी नहीं कहूंगा।तुमसे बिछड़ के इतना अकेला था कि अब डर नहीं लगता।फिर भी अगर कोई गिला शिकवा हो तुम्हें तोबोल न चुप क्यों हैडियर एक्सअलविदाथा तुम्हें।बोल न चुप क्यों हैडियर एक्सतुम्हें उस वक्त जरूरत थी प्यार की।उसने तुम्हे बहलाया होगा।तेरे आँसू पोंछे होगें, तुझे अपनाया होगा।फिर तुझे कोई सपना दिखाकर  तुमसे दूर हो गया होगा.....बोल न चुप क्यों हैडियर एक्सउसने भी कहा होगा तेरी सूरत से नहीं तेरी सीरत से प्यार करता हूँ।तेरी औकात से नहीं तेर जज्बात से प्यार करता हूँ उसने ये भी कहा होगा।अच्छा छोड़,क्या तू भी उसके कॉल का इंतज़ार करती होगी जैसा मेरा किया करती थी।तू उसे भी इतने सारे फ़ोन कॉल्स करती होगी जितने मेरे मोबाइल पर रिंग करते थे।उसने भी किये होंगे साथ जीने मरने के वादे....झूठी कसमें भी खाई होंगी....बोल न चुप क्यों है

मेरी सब यादगार घटनायें अंतराल में कैद हैं। फिर भी बताती हूँ....
 22 July 2019  
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प्र. आप का पूरा नाम?उ. पूनम ‘पूर्णाश्री’प्र. जन्म दिन?उ. 13 नवम्बर 1966प्र. जन्म भूमि और माता पिता के बारे में बताएं?उ. मेरी जन्म भूमि अलीगढ़ जिले के अन्तर्गत आने वाला कस्बा अतरौली है। मेरी मां घरेलू महिला और पिताजी सरकारी मुलाजिम थे।प्र. बचपन का कोई यादगार लम्हा?उ. मेरी सब यादगार घटनायें अंतराल में कैद हैं। फिर भी बताती हूँ जब में रसोईघर की खिड़की पर चढ़ कर नाच रही थी और गिर गई थी। दूसरी यादगार घटना है कि मेरे न चाहते हुये मेरे रेशमी बाल नाई द्वारा बेतरतीब ढंग से काट दिये गये और मैं बहुत दुखी हुई । दोनों चोट गहरी थीं।प्र. आप की प्रारम्भिक शिक्षा की शुरुआत और शिक्षा संघर्ष के बारे में विस्तार से बताएं ताकि हमारे विद्यार्थियों को कुछ सिखने को मिले?उ.  मेरी प्रारभ्भिक शिक्षा अतरौली के चुंगी स्कूल (नगरपालिका) में हुईलेकिन हमारी शिक्षा में शुरू से अन्त तक संघर्ष ही संघर्ष था। आवश्यक संसाधनों का अभाव, बालिकाओं के प्रति समाज का नजरिया, कस्बे में पर्याप्त स्कूलों का प्रभाव हमारी शिक्षा में रूकावट पैदा करता था।प्र. आप के जीवन में साहित्य का जुड़ाव कैसे हुआ? लिखने की प्रेरणा कहां से मिली?उ.  मुझे याद नही है कि साहित्य का जुड़ाव कहाँ से और कैसे हुआ लेकिन पढ़ने की आदत ने मुझे साहित्य के करीब ला दिया। अपनी कोचिंग क्लास में टीचर की बुक शैल्फ से विमल मित्र, शरदचन्द और प्रेमचन्द के उपन्यासों का ही चयन करती थी। प्र. आप के परिवार में और कौन-कौन साहित्य में रुचि रखते हैं?उ.  मेरी बहन भी साहित्य में रूचि रखती है और लिखती है।प्र. साहित्य से सम्बंधित किन परेशानियों का आप को सामना करना पड़ा?  उ.  साहित्य सम्बन्धित परेशानियाँ विषय कोई भी हो वहीं खड़ी मिलती हैं। आज काम से ज्यादा नाम बिकता है, मुझे बस लिखना अच्छा लगता है सो लिखती हूँ।प्र.  आज के साहित्य को आप किस नजरिए से देखती हैं?उ.  आज के साहित्य में समाज के बदलाव की संभावना नजर आती है।प्र. आज डिजिटल और सोशल मीडिया के आ जाने से साहित्यकारों के लिए क्या एक नया अवसर है?  उ. हाँ सोशल मीडिया के आने से स्वतन्त्र और गुमनाम लेखकों कोएक नाम और पहचान मिलती है जिससे वे प्रोत्साहित होते हैं।प्र.  कविता लिखना ज्यादा अच्छा लगता है या कहानी?उ. मुझे कवितायें रचना पसन्द है क्यों कि वह थोड़े में ही बहुत कह  जाती हैं। मगर विस्तृत विषय पर कहानी भी लिखती हूँ।प्र.  आप की पहली रचना और वह कैसे प्रकाशित हुई?उ. मेरी पहली रचना ‘फूल की पुकार’ एक कविता थी जो जनसंख्या पर केन्द्रित थी। बढ़ती हुई जनसंख्या पर आधारित विषय पर एक समाचार पत्र ने इसे प्रकाशित किया।प्र.  अपनी पुस्तकों के बारे में बताएं?उ.  मेरी पहली पुस्तक ‘कविता कानन’ थी जो ग्यारह कवियों का संयुक्त काव्य संग्रह थी। मेरी दूसरी पुस्तक अंतराल है जो मेरे बचपन की स्मृतियों पर आधारित संस्मरण हैं। अंतराल पिछले चालीस सालों में आये समय के बदलाव को भी चिन्हित करती है।प्र. साहित्यक सम्मान और पुरस्कारों से आप का क्या नाता रहा है?उ. पाठकों का प्यार व सराहना ही एक लेखक के लिये सबसे बड़ा सम्मान होता है। हाँ पुरस्कार मिलने से आत्मविश्वास में वृद्धि अवश्य होती है। मुझे अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र लेखक मंच पर‘पर्यावरण मित्र सम्मान’ और ‘सरस्वती रत्न’ सम्मान दिया गया है।प्र. लिखने के लिए समय कैसे निकालती हैं?उ.  हां ये बात तो सही कही आपने। डिजिटलाइजेशन और सोशलमीडिया के इस युग में आपका समय सिर्फ आपका ही नही है। लाइन बहुत लंबी है मगर लेखक के लिये समय निर्धारण आवश्यक है। मैं भी अपनी ग्रहस्थी के कुछ घन्टे निकालकर लेखन में देती हूँ। प्र. वर्तमान में आप क्या लिख रही हैं?उ.  वर्तमान में मेरे पास कई विषय हैं जिन पर मैं काम कर रही हूँ। भविष्य में उनको मूर्त रूप देना चाहूँगी। प्र. और आप की ऐसी कोई अभिलाषा जिसे आप लिखना चाहती हों?उ.  क्यों कि मैं एक औरत हूँ अतः यही मेरा विषय है और मैं भारत की जिम्मेदार नागरिक हूँ अतः पर्यावरण को लेकर अवश्य ही कुछ लिखना चाहुंगी।  प्र. क्या आप कवि सम्मेलनों में भाग लेती हैं? उ. सालों पहले कवि सम्मेलन हमारी साहित्यक गतिविधियों काहिस्सा थे अब नही। प्र. आप के साहित्यक मित्रों के बारे में बताएं? उ. मेरे साहित्यक मित्र साहित्य से ही है और साहित्य में ही हैं और सभी के अनुभवों के सानिध्य में मुझे भी बहुत सीखने को मिला। प्र. एक लेखिका होने के नाते भारत की वर्तमान व्यवस्थाओं के बारे में आप की क्या राय है और आप किस बदलाव की उम्मीद करती हैं?  उ. एक लेखिका होने के नाते मैं लड़कियों की सुरक्षा हेतु कड़े नियम और कानून व्यवस्था में बदलाव चाहती हूँ। प्र. हमारी मातृभाषा हिंदी के बारे में क्या कहना चाहेंगी?उ.  मैं हिन्दी लेखिका हूँ साथ ही हिन्दी भाषी और हिन्दी प्रेमी भी। हिन्दी पर अधिक जोर रहे क्यों कि ये मधुर भाषा है। हिन्दी के बारे में एक लाइन ‘जग घूमया थारे जैसा न कोई प्र. आप की व्यवसायिक और कार्यक्षेत्र के बारे में बताएं?उ.  मेरा कार्यक्षेत्र मेरा समाज है जरूरतमंदों के लिये काम करना औरसमाजसेवा ही मेरा व्यवसाय है। प्रदूषण मुक्त भारत और जलयुक्त जीवन के बारे में अनभिज्ञ लोगों को जागरूक करना ही मेरा कर्म है। प्र. नये लेखकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?उ.  लेखन जन्मजात नही होते परिस्थितिजन्य ही होते है, अपनी भावनाओं को व्यक्त करना ही लेखन है। जो सोचते हैं, जैसा सोचते हैं कागज पर उतार दीजिये जरूरी नही महाकाव्य की रचना हो कुछ तो अवश्य ही रचित होगा। प्र.  स्टोरीमिरर पर लिखने का कैसा अनुभव रहा?उ.  स्टोरी मिरर के साथ काम करने का अपना ही आनन्द है। यदिमाहौल दोस्ताना हो तो सीमायें नही रहती। यह भाव साहित्यक क्षेत्र के लिये सर्वथा उपयुक्त है।  प्र. स्टोरीमिरर के बारे में कुछ कहना चाहेंगी? उ.  स्टोरी मिरर नवागत लेखकों के लिये वह सही मंच है जो उन परभरोसा कायम कर उनकी भावनाओं का सम्मान करता है। स्टोरी मिरर स्वतन्त्र लेखन की सीमा को लेखन द्वारा निर्धारित करने की स्वतन्त्रता देता है।

"मेरे पंख,मेरा नीड़" #मन कि बतियां"
 21 June 2019  
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आज रात जो में उड़ती पाटी,एक दृश्य दर्शक का रुख़ करता है,मेरे हाथ मेरे पंख बन जाते हैं,में उड़ती सागर पर,उन लम्हों की साक्षी बनती हैं।जो मानव का आधार बना,उन सिसकियों को ठिठकर सुनती,जो पत्थरों के दिलों में क़ैद हे।उन विशाल झरनों तक जाता है,जिनका जल, ज़मीन छूने को लालित्य है।और बूंदें आकाशों को हासिल करती हैं,जब इतनी दूर उड रही होती है तब भी,अपना आंगन याद आता है।तुलसी का चौरा, बगिया की मिट्टी,द्वार की सांकल खिड़की का पर्दा सब,तुम, सब, बच्चे,तुम्हारे साथ चाय की प्याली की चुस्कियां।माँ से मिले कपड़े की, मड का दुलार,हौले से उतार लाते है,मेरे डैने अपनी छत पर ही ...। घर मेरा अपना है,मेरा सच है... साजिदा अकरम                           

जीवन का गणित प्लस या माइनस
 21 June 2019  
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जीवन का गणित प्लस या माइनस.....जीवन में कुछ अच्छे ,कुछ कम अच्छे लोगों से मिलना होता है ।जिनके विचार हमे पसंद आते हैं ,हम उनका साथ पसंद करते हैं या ये कह लिजिए हम उन्हीं से जुड़ते हैं जो हमारे विचारों से मेल खाते हैं।जिनके साथ हमें खुशी मिलती है उनको हम अपनी  जिंदगी मे जोड़ते जाते हैं।जिनके आने से हम दुख में घिर जाते हैं या हम विचारों को मिला नहीं पाते उसे जिंदगी से माइनस करते हैं। ये जिंदगी का गणित है।जब तक कोई आपके जीवन में या आप किसी के जीवन में दखलंदाजी नहीं करते तब तक आप एक दूसरे के लिए अच्छे हैं।किसी भी रिश्ते में मर्यादा की एक रेखा होनी चाहिए ,चाहे वह कोई अपना सगा ही क्यों ना हो। रिश्तो में जरा सी पूरी जरूरी होती है।जब रिश्तों के लिए हमारे दिमाग में जोड़, घटाव होने लगते हैं , होने लगती है तब समझ लिजिए कि रिश्ते कमजोर होने लगते हैं।दिल कम ,दिमाग ज्यादा काम करता है तब रिश्ते कभी मजबूत नहीं होते।दिल की भी सुननी चाहिए।दिल से सुनने पर छोड़ ,घटा ,फायदा नुकसान नहीं देखे जाते।कभी नुकसान भी हो तो भी रिश्ते में फायदा ही होता है।बहुत देखा है कि हमारे आस पास के लोग हमसे फायदा हो तब रिश्ता रखते हैं।जब हमसे काम ना हो तब दूर हो जाते हैं।ये भी जीवन का गणित ही है । कुछ गुणा होते जाते हैं। कुछ घटा कर दिये जाते हैं।ये सब हमारा जीवन है जिनमें कौन आयेगा कौन जायेगा सब हम पर निर्भर करता है। पहले कि लोगों में अपनापन बहुत था। एक दूसरे के लिए सहनशीलता बहुत थी। पहले एक दूसरे को प्यार करते थे जल्दी से उनकी बातें बुरी नहीं लगती थी। कोई भी बड़ा किसी छोटे को सलाह दे सकता था ,डांट सकता था। पर आजकल आप किसी के बच्चे को उसकी गलती पर डांट नहीं सकते क्योंकि उसके माता-पिता यह बर्दाश्त नहीं कर पाती कि उसके बच्चे को किसी ने कुछ कहा ।चाहे बच्चे की ही गलती क्यों ना हो ।आजकल अपनेपन की परिभाषा बदल गई है।कभी-कभी हम नकारात्मकता से भरे लोगों को भी अपने से हटा देते हैं और हटा देना चाहिए क्योंकि उनकी वजह से आप मानसिक तनाव में आ जाते हैं और उनका काम सिर्फ कमियां निकालना ,कमियां ढूंढ ना होता है दुसरो में।हर किसी के गुणो मे कुछ अच्छे और कुछ बुरे गुण होते है, उन सबके देखने का नजरिया भी अलग,   और ये भी जरुरी नही जो व्यक्ति दुसरे के लिये बुरा हो तो हमारे लिये भी वैसा हो..जिसके विचार जिससे मिले वो अच्छा, ना मिले विचार तो उसमें लाख कमियाँ दिखाई दे जाती है..।जब तक वो आपकी राय मे साथ दे वो सबसे प्यारा होता है,.प्लस यानि अच्छे गुण , और माइनस यानि बुरे ..माइनस को नजर अन्दाज कर ने मे ही, जीवन का हल छुपा है इसलिये  केवल प्लस  को देखकर जीवन को खुश रखा जा सकता है। सारी जिंदगी हम ये ही करते है ,कुछ जिंदगी में रखते हैं कुछ को जिंदगी से निकाल देते हैं।इसलिए कहते हैं जीवन का गणित प्लसया माइनसमौलिक रचनाअंशु शर्मा

"अनकही बातें"माय ब्लॉग
 25 May 2019  
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स्त्री ही तो फर्क करती है .अगर दिया होता बेटी, बहन, माँ, बहु को सम्मान तो समाज में कुछ और स्थिति होती ।न ये मामला आता है लड़के के लड़के तो गाय ही होती है चाहे वो तेड़ा ही हो माता-पिता आज भी अपने बूढ़ापन की लाठी समझते हैं अक्सर औरतें या यूँ कहें बड़े-बुधि आज भी जहाँ घर में एक से दूसरी लड़की हुई नहीं उसके बेटे की टेर लग रही हैं, ये अक्सर सास ही अपनी बहुओं को बात बे बात पर ताने मारने लगती हैं। कहीं एक बेटा होता है तो हमारे वंश का नाम तो उठता है, लेकिन ये कम अक़्लों को कौन समझाये ..... इस 'मेरी' कविता"घी का लड्डू टेड़ो भलो,लड़के "घी" के लड्डू होते हैं,और हम "लड़कियां?स्त्री ही बेटी की तुलना मेंधड़कता है, बेटों को ऊँचा रेटेड,हर तरह से स्त्रियाँ हैं।सभी मापदंड का स्रोत हैं, फिर क्यों बिसुरती हैं,अपने अधिकार के हनन से?क्यों सहती है?माँ, बहन, बेटी, बहु के रूप में पीड़ा।महिला ही कहती हैं ......"घी का लड्डू टेढ़ा भलो"फिर बिसलाई क्यों है?यही नियति स्त्री को गर्त में ले जाती है।यदि दिया  होता बेटी, बहु,बहन को स्त्री ने सम्मान न होता