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हारना नहीं...
 20 January 2020  

हमारी ज़िंदगी में कितनी बार ऐसा होता है, जब हम खुद को हारा हुआ महसूस करते है। जब हमें ऐसा लगता है बस अब हमारी ज़िंदगी में कुछ नहीं बचा हम पूरी तरह से टूट चुके होते है, हमें कोई रास्ता नहीं नज़र आता की अब हम क्या करे। मन में हज़ारों शिकायतें होती है दिल ग़ुस्से की आग में झुलझ रहा होता है। हमारी आत्मा भगवान से चिला-चिला कर बोल रही होती है, मेने क्या बुरा किया मेरे साथ ही क्यूँ? पर क्या उस पल में हम एक बार भी उन लोगों के बारे में विचार करते है जो नजने कितने कष्टों में अपनी ज़िंदगी मुस्कुराकर जीते है नहीं ना ! क्यूँ? हम केवल आधे पानी से भरे गिलास्स की ख़ाली हिस्से को ही देखते है, उसी के ख़ाली होने के ग़म को लिए बेठै रहते है जबकि हमें ये  देखने का प्रयास करना चाहिए कि ग़िलास आधा भरा भी तो हुआ हैं। जो हमारे पास है बहुत लोग एसे भी हैं जो वह पाने को तरसते हैं। दुःख हर किसी कि ज़िन्दगी में हैं पर सही नज़रिये से ही इसका सामना किया जा सकता है.....

राष्ट्रवाद बनाम धर्मवाद
 17 January 2020  
Art

इतिहास में कई बार यह प्रयास हुआ है कि धर्मवाद के सहारे राष्ट्रवाद को परवान चढ़ाया जाए लेकिन यह हमेशा असफल रहा है ।दुनिया के कई हिस्सो में धर्म को बुनियाद बना कर लोगों को मोटिवेट किया गया और एक मजबूत राष्ट्र बनाने का प्रयास किये गये;  कुछ समय के लिए उनको सफलता मिली लेकिन जल्दी ही वहां  आंतरिक असुरक्षा का माहौल बना; फित्ने पैदा हुए  ; संघर्ष हुए और वे राष्ट्र दुनिया के पश्मंजर में पिछड़ गए।ऐसे उदाहरण योरप से लेकर मध्य पूर्व की इस्लामी दुनिया में मौजूद है ।यह बात कहने का मेरा उद्देश्य यह है कि अगर आज के दौर में भी अगर कोई इसी बुनियाद पर किसी राष्ट्र को अग्रेषित कर एक मजबूत राष्ट्र बनाने की कोशिश कर रहा है तो वह भी वही भूल कर रहा है ।क्योंकि धर्म व राष्ट्र दो ऐसी संरचनाए हैं जो एक साथ मिलकर काम कर नही सकती । ऐसा क्यों इसे समझने के लिए हमे धर्म व राष्ट्र की अवधारणा को निष्पक्ष रूप से समझना होगा ।धर्म के बारे मे सोचते समय यह बहुत जरूरी है कि हम निष्पक्ष रहे लेकिन यह होना बहुत मुश्किल है ।निष्पक्ष रूप से अगर देखा जाए तो हम देखेंगे कि किसी भी धर्म ने अपने सिद्धांतो को किसी अन्य धर्म के सिद्धांतो से कम या बराबर होने की कोई गुंजाइश नही छोड़ी ।यानी अपने धर्म को सर्वोच्च मानना ही अपनी सच्ची वफादारी होता है । धर्म की यही बात धर्म को अधर्म बनाती है ।इसके बरक्स राष्ट्र अपेक्षा करता है कि  लोग समानता के आधार पर रहे;  एक दूसरे के विचारो का सम्मान करे । इस कारण से ही राष्ट्र के लिए हमेशा धर्म  एक समस्या ही रही है ।धर्म के  आधार पर राष्ट्र की कल्पना करने वाले  आगे चलकर  इसी द्वन्द का शिकार हो जाते है । राष्ट्रवादी विचारधारा हमेशा समझोतावादी होती है, वे बहुत हद तक धर्मवाद से सहिष्णुता के नाते समझौता करती है  लेकिन धर्मवाद ने हमेशा  उसका दुरुपयोग किया है ; मौका पाकर हमेशा धर्मवाद ने राष्ट्रवाद के लिए मुश्किले खड़ी की है ।आगे बढ़ने से पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहता हू कि आखिर धर्म मे ऐसा क्या है जो कि राष्ट्र को स्वीकार्य नही ।  इस हेतु मैं थोड़ा धर्म के गढ के  अंदर घुस कर बात करूंगा; किसी अन्य के धर्म को खंगालने से पहले मैं समझता हू कि अपने ही धर्म से शुरूआत करू ।मै एक मुसलमान हू; इसलिए कई दफे दीनी तकरीरो ;जलसो वगैरह मे शामिल हो लिया करता हू ; वहा कई बाते सुनने को मिल जाती है जो कि  एक राष्ट्र के लिए काबिल ए कबुल नही होती ।मसलन मौलाना साहब बड़े दावे के साथ फरमाते है कि दुनिया मे सच्चा धर्म तो सिर्फ इस्लाम ही है बाकी सब गुमराह है। जो नमाज नही पढता वो इंसान इंसान ही कहा ? इससे भी कड़वी बाते सुनने को मिल जाती है ।ऐसा सिर्फ यहीं नही बकिया धर्म भी कम नही !आजकल हिन्दू धर्म के प्रचारक बड़े दावे के साथ सुने जा सकते है कि सारे लोग मूल रूप से हिन्दू ही है इसलिए सब को हिन्दू ही हो जाना चाहिए; राम तो सभी के पूर्वज है ; सभी को ब्रह्मा ने ही पैदा किया है; इससे आगे तक की बाते सुनी जाती है ।सब धर्म इसी प्रकार की बातो से चलते है ।जो बहुत संकीर्ण सोच की हामिल होती है ।यही वह वजह है जो आदमी आदमी के बीच खाई पैदा करती है; वैचारिक मतभेद व संघर्ष पैदा करती है और राष्ट्र की परिकल्पना के लिये बाधा उत्पन्न करती है ।               पिछले कुछ दसको से भारतीय जन मानस को भी  इसी धर्मवाद की तर्ज पर संगठित करने का प्रयास किया जा रहा है ।लेकिन  इन का भी यही हाल होने वाला है । भारतीय समाज बहुत सी संकृतियो का मिश्रण है । यहा सभी धर्मो के लोग रहते है ; इस कारण धार्मिक द्वन्द व वैचारिक वैमनस्य का बहुत अधिक खतरा रहता है । इन परिस्थितियो मे राष्ट्र के  अस्तित्व को बचाने के लिए धर्म पर चैक  एंड बैलेंस  की पोलिसी लागू करना चाहिए । आजादी के बाद राष्ट्र निर्माताओ व संविधान निर्माताओ ने इसे  समझा भी और चैक व बैलेंस की नीति लागू करने के लिए प्रावधान भी किए । लेकिन समय के साथ यह कमजोर होते  गए। इन्ही परिस्थितियो मे राष्ट्रवादी लोग दरकिनार होते गए और धर्मवाद का प्रयास तेज होता गया ।धर्मवादी फिर  उसी गलतफहमी का शिकार हो गए कि वे धर्म के सहारे मजबूत राष्ट्र का निर्माण कर लेंगे । और यह लाॅबी इसी गुमराही मे उलझी हुई है ।आज यह बहुत जरूरी है कि लोगो को समझाया जाए कि धर्म की बुनियाद पर सफल राष्ट्र खड़ा नही किया जा सकता । कुछ समय के लिए हमे  ऐसा लगता है कि हम अपने मकसद मे सफलता पा रहे है लेकिन  आगे चलकर इस मार्ग मे बहुत खतरनाक हालात पैदा हो जाते है ।भारतीय परिवेश मे अगर धर्मवाद को  स्वछंद किया जाए तो हम देखेंगे कि इस्लाम परस्त हिदुत्व को मिटाने की चेष्टा करेंगे  ,हिन्दुत्व इस्लाम का अस्तित्व मिटाने की चेष्टा करेगा ; इतना ही नही दलित का अस्तित्व स्वर्णो को गवारा नही;  और यहीं से मानविय संघर्ष पैदा होता है और ये सब राष्ट्र के अस्तित्व को ध्वस्त करते है।यहां एक और बात भी महत्वपूर्ण है;  हर दौर मे समाज मे क्राईम मौजूद रहता है; क्राइम अपने आप को बचाने के लिए धर्म की आड़ आसानी से प्राप्त कर लेता है और वह धार्मिक वैधानिकता हासिल कर लेता है जो कि  एक राष्ट्र के लिए काबिल ए कबुल नही हो सकता ।           राष्ट्रीय महत्व के लिए धर्म पर चैक एंड बैलेंस रखना कोई नई बात नहीं है । भारतीय  इतिहास मे जितने भी महान साम्राज्य हुए है  उन सभी ने अपने अपने तरीके से धर्म पर कड़ी नजर रखी है । उन्होंने हमेशा  उन धार्मिक विचारो  को राज्य व राष्ट्र की नितियों से दूर रखा जो कि प्राकृतिक न्याय के अनुरूप नहीं होते थे ।भारत एक विविध संस्कृतियों व धर्मो वाला देश है ।अगर कोई यह समझे कि यहा धार्मिक मान्यताओ को हवा दे कर सफल राष्ट्र कायम रखा जा सकता है तो यह  उनकी गलतफहमी है । अगर कोई सरकार अपनी जनता को कल्याणकारी व प्रगतिशील राष्ट्र देना चाहती है तो उसके लिए यह जरूरी है कि वह धार्मिक मिथ्या व संकीर्ण धारणाओ को हवा देने के बजाय  उनको रोकने की कोशिश करनी चाहिए ।देश के जनमानस मे विज्ञान व तर्क के आधार  प्रगतिशील विचारो का संचरण किया जाना चाहिए । धर्म का मूल अंधविश्वास होता है;  कोई भी धर्म हो वह वर्तमान स्थिति को लेकर वास्तविकता को समझने के बजाय प्राचीन चमत्कारो की दुनिया दिखा कर मनुष्य को दैवीय शक्ति का भय दिखाकर उसकी विचारधाराको संकीर्ण व रूढ़िवादी बनता है ।                       आज के परिपेक्ष मे भारतीय जनमानस को यह चोला चढ़ाया जा रहा है जो कि भारतीय राष्ट्र के लिए बहुत ही खतरनाक साबित होगी ।हमे इस खतरे को समय रहते समझना चाहिए वरना हम देश को रूढ़िवाद व धार्मिक संघर्ष के भंवर मे फंस्सा बैठेंगे । देश के जागृत नागरिकों को देश मे वैज्ञानिक सोच व सामाजिक सहअस्तित्व की विचारधारा को बढ़ावा देना चाहिए ।भारत जैसे देश के लिए यह शोभा  नही देता  है कि वह मध्यकालीन  धार्मिक उन्माद को वापस स्थापित करे बल्कि  उसे राष्ट्रीय विचार की वैश्विक सोच को कायम करना चाहिए और धर्मवाद को स्वछंद न छोड़े बल्कि  उस पर चैक एंड बैलेंस की पोलिसी लागू करना चाहिए ।रहीम " नादान"                             

चंदनबाला
 31 December 2019  

चंदनबालाचंदनबाला वसुमती चम्पा नगरी की राजकुमारी थी. अचानक हुए एक युद्ध में चंपा के राजा की मृत्यु हो गयी और राजकुमारी बंधक बना ली गयीं. बाद में उन्हें कौशाम्बी नागर में धन्ना सेठ नाम के एक प्रसिद्द व्यापारी ने खरीद लिया और उनका नाम चंदनबाला रख दिया।सेठ राजुकुमारी को अपनी पुत्री की तरह मानता था पर उसकी पत्नी मूला को डर था कि कहीं सेठ राजकुमारी के प्रेम में ना पड़ जाए।एक बार जब सेठ व्यापार के सिलसिले में किसी दूसरे नगर गया हुआ था तब मूला ने राजुमारी का सिर मुंडवा कर बेड़ियों से बंधवा दिया. तीन दिनों तक राजकुमारी को भूखा-प्यासा रखा गया और अंत में उन्हें भुने हुए चने खाने को दिए गए।इधर महावीर कठोर तपस्या में लगे हुए थे और अपने पांच महीने के उपवास को तोड़ने के लिए घर-घर जाकर भिक्षा मांग रहे थे।अब तक उनकी कीर्ति दूर-दूर तक फ़ैल गयी थी और हर कोई इस तपस्वी को अच्छा से अच्छा भोजन कराने के लिए आतुर था; पर महावीर परिस्थिति और भोजन देखने के बाद आगे बढ़ जाते और कहीं भी अन्न ग्रहण ना करते।लोगों के लिए महावीर का यह व्यवहार समझ से परे था. वे ये नहीं जानते थे कि कुछ ख़ास परिस्थितियां पूर्ण होने पर ही वे अपना उपवास तोड़ते हैं, फिर चाहे ऐसा होने में महीनों ही क्यों न लग जाएं. महावीर मानते थे कि यदि प्रकृति उन्हें जीवित रखना चाहती है तो वह उनका प्रण ज़रूर पूरा करेगी।💡 माना जाता है कि भगवान् महावीर ने अपनी 12 साल की तपस्या में सिर्फ 349 बार ही भोजन ग्रहण किया था।अपनी तपस्या के ग्यारहवें साल में महावीर कौशाम्बी में थे, और उन्होंने प्रण किया था कि वे तभी अन्न ग्रहण करेंगे जब वह किसी राजकुमारी द्वारा दिया जाए –जिसेक बाल मुंडे हुए हों, जो बंधनों में जकड़ी हुई हो, जिसकी आँखों में आंसू हों और वह खाने के लिए भुने हुए चने दे।ऐसी शर्त पूरा होना बहुत कठिन था और महावीर पांच महीने पच्चीस दिनों तक कौशाम्बी में एक घर से दूसरे घर भटकते रहे।चन्दनबाला को भी यह बात पता थी कि महावीर अपना उपवास तोड़ने के लिए घर-घर भिक्षा मांग रहे हैं. और जैसे ही तीन दिनों की यातना के बाद उसे खाने के लिए चने दिए गए, उसके मन में यही विचार आया कि काश वह इसे उस तपस्वी को दान दे पाती और वह उसे स्वीकार कर लेते।वह ऐसा सोच ही रही थी कि महावीर सेठ के द्वार पर भिक्षा मांगते हुए पहुंचे. उन्हें देखते ही चंदनबाला प्रसन्न हो गयी और स्वयम भूख से व्याकुल होने के बावजूद वह उन्हें खाने के लिए चने देने को आतुर हो गयी।महावीर ने देखा कि इस बार खाने को लेकर उनकी सभी शर्तें पूरी हो रही हैं, सिवाय इसके कि चंदनबाला की आँखों में आंसू नहीं थे।महावीर इस बार भी वह अन्न ग्रहण किये बिना वापस जाने लगे. यह देख चंदनबाला को बहुत दुःख हुआ और वह रोने लगी. जब महावीर ने पलट कर उसे देखा तब वह वापस उसके पास गए और चने खाकर अपना प्रसिद्द व्रत तोड़ा।कालांतर में जब भगवान् महावीर को ज्ञान प्राप्त हुआ तब चंदनबाला ही 36000 जैन साध्वियों की पहली प्रमुख बनी।

मोम का शेर
 31 December 2019  

अकबर बीरबल के किस्सेमोम का शेरसर्दियों के दिन थे, अकबर का दरबार लगा हुआ था। तभी फारस के राजा का भेजा एक दूत दरबार में उपस्थित हुआ।राजा को नीचा दिखाने के लिए फारस के राजा ने मोम से बना शेर का एक पुतला बनवाया था और उसे पिंजरे में बंद कर के दूत के हाथों अकबर को भिजवाया, और उन्हे चुनौती दी की इस शेर को पिंजरा खोले बिना बाहर निकाल कर दिखाएं।बीरबल की अनुपस्थिति के कारण अकबर सोच पड़ गए की अब इस समस्या को कैसे सुलझाया जाए। अकबर ने सोचा कि अगर दी हुई चुनौती पार नहीं की गयी तो जग हसायी होगी। इतने में ही परम चतुर, ज्ञान गुणवान बीरबल आ गए। और उन्होने मामला हाथ में ले लिया।बीरबल ने एक गरम सरिया मंगवाया और पिंजरे में कैद मोम के शेर को पिंजरे में ही पिघला डाला। देखते-देखते मोम  पिघल कर बाहर निकल गया ।अकबर अपने सलाहकार बीरबल की इस चतुराई से काफी प्रसन्न हुए और फारस के राजा ने फिर कभी अकबर को चुनौती नहीं दी।Moral: बुद्धि के बल पर बड़ी से बड़ी समस्या का हल निकाला जा सकता है.

गौतम बुद्ध जी की कहानी।
 31 December 2019  

गौतम बुद्ध जी की कहानी।सुख की नींदएक बार गौतम बुद्ध सिंसवा वन में पर्ण-शय्या पर विराजमान थे कि हस्तक आलबक नामक एक शिष्य ने वहाँ आकर उनसे पूछा, ''भंते, कल आप सुखपूर्वक सोए ही होंगे ?"“हाँ, कुमार, कल मैं सुख की नींद सोया।"“किंतु भगवन्‌ ! कल रात तो हिमपात हो रहा था और ठंड भी कड़ाके की थी। आपके पत्तों का आसन तो एकदम पतला है, फिर भी आप कहते हैं कि आप सुख की नींद सोए ?''“अच्छा कुमार, मेरे प्रश्न का उत्तर दो। मान लो, किसी गृहपति के पुत्र का कक्ष वायुरहित और बंद हो, उसके पलंग पर चार अंगुल की पोस्तीन बिछी हो, तकिया कालीन का हो तथा ऊपर वितान हो और सेवा के लिए चार भार्याएँ तत्पर हों, तब क्‍या वह गृहपति पुत्र सुख से सो सकेगा ?”'हाँ भंते, इतनी सुख- सुविधाएँ होने पर भला वह सुख से क्‍यों न सोएगा ? उसे सुख की नींद ही आएगी।'“किंतु कुमार, यदि उस गृहपति-पुत्र को रोग से उत्पन्न होने वाला शारीरिक या मानसिक कष्ट हो, तो क्‍या वह सुख से सोएगा ?''“नहीं भंते, वह सुख से नहीं सो सकेगा।''“और यदि उस गृहपति-पुत्र को द्वेष या मोह से उत्पन्न शारीरिक या मानसिक कष्ट हो, तो क्या वह सुख से सोएगा ?''“नहीं भंते, वह सुख से नहीं सो सकेगा।''“कुमार तथागत की राग, द्वेष और मोह से उत्पन्न होने वाली जलन जड़ मूल से नष्ट हो गई है, इसी कारण सुख की नींद आई थी।"“वास्तव में नींद को अच्छे आस्तरण की आवश्यकता नहीं होती । तुमने यह तो सुना ही होगा कि सूली के ऊपर भी अच्छी नींद आ जाती है। सुखद नींद के लिए चित्त का शांत होना परम आवश्यक है और यदि सुखद आस्तरण हो तब तो बात ही क्या? सुखद नींद के लिए वह निश्चय ही सहायक होगा।''

भगवान महावीर
 31 December 2019  

भगवान महावीरभगवान महावीर का जन्म लगभग 600 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन क्षत्रियकुण्ड नगर मे हुआ. भगवान महावीर की माता का नाम महारानी त्रिशला और पिता का नाम महाराज सिद्धार्थ थे. भगवान महावीर कई नामो से जाने गए उनके कुछ प्रमुख नाम वर्धमान, महावीर, सन्मति, श्रमण आदि थे. महावीर स्वामी के भाई नंदिवर्धन और बहन सुदर्शना थी. बचपन से ही महावीर तेजस्वी और साहसी थेपिता की मृत्यु के पश्चात 30 वर्ष की आयु में इन्होने सन्यास ग्रहण कर लिया और कठोर तप में लीन हो गये। ऋजुपालिका नदि के तट पर सालवृक्ष के नीचे उन्हे ‘कैवल्य’ ज्ञान (सर्वोच्च ज्ञान) की प्राप्ति हुई जिसके कारण उन्हे ‘केवलिन’ पुकारा गया। इन्द्रियों को वश में करने के कारण ‘जिन’ कहलाये एवं पराक्रम के कारण ‘महावीर’ के नाम से विख्यात हुए।महावीर स्वामी द्वारा बताया गया पंचशील सिद्धांतअहिंसा – कर्म, वाणी, व विचार में किसी भी तरह की अहिंसा न हो, गलती से भी किसी को चोट ना पहुंचाई जाएसत्य – सदा सत्य बोलेंअपरिग्रह – किसी तरह की संपत्ति न रखें, किसी चीज से जुडें नहींअचौर्य (अस्तेय) – कभी चोरी ना करेंब्रह्मचर्य – जैन मुनि भोग विलास से दूर रहें, गृहस्त अपने साथी के प्रति वफादार रहेंवर्द्धमान महावीर ने 12 साल तक मौन तपस्या की और तरह-तरह के कष्ट झेले। अन्त में उन्हें 'केवलज्ञान' प्राप्त हुआ। केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद भगवान महावीर ने जनकल्याण के लिए उपदेश देना शुरू किया। अर्धमागधी भाषा में वे उपदेश करने लगे ताकि जनता उसे भलीभाँति समझ सके।भगवान महावीर ने अपने प्रवचनों में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पर सबसे अधिक जोर दिया। त्याग और संयम, प्रेम और करुणा, शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का सार था। भगवान महावीर ने श्रमण और श्रमणी, श्रावक और श्राविका, सबको लेकर चतुर्विध संघ की स्थापना की। उन्होंने कहा- जो जिस अधिकार का हो, वह उसी वर्ग में आकर सम्यक्त्व पाने के लिए आगे बढ़े। जीवन का लक्ष्य है समता पाना। धीरे-धीरे संघ उन्नति करने लगा। देश के भिन्न-भिन्न भागों में घूमकर भगवान महावीर ने अपना पवित्र संदेश फैलाया।भगवान महावीर ने 72 वर्ष की अवस्था में ईसापूर्व 527 में पावापुरी (बिहार) में कार्तिक (आश्विन) कृष्ण अमावस्या को निर्वाण प्राप्त किया। इनके निर्वाण दिवस पर घर-घर दीपक जलाकर दीपावली मनाई जाती है।हमारा जीवन धन्य हो जाए यदि हम भगवान महावीर के इस छोटे से उपदेश का ही सच्चे मन से पालन करने लगें कि संसार के सभी छोटे-बड़े जीव हमारी ही तरह हैं, हमारी आत्मा का ही स्वरूप हैं।

कुन्ती
 31 December 2019  

कुन्तीकुन्ती महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक है। श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की बहन थीं और भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं। महाराज कुन्तिभोज से इनके पिता की मित्रता थी, उसके कोई सन्तान नहीं थी, अत: ये कुन्तिभोज के यहाँ गोद आयीं और उन्हीं की पुत्री होने के कारण इनका नाम कुन्ती पड़ा। महाराज पाण्डु के साथ कुन्ती का विवाह हुआ, वे राजपाट छोड़कर वन चले गये। वन में ही कुन्ती को धर्म, इन्द्र, पवन के अंश से युधिष्ठर, अर्जुन, भीम आदि पुत्रों की उत्पत्ति हुई और इनकी सौत माद्री को अश्वनीकुमारों के अंश से नकुल, सहदेव का जन्म हुआ। महाराज पाण्डु का शरीरान्त होने पर माद्री तो उनके साथ सती हो गयी और ये बच्चों की रक्षा के लिये जीवित रह गयीं। इन्होंने पाँचों पुत्रों को अपनी ही कोख से उत्पन्न हुआ माना, कभी स्वप्न में भी उनमें भेदभाव नहीं किया।कुंती एक अद्भुत महिला थीं। पति की मृत्यु के बाद कैसे उन्होंने अपने पुत्रों को हस्तिनापुर में दालिख करवाकर गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा दिलवाई और अंत में उन्हें राज्य का अधिकार दिलवाने के लिए प्रेरित किया यह सब जानना अद्भुत है। एक स्त्री की संघर्ष कहानी में द्रौपदी का नाम तो लिया जाता है लेकिन कुंती की कम ही चर्चा होती है।कुंती अपने महल में आए महात्माओं की सेवा करती थी। एक बार वहां ऋषि दुर्वासा भी पधारे। कुंती की सेवा से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने कहा, 'पुत्री! मैं तुम्हारी सेवा से अत्यंत प्रसन्न हुआ हूं अतः तुझे एक ऐसा मंत्र देता हूं जिसके प्रयोग से तू जिस देवता का स्मरण करेगी वह तत्काल तेरे समक्ष प्रकट होकर तेरी मनोकामना पूर्ण करेगा।' इस तरह कुंती को एक अद्भुत मंत्र मिल गया।कुंती जब विवाह योग्य हुई तो उसका स्वंवर किया गया। स्वयंवर-सभा में कई राजा और राजकुमारों ने भाग लिया जिसमें हस्तिनापुर के राजा पाण्डु भी थे। कुंती ने पाण्डु को जयमाला पहनाकर पति रूप से स्वीकार कर लिया। कुंती का वैवाहिक जीवन सुखमय नहीं रहा। एक बार आखेट के दौरान पाण्डु हिरण समझकर मैथुनरत एक किदंम ऋषि को मार देते हैं। वे ऋषि मरते वक्त पांडु को शाप देते हैं कि तुम भी मेरी तरह मरोगे, जब तुम मैथुनरत रहोगे। इस शाप के चलते पांडु अपनी पत्नियों के साथ जंगल चले जाते हैं। पांडु को दो पत्नियां कुंती और माद्री थीं।एक दिन राजा पांडु माद्री के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे। वातावरण अत्यंत रमणीक था और शीतल-मंद-सुगंधित वायु चल रही थी। सहसा वायु के झोंके से माद्री का वस्त्र उड़ गया। इससे पांडु का मन चंचल हो उठा और वे मैथुन में प्रवृत हुए ही थे कि शापवश उनकी मृत्यु हो गई।

नींद
 31 December 2019  

नींदनींद तो बहुत ही जरूरी चीज़ है, लेकिन यह ऑफिस के समय आ जाए तो मुसीबत बन जाती है। काम करते हुए आंखें बंद होने लगें, थकान महसूस होने लगे और अगर ऐसे मौके पर नींद लेने का मौका ना मिले, तो बस सिरदर्द शुरू हो जाता है। ऐसे में करें तो क्या करे।कम सोना सेहत के लिए नुकसानदेह है, मगर ज्यादा सोना भी फायदेमंद नहीं है। अगर आपको ज्यादा नींद आती है तो चेक करें.. हो सकता है इसके लिए आपकी खुराक जिम्मेदार हो। अगर आपकी थाली में दूध के बने पदार्थ जैसे पनीर, चीज या दही ज्यादा हैं या फिर आप दाल या सोयाबीन वगैरह ज्यादा खाते हैं तो आपको ज्यादा नींद आ सकती है। इसके अलावा खाना बनाने की विधि भी तय करती है कि आपको नींद ज्यादा आएगी या कम? अगर आप खाने में ज्यादा तेल या मसाला डालते हैं तो भी आपको ज्यादा नींद आ सकती है। अगर आपके खाने में प्रोटीन या काबरेहाइड्रेट की मात्रा ज्यादा है तो भी आप ज्यादा सो सकते हैं। ये दोनों ही तत्व आपके शरीर में शुगर की मात्रा बढ़ा देते हैं, जिससे आप के सोने की अवधि भी बढ़ जाती है। इसके अलावा ऐसे लोग, जो किसी भी रूप में कैफीन का इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा करते हैं, उन्हें भी खूब नींद आती है, इसलिए कॉफी और चाय के ज्यादा इस्तेमाल से बचें।ज्यादा नींद आने की समस्या से कैसे पाएं छुटकारामसालेदार भोजन से परहेज़ करें – तीखा और मसालेदार भोजन देखने में और खाने में भले ही ज़ायके से भरपूर होता हो लेकिन ये शरीर को नुकसान भी पहुंचाता है।अगर आप ज़्यादा नींद आने की मुश्किल से परेशान है तो इसे दूर करने के लिए आपको तीखे, चटपटे मसालेदार व्यंजनों से दूरी बना कर रखनी होगी।अधिक वसायुक्त भोजन न खाएं – ज़्यादा वसायुक्त भोजन शरीर को हानि पहुंचाता है और ज़्यादा नींद आने की स्थिति भी उत्पन्न करता है। इसलिए ऐसे वसायुक्त भोजन की मात्रा अपने आहार में कम करते जाये।ताज़ा भोजन करने की आदत डालें – कई बार ऐसा होता है कि खाना बनने के काफी समय बाद उसे खाया जाता है जिसकी वजह से खाना ठंडा हो जाता है और कई बार तो खाना फ्रिज से निकाल कर खाया जाता है।ऐसा खाना सेहत नहीं बनाता है बल्कि ज़्यादा नींद का कारण भी बनता है और इसके कारण शरीर को कई दिक्कतें भी उठानी पड़ती है। इसलिए खाना पकने के 2 घंटे के अंदर ही उसे खा लें।इसके अलावा डिब्बाबंद खाने की चीज़ों से भी परहेज़ करें क्योंकि ये आलस को बढ़ाती हैं और मानसिक फुर्ती और सजगता में भी कमी लाती हैं।रात में हल्का भोजन करें – सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक अगर आप भारी भोजन करेंगे तो शरीर का सुस्त होना और ज़्यादा नींद आना स्वाभाविक ही है।लेकिन अगर आप ज्यादा आने वाली नींद को कम करना चाहते हैं तो रात को हल्का भोजन करना शुरू कीजिये, साथ ही भोजन का पौष्टिक होना तो हर स्थिति में जरुरी है ही।विटामिन-सी का सेवन कीजिये – मौसमी, संतरा और नींबू विटामिन-सी के अच्छे स्रोत हैं। अपनी डाइट में विटामिन-सी की प्रचुरता करके आप ज्यादा नींद आने की समस्या में राहत पा सकते हैं।वज्रासन करिये – रोज़ सुबह वज्रासन में बैठने से ज़्यादा नींद आने की समस्या में आपको राहत मिलने लगेगी। आपका मन एकाग्र भी होने लगेगा।शायद अब तक आप ये मानते हों कि नींद जितनी ली जाए, उतनी सेहत के लिए अच्छी ही रहती है। इसी सोच के चलते आप ज़्यादा सोना पसंद करने लगे हो और देखते ही देखते ये आपकी आदत बन गयी हो।लेकिन अब आप ये जान चुके है कि हर अति की तरह नींद की अति भी अच्छी नहीं होती। इस आदत को बदलना भी आपके अपने हाथ में है।तो बस, देर किस बात की…आज ही से स्वयं को ज़्यादा नींद आने की इस समस्या से मुक्त करना शुरू कर दीजिये। जल्द ही आप इसमें पूरी तरह सफल भी हो जायेंगे और स्वस्थ सेहत और पर्याप्त नींद का लाभ उठा पाएंगे।उम्मीद है जागरूक पर ज्यादा नींद आने की समस्या से कैसे पाएं छुटकारा कि ये जानकारी आपको पसंद आयी होगी और आपके लिए फायदेमंद भी साबित होगी।

पिज्जा
 31 December 2019  

पिज्जापिज्जा दुनिया की सबसे टेस्टी डिशेज में से एक माना जाता है, पर क्या आप लोग जानते है कि पिज्जा का अविष्कार सबसे पहले इटली में हुआ था।अगर बात की जाए मार्गरिटा पिज्जा की तो उसके बारे में ऐसा माना जाता है कि 18वीं शताब्दी में राजा अम्बर्टो और रानी मार्गरिटा इटली के दौरे पर निकले थे। रानी मार्गरिटा के लिए स्पेशल पिज्जा बनाने के लिए राफेल एस्पोसिटो नाम के एक पिज्जा विक्रेता को बुलाया गया था। उस खास पिज्जा में टमाटर, चीज के साथ बहुत सारी टॉपिंग का इस्तेमाल किया गया था। इस तरह से बना पिज्जा रानी को बहुत पसंद आया था, जिसके बाद उस विक्रेता ने उस पिज्जा का नाम मार्गरिटा पिज्जा रख दिया।दुनिया का सबसे तेज पिज्जा बनाने वाला 2 मिनट 35 सेकण्ड में 14 पिज्जा बना सकता है।दुनिया का सबसे बड़ा पिज्जा दक्षिण अफ्रीका के जोहन्सबर्ग शहर में बनाया गया था। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी यह अंकित है। इस पिज्जा की गोलाई 37.4 मीटर थी। इसे 500 किलो आंटे, 800 किलो चीज़ और 900 किलो टॉमेटो प्यूरी से 8 दिसंबर 1990 में बनाया गया था।22 मार्च 2001 में केपटाऊन के बटलर्स पिज्जा के बनार्ड जॉर्डन ने केपटाऊन से सिडनी यानी11042 किलोमीटर का फासला तय करके पिज्जा डिलीवर किया था। इसे गिनीज बूक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में लॉन्गेस्ट पिज्जा ऑर्डर उत्तरी कैरोलीना के वीएफ कॉर्पोरेशन द्वारा दिया गया था। इन्होने देशभर में फैले अपने 40160 कर्मचारियो के लिये 13386 पिज्जा का ऑर्डर दिया था।आधुनिक पिज़्ज़ा इटली की देन माना जाता है। 18वीं सदी में सबसे पहले इटली के शहर नेपल्स में पिज़्ज़ा को ईजाद किया गया था। आज भले ही पिज़्ज़ा गरीबों की पहुंच से दूर हो, लेकिन इसके शुरुआती वर्जन गरीबों के लिए ही बनाए गए थे। दो-ढाई सौ साल पहले नेपल्स की गिनती यूरोप के बड़े और समृद्ध शहरों में होती थी। उस समय वहां आर्थिक गतिविधियां चरम पर थीं। इसलिए शहर व्यापारियों और किसानों से गुलज़ार रहता था। आसपास के कस्बों और शहरों से बड़ी संख्या में गरीब मजदूर भी रोजगार की तलाश में नेपल्स आते थे और कई दिनों तक वहीं रहते थे। ये हमेशा सस्ते फूड की तलाश में रहते थे। सड़क किनारे फूड बेचने वाले वेंडर्स ने इनकी यह तलाश पूरी कर दी।

चाय
 31 December 2019  

चायचाय पीने का इतिहास 750 ईसा पूर्व से है। आम तौर पर भारत में चाय उत्तर-पूर्वी भागों और नीलगिरि पहाड़ियों में उगायी जाती है। आज भारत दुनिया में चाय का सबसे बड़ा उत्पादक है।क्या आप जानते हैं कि हजारों साल पहले भारत में बौद्ध भिक्षुओं ने चाय का इस्तेमाल औषधीय प्रयोजन के लिए किया था । इसके पीछे एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है अर्थात भारत में चाय पीने का इतिहास 2000 साल पहले के  एक बौद्ध भिक्षु के साथ शुरू हुआ था। बाद में ये भिक्षु ज़ेन बौद्ध धर्म के संस्थापक बने और इन्होंने सात साल की नींद को त्यागकर जीवन के सत्य को जाना और बुद्ध की शिक्षाओं पर विचार करने का फैसला किया। यह जब चिंतन के अपने पांचवें साल में थे तो इन्होंने बुश के कुछ पत्ते लिये और उन्हें चबाना शुरू कर दिया। इन पत्तियों ने उन्हें पुनर्जीवित रखा और उन्हें जागते रहने के लिए सक्षम बनाया ।19वीं शताब्दी में जब ब्रिटिश का आगमन हुआ तो उन्होनें पता लगाया कि असम के लोग एक काले रंग का तरल पदार्थ पीते है जो एक जंगली पौधे की पत्तियों से प्राप्त होता है। इसके बाद साल 1823 से 1831 के दौरान ब्रिटिशस ने चाय की पैदावर को देश में शुरु किया।ब्रिटिश अधिकारियों ने पता लगाया कि चाय की पैदावर पूर्वी भारत के असम राज्य में हुई है। जिसके बाद असम से चाय के बीच और पौधे लाकर इनका कोलकत्ता में सोध किया गया।लेकिन चाय की पैदावर का पता लगाने के बाद भी ब्रिटिश ने शुरुआत में इसकी पैदावार पर पैसा न खर्च करने का फैसला किया। लेकिन बाद मे जब ब्रिटिश अधिकारियों को इसकी एहमियत समझ आने लगी तो उन्होनें इसका व्यापार करने का फैसला किया। और बॉटनिकल गार्डन बनवाए और चाय के बगान तैयार करवाए गए।इसके बाद चाय के व्यापार ने भारत में बहुत विकास किया और यही कारण है कि भारत चाय उत्पादन में देश का नंबर वन देश है।

श्रीदेवी
 31 December 2019  

श्रीदेवीश्रीदेवी का जन्म 13 अगस्त 1963 को शिवाकाशी, तमिलनाडु में हुआ था। जन्म के समय उनका नाम श्रीअम्मा यंगेर अय्यपन था। श्रीदेवी की मातृभाषा तमिल है।श्रीदेवी ने अपने फ़िल्मी करियर में कई अनगिनत फिल्में की। अपने करियर के दौरान उन्होंने कई दमदार रोल किए और कई मजबूत फीमेल किरदार को पर्दे पर बेहतरीन तरीके से पेश किया और मुख्यधारा के सिनेमा के अलावा उन्होंने कई आर्ट फिल्मों मे भी काम किया जिसे भारत में पैरलल सिनेमा कहा जाता है| उन्हें तीन बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिल चुका है। उनके करियर का ग्राफ कई बार नीचे भी गिरा लेकिन उन्होंने अपने आप को कई बार इससे उबारा और स्टेटस को बरकरार रखने के लिए उनकी क्षमता ने सभी का दिल जीता। 2013 में उन्हें भारत सरकार की ओर से पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा गया। श्रीदेवी ने अपने करियर में हिन्दी, तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ फिल्मों में काम किया। 13 वर्षीय श्रीदेवी ने तमिल फिल्म 'मोन्दरु मूडीचु' में रजनीकांत की सौतेली मां का अभिनय किया था।श्रीदेवी ने जब बॉलीवुड में शुरुआत की, तब वे हिन्दी में बात करने में सहज नहीं थीं इसलिए उनकी आवाज ज्यादातर नाज द्वारा डब गई थी। इसके अलावा फिल्म 'आखिरी रास्ता' को रेखा ने डब किया था। श्रीदेवी ने पहली बार फिल्म 'चांदनी' में अपने संवाद के लिए डब किया।कहा जाता है कि मिथुन चक्रवर्ती और श्रीदेवी ने गुपचुप शादी कर ली थी लेकिन कुछ समय बाद ही दोनों अलग हो गए। उनकी शादी का प्रमाण-पत्र मीडियावालों के हाथ लगा था।1996 में श्रीदेवी ने अनिल कपूर और संजय कपूर के बड़े भाई फिल्म निर्माता बोनी कपूर से शादी कर ली और वे अर्जुन कपूर की सौतेली मां हैं।श्रीदेवी की 2 बेटियां हैं जिनके नाम जाह्नवी और खुशी हैं। यही नाम उनके पति बोनी कपूर की फिल्म जुदाई (1997) और हमारा दिल आपके पास है (2000) की नायिकाओं के भी थे।

लिओनार्दो दा विंची
 31 December 2019  

लिओनार्दो दा विंचीलिओनार्दो दा विंची का जन्म इटली के फ्लोरेंस प्रदेश के विंचि नामक ग्राम में हुआ था। इस ग्राम के नाम पर इनके कुल का नाम पड़ा। ये अवैध पुत्र थे। शारीरिक सुंदरता तथा स्फूर्ति के साथ साथ इनमें स्वभाव की मोहकता, व्यवहारकुशलता तथा बौद्धिक विषयों में प्रवीणता के गुण थे।लिओनार्दो दा विंची का बचपन अपने दादा के घर में ही बीता था | सन 1469 में लिओनार्दो दा विंची के पिता उनके साथ फ्लोरेंस आ गये जहा पर उनकी चाची ने उनकी कई वर्षो तक देखभाल की थी | फ्लोरेंस में ही उनकी शिक्षा दीक्षा पूर्ण हुयी थी | स्कूल से ही लिओनार्दो दा विंची की प्रतिभा सामने आने लगी थी जबकि गणित की मुश्किल से मुश्किल समस्याओ का समाधान वो चुटकियो में ही कर लेते थे | सन 1482 इस्वी तक उन्होंने विविध विषयों में शिक्षा प्राप्त कर ली थी |लिओनार्दो दा विंची ने कई अभूतपूर्व आविष्कारों की डिज़ाइन तैयार की थी। उनके इन चित्रों में अलार्म घड़ी, पनडुब्बी, हेलीकॉप्टर, टैंक, पैरासूट जैसे इंजीनियरिंग उपकरणों की डिज़ाइन थी। यह लिओनार्दो की कल्पना भी कही जा सकती है की उन्होंने कई वर्ष पूर्व ही ऐसे उपकरणों का अनुमान लगा लिया था।गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार लियनार्डो कि मोना लिसा कि पेंटिग इतिहास में सबसे ज्यादा इंश्योर्ड पेंटिंग है. साल 1911 में पेरिस के लौव्रे म्यूजियम से चोरी होने के बाद यह सबसे फेमस तस्वीर बन गई. 2015 में इसकी कीमत 780 मिलियन यु एस डॉलर थी. आश्चर्यजनक बात यह है कि लियनार्डो ने मोना लिसा की आंख की दाई पुतली पर अपने हस्ताक्षर किये थे.- लियनार्दो एक समय में अपने दोनों हाथों से काम कर सकते थे. मसलन अगर एक हाथ से वो लिख रहे हैं तो दूसरे हाथ से पेंटिंग बनाते रहते थे

लक्ष्मीबाई
 29 December 2019  

लक्ष्मीबाईलक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले के भदैनी नामक नगर में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था परन्तु प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था। उनकी माँ का नाम भागीरथीबाई तथा पिता का नाम मोरोपन्त तांबे था। मोरोपन्त एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे।पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे। मनु भी उन्हीं बच्चों के साथ पढ़ने लगी। सात साल की उम्र में ही लक्ष्मीबाई ने घुड़सवारी सीखी। साथ ही तलवार चलाने में, धनुर्विद्या में निष्णात हुई। बालकों से भी अधिक सामर्थ्य दिखाया। बचपन में लक्ष्मीबाई ने अपने पिता से कुछ पौराणिक वीरगाथाएँ सुनीं। वीरों के लक्षणों व उदात्त गुणों को उसने अपने हृदय में संजोया। इस प्रकार मनु अल्पवय में ही अस्त्र-शस्त्र चलाने में पारंगत हो गई। अस्त्र-शस्त्र चलाना एवं घुड़सवारी करना मनु के प्रिय खेल थे।मनु बहुत सुंदर थी। पेशवा बाजीराव उसे बहुत प्यार करते थे। मनु की सुंदरता को देखकर वह वे उसे छबीली कहा करते थे। बाजीराव के दो पुत्र थे नानासाहब और रावसाहब। मनु इन दोनो के साथ खूब खेलती थी। दोनो ने मनु को अपनी बहन बना लिया था। तीनो बच्चो का जीवन बडी हसी खुसी पढाई लिखाई और मस्ती के साथ कट रहा था।धीरे धीरे ये बालक बडे होने लगे। बाजीराव ने अपने पुत्रो को घुडसवारी सिखाने का प्रबंध किया तो मनु कैसे पिछे रहती? वह भी उन दोनो के साथ घुडसवारी करने का अभ्यास करती रही और थोडे ही दिनो में अच्छी घुडसवार बन गई।सन 1858 के जनवरी महीने में अंग्रेजी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च में शहर को घेर लिया। लगभग दो हफ़्तों के संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने शहर पर कब्जा कर लिया पर रानी लक्ष्मीबाई अपने पुत्र दामोदर राव के साथ अंग्रेजी सेना से बच कर भाग निकली। झाँसी से भागकर रानी लक्ष्मीबाई कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिलीं।तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई की संयुक्त सेना ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई ने जी-जान से अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया पर 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गयीं।

फिट रहने का तरीक़ा
 29 December 2019  

फिट रहने का तरीक़ाहर कोई ऐसा शरीर चाहता है जो कि एकदम चुस्त, फिट और स्वस्थ हो। फिट और चुस्त रहने के लिए जरूरी है कि आप शरीर को सही आकार में रखें और बीमारियों के जोखिम को कम करें। फिट रहने के लिए आपको अपनी डाइट और रोजाना की गतिविधियों में कुछ बदलाव लाने होंगे। आप अक्सर लोगों को एक-दूसरे के फिट रहने के सीक्रेट पूछते है लेकिन ऎसा कौनसा तरीका है जिससे फिट रह सकते है? चलिए जानते हैं-* प्रतिदिन प्रातः सूर्योदय पूर्व (5 बजे) उठकर दो या तीन किमी घूमने जाएँ। सूर्य आराधना से दिन का आरंभ करें। इससे एक शक्ति जागृत होगी जो दिल-दिमाग को ताजगी देगी।* शरीर को हमेशा सीधा रखें यानी बैठें तो तनकर, चलें तो तनकर, खड़े रहें तो तनकर अर्थात शरीर हमेशा चुस्त रखें।* भोजन से ही स्वास्थ्य बनाने का प्रयास करें। इसका सबसे सही तरीका है, भोजन हमेशा खूब चबा-चबाकर आनंदपूर्वक करें ताकि पाचनक्रिया ठीक रहे, इससे कोई भी समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी।* मोटापा आने का मुख्य कारण तैलीय व मीठे पदार्थ होते हैं। इससे चर्बी बढ़ती है, शरीर में आलस्य एवं सुस्ती आती है। इन पदार्थों का सेवन सीमित मात्रा में ही करें।* गरिष्ठ-भारी भोजन या हजम न होने वाले भोजन का त्याग करें। यदि ऐसा करना भी पड़े तो एक समय उपवास कर उसका संतुलन बनाएँ।* वाहन के प्रति मोह कम कर उसका प्रयोग कम करने की आदत डालें। जहाँ तक हो कम दूरी के लिए पैदल जाएँ। इससे मांसपेशियों का व्यायाम होगा, जिससे आप निरोगी रहकर आकर्षक बने रहेंगे, साथ ही पर्यावरण की रक्षा में भी सहायक होंगे।* भोजन में अधिक से अधिक मात्रा में फल-सब्जियों का प्रयोग करें। उनसे आवश्यक तैलीय तत्व प्राप्त करें, शरीर के लिए आवश्यक तेल की पूर्ति प्राकृतिक रूप के पदार्थों से ही प्राप्त करें।* दिमाग में सुस्ती नहीं आने दें, कार्य को तत्परता से करने की चाहत रखें।* घर के कार्यों को स्वयं करें- यह कार्य अनेक व्यायाम का फल देते हैं।* व्यस्तता एक वरदान है, यह दीर्घायु होने की मुफ्त दवा है, स्वयं को व्यस्त रखें।* कपड़े अपने व्यक्तित्व के अनुरूप पहनें। थोड़े चुस्त कपड़े पहनें, इससे फुर्ती बनी रहेगी।* जीवन चलने का नाम है, गतिशीलता ही जीवन है, यह सदा ही याद रखें।* अपने जीवन में लक्ष्य, उद्देश्य और कार्य के प्रति समर्पण का भाव रखें।* शरीर की सुंदरता उसकी सफाई में है। इसका विशेष ध्यान रखें।* सुबह एवं रात में मंजन अवश्य करें। साथ ही सोने से पूर्व स्नान कर कपड़े बदलकर पहनें। आप ताजगी महसूस करेंगे।* शरीर का प्रत्येक अंग-प्रत्यंग रोम छिद्रों के माध्यम से श्वसन करता है। इसीलिए शयन के समय कपड़े महीन, स्वच्छ एवं कम से कम पहनें। सूती वस्त्र अतिउत्तम होते हैं।* बालों को हमेशा सँवार कर रखें। अपने बालों में तेल का नियमित उपयोग करें। बाल छोटे, साफ रखें, अनावश्यक बालों को साफ करते रहें।* नियमित रूप से अपने आराध्य देव के दर्शन हेतु समय अवश्य निकालें। आप चाहे किसी भी धर्म के अनुयायी हों, अपनी धर्म पद्धति के अनुसार ईश्वर की प्रार्थना अवश्य करें।* क्रोध के कारण शरीर, मन तथा विचारों की सुंदरता समाप्त हो जाती है। क्रोध के क्षणों में संयम रखकर अपनी शारीरिक ऊर्जा की हानि से बचें।* मन एवं वाणी की चंचलता से अनेक अवसरों पर अपमानित होना पड़ सकता है। अतः वाणी में संयम रखकर दूसरों से स्नेह प्राप्त करें, घृणा नहीं।अगर हम इन सभी बातों को अपने जीवन में उतार ले तो हम सब फिट रह सकते हैं।

गौतम बुद्ध
 29 December 2019  

गौतम बुद्धगौतम बुद्ध के प्रारंभिक जीवन के बारे में कई रहस्य हैं. कहा जाता है कि 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में वे लुम्बिनी (आज का आधुनिक नेपाल) में पैदा हुए और उनका जन्म का नाम सिद्धार्थ गौतम था और वह एक राजकुमार के रूप में पैदा हुए थे. उनके पिता शुद्धोधन शाक्य राज्य के राजा थे और उनकी मां रानी माया थी और उनके जन्म के बाद शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो गई थी|उन्होंने कम उम्र में अपनी मां को खो दिया और उनके सहृदय पिता ने अपने जवान बेटे को दुनिया के दुख से दूर रखने के लिए अपनी पूरी कोशिश की. जब वो एक छोटे बच्चे थे तो कुछ बुद्धिमान विद्वानों ने भविष्यवाणी की है कि थी वह या तो एक महान राजा या एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक नेता बनेंगे|बुद्ध के धर्म प्रचार से भिक्षुओं की संख्या बढ़ने लगी। बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी उनके शिष्य बनने लगे। शुद्धोधन और राहुल ने भी बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। भिक्षुओं की संख्या बहुत बढ़ने पर बौद्ध संघ की स्थापना की गई। बाद में लोगों के आग्रह पर बुद्ध ने स्त्रियों को भी संघ में ले लेने के लिए अनुमति दे दी, यद्यपि इसे उन्होंने उतना अच्छा नहीं माना। भगवान बुद्ध ने ‘बहुजन हिताय’ लोककल्याण के लिए अपने धर्म का देश-विदेश में प्रचार करने के लिए भिक्षुओं को इधर-उधर भेजा। अशोक आदि सम्राटों ने भी विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार में अपनी अहम्‌ भूमिका निभाई। मौर्यकाल तक आते-आते भारत से निकलकर बौद्ध धर्म चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया, बर्मा, थाईलैंड, हिंद चीन, श्रीलंका आदि में फैल चुका था। इन देशों में बौद्ध धर्म बहुसंख्यक धर्म है।

तीन रूपये, तीन चीज़ें
 29 December 2019  

तीन रूपये, तीन चीज़ेंएक मंत्री की उदास शक्ल देख बादशाह अकबर ने उसकी उदासी का कारण पूछा। तब मंत्री बोले कि आप सारे महत्वपूर्ण कार्य बीरबल को सौप कर उसे महत्ता देते हैं। जिस कारण हमें अपनी प्रतिभा साबित करने का मौका ही नहीं मिलता है। इस बात को सुन कर अकबर ने उस मंत्री को तीन रूपये दिये और कहा कि आप बाज़ार जा कर इन तीन रुपयों को तीन चीजों पर बराबर-बराबर खर्च करें…यानी हर एक चीज पर 1 रुपये।लेकिन शर्त यह है कि-पहली चीज यहाँ की होनी चाहिए। दूसरी चीज वहाँ की होनी चाहिए। और तीसरी चीज ना यहाँ की होनी चाहिए और ना वहाँ की होनी चाहिए।दरबारी मंत्री अकबर से तीन रूपये ले कर बाज़ार निकल पड़ा। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वो अब क्या करे। वह एक दुकान से दुसरे दुकान चक्कर लगाने लगा लेकिन उसे ऐसा कोई नहीं मिला जो इस शर्त के मुताबिक एक-एक रूपये वाली तीन चीज़ें दे सके। वह थक हार कर वापस अकबर के पास लौट आया।अब बादशाह अकबर ने यही कार्य बीरबल को दिया।बीरबल एक घंटे में अकबर बादशाह की चुनौती पार लगा कर तीन वस्तुएँ ले कर लौट आया। अब बीरबल ने उन वस्तुओं का वृतांत कुछ इस प्रकार सुनाया।पहला एक रुपया मैंने मिठाई पर खर्च कर दिया जो यहाँ इस दुनिया की चीज है। दूसरा रुपया मैंने एक गरीब फ़कीर को दान किया जिससे मुझे पुण्य मिला जो वहाँ यानी ज़न्नत की चीज है। और तीसरे रुपये से मैंने जुवा खेला और हार गया… इस तरह “जुवे में हारा रुपया” वो तीसरी चीज थी जो ना यहाँ मेरे काम आई न वहां ,ज़न्नत में मुझे नसीब होगी।बीरबल की चतुराईपूर्ण बात सुनकर राजा के साथ-साथ दरबारी भी मुस्कुरा पड़े और सभी ने उनकी बुद्धि का लोहा मान लिया।

आदमी एक खूबियाँ तीन
 29 December 2019  

आदमी एक खूबियाँ तीनएक बार अकबर और बीरबल बागीचे में बैठे थे। अचानक अकबर ने बीरबल से पूछा कि क्या तुम किसी ऐसे इन्सान को खोज सकते हो जिसमें अलग-अलग बोली बोलने की खूबी हों?बीरबल ने कहा, क्यों नहीं, मै एक आदमी जानता हूँ जो तोते की बोली बोलता है, शेर की बोली बोलता है, और गधे की बोली भी बोलता है। अकबर इस बात को सुन कर हैरत में पड़ गए। उन्होने बीरबल को कहा किअगले दिन उस आदमी को पेश किया जाये।बीरबल उस आदमी को अगले दिन सुबह दरबार में ले गए। और उसे एक छोटी बोतल शराब पीला दी। अब हल्के नशे की हालत में शराबी अकबर बादशाह के आगे खड़ा था। वह जानता था की दारू पी कर आया जान कर बादशाह सज़ा देगा। इस लिए वह गिड़गिड़ाने लगा। और बादशाह की खुशामत करने लगा। तब बीरबल बोले की हुज़ूर, यह जो सज़ा के डर से बोल रहा है वह तोते की भाषा है।उसके बाद बीरबल ने वहीं, उस आदमी को एक और शराब की बोतल पिला दी। अब वह आदमी पूरी तरह नशे में था। वह अकबर बादशाह के सामने सीना तान कर खड़ा हो गया। उसने कहा कि आप नगर के बादशाह हैं तो क्या हुआ। में भी अपने घर का बादशाह हूँ। मै यहाँ किसी से नहीं डरता हूँ।बीरबल बोले कि हुज़ूर, अब शराब के नशे में निडर होकर यह जो बोल रहा है यह शेर की भाषा है।अब फिर से बीरबल ने उस आदमी का मुह पकड़ कर एक और बोतल उसके गले से उतार दी। इस बार वह आदमी लड़खड़ाते गिरते पड़ते हुए ज़मीन पर लेट गया और हाथ पाँव हवा में भांजते हुए, मुंह से उल-जूलूल आवाज़ें निकालने लगा। अब बीरबल बोले कि हुज़ूर अब यह जो बोल रहा है वह गधे की भाषा है।अकबर एक बार फिर बीरबल की हाज़िर जवाबी से प्रसन्न हुए, और यह मनोरंजक उदाहरण पेश करने के लिए उन्होने बीरबल को इनाम दिया।

राधा माँ
 29 December 2019  

राधा माँराधा को अक्सर राधिका भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म में विशेषकर वैष्णव सम्प्रदाय में प्रमुख देवी हैं। वह कृष्ण की प्रेमिका और संगी के रूप में चित्रित की जाती हैं।वैष्णव सम्प्रदाय में राधाको भगवान कृष्ण की शक्ति स्वरूपा भी माना जाता है , जो स्त्री रूप मे प्रभु के लीलाओं मे प्रकट होती हैं |राधा में ‘रा’ धातु के बहुत से अर्थ होते हैं. देवी भागवत में इसके बारे में लिखा है कि जिससे समस्त कामनायें, कृष्ण को पाने की कामना तक भी, सिद्ध होती हैं. सामरस उपनिषद में वर्णन आया है कि राधा नाम क्यों पड़ा ?राधा के एक मात्र शब्द से जाने कितने जन्मो के पाप नष्ट हो जाते हैर शब्द का अर्थ है = जन्म-जन्मान्तर के पापो का नाशअ वर्ण का अर्थ है =मृत्यु, गर्भावास,आयु हानि से छुटकाराध वर्ण का अर्थ है =श्याम से मिलनअ वर्ण का अर्थ है =सभी वन्धनो से छुटकाराश्रीराधा के परिवार का परिचयपितामह (दादा)–महीभानुपितामही (दादी)–सुखदापिता–वृषभानुमाता–कीर्तिदाभाई–श्रीदामछोटी बहिन–अनंगमंजरीचाचा–भानु, रत्नभानु एवं सुभानुबुआ–भानुमुद्रानाना–इन्दुनानी–मुखरामामा–भद्रकीर्ति, महाकीर्ति, चन्द्रकीर्तिमौसी–कीर्तिमतीकुल-उपास्य देव–श्रीराधारानी के कुलदेवता भगवान सूर्यदेव हैं।श्रीराधा के प्रिय आभूषणों के नामतिलक–स्मरयन्त्रहार–हरिमनोहरनाक की बुलाक–प्रभाकरीकड़े की जोड़ी (कड़ूला)–चटकारावबाजूबंद–मणिकर्बुरअंगूठी–विपक्षमर्दिनी इस पर ‘श्रीराधा’ नाम गुदा है।रत्नताटंक जोड़ी–रोचनकरधनी (कमरपेटी)–कांचनचित्रांगीनूपुर–रत्नगोपुर (इनकी मधुर झंकार ही श्रीकृष्ण का मन मोह लेती थी)मणि–सौभाग्यमणि (यह मणि सूर्य और चन्द्र दोनों के समान कान्तियुक्त थी। इसका नाम स्यमन्तकमणि भी है)वस्त्र–श्रीराधा को दो वस्त्र अत्यन्त प्रिय थे। १. मेघाम्बर–मेघ की कान्ति के समान यह वस्त्र श्रीराधा को अत्यन्त प्रिय है। २. कुरुविन्दनिभ–श्रीराधा का लाल रंग का यह वस्त्र श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय है।दर्पण–मणिबान्धवकंघी–स्वस्तिदासुवर्णशलाका (काजल लगाने के लिए सोने की सलाई)–नर्मदाश्रीराधा को प्रिय सोनजूही का पेड़–तडिद्वल्लीराग–श्रीराधा के प्रिय राग मल्हार व धनाश्री हैं।वीणा–श्रीराधा की रुद्रवीणा का नाम मधुमती है।नृत्य–श्रीराधा के प्रिय नृत्य का नाम छालिक्य है।कुण्ड–श्रीराधाकुण्डश्रीराधा की प्रिय गायों के नामसुनन्दा, यमुना, बहुला आदि श्रीराधा की प्रिय गाय हैं।प्रिय हिरनी–रंगिणीप्रिय चकोरी–चारुचंद्रिकाप्रिय हंसिनी–तुण्डीकेरीप्रिय मैना–शुभा और सूक्ष्मधीप्रिय मयूरी–तुण्डिका

डॉ. भीमराव आंबेडकर
 26 December 2019  
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डॉ. भीमराव आंबेडकरडॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को महू में सूबेदार रामजी शकपाल एवं भीमाबाई की चौदहवीं संतान के रूप में हुआ था। उनके व्यक्तित्व में स्मरण शक्ति की प्रखरता, बुद्धिमत्ता, ईमानदारी, सच्चाई, नियमितता, दृढ़ता, प्रचंड संग्रामी स्वभाव का मणिकांचन मेल था।बालक भीमराव का प्राथमिक शिक्षण दापोली और सतारा में हुआ। बंबई के एलफिन्स्टोन स्कूल से वह 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। इस अवसर पर एक अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया और उसमें भेंट स्वरुप उनके शिक्षक श्री कृष्णाजी अर्जुन केलुस्कर ने स्वलिखित पुस्तक 'बुद्ध चरित्र' उन्हें प्रदान की। बड़ौदा नरेश सयाजी राव गायकवाड की फेलोशिप पाकर भीमराव ने 1912 में मुबई विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा पास की। संस्कृत पढने पर मनाही होने से वह फारसी लेकर उत्तीर्ण हुये।डॉक्टर अम्बेडकर को आधुनिक भारत के सबसे ओजस्वी लेखकों में गिना जाता है. विश्व के लगभग हर देश में उनके प्रशंसक मौजूद हैं. डॉक्टर अम्बेडकर की सबसे प्रसिद्द पुस्तक "जाति का उच्छेद" है.

अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद
 26 December 2019  

अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (1 सितम्बर 1896 – 14 नवम्बर 1977) जिन्हें स्वामी श्रील भक्तिवेदांत प्रभुपाद के नाम से भी जाना जाता है, बीसवीं सदी के एक प्रसिद्ध गौडीय वैष्णव गुरु तथा धर्मप्रचारक थे। उन्होंने वेदान्त, कृष्ण-भक्ति और इससे संबंधित क्षेत्रों पर शुद्ध कृष्ण भक्ति के प्रवर्तक श्री ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय संप्रदाय के पूर्वाचार्यों की टीकाओं के प्रचार प्रसार और कृष्णभावना को पश्चिमी जगत में पहुँचाने का काम किया। ये भक्तिसिद्धांत ठाकुर सरस्वती के शिष्य थे जिन्होंने इनको अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से वैदिक ज्ञान के प्रसार के लिए प्रेरित और उत्साहित किया। इन्होने इस्कॉन (ISKCON) की स्थापना की और कई वैष्णव धार्मिक ग्रंथों का प्रकाशन और संपादन स्वयं किया।श्री प्रभुपाद से उनके गुरु श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने कहा था कि वह अंग्रेजी भाषा के माध्यम से वैदिक ज्ञान का प्रसार करें। आगामी वर्षों में श्री प्रभुपाद ने श्रीमद् भगवद्गीता पर एक टीका लिखी और गौड़ीय मठ के कार्य में सहयोग दिया। 1944 ई. में श्री प्रभुपाद ने बिना किसी सहायता के एक अंग्रेजी पाक्षिक पत्रिका आंरंभ की जिसका संपादन, पाण्डुलिपि का टंकन और मुद्रित सामग्री के प्रूफ शोधन का सारा कार्य वह स्वयं करते थे। ‘बैक टू गॉडहैड’ नामक यह पत्रिका पश्चिमी देशों में भी चलाई जा रही है और तीस से अधिक भाषाओं में छप रही है। श्री प्रभुपाद के दार्शनिक ज्ञान एवं भक्ति की महत्ता पहचान कर गौड़ीय वैष्णव समाज ने 1947 ई. में उन्हें ‘भक्ति वेदांत’ की उपाधि से सम्मानित किया।

नागरिकता (संशोधन) बिल, 2019
 23 December 2019  

नागरिकता (संशोधन) बिल, 2019नागरिकता एक्ट, 1955 यह रेगुलेट करता है कि कौन भारतीय नागरिकता हासिल कर सकता है और किस आधार पर। एक व्यक्ति भारतीय नागरिक बन सकता है, अगर उसने भारत में जन्म लिया हो या उसके माता-पिता भारतीय हों या एक निश्चित अवधि से वह भारत में रह रहा हो, इत्यादि। हालांकि अवैध प्रवासियों द्वारा भारतीय नागरिकता हासिल करना प्रतिबंधित है। एक अवैध प्रवासी वह विदेशी है जो: (i) वैध यात्रा दस्तावेजों, जैसे पासपोर्ट और वीजा के बिना देश में प्रवेश करता है, या (ii) वैध दस्तावेजों के साथ देश में प्रवेश करता है लेकिन अनुमत समयावधि के बाद भी देश में रुका रहता है।[1]अवैध प्रवासियों को विदेशी एक्ट, 1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) एक्ट, 1920 के अंतर्गत कारावास दिया जा सकता है या निर्वासित किया जा सकता है। 1946 और 1920 के एक्ट केंद्र सरकार को भारत में विदेशियों के प्रवेश, निकास और निवास को रेगुलेट करने की शक्ति प्रदान करते हैं। 2015 और 2016 में केंद्र सरकार ने दो अधिसूचनाएं जारी करके अवैध प्रवासियों के कुछ समूहों को 1946 और 1920 के एक्ट्स के प्रावधानों से छूट प्रदान की।[2] ये समूह अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई हैं जिन्होंने भारत में 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले प्रवेश किया है।2 इसका अर्थ यह है कि अवैध प्रवासियों के इन समूहों को वैध दस्तावेजों के बिना भी भारत में रहने पर निर्वासित नहीं किया जाएगा या कारावास नहीं भेजा जाएगा।2016 में नागरिकता एक्ट, 1955 में संशोधन करने के लिए एक बिल पेश किया गया।[3] यह बिल उन्हीं छह धर्मों और तीन देशों के अवैध प्रवासियों को नागरिकता की पात्रता प्रदान करने के लिए संशोधन का प्रस्ताव रखता है। बिल भारत की विदेशी नागरिकता (ओसीआई) वाले कार्डहोल्डरों के पंजीकरण से संबंधित प्रावधानों में भी संशोधन प्रस्तावित करता है। इसे ज्वाइंट पार्लियामेंटरी कमिटी को भेजा गया जिसने 7 जनवरी, 2019 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।[4]  8 जनवरी, 2019 को बिल लोकसभा में पारित हो गया।[5]  हालांकि 16वीं लोकसभा के भंग होने के साथ बिल लैप्स हो गया। परिणामस्वरूप दिसंबर, 2019 को लोकसभा में नागरिकता (संशोधन) बिल, 2019 को पेश किया गया।2019 का बिल अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई अवैध प्रवासियों को नागरिकता की पात्रता प्रदान करने का प्रयास करता है। वह पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों को इस प्रावधान से छूट देता है। बिल ओसीआई कार्डहोल्डर्स से संबंधित प्रावधानों में भी संशोधन करता है। एक विदेशी 1955 के एक्ट के अंतर्गत ओसीआई के रूप में पंजीकरण करा सकता है, अगर वह भारतीय मूल का है (जैसे भारत के पूर्व नागरिक या उनके वंशज) या भारतीय मूल के किसी व्यक्ति का स्पाउस (पति या पत्नी) है। इससे वे भारत आने और यहां काम करने एवं अध्ययन करने जैसे लाभों को प्राप्त करने के लिए अधिकृत हो जाएंगे। बिल एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव रखता है जिसके अंतर्गत अगर ओसीआई कार्डहोल्डर केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किसी कानून का उल्लंघन करता है तो उसका पंजीकरण रद्द किया जा सकता है।