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प्रेम
 27 April 2020  
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कितना अजीब है ना. हुमेशा से मुझे ऐसे वक़्त की आस रही जहाँ में कुछ कर सकूँ. ऐसा कुछ जिसमें में अपनी क्रियेटिविटी, टॅलेंट ओर इंटेरेस्ट को इस्तेमाल करके कुछ कर सकूँ, कुछ प्रोडक्टिव. सोचती थी अपने इंट्रेस्ट्स को बिज़्नेस में बी तब्दील कर लूँगी. पर आजकल जैसे कुछ सूझ ही नही रहा है.मैं लिखने की शौकीन हूँ पर ज़्यादा कुच्छ दिमाग़ में आता नही आजकल. हो सकता है की निशांत के साथ रहते हुए मुझे केवल खुशी का ही एहसास है ओर सूकून का भी. मुझे ऐसा पति मिला भी है. कल रात में ज़िंदगी गुलज़ार देख रही थी दोबारा. बहुत ही खूबसूरती से लिखा हुआ सीरियल है. पहली बार जब देखा था तो कहीं कहीं पर वो सारी रोमॅंटिक बातें देख के ओवर दा टॉप लगती थी. लेकिन कल रात में निशांत के बारे में सोचने लगी. सीरियल की हेरोयिन की तरह मुझे भी शायद निशांत से गहरी मोहब्बत हो रही है. मोहब्बत पहले भी थी पर मैं उसे शदीद आकर्षण का ही नाम दूँगी. पहले मैं काफ़ी हद्द तक उसके अच्छे नेचर ओर अपने लिए उसके ढेर सारे प्यार से मुतासिर थी पर अब एक अजीब सी आदत बनती जा रहा है वो मेरी. उसके हाथों की च्छुअन- दा टच, उसके बदन की महक से मेरी अच्छी ख़ासी पहचान हो गयी है. कई बार सोचती हूँ ऐसा वाकई हो सकता है क्या की मुझे कोई इतना पसंद करे. ना केवल पसंद बल्कि इतना प्यार करे. सच बताउन तो मुझे लगता था की कुछ दिनो में वो मुझसे परेशान हो जाएगा पर वो मेरा ख़याल करने में ओर मुझे समझने में वो मेरी इनसेक्युरिटीस से दो कदम आगे ही रहता है. पता नही ये सारी इनसेक्युरिटीस आई कहाँ से हैं मुझमें. शायद बहुत सारे रिजेक्षन्स देखें हैं मैने ज़िंदगी के. ओर शायद ये भी की ज़िंदगी की काफ़ी सारी चीज़ों का रिजेक्षन मैने खुद भी किया है. सबसे बड़ा रिजेक्षन  तो मुझे ज़िंदगी ने तब दिया जब मेरी माँ को मुझ से छिन गयी. लगने लगा किस्मत, भगवान सबने ही मुझे रिजेक्ट किया है. उसके बाद से ही मुझे हर चीज़ से बदगुमानी, अविश्वास होने लगा. कुछ माज़ी के तज़ुरबों ने भी मेरी पर्सनॅलिटी में अतियात की जगह बना ली थी. निशांत से पहली मुलाक़ातों में भी काफ़ी कुछ अपने अंदर समाए हुए थी. आज पूरे एक साल बाद भी ओर शादी के चार महीने बाद भी कयि सारी दीवारें हैं जो मेरे दिल के आस पास हैं. काफ़ी कुछ में शेयर नही करती हूँ आज भी उससे. डर लगता है की कहीं ये इनसेक्युरिटीस उसके सामने ना आ जाएं. लेकिन पता है ज़्यादा इन्हे च्छुपा नही पवँगी . क्यूंकी ये श्क्स अपने प्यार ओर ख़ूलुस से मेरी अंदर च्छूपी सारी दीवारों को धीरे धीरे गिरा रहा है. ओर मैं कैसे ना पिघलू, वो इस कदर अपने आपको मुझे सौंप देता है की मेरे सारे कवच ढीले पढ़ जाते हैं. इस तरह से मेरा बन जाता है, मुझे पे इस तरह से अपनी ज़िम्मेदारी सौंप देता है की मैं बहुत सारे एहसासों के बवंडर में डूब जाती हूँ. एक दम से विश्वास तो नही हो पाता किी में किसिके लिए इतनी ख़ास कैसे हूँ. पर यकीन मानिए ये एहसास इंतिहाही हसीन है. बहुत खुमारी है इसमेंआजकल निशांत को नींद में ताकते ताकते वक़्त का पता ही नही चलता. ऐसा नही है की मैं उसे देखते हुए दंपत्या जीवन से जुड़ी हुई बातों पे विचार करती हूँ. ओर उसके ओर मेरे भविष्या के बारे में भी नही सोचती. सोचना भी नही चाहती चाहे इसमें रिस्क ही क्यूँ ना हो. बस उसे देखना बहुत अच्छा लगता है उसे.  इन एहसासों को में समझा नही सकती क्यूंकी मुझे ये खुद समझ नही आ रहे. फिर भी इन एहसाँसों में रहना आजकल मेरे लिए दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ है. शायद  प्यार के समुंदर में लोग ऐसे ही डूबते होंगे.

उन्नति
 21 April 2020  
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तकलीफ़ोंकेगलियारेसेगुजरजरूररहेहैंलेकिनअपनोंकेसाथअपनापनमहसूसकररहेहैं।सभीजोवक्तकेहाथोंकठपुतलीबनचुकेथे।आजखुदकीतालपरथिरकरहेहैं।प्रदूषण,कोलाहल,जिंदगीकीभागदौड़तोमानोगर्मतवेपरपड़ेपानीकीतरहभापबनकरउड़चुकीहैं।आजसभीघरमेंरहकरनया-नयाकरनेकीपहलकररहेहैं।नसिर्फप्रकृतिसेअपितुमानवजीवनसेभीकोहराहटगयाहै,धुंधछटगईहै।मनमंथनकेलिएसभीकोपर्याप्तसमयमिलाहै।घरमेंरहकरनसिर्फघरकेप्रतिजागरूकहुएहैं।अपितुप्रकृतिकीओरभीखींचेजारहेहैं।सात्विकजीवनअपनारहेहैं।नप्रदूषण,नट्रैफिककीसमस्याघरसेहीकार्यालयकेकार्यभीसुचारूरूपसेहोरहेहैं।कार्यक्षमतामेंभीबढावाहुआहै।जीवनकोनयाआयाममिलाहै।प्राथमिकताएंबदलीहैंलेकिनवैक्सीनबनजानेकेबादजबकोरोनावायरसकेआतंककाअस्तहोजाएगातबकहींहमइसअच्छेबदलावकोहाशिएमेंडालकरफिरवहीपुरानीतनावयुक्तदिनचर्यानअपनालें।नगाड़ेकीतरहबर्तावनकरनेलगें।जिसपरकितनाभीमारोउसकाअपनाहीसंगीतनिकलताहै।लेकिनहमसबजानतेहैं।उम्मीदोंपरदुनियाटिकीहै।अतःविश्वासहैकि,लाॅकडाउनकेदौरानहमारेजीवनमेंजोनयाउजासआयाहैवहयकीननबनारहेगाऔरहमाराहरकदमउन्नतिकीओरतोबढ़ेगालेकिनअबउसमेंप्रकृतिकीअवनतिनहींछुपीहोगी।

अखबार व पत्रिकाओं से अपेक्षाएं
 13 February 2020  
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रोज सुबह उठते ही चाय की पहली चुस्की के साथ समाचार पत्र का पहला पन्ना पढ़ा जाता है। और यह पहला पन्ना ही पूरे दिन की आपकी मानसिकता निर्धारित कर देता है। सकारात्मक समाचार जहां चेहरे पर हल्की मुस्कान ले आता है वही नकारात्मक दिन की शुरुआत को दिशाहीन बना देता है। कहते हैं "साहित्य समाज का दर्पण" होता है। लेकिन मेरी सोच थोड़ी अलग है। मेरा मानना है कि, साहित्य को न सिर्फ समाज का दर्पण होना चाहिए बल्कि समाज को एक दर्पण भी दिखाना चाहिए कि, साहित्य समाज से क्या अपेक्षा रखता है और साहित्य के अनुसार समाज कैसा होना चाहिए। अतः समाचार पत्र अगर इन दोनों भाव में संतुलन स्थापित कर पाता है तो समाचार पत्र के अंतिम पन्ने तक पहुंचते-पहुंचते पाठक को नया सोचने के लिए बहुत कुछ मिल जाएगा। वह नए समाज की कल्पना कर पाएगा। कहा भी गया है हम जैसा सोचेंगे समाज भी वैसा ही बनेगा अगर हर वक्त दुख की ही बातें करेंगे, क्या खोया का दुखड़ा रोएंगे तो सुकून का मिलना मुश्किल होगा। और अगर सुख, खुशी से साक्षात्कार होता भी है तो उसे उसकी चरम सीमा तक जी नहीं पाएंगे । लेकिन अगर सुखो की ही बात करेंगे तो दुख भी दुख नहीं लगेगा। रचनात्मकता कलात्मकता कुछ नया लिखने में हैं, सोच को, कल्पना को परवाज़ देने में हैं समाज में घटित घटनाओं को व्याकरण व भाषा से सजा देने में नहीं। अतः अगर समाचार पत्र इन बातों का ध्यान रखें तो पाठकों का यह बोलना छूट जाएगा कि पत्र में होता ही क्या है रोज  एक ही खबर मारधाड़ की या फिर कोई और नरक तुल्य घटना की।

वसंत ऋतु
 9 February 2020  
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वसंत ऋतुआज दिन है देखो कितना सुहानायह तो मौसम है जाना पहचानाजीवन में वसंत नई खुशियाँ लाते हैंघर –आँगन खुशियों से महकाते हैंइस वसंत को देख मन मेरा मुस्काएहर जगह खुशहाली ही छा जाएमिल गई अब तो सर्दी से राहतइस मौसम की मुझे थी कब से चाहतकोयल मीठे –मीठे गीत सुनातीसब के दिल को बहुत ही हर्षातीप्रकृति में फैली है खुशबू अपारफूलों पर ,पेड़ों पर ,पत्तों परहाँ नए रंगों की खुशबू  जैसे भरमारकलकल करती नदियाँ बहतीदृढ़ विश्वास मन में है भरतीठंडी ठंडी हवा निरालीबहती रहती जैसे हो मतवालीफसलों से बढ़ता जाता प्यारफसलें पक कर है अब कटने को तैयारसरसों के पीले-पीले फूलखिल खिल कर मुस्कुराते हैंजीवन में वसंत नई खुशियाँ लाते हैंघर –आँगन खुशियों से महकाते हैंसोनी गुप्ता कालकाजी नई दिल्ली -19

भगवान कृष्ण का स्वरूप
 31 January 2020  

😇☝🏼क्या सिखाता है भगवान कृष्ण का स्वरूप ?कभी सोचा है भगवान कृष्ण का स्वरूप हमें क्या सिखाता है। क्यों भगवान जंगल में पेड़ के नीचे खड़े बांसुरी बजा रहे हैं, मोरमुकुट पहने, तन पर पीतांबरी, गले में वैजयंती की माला, साथ में राधा, पीछे गाय। कृष्ण की यह छवि हमें क्या प्रेरणा देती है। क्यों कृष्ण का रूप इतना मनोहर लगता है। दरअसल कृष्ण हमें जीवन जीना सिखाते हैं, उनका यह स्वरूप अगर गहराई से समझा जाए तो इसमें हमें सफल जीवन के कई सूत्र मिलते हैं। विद्वानों का मत है कि भगवान विरोधाभास में दिखता है।आइए जानते हैं कृष्ण की छवि के क्या मायने हैं।1. मोर मुकुट - भगवान के मुकुट में मोर का पंख है। यह बताता है कि जीवन में विभिन्न रंग हैं। ये रंग हमारे जीवन के भाव हैं। सुख है तो दुख भी है, सफलता है तो असफलता भी, मिलन है तो बिछोह भी। जीवन इन्हीं रंगों से मिलकर बना है। जीवन से जो मिले उसे माथे लगाकर अंगीकार कर लो। इसलिए मोर मुकुट भगवान के सिर पर है।2. बांसुरी - भगवान बांसुरी बजा रहे हैं, मतलब जीवन में कैसी भी घडी आए हमें घबराना नहीं चाहिए। भीतर से शांति हो तो संगीत जीवन में उतरता है। ऐसे ही अगर भक्ति पानी है तो अपने भीतर शांति कायम करने का प्रयास करें।3. वैजयंती माला - भगवान के गले में वैजयंती माला है, यह कमल के बीजों से बनती है। इसके दो मतलब हैं कलम के बीच सख्त होते हैं, कभी टूटते नहीं, सड़ते नहीं, हमेशा चमकदार बने रहते हैं। भगवान कह रहे हैं जब तक जीवन है तब तक ऐसे रहो जिससे तुम्हें देखकर कोई दुखी न हो। दूसरा यह माला बीज की है और बीज ही है जिसकी मंजिल होती है भूमि। भगवान कहते हैं जमीन से जुड़े रहो, कितने भी बड़े क्यों न बन जाओ, हमेशा अपने अस्तित्व की असलियत के नजदीक रहो।4. पीतांबर - पीला रंग सम्पन्नता का प्रतीक है। भगवान कहते हैं ऐसा पुरुषार्थ करो कि सम्पन्नता खुद आप तक चल कर आए। इससे जीवन में शांति का मार्ग खुलेगा।5. कमरबंद - भगवान ने पीतांबर को ही कमरबंद बना रखा है। इसका अर्थ है हमेशा चुनौतियों के लिए तैयार रहें। धर्म के पक्ष में जब भी कोई कर्म करना पड़े हमेशा तैयार रहें।6. राधा - कृष्ण के साथ राधा भी है। इसका अर्थ है जीवन में स्त्रीयों का महत्व भी है। उन्हें पूर्ण सम्मान दें। वे हमारी बराबरी में रहें, हमसे नीचे नहीं। —

बसंत पंचमी
 31 January 2020  

ॐ सरस्वती मया दृष्ट्वा, वीणा पुस्तक धारणीम् । हंस वाहिनी समायुक्ता मां विद्या दान करोतु में ॐ ।।बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा करने से बुद्धि और ज्ञान बढ़ता है. बसंत पंचमी दिन स्नान का भी खास महत्व माना जाता है. इस बार बसंत पंचमी की पूजा 30 जनवरी को की जा रही है. बसंत पंचमी आते ही वसंत ऋतु की शुरुआत हो जाती है.बसंत पंचमी का दिन ज्ञान की देवी मां सरस्वती को समर्पित है. इस दिन मां सरस्वती को ज्ञान और वाणी की शक्ति के रूप में पूजा जाता है. मान्यता है कि बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा करने से बुद्धि और ज्ञान बढ़ता है. बसंत पंचमी दिन स्नान का भी खास महत्व माना जाता है. इस बार बसंत पंचमी की पूजा 30 जनवरी को की जा रही है.बसंत पंचमी को श्री पंचमी, सरस्वती पंचमी, ऋषि पंचमी नामों से भी जाना जाता है. मान्यता है कि इसी दिन मां सरस्वती का जन्म हुआ था. ऋग्वेद के अनुसार ब्रह्मा जी अपनी सृष्टी के सृजन से संतुष्ट नहीं थे. चारों तरफ मौन छाया हुआ था. तब उन्होंने अपने कमण्डल से जल का छिड़काव किया, जिससे हाथ में वीणा लिए एक चतुर्भुजी स्त्री प्रकट हुईं. ब्रह्माजी के आदेश पर देवी ने वीणा पर मधुर सुर छेड़ा जिससे संसार को ध्वनि और वाणी मिली. इसके बाद ब्रह्मा जी ने इस देवी का नाम सरस्वती रखा, जिन्हें शारदा और वीणावादनी के नाम से भी जानते हैं. बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती का पूजन करते हैं.

श्रीमद्भगवद्गीता
 31 January 2020  

श्रीमद्भगवद्गीताअध्याय : 3 | श्लोक : 28तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयो:।गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥ २८॥परन्तु हे महाबाहो! गुण-विभाग और कर्म-विभागकोतत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष ‘सम्पूर्ण गुण (ही) गुणोंमें बरत रहे हैं’— ऐसा मानकर (उनमें) आसक्त नहीं होता।**विवेचना **‘तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्म-विभागयो:’—पूर्वश्लोकमें वर्णित ‘अहङ्कारविमूढात्मा’ (अहंकारसे मोहित अन्त:करणवाले पुरुष) से तत्त्वज्ञ महापुरुषको सर्वथा भिन्न और विलक्षण बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पदका प्रयोग हुआ है।सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृतिजन्य हैं। इन तीनों गुणोंका कार्य होनेसे सम्पूर्ण सृष्टि त्रिगुणात्मिका है। अत: शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राणी, पदार्थ आदि सब गुणमय ही हैं। यही ‘गुण-विभाग’ कहलाता है। इन (शरीरादि)-से होनेवाली क्रिया ‘कर्म-विभाग’ कहलाती है।गुण और कर्म अर्थात् पदार्थ और क्रियाएँ निरन्तर परिवर्तनशील हैं। पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तथा क्रियाएँ आरम्भ और समाप्त होनेवाली हैं। ऐसा ठीक-ठीक अनुभव करना ही गुण और कर्म-विभागको तत्त्वसे जानना है। चेतन (स्वरूप)-में कभी कोई क्रिया नहीं होती। वह सदा निर्लिप्त, निर्विकार रहता है अर्थात् उसका किसी भी प्राकृत पदार्थ और क्रियासे सम्बन्ध नहीं होता। ऐसा ठीक-ठीक अनुभव करना ही चेतनको तत्त्वसे जानना है।अज्ञानी पुरुष जब इन गुण-विभाग और कर्म-विभागसे अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह बँध जाता है। शास्त्रीय दृष्टिसे तो इस बन्धनका मुख्य कारण ‘अज्ञान’ है, पर साधककी दृष्टिसे ‘राग’ ही मुख्य कारण है। राग ‘अविवेक’ से होता है। विवेक जाग्रत् होनेपर राग नष्ट हो जाता है। यह विवेक मनुष्यमें विशेषरूपसे है। आवश्यकता केवल इस विवेकको महत्त्व देकर जाग्रत् करनेकी है। अत: साधकको (विवेक जाग्रत् करके) विशेषरूपसे रागको ही मिटाना चाहिये।तत्त्वको जाननेकी इच्छा रखनेवाला साधक भी अगर गुण (पदार्थ) और कर्म -(क्रिया-) से अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानता, तो वह भी गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जान लेता है। चाहे गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाने, चाहे ‘स्वयं’-(चेतन स्वरूप-) को तत्त्वसे जाने, दोनोंका परिणाम एक ही होगा।गुण-कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेका उपाय१—शरीरमें रहते हुए भी चेतन-तत्त्व (स्वरूप) सर्वथा अक्रिय और निर्लिप्त रहता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)। प्रकृतिका कार्य (शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि) ‘इदम् ’ (यह) कहा जाता है। ‘इदम् ’ (यह) कभी ‘अहम् ’ (मैं) नहीं होता। जब ‘यह’ (शरीरादि) ‘मैं’ नहीं है, तब ‘यह’ में होनेवाली क्रिया ‘मेरी’ कैसे हुई? तात्पर्य है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सब प्रकृतिके कार्य हैं और ‘स्वयं’ इनसे सर्वथा असम्बद्ध, निर्लिप्त है। अत: इनमें होनेवाली क्रियाओंका कर्ता ‘स्वयं’ कैसे हो सकता है? इस प्रकार अपनेको पदार्थ एवं क्रियाओंसे अलग अनुभव करनेवाला बन्धनमें नहीं पड़ता। सब अवस्थाओंमें ‘नैव किञ्चित्करोमीति’ (गीता ५। ८) ‘मैं’ कुछ भी नहीं करता हूँ’—ऐसा अनुभव करना ही अपनेको क्रियाओंसे अलग जानना अर्थात् अनुभव करना है।२—देखना-सुनना, खाना-पीना आदि सब ‘क्रियाएँ’ हैं और देखने-सुनने आदिके विषय, खाने-पीनेकी सामग्री आदि सब ‘पदार्थ’ हैं। इन क्रियाओं और पदार्थोंको हम इन्द्रियों- (आँख, कान, मुँह आदिसे) जानते हैं। इन्द्रियोंको ‘मन’ से, मनको ‘बुद्धि’ से और बुद्धिको माने हुए ‘अहम् ’-(मैं-पन-) से जानते हैं। यह ‘अहम् ’ भी एक सामान्य प्रकाश- (चेतन-) से प्रकाशित होता है। वह सामान्य प्रकाश ही सबका ज्ञाता, सबका प्रकाशक और सबका आधार है।‘अहम् ’ से परे अपने स्वरूप-(चेतन-) को कैसे जानें? गाढ़ निद्रामें यद्यपि बुद्धि अविद्यामें लीन हो जाती है, फिर भी मनुष्य जागनेपर कहता है कि ‘मैं बहुत सुखसे सोया।’ इस प्रकार जागनेके बाद ‘मैं हूँ’ का अनुभव सबको होता है। इससे सिद्ध होता है कि सुषुप्तिकालमें भी अपनी सत्ता थी। यदि ऐसा न होता तो ‘मैं बहुत सुखसे सोया; मुझे कुछ भी पता नहीं था’—ऐसी स्मृति या ज्ञान नहीं होता। स्मृति अनुभवजन्य होती है. अतएव सबको प्रत्येक अवस्थामें अपनी सत्ताका अखण्ड अनुभव होता है। किसी भी अवस्थामें अपने अभावका (‘मैं’ नहीं हूँ—इसका) अनुभव नहीं होता। जिन्होंने माने हुए ‘अहम् ’-(मैं-पन-) से भी सम्बन्ध-विच्छेद करके अपने स्वरूप-( ‘है’-) का बोध कर लिया है, वे ‘तत्त्ववित् ’ कहलाते हैं।अपरिवर्तनशील परमात्मतत्त्वके साथ हमारा स्वत:सिद्ध नित्य सम्बन्ध है। परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ हमारा सम्बन्ध वस्तुत: है नहीं, केवल माना हुआ है। प्रकृतिसे माने हुए सम्बन्धको यदि विचारके द्वारा मिटाते हैं तो उसे ‘ज्ञानयोग’ कहते हैं; और यदि वही सम्बन्ध परहितार्थ कर्म करते हुए मिटाते हैं तो उसे ‘कर्मयोग’ कहते हैं। प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ही ‘योग’ (परमात्मासे नित्य- सम्बन्धका अनुभव) होता है, अन्यथा केवल ‘ज्ञान’ और ‘कर्म’ ही होता है। अत: प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक परमात्मासे अपने नित्य-सम्बन्धको पहचाननेवाला ही ‘तत्त्ववित् ’ है।‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’—प्रकृतिजन्य गुणोंसे उत्पन्न होनेके कारण शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि भी ‘गुण’ ही कहलाते हैं और इन्हींसे सम्पूर्ण कर्म होते हैं। अविवेकके कारण अज्ञानी पुरुष इन गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मानकर इनसे होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है२। परन्तु ‘स्वयं’ (सामान्य प्रकाश—चेतन) में अपनी स्वत:सिद्ध स्थितिका अनुभव होनेपर ‘मैं कर्ता हूँ’—ऐसा भाव आ ही नहीं सकता।रेलगाड़ीका इंजन चलता है अर्थात् उसमें क्रिया होती है; परन्तु खींचनेकी शक्ति इंजन और चालकके मिलनेसे आती है। वास्तवमें खींचनेकी शक्ति तो इंजनकी ही है, पर चालकके द्वारा संचालन करनेपर ही वह गन्तव्य स्थानपर पहुँच पाता है। कारण कि इंजनमें इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि नहीं हैं, इसलिये उसे इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिवाले चालक-(मनुष्य-) की जरूरत पड़ती है। परन्तु मनुष्यके पास शरीररूप इंजन भी है और संचालनके लिये इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि भी। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि—ये चारों एक सामान्य प्रकाश- (चेतन-) से सत्ता-स्फूर्ति पाकर ही कार्य करनेमें समर्थ होते हैं। सामान्य प्रकाश-(ज्ञान-) का प्रतिबिम्ब बुद्धिमें आता है, बुद्धिके ज्ञानको मन ग्रहण करता है, मनके ज्ञानको इन्द्रियाँ ग्रहण करती हैं, और फिर शरीररूप इंजनका संचालन होता है। बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ, शरीर—ये सब-के-सब गुण हैं और इन्हें प्रकाशित करनेवाला अर्थात् इन्हें सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला ‘स्वयं’ इन गुणोंसे असम्बद्ध, निर्लिप्त रहता है। अत: वास्तवमें सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं।श्रेष्ठ पुरुषके आचरणोंका सब लोग अनुसरण करते हैं। इसीलिये भगवान् ज्ञानी महापुरुषके द्वारा लोकसंग्रह कैसे होता है—इसका वर्णन करते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार वह महापुरुष ‘सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं’—ऐसा अनुभव करके उनमें आसक्त नहीं होता, उसी प्रकार साधकको भी वैसा ही मानकर उनमें आसक्त नहीं होना चाहिये।**प्रकृति-पुरुष-सम्बन्धी मार्मिक बात*आकर्षण सदा सजातीयतामें ही होता है; जैसे— कानोंका शब्दमें, त्वचाका स्पर्शमें, नेत्रोंका रूपमें, जिह्वाका रसमें और नासिकाका गन्धमें आकर्षण होता है। इस प्रकार पाँचों इन्द्रियोंका अपने-अपने विषयोंमें ही आकर्षण होता है। एक इन्द्रियका दूसरी इन्द्रियके विषयमें कभी आकर्षण नहीं होता। तात्पर्य यह है कि एक वस्तुका दूसरी वस्तुके प्रति आकर्षण होनेमें मूल कारण उन दोनोंकी सजातीयता ही है।आकर्षण, प्रवृत्ति एवं प्रवृत्तिकी सिद्धि सजातीयतामें ही होती है। विजातीय वस्तुओंमें न तो आकर्षण होता है, न प्रवृत्ति होती है और न प्रवृत्तिकी सिद्धि ही होती है, इसलिये आकर्षण, प्रवृत्ति और प्रवृत्तिकी सिद्धि सजातीयताके कारण ‘प्रकृति’ में ही होती है; परन्तु पुरुष-(चेतन-) में विजातीय प्रकृति-(जड-) का जो आकर्षण प्रतीत होता है, उसमें भी वास्तवमें प्रकृतिका अंश ही प्रकृतिकी ओर आकॢषत होता है। करने और भोगनेकी क्रिया प्रकृतिमें ही है, पुरुषमें नहीं। पुरुष तो सदा निर्विकार, नित्य, अचल तथा एकरस रहता है।तेरहवें अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया है कि शरीरमें स्थित होनेपर भी पुरुष वस्तुत: न तो कुछ करता है और न लिप्त होता है—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।’ पुरुष तो केवल ‘प्रकृतिस्थ’ होने अर्थात् प्रकृतिसे तादात्म्य माननेके कारण सुख-दु:खोंके भोक्तृत्वमें हेतु कहा जाता है—‘पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते’ (गीता १३। २०) और ‘पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ् क्ते प्रकृतिजान्गुणान्’ (गीता १३। २१)। तात्पर्य यह है कि यद्यपि सम्पूर्ण क्रियाएँ, क्रियाओंकी सिद्धि और आकर्षण प्रकृतिमें ही होता है, तथापि प्रकृतिसे तादात्म्यके कारण पुरुष ‘मैं सुखी हूँ’, ‘मैं दु:खी हूँ’—ऐसा मानकर भोक्तृत्वमें हेतु बन जाता है। कारण कि सुखी-दु:खी होनेका अनुभव प्रकृति-(जड-) में हो ही नहीं सकता, प्रकृति-(जड-)के बिना केवल पुरुष (चेतन) सुख-दु:खका भोक्ता बन ही नहीं सकता।पुरुषमें प्रकृतिकी परिवर्तनरूप क्रिया या विकार नहीं है; परन्तु उसमें सम्बन्ध मानने अथवा न माननेकी योग्यता तो है ही। वह पत्थरकी तरह जड नहीं, प्रत्युत ज्ञानस्वरूप है। यदि पुरुषमें सम्बन्ध मानने अथवा न माननेकी योग्यता नहीं होती, तो वह प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध कैसे मानता? प्रकृतिसे सम्बन्ध मानकर उसकी क्रियाको अपनेमें कैसे मानता? और अपनेमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व कैसे स्वीकार करता? सम्बन्धको मानना अथवा न मानना ‘भाव’ है, ‘क्रिया’ नहीं।पुरुषमें सम्बन्ध जोडऩे अथवा न जोडऩेकी योग्यता तो है, पर क्रिया करनेकी योग्यता उसमें नहीं है। क्रिया करनेकी योग्यता उसीमें होती है, जिसमें परिवर्तन (विकार) होता है। पुरुषमें परिवर्तनका स्वभाव नहीं है, जबकि प्रकृतिमें परिवर्तनका स्वभाव है अर्थात् प्रकृतिमें क्रियाशीलता स्वाभाविक है। इसलिये प्रकृतिसे सम्बन्ध जोडऩेपर ही पुरुष अपनेमें क्रिया मान लेता है—‘कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३। २७)।पुरुषमें कोई परिवर्तन नहीं होता, यह (परिवर्तनका न होना) उसकी कोई अशक्तता या कमी नहीं है, प्रत्युत उसकी महत्ता है। वह निरन्तर एकरस, एकरूप रहनेवाला है। परिवर्तन होना उसका स्वभाव ही नहीं है; जैसे—बर्फमें गरम होनेका स्वभाव या योग्यता नहीं है। परिवर्तनरूप क्रिया होना प्रकृतिका स्वभाव है, पुरुषका नहीं। परन्तु प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध न माननेकी इसमें पूरी योग्यता, सामथ्र्य, स्वतन्त्रता है; क्योंकि वास्तवमें प्रकृतिसे सम्बन्ध मूलमें नहीं है।प्रकृतिके अंश शरीरको पुरुष जब अपना स्वरूप मान लेता है, तब प्रकृतिके उस अंशमें (सजातीय प्रकृतिका) आकर्षण, क्रियाएँ और उनके फलकी प्राप्ति होती रहती है। इसीका संकेत यहाँ ‘गुणा: गुणेषु वर्तन्ते’ पदोंसे किया गया है। गुणोंमें अपनी स्थिति मानकर पुरुष (चेतन) सुखी-दु:खी होता रहता है। वास्तवमें सुख-दु:खकी पृथक् सत्ता नहीं है। इसलिये भगवान् गुणोंसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करनेके लिये विशेष जोर देते हैं।तात्त्विक दृष्टिसे देखा जाय तो सम्बन्ध-विच्छेद पहलेसे (सदासे) ही है। केवल भूलसे सम्बन्ध माना हुआ है। अत: माने हुए सम्बन्धको अस्वीकार करके केवल ‘गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं’ इस वास्तविकताको पहचानना है।‘इति मत्वा न सज्जते’—यहाँ ‘मत्वा’ पद ‘जानने’ के अर्थमें आया है। तत्त्वज्ञ महापुरुष प्रकृति (जड) और पुरुष-(चेतन-)को स्वाभाविक ही अलग-अलग जानता है। इसलिये वह प्रकृतिजन्य गुणोंमें आसक्त नहीं होता।भगवान् ‘मत्वा’ पदका प्रयोग करके मानो साधकोंको यह आज्ञा देते हैं कि वे भी प्रकृतिजन्य गुणोंको अलग मानकर उनमें आसक्त न हों।*परिशिष्ट भाव**—जो अहंकारसे मोहित नहीं होता, वह ‘तत्त्ववित् ’ होता है। इस तत्त्ववित् को ही दूसरे अध्यायके सोलहवें श्लोकमें ‘तत्त्वदर्शी’ कहा है। तत्त्ववित् गुण-विभाग और कर्म-विभागसे अर्थात् पदार्थ और क्रियासे सर्वथा अतीत हो जाता है।जबतक साधकका संसारके साथ सम्बन्ध रहेगा, तबतक वह ‘तत्त्ववित् ’ नहीं हो सकता। कारण कि संसारके साथ सम्बन्ध रखते हुए कोई संसारको जान ही नहीं सकता। संसारसे सर्वथा अलग होनेपर ही संसारको जान सकते हैं—यह नियम है। इसी तरह परमात्मासे अलग होकर कोई परमात्माको जान ही नहीं सकता। परमात्मासे एक होकर ही परमात्माको जान सकते हैं—यह नियम है। कारण यह है कि वास्तवमें हम संसारसे अलग हैं और परमात्मासे एक हैं। शरीरकी संसारके साथ एकता है, हमारी (स्वयंकी) परमात्माके साथ एकता है.

हरे कृष्णा।
 28 January 2020  

हरे कृष्णा। ।हरे   रामा ।।सत्संग, या आध्यात्मिक लोगों की संगति, व्यक्ति के अंतिम उद्देश्य को प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। भक्ति एक सिद्धांत है जो खुद को एक अनुकूल आत्मा से दूसरे में संचालित करती है। भक्ति का सिद्धांत निष्ठावान और जीवन के सभी कार्यों में देवता पर निर्भर होता है।भक्ति आध्यात्मिक अस्तित्व के अंतिम उद्देश्य की प्राप्ति का एकमात्र साधन है। कर्म सीधे और तत्काल रूप से आध्यात्मिक परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकता है; यह वैसा भक्ति के साधन द्वारा करता है। भक्ति स्वतंत्र होती है, और कर्म और ज्ञान निर्भर सिद्धांत हैं। भक्ति एक भावना और एक क्रिया दोनों है। इसके तीन चरण होते हैं, साधना भक्ति, भाव भक्ति और प्रेम भक्ति। साधना भक्ति में प्रेम की भावना अब तक उत्पन्न नहीं हुई है। भाव भक्ति में, भावना जागृत होती है और प्रेम भक्ति में भावना पूर्णतः क्रिया में निर्धारित होती है। कृष्ण प्रेम या शुद्ध प्रेम हैं। कृष्ण आध्यात्मिक अस्तित्व के अंतिम उद्देश्य हैं। .जय जय श्री राधे राधे🙏🙏🙏

हारना नहीं...
 20 January 2020  

हमारी ज़िंदगी में कितनी बार ऐसा होता है, जब हम खुद को हारा हुआ महसूस करते है। जब हमें ऐसा लगता है बस अब हमारी ज़िंदगी में कुछ नहीं बचा हम पूरी तरह से टूट चुके होते है, हमें कोई रास्ता नहीं नज़र आता की अब हम क्या करे। मन में हज़ारों शिकायतें होती है दिल ग़ुस्से की आग में झुलझ रहा होता है। हमारी आत्मा भगवान से चिला-चिला कर बोल रही होती है, मेने क्या बुरा किया मेरे साथ ही क्यूँ? पर क्या उस पल में हम एक बार भी उन लोगों के बारे में विचार करते है जो नजने कितने कष्टों में अपनी ज़िंदगी मुस्कुराकर जीते है नहीं ना ! क्यूँ? हम केवल आधे पानी से भरे गिलास्स की ख़ाली हिस्से को ही देखते है, उसी के ख़ाली होने के ग़म को लिए बेठै रहते है जबकि हमें ये  देखने का प्रयास करना चाहिए कि ग़िलास आधा भरा भी तो हुआ हैं। जो हमारे पास है बहुत लोग एसे भी हैं जो वह पाने को तरसते हैं। दुःख हर किसी कि ज़िन्दगी में हैं पर सही नज़रिये से ही इसका सामना किया जा सकता है.....

राष्ट्रवाद बनाम धर्मवाद
 17 January 2020  
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इतिहास में कई बार यह प्रयास हुआ है कि धर्मवाद के सहारे राष्ट्रवाद को परवान चढ़ाया जाए लेकिन यह हमेशा असफल रहा है ।दुनिया के कई हिस्सो में धर्म को बुनियाद बना कर लोगों को मोटिवेट किया गया और एक मजबूत राष्ट्र बनाने का प्रयास किये गये;  कुछ समय के लिए उनको सफलता मिली लेकिन जल्दी ही वहां  आंतरिक असुरक्षा का माहौल बना; फित्ने पैदा हुए  ; संघर्ष हुए और वे राष्ट्र दुनिया के पश्मंजर में पिछड़ गए।ऐसे उदाहरण योरप से लेकर मध्य पूर्व की इस्लामी दुनिया में मौजूद है ।यह बात कहने का मेरा उद्देश्य यह है कि अगर आज के दौर में भी अगर कोई इसी बुनियाद पर किसी राष्ट्र को अग्रेषित कर एक मजबूत राष्ट्र बनाने की कोशिश कर रहा है तो वह भी वही भूल कर रहा है ।क्योंकि धर्म व राष्ट्र दो ऐसी संरचनाए हैं जो एक साथ मिलकर काम कर नही सकती । ऐसा क्यों इसे समझने के लिए हमे धर्म व राष्ट्र की अवधारणा को निष्पक्ष रूप से समझना होगा ।धर्म के बारे मे सोचते समय यह बहुत जरूरी है कि हम निष्पक्ष रहे लेकिन यह होना बहुत मुश्किल है ।निष्पक्ष रूप से अगर देखा जाए तो हम देखेंगे कि किसी भी धर्म ने अपने सिद्धांतो को किसी अन्य धर्म के सिद्धांतो से कम या बराबर होने की कोई गुंजाइश नही छोड़ी ।यानी अपने धर्म को सर्वोच्च मानना ही अपनी सच्ची वफादारी होता है । धर्म की यही बात धर्म को अधर्म बनाती है ।इसके बरक्स राष्ट्र अपेक्षा करता है कि  लोग समानता के आधार पर रहे;  एक दूसरे के विचारो का सम्मान करे । इस कारण से ही राष्ट्र के लिए हमेशा धर्म  एक समस्या ही रही है ।धर्म के  आधार पर राष्ट्र की कल्पना करने वाले  आगे चलकर  इसी द्वन्द का शिकार हो जाते है । राष्ट्रवादी विचारधारा हमेशा समझोतावादी होती है, वे बहुत हद तक धर्मवाद से सहिष्णुता के नाते समझौता करती है  लेकिन धर्मवाद ने हमेशा  उसका दुरुपयोग किया है ; मौका पाकर हमेशा धर्मवाद ने राष्ट्रवाद के लिए मुश्किले खड़ी की है ।आगे बढ़ने से पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहता हू कि आखिर धर्म मे ऐसा क्या है जो कि राष्ट्र को स्वीकार्य नही ।  इस हेतु मैं थोड़ा धर्म के गढ के  अंदर घुस कर बात करूंगा; किसी अन्य के धर्म को खंगालने से पहले मैं समझता हू कि अपने ही धर्म से शुरूआत करू ।मै एक मुसलमान हू; इसलिए कई दफे दीनी तकरीरो ;जलसो वगैरह मे शामिल हो लिया करता हू ; वहा कई बाते सुनने को मिल जाती है जो कि  एक राष्ट्र के लिए काबिल ए कबुल नही होती ।मसलन मौलाना साहब बड़े दावे के साथ फरमाते है कि दुनिया मे सच्चा धर्म तो सिर्फ इस्लाम ही है बाकी सब गुमराह है। जो नमाज नही पढता वो इंसान इंसान ही कहा ? इससे भी कड़वी बाते सुनने को मिल जाती है ।ऐसा सिर्फ यहीं नही बकिया धर्म भी कम नही !आजकल हिन्दू धर्म के प्रचारक बड़े दावे के साथ सुने जा सकते है कि सारे लोग मूल रूप से हिन्दू ही है इसलिए सब को हिन्दू ही हो जाना चाहिए; राम तो सभी के पूर्वज है ; सभी को ब्रह्मा ने ही पैदा किया है; इससे आगे तक की बाते सुनी जाती है ।सब धर्म इसी प्रकार की बातो से चलते है ।जो बहुत संकीर्ण सोच की हामिल होती है ।यही वह वजह है जो आदमी आदमी के बीच खाई पैदा करती है; वैचारिक मतभेद व संघर्ष पैदा करती है और राष्ट्र की परिकल्पना के लिये बाधा उत्पन्न करती है ।               पिछले कुछ दसको से भारतीय जन मानस को भी  इसी धर्मवाद की तर्ज पर संगठित करने का प्रयास किया जा रहा है ।लेकिन  इन का भी यही हाल होने वाला है । भारतीय समाज बहुत सी संकृतियो का मिश्रण है । यहा सभी धर्मो के लोग रहते है ; इस कारण धार्मिक द्वन्द व वैचारिक वैमनस्य का बहुत अधिक खतरा रहता है । इन परिस्थितियो मे राष्ट्र के  अस्तित्व को बचाने के लिए धर्म पर चैक  एंड बैलेंस  की पोलिसी लागू करना चाहिए । आजादी के बाद राष्ट्र निर्माताओ व संविधान निर्माताओ ने इसे  समझा भी और चैक व बैलेंस की नीति लागू करने के लिए प्रावधान भी किए । लेकिन समय के साथ यह कमजोर होते  गए। इन्ही परिस्थितियो मे राष्ट्रवादी लोग दरकिनार होते गए और धर्मवाद का प्रयास तेज होता गया ।धर्मवादी फिर  उसी गलतफहमी का शिकार हो गए कि वे धर्म के सहारे मजबूत राष्ट्र का निर्माण कर लेंगे । और यह लाॅबी इसी गुमराही मे उलझी हुई है ।आज यह बहुत जरूरी है कि लोगो को समझाया जाए कि धर्म की बुनियाद पर सफल राष्ट्र खड़ा नही किया जा सकता । कुछ समय के लिए हमे  ऐसा लगता है कि हम अपने मकसद मे सफलता पा रहे है लेकिन  आगे चलकर इस मार्ग मे बहुत खतरनाक हालात पैदा हो जाते है ।भारतीय परिवेश मे अगर धर्मवाद को  स्वछंद किया जाए तो हम देखेंगे कि इस्लाम परस्त हिदुत्व को मिटाने की चेष्टा करेंगे  ,हिन्दुत्व इस्लाम का अस्तित्व मिटाने की चेष्टा करेगा ; इतना ही नही दलित का अस्तित्व स्वर्णो को गवारा नही;  और यहीं से मानविय संघर्ष पैदा होता है और ये सब राष्ट्र के अस्तित्व को ध्वस्त करते है।यहां एक और बात भी महत्वपूर्ण है;  हर दौर मे समाज मे क्राईम मौजूद रहता है; क्राइम अपने आप को बचाने के लिए धर्म की आड़ आसानी से प्राप्त कर लेता है और वह धार्मिक वैधानिकता हासिल कर लेता है जो कि  एक राष्ट्र के लिए काबिल ए कबुल नही हो सकता ।           राष्ट्रीय महत्व के लिए धर्म पर चैक एंड बैलेंस रखना कोई नई बात नहीं है । भारतीय  इतिहास मे जितने भी महान साम्राज्य हुए है  उन सभी ने अपने अपने तरीके से धर्म पर कड़ी नजर रखी है । उन्होंने हमेशा  उन धार्मिक विचारो  को राज्य व राष्ट्र की नितियों से दूर रखा जो कि प्राकृतिक न्याय के अनुरूप नहीं होते थे ।भारत एक विविध संस्कृतियों व धर्मो वाला देश है ।अगर कोई यह समझे कि यहा धार्मिक मान्यताओ को हवा दे कर सफल राष्ट्र कायम रखा जा सकता है तो यह  उनकी गलतफहमी है । अगर कोई सरकार अपनी जनता को कल्याणकारी व प्रगतिशील राष्ट्र देना चाहती है तो उसके लिए यह जरूरी है कि वह धार्मिक मिथ्या व संकीर्ण धारणाओ को हवा देने के बजाय  उनको रोकने की कोशिश करनी चाहिए ।देश के जनमानस मे विज्ञान व तर्क के आधार  प्रगतिशील विचारो का संचरण किया जाना चाहिए । धर्म का मूल अंधविश्वास होता है;  कोई भी धर्म हो वह वर्तमान स्थिति को लेकर वास्तविकता को समझने के बजाय प्राचीन चमत्कारो की दुनिया दिखा कर मनुष्य को दैवीय शक्ति का भय दिखाकर उसकी विचारधाराको संकीर्ण व रूढ़िवादी बनता है ।                       आज के परिपेक्ष मे भारतीय जनमानस को यह चोला चढ़ाया जा रहा है जो कि भारतीय राष्ट्र के लिए बहुत ही खतरनाक साबित होगी ।हमे इस खतरे को समय रहते समझना चाहिए वरना हम देश को रूढ़िवाद व धार्मिक संघर्ष के भंवर मे फंस्सा बैठेंगे । देश के जागृत नागरिकों को देश मे वैज्ञानिक सोच व सामाजिक सहअस्तित्व की विचारधारा को बढ़ावा देना चाहिए ।भारत जैसे देश के लिए यह शोभा  नही देता  है कि वह मध्यकालीन  धार्मिक उन्माद को वापस स्थापित करे बल्कि  उसे राष्ट्रीय विचार की वैश्विक सोच को कायम करना चाहिए और धर्मवाद को स्वछंद न छोड़े बल्कि  उस पर चैक एंड बैलेंस की पोलिसी लागू करना चाहिए ।रहीम " नादान"