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कौमार्य: एक मिथ

......कौमार्य: virginity........(एक सामाजिक जागरूकता संदेश)हम कल महिलाएं कौमार्य के बारे में चर्चा कर रहे थे और बहुत सारे लोग ये मानते हैं कि कोई लड़की कुंवारी है या नेहीँ ये उस लड़की को अपने पहले सेक्स के दौरान खून निकलता है या नेहीँ, उस से ही पता चलता है। लेकिन यह गलत है .. रक्तस्राव यह निर्धारित नहीं करता कि कोई लड़की कुंवारी है या नहीं, इसलिए मैंने इस लेख को जारी करने का फैसला किया है ताकि लड़कियों के इस मुद्दे पर हमारे युवा पुरुषों और महिलाओं को शिक्षित करने में मदद मिल सके .....क़ौमर्ज्य के बारे में मिथक-ज्यादातर महिलाको अपने पहले सेक्स के दौरान रक्तस्राव  क्यों होती। दक्षिण और मध्य एशिया (पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश, अफगानिस्तान इत्यादि) और अफ्रीका (नाइजीरिया और कई अन्य राष्ट्रों) में एक बहुत ही आम मिथक है की कोई महिला कुंवारी है या नेहीँ पहली सेक्स के दौरान  रक्तस्राव  हुआ कि नेहीँ इस आधार पर आप बता सकते हैं ,  ये बिल्कुल  सत्य नेहीँ है। पहली बार यौन  संबंध बनाने पर सभी महिलाको खून नहीं निकलति। ऐसा क्यों आइये समझते हैं।  यह समझने के लिए कि क्यों कुछ महिलाएं खून बहाती हैं और क्यों कुछ नहीं बहती हैं, यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि हाइमेन क्या है। हाइमेन एक झिल्ली है जो योनि खोलने के हिस्से को कवर करती है (यह हमेशा पूरे योनि को अवरुद्ध या कवर नहीं करती है, क्योंकि कुछ लोग गलती से सोचते हैं)।सभी महिलाओंका एक समान हाइमन नहीं होता है। हाईमेन भी महिला से महिला से अलग होता है - जैसे कि सभी महिलाओं की अलग-अलग ऊंचाई और वजन और फीचर्स होते हैं, सभी महिलाओं के पास अलग-अलग प्रकार के हाइमेन होते हैं। कुछ महिलाओं में मोटी टाइप  होते हैं, कुछ में बहुत पतले टाइप  होते हैं, और कुछ महिलाओं में कोई हाइमेन नहीं होता है। कुछ महिलाओं में बड़े होते हैं, कुछ महिलाओं में स्वाभाविक रूप से बहुत कम मात्रा में हाइमेन होता है जो उनके योनि खोलने के केवल एक छोटे हिस्से को कवर करता है (और इसलिए वास्तव में पहली बार सेक्स के दौरान, रास्ते में नहीं मिलता है)। इसके अलावा, जब आप बड़े होते हैं तो हाइमेन अपने आप नस्ट हो सकता हैं। अधिकांश महिलाओं के लिए, हाइमेन व्यायाम, साइकिल चलाना, घुड़सवारी के साथ अपने आप नस्ट हो सकता हैं - बहुत अधिक शारीरिक गतिविधि, यहां तक कि नाचने के साथ भी नस्ट हो सकते हैं! - या मासिक धर्म के दौरान टैम्पन का उपयोग करने से भी। विशेष रूप से यदि हाइमेन बहुत छोटा या पतला होता है, तो इसमें से अधिकांश एक लड़की के ग्रोथ के साथ साथ में खुद ब खुद नस्ट होने लगती है। अगर एक महिला एक हाइमेन के बिना पैदा होती है, तो वह पहली बार यौन संबंध के समय खून नेहीँ बहती।  अगर एक औरत के पास छोटे या पतले हामेन होते हैं, तो वह भी पहली बार यौन संबंध के टाइम खून नेहीँ बहती है। अगर एक महिला के हाइमेन अपने आप नस्ट हो जाती है  (जो लड़कियां बड़े होने के समान ही आम हैं), तो वह भी नेहीँ । नतीजा यह है कि ब्रिटेन मेडिकल जर्नल द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, कम से कम 63% महिलाएं यौन संबंध के समय खून नेहीँ बहती। जो महिलाएं खून बहती हैं उनमें शामिल हैं: - मोटी भजन वाली महिलाएं (जो आबादी का एक छोटा प्रतिशत बनती हैं) - छोटी लड़कियां। क्योंकि हाइमैन समय के साथ अपने आप नस्ट हो सकते हैं। 16 वर्षीय महिला के पास 25 वर्षीय की तुलना में खून बहने का अधिक मौका होता है। जब तक एक लड़की सहमति की कानूनी आयु से ऊपर या उससे अधिक हो - 18, 20, 24 वर्ष की आयु, उदाहरण के लिए - उसके अधिकांश हाइमेन अपने आप से नस्ट होने  की संभावना है, जिसका अर्थ यह है कि वह  खून बहने की संभाबना कम होता है।  अक्सर, जो महिलाएं खून बहती हैं वे ऐसी महिलाएं होती हैं जिन्हें सेक्स के दौरान दर्द से गुजरना पड़ताहै।  अगर  लड़की के अंदर दर, असहज, उत्तेजित न होना ऐसे हालात होता है  तो  चोट लगने से खून बहने की संभावना है। चूंकि ज्यादातर लोग सोचते हैं कि पहली बार महिलाओं के यौन संबंध होने पर महिलाओं के लिए खून बहना जरूरी है, उन्हें यह नहीं पता कि यह खून किसलिए है,  है कि महिला को चोट लगी है, या  न कि हाइमैन तोड़ने के कारण। ज्यादातर मामलों में चोट ही कारण है।   महिला कौमार्य का आकलन करने का कोई तरीका नहीं है। रक्तस्राव में कौमार्य के साथ कुछ भी संबंध नहीं है -हाइमेन के प्रकार पे डिपेंड करता है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, पहली बार सेक्स के दौरान केवल 37% खून बहती है। यह जानना इतना महत्वपूर्ण क्यों है? दुनिया भर में महिलाएं 'कुंवारी खून बहने की मिथक के कारण दुर्व्यवहार, घायल और यहां तक कि मारे गए .. क्योंकि ज्यादातर लोग (पुरुष और महिलाएं) सोचते हैं कि खून बहना कौमार्य का संकेत है, जो महिलाएं पहली बार खून नहीं बहती वे  तलाक, घरेलू हिंसा और संदेह से पीड़ित होते हैं, और यहां तक कि सम्मान के लिए भी मारे गये है।लोगों को ये शिक्षित करना है  कि लड़की को पहली बार यौन संबंध रखने से  खून बहना जरूरी नेहीँ है  - क्योंकि सभी लड़कियों में मोटी हाइमेन नहीं होते हैं, और कुछ हाइमेन जन्म के बिना पैदा भी होते हैं - यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सचमुच जीवन को बचा सकता है। कृपया समझे और समझाये।Source: Bannu institute of medical sciencesRajabala

लिल्लीथ की कहानी

*लिलीथ की कहानी*एक लंबे समय पहले मुझे लिलीथ की इस कहानी को पढ़ने का मौका मिली थी। मेरे लिए वह एकमात्र विद्रोही पौराणिक नारी चरित्र है।.........................................................................पारंपरिक बाइबिल कई धार्मिक फिल्टरों से गुजर चुका है और यह कुछ महत्वपूर्ण वर्गों और टुकड़ों को भी खो दिया है। हालांकि, इसमें एक हिस्सा है जो इसमें छोड़ा गया है जो बताता है कि ईश्वर ने मनुष्य सृष्टिके पहले मुहुर्त में न केवल एक आदमी बल्कि एक महिला को बनाया है। कहा जाता है कि ओ  लिलिथ थी दुनिया की पहली महिला और उसे   भगवान ने उसी मिट्टी से बनाया था जिस मिट्टी से  उसने आदम को बनाया था। ऐसा कहा जाता है कि लिलिथ को तब भगवान ने त्याग दिया और खारिज कर दिया जब यह पाया गया कि वह आदम से मजबूत और अधिक बुद्धिमान है  और वह आदम के आदेशों का पालन नहीं कर रही थी। मानवता की उत्पत्ति को समझने के लिए बाइबिल में इस चरित्र का उल्लेख नहीं किया गया था क्योंकि लिलीथ  चर्च की परंपरा के खिलाफ थी जो कहता है कि महिलाओं को पुरुषों को मानना होगा और उनके स्तिति  पुरुषों की तुलना में कम   होना चाहिए। लिलिथ एक ऐसी महिला थी  जो दृढ़ थी, और वह बुद्धिमान थी और आदम से बेहतर  थी। हालांकि, आदम के चरित्र अधिक प्रभावशाली था। अंतरंगता के समय में, लिलीथ ने मांग कि ओ आदम के ऊपर  हो सकती है, लेकिन आदम ने इनकार कर दिया। ऐसा कहा जाता था कि एहि सुरुवात थी झगड़े का। इसलिए दोनों को अलग किया था और  भगवान द्वारा लिलिथ पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। किताब कहती है, लिलिथ: "मुझे तुम्हारे नीचे क्यों होना  चाहिए?  मुझे भी उसि मिट्टी से बनाया गया है जिस में तुम बने हो,  और इसलिए मैं तुम्हारा बराबर हूं।" पर आदम ने नेहीँ मानी और  जैसे ही  ने उसे आज्ञा मानने के लिए मजबूर करने की कोशिश की, लिलिथ ने गुस्सा किया, भगवान के नाम का उच्चारण किया, और छोड़ कर चालि गयी।  उसके बाद ईस्वर ने इव  को आदम की पसलियों से बनाया  था। लिलीथ की चरित्र को बाइबल से सेंसर किए गया  क्योंकि उसने महिलाओं को सशक्तिकरण के विचार देती है। लेकिन अगर लिलीथ चले गए, तो बड़ा सवाल यह है कि वह कहाँ गई थी? यह कहा गया है कि  कि वह सीधे शैतान की बाहों में भाग गई। लिलीथ पहली महिला थी, इव से पहले, लेकिन वह अधिक बुद्धिमान और विद्रोही थी और मनुष्य की तुलना में एक बेहतर चरित्र थी, इसलिए उसे दंडित किया गया और उसकी गाथा बाइबल से काट दिया गया ।.................................................. ..........................यह लिलीथ की दुखद कहानी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, हम ईव के वंशज है लिलीथ के नहीं । सायेद इस लिए  किसी भी असमानता के खिलाफ हमारी आवाज उठाना इतना  सहज नहीं होता है। एक राशनलिस्ट होने के नाते मैं जीवन की पौराणिक उत्पत्ति में विश्वास नहीं करति हूं, फिर भी यदि मुझे चयन करने को कहा जाए, निश्चित रूप से में अपने  पूर्बज के रूप में  रूप में इव के बजाय लिलीथ का चयन करूंगी।Rajabala

राजनीति में चुनाव और चुनाव की राजनीति ...!! _ तारकेश कुमार ओझा
 27 March 2019  
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कद्दावर नेता के निधन की सूचना ऐसे समय आई जब समूचा देश चुनावी तपिश मेंतप रहा था। काल कवलित नेता की प्रोफाइल चीजों को अलग नजरिए से देखने कीसीख दी गई। शिक्षा - दीक्षा ऐसी थी कि राजनीति से दूर रहते हुए ऐशो -आराम की जिंदगी जी सकते थे। लेकिन लीक से हट कर उन्होंने राजनीति कोकर्मक्षेत्र बनाया तो जरूर कुछ सोच कर। चुनाव के चलते राजनीति का हेवीडोज दिमाग में घुस रहा है। चौक - चौराहों से लेकर हर कहीं बस चुनाव की हीचर्चा। वाकई हमारे देश की राजनीति विरोधाभासों से भरी है। बातचीत मेंराजनीति या चुनाव की चर्चा होते ही लोग मुंह बिचकाते हुए बोल पड़ते हैं... अरे छोड़िए ... सब धंधेबाज हैं...। लेकिन छुटभैया नेता से भी सामनाहोते ही आत्मिक अभिवादन तय। मतदान की बात आई तो जवाबी आश्वासन ... वोट तोआपकी पार्टी को ही देंगे... यह भी कोई पूछने वाली बात है। उम्मीदवार तोछोड़िए उनके चंपुओं के बैठकखानों में भी अच्छी - खासी भीड़ नजर आती है।ज्यादातर फरियादी ही दिखाई देते हैं। खादी पहने शख्स हर किसी की बातविनम्रतापूर्वक सुन रहा है...। मानो किसी को भी नाराज नहीं करने की भीष्मप्रतिक्षा कर रखी हो। इस बीच भीतर से प्लेट निकला जिसमें दर्जनोंमिठाइयां रखी हुई हैं। नेताजी निर्देश देते हैं कि कोई भी मीठा के साथपानी पीने से वंचित न रह जाए। थोड़ी देर में काली चाय भी आ जाती है।नेताजी विनम्रतापूर्वक कहते हैं... भैया इसी से काम चलाइए ...। दूध वालीचाय पिलाने की हमारी औकात नहीं है। हम कोई बड़े लोग थोड़े हैं... बस जनताकी सेवा का नशा है। अपने देश में सच्चाई है कि मौका चुनाव का हो तोबेचारे उम्मीदवार सबसे सीधी गाय बन जाते हैं। जिसकी इच्छा हो दुह ले...।नेताजी को ठगे जाने का बखूबी अहसास है। लेकिन हंसते हुए सब कुछ सह रहेहैं। बकौती में कोई सीमा पार कर रहा है लेकिन जनाब शालीनता से सब कुछबर्दाश्त कर रहे हैं। यह सब देख  मैं सोच में पड़ गया कि क्या वाकईराजनीति और इससे जुड़े सारे लोग बहुत ही  बुरे हैं। इनमें लेशमात्र भीअच्छाई नहीं है। फिर क्यों लोग इनके सामने सिर झुकाते हैं। मैने कई ऐसेजनप्रतिनिधियों को देखा है जो औसतन 16 से 18 घंटे काम करते हैं। उन्हेंदेख कर अनायास ही ख्याल आता  है  ठंडे कमरों में कुर्सियों  पर पसरे  उनसरकारी बाबुओं व कर्मचारियों का जो महज इस बात से बिफर पड़ते हैं कि किसीने उनके सामने खड़ा होकर उनके अखबार पढ़ने या मोबाइल पर चैटिंग  का मजाकिरकिरा कर दिया। जबकि  तनख्वाह हजारों में पाते हैं। हर पांच साल मेंजनता की चौखट पर मत्था टेकने की कोई मजबूरी उनके सामने नहीं है। करोड़ोंमें बना पुल भले ताश के पत्तों की  भरभरा कर  गिर जाए लेकिन क्या मजाल किकायदे का कोई भी काम बगैर मीन -मेख निकाले आगे  बढ़ा दे।  सरकारी अस्पतालमें मरीज बाथरुम में औंधे मुंह गिरा पड़ा है, लेकिन शोर मचने के बावजूदअस्पताल के कर्मचारी अपने में मस्त हैं कि गिरे को उठाना हमारा काम थोड़ेहैं। मेरे शहर में संगठित अपराध के गिरोह ने करोड़ों के वारे - न्यारेकिए। कालचक्र में गिरोह की कमर टूट गई। कईयों को जेल जाना पड़ा। कई अच्छे- भले लोगों पर बदनामी के कीचड़ उछले। लेकिन काली कमाई की आधी मलाई खानेवाले  सरकारी अधिकारी, कर्मचारी और पुलिस का बाल भी बांका नहीं हुआ।चुनाव या राजनीति से आप निराश हो सकते हैं ... राजनेताओं को गालियां भीदे सकते हैं। लेकिन इसकी कुछ अच्छाइयों को नजरअंदाज करना भी गलत होगा।सामान्य वर्ग के कई नेताओं पर खास वर्ग को जरूरत से ज्यादा महत्व देने काआरोप लगता है तो एक मायने में यह सुखद ही है कि वोटों की खातिर ही सहीलेकिन कोई  उपेक्षित तबके का ख्याल तो रख रहा है। अल्पसंख्यक समुदाय केएक ऐसे नेता को जानता हूं कि जिसके क्षेत्र में बहुसंख्यक - अल्पसंख्यकहैं। वो खुद भी अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। लेकिन रक्षाबंधन के दिन  हाथोंमें राखियां सजा कर वो नेता अपने क्षेत्र  के हर हिंंदू के घर जा धमकाताहै और शिकायती लहजे में कहता है कि क्या इस भाई की कलाई में राखी नहींसजेगी।  फिर लगातार कई दिनों तक राखियां उसकी कलाई पर बंधी नजर आती है।यह भी राजनीति और चुनाव का करिश्मा है जो एक अदने से नेता को इतना उदारबनने को मजबूर कर सकता है। लिहाजा हम चुनाव या राजनीति की बुराइयों कीजरूर आलोचना करें, लेकिन इसकी अच्छाइयों की ओर ध्यान देना भी जरूरी है।इसके कई सकारात्मक पक्ष भी हैं....।

नारी सशक्तिकरण - रूपेश कुमार
 8 March 2019  
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आज हमारा समाज जिस दौर से गुजर रहा है उसमें भारतीय नारी का महत्वपूर्ण योगदान है ! कभी वह समय था जब नारी का क्षेत्र शिक्षिका या नर्स बन जाने तक सीमित था ! किन्तु अब वह हर क्षेत्र में सक्रिय है ! वह अपने घर - परिवार के साथ - साथ समाज एवं राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को निभाने मे पूर्णतया सजग है ! इतना सब होने पर भी चिंता का विषय यह है कि देश का तथाकथित प्रगतिशील पुरूष वर्ग नारी के प्रति अपनी परंपरागत दृष्टिकोण को बदल नहीं पाया है ! वह आज भी उसे भोग्या ही समझा जाता है ! उसकी कोमलता से अनुचित लाभ उठाने का प्रयास करता है ! आज आवश्यकता इस बात की है कि पुरूष वर्ग नारी को मुक्तभाव से निर्भय होकर कार्य करने का अवसर प्रदान करे ! पुरूष को सदैव से शक्तिशाली माना जाता रहा है और स्त्री को अबला नारी ! आज के युग में नारी को कोई सम्मान नहीं मिलता ! महिला उत्पीड़न का मूल कारण उसकी शारीरिक स्थिति और सामाजिक मापदंड है ! पतियों द्वारा पत्नियों की पिटाई, युवतियों का बलात्कार, दहेज के लिए की गई बहुओं की हत्या, बाल विवाह आदि इसके कुछ ज्वलंत उदाहरण है ! घरेलू कार्यों का अधिकतर बोझ उन्हीं के कंधों पर रहता है ! लङकीयो के शिक्षा कम ध्यान दिया जाता था ! कई महिलाओं के उनके पुरूष सहकर्मी भी कम परेशान नहीं करते ! प्राकृतिक तथ्य है कि नारी कोमलकांता होने के साथ- साथ अपने स्वभाव में अधिक कर्मठ एवं सहनशील होती है ! धैर्य भावना भी उसमें अधिक होती हैं  ! इसलिए राष्ट्र निर्माण के कार्यों में वह पुरूषों की अपेक्षा अधिक सहायक सिद्ध होने मे समर्थ है ! आज आवश्यकता इस बात की है कि नारी शिक्षा का अधिकाधिक विकास कर उसकी क्षमता को विकसित किया जाय ताकि राष्ट्र निर्माण के कार्य में पुरूषों से ज्यादा सिद्ध हो सके !                      स्त्रियों पर लग रहे अंकुश से समाज मे 2012 वर्ष दिल्ली मे हुए दामिनी गैंगरेप से महिलाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं ! इसके विरोध में  पुरूषों एवं महिलाओं का कठोर कानून बनाने के लिए धरना एवं प्रदर्शन किया गया था ! इस तरह का कांड अब न हो इसके लिए हमें अपनी सोच बदलनी होगी!

एक मुलाकात अंजना बख्शी जी के साथ
 8 March 2019  
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किताबें हमें बनाती हैं, किताबें हमें गढ़तीहैंअंजना बख्शीआह को चाहिए एक उम्र असर होने तककौन जीता है तेरी जुल्फ़ के सर होने तक.मेरी सारी ज़िन्दगी ग़ालिब के ही शेर कीतरह गुजरी, पैदा होते ही अंधेरे घर में जैसे दुआएं गुमहो गई थीं. बहुत अंधेरा था. होश संभालनेवाली लड़की खरगोश-सी मासूम की तरह तोथी लेकिन उसे इस अंधेरे से डर भी लग रहा है.’मम्मा’ (मां) कितना अंधेरा है?’ नन्हीं-सीबच्ची की बातें मां की आवाज़ों में गुम होजातीं.’अंधेरा है तो क्या हुआ. लड़कियां इसी अंधेरे मेंरास्ता बनाती हैं. इसी अंधेरे में एक दिन ताड़ केपेड़ की तरह लंबी हो जाती हैं… अंधेरा तब भीरहता है.एक परिवार के बंटते हुए भी वे इस अंधेरे केतक्सीम से गुजरती रहती हैं’---मां की आंखों में एक दर्द सिमटा होता. तभीसोच लिया था मुझे अंधेरे का हिस्सा नहींबनना. तभी से बिगड़ने लगी थी मैं. हर वो कामकरना चाहती थी जिसके बारे में कहा जाताथा कि ये काम लड़कियों को नहीं करनाचाहिए. मैं उड़ना चाहती थी, खिलखिलानाचाहती थी, चमकते हुए जुगुनुओं को हाथों में कैदकरना चाहती थी, चपेटे खेलना या रस्सीफलागना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था. मुझे तो हरउल्टे-सीधे काम पसम्द थे. लड़कों की तरह पेड़ परचढ़ जाना, पत्थर लेकर आम के कच्चे-कच्चे बौरों परफेकना, इमलियां और बेर तोड़ते हुए एक सुखद-सीअनुभूति होती थी मुझे. थोड़ा आगे बढ़ी तोआम के बौरों से रिश्ता टूट गया. इमलियां अबकुछ ज्यादा ही खट्टी लगने लगीं. मन ग़ालिबके शेरों की तरह कुछ और चाहने लगा. मां तब भीअंधेरा दिखाकर कहा करती—’ ये रास्ता तेरानहीं है अनु, इन रास्तों पर तो केवल लड़के चलते हैं.तब पहली बार कहीं प्रेमचन्द की ’पांच फूल’ मिलगई थी मुझे. पांच फूलों जैसी कहानियां---- इनकहानियों में एक अजीब-सी दुनिया थी. अबदुनिया आबाद थी…लगा ये तो मेरी दुनियाहै. लेखक ने कैसे लिखा होगा इस दुनिया को.इस बार कमरे में गई तो वहां अंधेरा नहीं था,वहां मेज पर किताबें थीं. तब से किताबें दोस्तबनती चली गईं…या दूसरे शब्दों में कहूं तो मुझेगढ़ती चली गईं.कभी-कभी इन कहानियों को पढ़ते हुए बहुत जोरसे रोना आता मुझे खासकर उस ज़मानें में मंटोकी कहानियां पढ़ते हुए. मां ने बंटवारे कीइतनी कहानियां सुन रखी थीं. मां नेकहानियां दादा-दादी के मार्फत सुनी थीं.उन्होंने बंटवारे को बहुत करीब से अपनी आंखों सेदेखा था, जलती हुई ट्रेनों को भी… जबइंसानी लाशों से भरी ट्रेनें आया करती थीं.सगे-संबन्धियों को करीब से मरते हुए देखा---वोलोग तक्सीम के वक्त रावलपिण्डी सेहिन्दुस्तान आए थे. मैं इन किस्से कहानियों कोसुनती हुई बड़ी हुई थी.बंटवारा एक नासूर की तरह मुझे सीलता रहाथा. फिर मंटो ने ऎसी-ऎसी कहानियांलिखी थीं कि इन्हें पढ़ते हुए मेरी आंखें भीग-भीग जातीं. इन कहानियों में मर्दों का एकक्रूर चेहरा भी होता---जहां औरत कसाबखाने मेंटगें गोश्त के लोथड़ों से ज्यादा नहीं थी. सबउसे खोल-खोल कर देखा चाहते थे. ’खोल दो’पढ़ते हुए मैं चीख पड़ी थी. नहीं प्लीज शलवारका नाड़ा मत खोलना सकीना.. ’धुंआ’ और ’ठंडेगोश्’ ने मर्द-औरत के अलग-अलग मनोविज्ञान कोचित्रित किया था. आप विश्वास करें, मंटोकी इन कहानियों को पढ़ते हुए मैं इतनी भयभीतहो जाती कि कभी-कभी दरवाजा बंद करचीखने-चिल्लाने का जी करता और फिर आइनेके सामने खड़े होकर खुद को देखकर फिर जोर सेचीख पड़ती. मुझे लगता मेरे चारों ओर दंगे भड़क रहेहैं और मंटॊ के खतरनाक चरित्रों ने मुझे चारों ओरसे घेर लिया है. मैं लंबी-गहरी सांसे ले रहीहोती. उसी ज़माने में मंटो के साथ-साथ इस्मतचुगताई, कृश्नचंदर, बेदी ---इन साहित्यकारोंको पढ़ने का इत्तेफ़ाक हुआ. अब मुझे पढ़ने की लतलग गई थी. इस्मत के ’लिहाफ’ में हाथी फुदक रहेथे..तौबा-तौबा. मुझे इन हाथियों से वहशत होरही थी, लेकिन लिहाफ की बेगम आपा से मुझेपूरी-पूरी हमदर्दी थी. मुझे नवाब साहब परगुस्सा आता कि वो सारा दिन और सारीरात लोडे-लापड़ों में घिरे होते और उन्हें बेगमसाहबा की मजबूरियों का जरा भी अहसास नहोता. इस्मत चुगताई की इस कहानी ने मुझेगहराई में उतरकर सोचने पर मजबूर किया.दुनिया को इस्मत की नजरों से बोल्ड बनकरदेखने की कोशिश करने लगी थी.शब्दों के लिबास को पहना तो अंजना नईहोती गयी. ये वो ज़माना था जब पहली बारकितने ही नए नामों को पढ़ने का इत्तेफाकहुआ---रसूल हमज़ातोव की ’मेरा दागिस्तान’ पढ़डाली. रूसी एवं अन्य साहित्यकारों सेतोस्ती बढ़ी. तोलस्तोय, दॉस्तोएव्स्की,गोर्की, चेखव, शेक्शपियर, चॉम्स्की, स्टीवेन्सन,रस्किन बॉण्ड…मेरे जिस्म में बरसात के फूल खिलने लगे थे---हवामदहोश थी---अब कविताओं के अंकुर नए सिरे सेफूट रहे थे. बदली थी मेरी आंखें---जीवन को देखनेऔर जीने की समूची दृष्टि में परिवर्तन आयाथा.मैं रसूल हमज़ातोव को धन्यवाद देती थी…“मैं हर बार उड़कर तुम्हारे पास पहुंच जाती हूं रसूलतुम कैसे बुनते हो इंसानी आत्मा से एक देह या देहसेएक इंसानी आत्मा,तुम दृष्टि को लिबास पहनाने का हुनर,कैसे सीख पाए.मैं देह-आत्मा से गुजरतीअक्सर तुम्हें छूने के प्रयास में,जख्मी हो जाती हूं रसूल.मेरे पंख काट दिए गएऔर मैं उड़ना भूल चुकीलेकिन अब वापस लेना चाहती हूंतुमसे अपनी उड़ान. “यहीं पहली बार पाब्लो नेरूदा को पढ़ने काइत्तेफ़ाक हुआ. मेरी कायनात बदली थी. एकतीसरी आंख खुली थी. सत्य की निर्गमवादियों से गुजरने को हौसला जागा था. मैंबड़ी हो रही थी. कठिन होता है लड़की मेंउड़ते पंखों का जागना. उन्हीं दिनों अमृताप्रीतम, सारा शगुफ़्ता और परवीन को पढ़ने बैठगई. मुहब्बत में कैद औरतें---अमृता से सारा औरपरवीन तक हसीन कायनात. सारा ने आत्म-हत्या कर ली---परवीन भरी जवानी में मोहब्बतके ताप के साथ जग को अलविदा कह गई---अमृता सारा जीवन साहिर की यादों केसाथ बसर कर गयीं. …कहीं एक बूंद शेष है …मैं अपनेभीतर उस बूंद को ढूंढ़ रही थी---जीवन केसारांश में उलझी उस बूंद को जो मुझको कह रहीथी अंजना मत तलाश करो…साहित्य केवल बहना सिखाता है जहां जख्मरिसते हैं. पराए ज़ख्मों को अपना कहते हुए हम खुदको लहूलुहान कर बैठते हैं---मैंने खुद को देखा तोचौंक गई. साहित्य की कितनी डगर से गुजरतीहुई---मैं सचमुच लहू-लुहान थी, लेकिन यहीं मुझे अपनेलिए विचारों का एक नया बसेरा भी आबादकरना था

चारूरत्न -स्त्री संघर्ष
 8 March 2019  

अगर एक सोने की अंगूठी बोल सकती और अपनी कहानी उन दिनों से शुरू करती जब वो mine के अंदर छुपी थी तो शायद कुछ ऐसी ही कहानी बनती - तप कर कुंदन बनने की। इस उपन्यास की नायिका भी अपने उम्र का 35 साल गुज़ार देने के बाद अपने नाम को सार्थक करती हुई कुंदन बनती है।******मेट्रो सिटी में फ्लैट, अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते दो प्यारे बच्चे, अच्छी पैकेज वाले जॉब में पति और इन सब का यानि फ्लैट, बच्चों और पति का ख्याल रखती पढ़ी लिखी गृहणी जो अपने उम्र के mid 30s में हो।इस scene से काफी लोग परिचित होंगे या relate कर पाएंगे।गृहणी को थोड़ा और describe करते हैं -एक ऐसे ग्रामीण परिवार में जन्म जहाँ खेत भी हो और गृह स्वामी की नौकरी भी। घर के लोग साक्षर/पढ़े लिखे हों। माइंडसेट वही टिपिकल ग्रामीण मिडिल क्लास जहाँ बेटे को नौकरी पाने के उद्देश्य से पढ़ाया जाता है और बेटी को बस उतना ही जितने में ब्याह हो जाये। शादी के पहले से लेकर बाद तक, घर की इज़्ज़त की जिम्मेदारी लड़की के कंधे पर। इज़्ज़त भी इतनी fragile की बस एक लड़के से बात करने या लड़का कहीं रोक कर जबरदस्ती प्रेम पत्र भी पकड़ा दे तो इज़्ज़त पर एक दाग।Globalisation और आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में ऐसी ढेर सारी लड़कियाँ गाँव से शहर / मेट्रो सिटी में आ गई हैं।इस उपन्यास की नायिका भी एक ऐसी ही 35 साल की महिला है। सबकुछ होते हुए भी जिस परिवेश में वो पली-बढ़ी होती है और जिन मान्यताओं के बीच वो बड़ी होती है, वो उसके अंदर कहीं न कहीं एक हीन भावना भी भर देती है। इन्हें जरुरत होती है एक ऐसे व्यक्ति की , चाहे वो सहेली, दोस्त, पति कोई भी हो, जो encourage कर सके .... कह सके कि yes, you can do !ये नायिका भी ऐसी ही कमजोरी के क्षण में एक सहारा पाकर अपने जीवन की कहानी लिखने का निश्चय करती है।अब इनकी कहानी के साथ आप उसके बचपन से लेकर अबतक की यात्रा के साथी बनते हैं। इसकी नज़र से इसके आसपास और घर-परिवार के लोगों को देखते हैं। नायिका की सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये कभी भी दोषारोपण करते हुए नहीं दिखती कि फलाने के कारण ऐसा हुआ या ऐसा हुआ होते तो वैसा होता। ये आपको हर पात्र के अंदर ले जाती है, आपको दिखाती है कि फलाने के ऐसे नेचर/सोच के पीछे कारण क्या था।नायिका कुंदन अपनी कहानी के साथ अपनी माँ सुधा की कहानी या यूँ कहें कि उनके जीवन की खिड़की भी हमारे लिए खोलती है। उसकी माँ का जीवन कई अर्थों में नायिका से विपरीत रहा है। मेट्रो सिटी में पली लड़की गाँव में ब्याह दी जाती है क्योंकि लड़के की सरकारी नौकरी है। अब इस महिला को गाँव के माहौल और ग्रामीण महिलाना पॉलिटिक्स में सेटल करना है।तो हम दो विपरीत परिस्थितियों के अंदरुनी संघर्ष को देखते हैं जो कि विपरीत होते हुए भी कई मायने में सामान है।****कुंदन की माँ जब ये सोचती है -"कुंदन तो बच्ची है, लेकिन जब उसके व्यवहार और उसके कम बोलने का मज़ाक उड़ा-उड़ाकर, मेरे सामने हँसा जाता है तो मैं एक ही दिन में उसे सबकुछ सिखाने के लिए मज़बूर हो जाती हूँ चाहे उसके लिए मुझे हाथ ही क्यों न उठाना पड़े।"तब आप कुंदन के प्रति उनके व्यवहार को समझ पाते हैं।और कुंदन भी माँ के दर्द को समझती है जब उसकी माँ बच्चों को अपने सरकारी नौकरी का ऑफर लैटर दिखाकर कहती है कि मैंने घर-परिवार के लिए जॉब नहीं किया।शादी के तुरंत बाद जॉब न कर रही लड़कियों की स्थिति अजीब हो जाती है। माँ-बाप से पैसे ले नहीं सकते क्योंकि वे पराये हो चुके और पति अभी इतना परिचित ही नहीं हुआ होता है कि उससे कुछ बोल सकें। जब कुंदन को ससुराल वाले MA में एडमिशन की सलाह देते हैं तो एडमिशन फी के पैसे के लिए उसकी दुविधा को बहुत ही बारीकी से दिखाया गया है।इस नॉवेल की एक पात्र कुंदन की दादी भी हैं जो कि खुद ही एक सम्पन्न मायके से तालुक रखती हैं लेकिन अपने पति यानि कुंदन के दादा जी को बहुत पहले ही खो चुकी हैं। वृद्ध होती महिला और घर से छूटती उनकी पकड़ और उसका उनपे पड़ते मनोवैज्ञानिक असर को बखूबी उकेरा गया है।मुझे इस नॉवेल की सबसे बड़ी खासियत ये लगी कि माँ और माँ के प्रेम का कहीं भी कवितीय महिमामंडन नहीं किया गया है। बिलकुल ही यथार्थ चित्रण है।लड़के एक बारीक़ चीज़ जो देख सकते हैं वो ये है कि एक केयरिंग डेवोटेड पति की कुछ बातें जो उसके लिए अति सामान्य होती है लेकिन पत्नी को अंदर तक बिंध देती है।पेरेंट्स को बाल मनोविज्ञान को समझने लायक कई चीज़ें और घटनाएं इस नॉवेल मिलेंगी। ये चीज़ें काफी सामान्य है, हर घर-परिवार में होती है लेकिन कुंदन की आँख से देखने के बाद पेरेंट्स एक बार गहराई से जरूर सोचेंगे।

नारी का वर्तमान कैसा हो
 1 March 2019  
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सूरत नहीं सिरत बदलनी होगी।देवी कहलाने से कोई सुरक्षित नहीं हो जाता।स्वयं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती है।माँ शक्ति को भी विभिन्न असुरों का सर्वनाश करने के लिएउनसेयुध्दकरनापड़ा।हरपलउन्हेंअपनीशक्तिकोसिध्दकरनापड़ा।जैसेरातकाअंधकारआरूश के दिखते हीओझल हो जाताहै वैसेहीसामाजिकविकृतियोंकाअंतग्यानऔरशक्ति ,युक्तिऔरबुध्दिकेप्रवेशसेहोसकताहै।हमेंस्वयंसमयकोउत्तमबनानाहोगाऔरनकारात्मकताकीचादरकोजलानाहोगा।धैर्य,सहनशीलतानारीकेअस्त्रथेअबउसेओजस्विता,साहस,युक्ति-बुध्दिकोअस्त्रबनानाहोगाऔरअपनेअस्तित्वकीमहत्तास्थापितकरवानीहोगी।सबलाबननाहोगाउसे।लुहारबनकरउसेहीजंजीरेंपिघलानीहोगी।अपनीशक्तियोंकोएकत्रितकरउद्दंडताकामखौलउड़ाकरलज्जाकाएहसासकरानाहोगा।मुख्तसरमेंकहेतोअपनीयुक्तिकीबुध्दिसेकीर्तिमानबनाकरसमाजकोपूर्णताप्रदानकरनीहोगी।सृजनकेसंकल्पकोस्मृतिमेंरखविश्वाससेआगेबढ़नाहोगा।अनर्गलप्रलापोंपरतरकशकेतीरचलाकरसमाजकोदर्पणदिखानाहोगा।दुस्साहसीहमेशाभीरूहोतेहैं।तुच्छशक्तियोंकाप्रयोगकरपापकीपराकाष्टाकोछूतेहैंइसीलिएतोवेदुस्साहसीहै।इनसेडरनेकीनहींइन्हेजीर्ण-शीर्णकरनेकी।आवश्यकताहैऔरयेमुसलसलतौरपरहोनाचाहिएतभीदुस्साहसियोंकामनोबलडगमगासकताहैऔरनएभारतकासपनासाकारहोसकताहै,सुविचारोंकास्थापनहोसकताहै।डॉशैलजाएनभट्टड़

संत रविदास जी की कहानी गुलाबचंद एन. पटेल की जुबानी
 19 February 2019  
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" मन चंगा तो कठौती में गंगा "    - संत रविदास1450 - 1520कवि, संत, समाज सुधारक और आध्यात्मिक गुरु संत रविदास का जन्म 19 फरवरी 1450, महा सूद पूनम के दिन वाराणसी में जन्मे हुए संत रविदास जी ने बचपन में ही अत्यंत छूता छूत और जाति भेद का सामना करना पड़ा था, मध्य कालीन संत रामानंद का शिष्य बनकर उन्होने धार्मिक आध्यात्मिक जीवन शुरू किया था, रविदास ने जाती और लिंग भेद का विरोध साहित्य सर्जन के द्वारा किया था, थोड़े ही समय में उनके हजारो शिष्य तैयार हुए थे, उसका प्रमाण मीरा बाई की पंक्ति में भी हे, " गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धूर से कलम भीड़ी,सत गुरु साईं दई जब आके जोत रली"धर्म संस्कृति के लिए जरूरी है, धार्मिक आस्था, मन की पवित्रता या शुद्धता दिखाने की जरूरत नहीं है, उनका साहित्य अवधि, राजस्थानी, खड़ी बोली और अरबी भाषा मिस्र होने के बावजूद ये लोकवाणी की तरह हे," धन लोभी मत बनो, धन कभी स्थिर नहीं होता "" आजीविका के लिए सख्त परिश्रम कीजिए "ये संत रविदास जी के ने अपने शिष्यों को संदेश दिया गया था, संत रविदास के पदों का संग्रह "गुरु ग्रन्थ साहिब" मे भी हुआ है, 15 वी सदी के ये महान संत और निर्गुण भक्ति के प्रणेता संत रविदास की स्मृति में सीख संप्रदाय मे "रविदास या पंथ "पंथ का निर्माण हुआ है,वाराणसी उत्तर प्रदेश में गंगा घाट पर भारत सरकार के द्वारा गुरु रविदास घाट का निर्माण किया गया है, ये इस महा मानव को दी गई अंजलि ही है!  इस समय देश में जातिवाद का विरोध किया गया था लेकिन उन्हे उनके सत्य और धर्म भावना के कारण और भगवान के करीब होने के कारण उन्हे स्वीकार कर के उन्हे मान सम्मान दिया गया था, आज भी देश और विदेश में उनकी जन्म जयंती समारोह मनाया जाता है,हिन्दी भक्ति काव्य मीराबाई, कबीर और संत रविदास ने रचे थे | वो शिक्षा में पारंगत न होने के बावजूद एक उमदा भक्ति काव्य समाज को दिया गया है | सामाजिक चेतना और आध्त्यात्मिकता की ओर ले जाने वाले ये हिन्दी भक्ति काव्य ने भारत में संस्कृति का सिंचन किया है |मीराबाई ने कृष्ण भाक्ति में लीन हो कर, राजा राणा के राज्य को तिलांजलि दे दी थी | राणाजी ने मीरा की परीक्षा के लिए जहर दिया था | वो कृष्ण के प्यार में झहर भी पी लेती है फिर भी, उसे कोई तकलीफ नहीं हुई थी | मीरा के पद समाज को श्री कृष्ण की भक्ति की ओर ले जाने में सफल हुए है |कबीरजी भी उतने ही धार्मिक थे | उनका साहित्य भी समाज के जीवन के साथ सरोकार रखता है | हिन्दी भक्ति काव्य के रूप में वाल्मिक रचित रामायण, हिन्दी महा भक्ति काव्य है | रामायण समाजीक जीवन कैसे जिया जाता है, पितृ प्रेम, मात्रु प्रेम, पत्नी प्रेम, भात्रू भाव, प्रजा प्रेम, मित्र प्रेम आदि की रीत समाज को दी है |महाभारत भी एक उमदा हिन्दी महा काव्य है | जिसकी रचना वेद व्यासजी ने की थी | रामायण और महाभारत दोनों पहले भारतीय धर्म भाषा, संस्कृत में लिखे गए थे, लेकिन उसका हिन्दी में संस्करण भी किया गया है | ये दोनों हिन्दी भक्ति ग्रन्थ सामाजिक जीवन में उन्नति लाते है | सामजिक जीवन की परिभाषा शिखाते है |इसी तरह, संत रविदासजी के द्वारा रचे गए भक्ति काव्य भी एक नयी दिशा देता है | उन्हों ने मांसाहार और नशे से दूर रहने की सीख दी है | वो कर्म कांड और मूर्ति पूजा के विरोधी थे | इरान की यात्रा मुलाकात दरम्यान, वो बेगमपुरा शहर की कल्पना करतें है | बेगमपुरा 7 होना चाहिए, जहाँ जात-पात में भेदभाव न हो, सब को अन्न मिले, सब सुख चेन से जिए और धर्म भावना के साथ अपना जीवन व्यतीत करे, ऐसी सुन्दर कल्पना संत रविदासजी ने ६०० साल पहले की है | संत रविदास के ४० भक्ति पद जो पंजाब में गुरु नानकजी के ‘ग्रन्थ साहिब’ में शामिल है | जो जन जीवन को एक नयी ऊर्जा प्रदान करता है | इसी तरह, हिन्दी भक्ति काव्य सामाजिक चेतना और संस्कृति के जतन के लिए एक उमदा हिन्दी भक्ति काव्य है | वो समाज जीवन से बहुत गहरा सरोकार रखता है |  हिन्दी भक्ति काव्यकी रचना संत रविदास, मिराबाई और संत कबीरने बहुत की है | संत रविदास का साहित्य हिन्दी, अंग्रेजी और पंजाबी में बहुत ही उपलब्ध है |संत रविदास की वाणीजो तुम गिरिवर तो हम मोरा,जो तुम चन्द्र तो हम भये है चकोरा ||माधवे तुम न तोरो तो हम नहीं तोरी,तुम सो तोरी तो किन सो जोरी ||जो तुम दिवरा तो हम बाती,जो तुम तीरथ तो हम जाती ||रैदास राती न सोइए, दिवस न करिये स्वाद,अहिनिसी हरिजी सुमिरिए, छांड सकल अपवाद ||चित सुमिरन करो नैन अवलोकनों,श्रवण वाणी सौ जस पूरी राखौ ||मन सो मधुकर करो, चरण ह्रदय धरो,रसना अमृत सम नाम भाखो ||मेरी प्रीती गोविन्द खोजनी घेरे,मैं तो मोल महँगी लई लिया सतै ||साध संगत बिना भाव नहीं उपजे,भाव बिना भक्ति नहीं होय तेरी ||कहे रविदास एक बिनती हरी स्यो,पैज राखो राजा राम मोरी  ||भारत वर्ष के इतिहास में मध्यकालीन युग में लोगों की मुसीबते ज्यादा थी, देश, प्रान्तों में बटा हुआ था | मुस्लिमोने विजय नहीं पाया लेकिन तबाही मचायी, मंदिर जो रविदास को प्रिय थे उसीको तोड़ते हुए संत रविदासजी ने देखा था | क्षुद्र को अछूत माना जाता था | मुस्लिम मूर्ति पूजा के विरोधी थे | धर्म परिवर्तन कराया गया | इस युग में पंजाब में गुरु नानक और पूर्व उत्तर मैं कबीर साहबने नइ परंपराओं को जन्म दिया |संत रविदास आध्यात्मिक सूर्य की आकाश गंगा थे | उनका जन्म राजस्थान में हुआ ऐसी लोक वायका है | लेकिन, वो पश्चिम भारत में ज्यादा रहे | वो काशी में रहते थे और मोची का काम करते थे | उनका जन्म १३९९ इस्वीसन और मृत्यु १५२७ में माना जाता है |उन्हों ने जाती प्रथा और मूर्ति पूजा और क्रिया कांड का विरोध किया था | वो सहिष्णु और सादगी से जीये थे | वो ब्राह्मिन नहीं थे | शास्त्रार्थ में पंडित को उन्हों ने पराजित किये थे | चितोड की रानी मीराबाई उनकी शिष्या बनी थी |गुरु शिष्य का सम्बन्धजो तुम गिरिवर तो हम मोरा,जो तुम चन्द्र तो हम भये है चकोरा ||माधवे तुम न तोरो तो हम नहीं तोरी,तुम सो तोरी तो किन सो जोरी ||संत रविदासजी अपने गुरु के प्रति अपनी प्रीत का वर्णन करतें है | वो कहेतें है कि प्रभु, तुम जो पर्वत हो तो में मोरा हूँ | में आप के प्यार में पागल हूँ | मेरा प्रेम आप के प्रति चन्द्र और चकोर जैसे है | रविदासजी प्रभु को माधव कहके पुकारते है | उनका एक शेर है |आरजी सो अक्स था इके इल्तफाते दोस्त का,जिसको नादानी से ऐसे जाबिंदा समजा था में ||प्रभु आपने जब आंख घुमा ली तब पता चला कि ये तो काँटों की सेज है | संत रविदासजी अपने गुरु के प्रति प्रेम व्यक्त करते कहेते हैं कि,“जो तुम दिवरा तो हम बाती,जो तुम तीरथ तो हम जाती” ||वो कहते है की में बाती हूँ और तुम दिया हो | संत रविदासजी आदर्श शिष्य का जीवन कैसा होता है वो बताते है | सच्चे भक्त की पहचान कराते है |“रैदास राती न सोइए, दिवस न करिये स्वाद,अहिनिसी हरिजी सुमिरिए, छांड सकल अपवाद” ||तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता ||“मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मरतबा चाहे कि दाना खाक में मिलकर गुले गुलजार होता है” || जब बीज मिटटी में मिल जाता है तब खुद का अस्तित्व खो देता है | वो फुल का रूप धारण कर लेता है | आध्यात्मिक मार्ग भी इसी तरह है | रविदासजी कहेते है कि सच्चा शिष्य रात में सोता नहीं है | शिष्य हंमेशा गुरु के साथ जुडा हुआ होता है |“हम अपने जजबाए बेदार को रुसवा नहीं करेती,शबे गम नींद से आँखों का आलूदा नहीं करेती” ||ये संत दर्शनजी महाराज कहते है | आशिक अपनी प्रियतमा से नजर नहीं हटाता, वो आँखों को बदनाम नहीं करता | संत रविदासजी आगे कहते है कि “ए दिल बेकरार ओ, रो ले, तडप ले, जाग ले, नींद की फ़िक्र क्यों, अभी रात मिली है बेसहर” | वो कहेते है कि रात दिन हमें प्रभु को यही करना चाहिए | सब छोडकर उनका स्मरण करना चाहिए |आध्यात्मिकता और धर्म:चित सुमिरन करो, नैन अवलोकनो,श्रवण वाणी सौ जस पूरी  राखौ ||मन सो मधुकर करो, चरण ह्रदय धरौं,रसना अमृत राम नाम भाखौ ||मेरी प्रीती गोविन्द स्योंजनी घटै,मैं तो मोल महँगी लई लिया सटै ||साध संगत बिना भाव नहीं उपजै,भाव बिनो भक्ति नहीं होय तेरी ||कहे रविदास एक बिनती हरी सयों,पैज राखो राजा राम मोरी  ||--संत रविदास--इसमें संत रविदास आदर्श शिष्य के जीवन का वर्णन कर रहे है | आध्यात्मिकता का मार्ग है | प्रेममयी बने बिना कुछ मिलता नहीं है | गुरु और शिष्य में प्रेम होता जरुरी है | जिस तरह चरवाहा अपने गौआ बकरियां को पहचानता है, उसी तरह गुरु अपने शिष्य को, अपने  जीवो को इकठ्ठा करके प्रभु के पास ले जाते है |जन्म मरण दौउ में नाही जन परोपकारी आये,           जिया दान है भक्ति भावन हरि सयों लेन मिलाये |शिष्य का जीवन भंवर जैसा होना चाहिए  | जैसे भंवर फुल के आसपास घूमता रहता है, वैसे गुरु के पास शिष्य को आगे पीछे घूमते रहना चाहिए |  शिष्य होना शरणागति है | रविदासजी प्रार्थना करते है, कि हमे संगत साधू की मिले | संगत से भाव पैदा होता है | प्रभु को याद करना अपने जीवन का लक्ष्य होना चाहिए | उनके मुख में प्रभु का ही नाम होता था | अपनी आँखों से प्रभु को ही देखना चाहते थे | संत रविदास और कबीर के गुरु स्वामी रामानंद थे | रविदासजी मांसाहार और नशा के विरोधी थे, जाती भेद का विरोध किया था | कर्म कांड के विरोधी थे, मद्य और पशु हिंसा के विरोधी थे | वो महेनत की कमाई से ही जीना चाहते थे |जाती पाती के फेरे में सुलज रह्यो सब लोग,मानवता को खात है रैदास जाती को रोग ||संत तुकाराम ने संत रविदासजी को एक साखी में कहा था, निवृति ज्ञानदेव सोपान चंगाजी, मेरे जी के नामदेव, नागाजन मित्र , नरहरी सोनार, रविदास कबीर सगा मेरे |शिखों के गुरु नानकदेवजी ने भक्ति काव्य में कहा है कि,“ रविदास चमारू उस्तुति करे, हर की रीती निमख एक गाई,पतित जाती उत्तम भया, चारो चरण पये जग गाई,रविदास हयाये प्रभु अनूप, नानक गोविद रूप”गुरु नानक कहते है कि चरों वर्णों के लोग संत रविदास के चरणों में नमन करते है क्यों कि वो ज्ञानी है |मेवाड़ की महारानी भक्त कवयत्री मीराबाई ने गुरु दीक्षा ले कर उनका सन्मान किया था | मीराबाई एक भक्ति काव्य में कहती है कि,“मेरा मन लागो गुरु सौ, अब न रहूंगी अटके,गुरु मिलियो रोहिदासजी, दिन्ही ज्ञान के गुटकी,रैदास मोहे मिले सद्गुरु, दिन्ही सूरत सुरई की,मीरा के प्रभु ते ही स्वामी, श्री रैदास सतगुरुजी“संत रविदासजी भक्ति युग के महान संत थे | गुरु संत रविदासजी के ४० पद “श्री गुरु ग्रन्थ साहेब” में समाविष्ट है | सोलह रागों में अपनी वाणी संत रविदासजी करते थे | रविदासजी कहते है कि,“रविदास ब्राह्मण मत पुजिये, जो होवे गुण हिन,पुजिये चरण चंडाल के जो होवे गुण परवीन”६०० साल पहेले मुस्लिम बादशाह ने ईरान में संत रविदास को बुलाये थे | ईरान के आबादान शहर में वो गए थे | आबादान के नाम से पर उन्हों ने अपनी कल्पना का शहर “बेगमपुरा” कैसा होना चाहिए उसका वर्णन अपनी वाणी में किया है | बेगमपुरा शहर को नाउ, दुःख अन्दोहु नहीं तीही ठाउ,  ना तसविस खिराजू न मालू, खउकु न खता, न तरसु जवाळु, अब मोहि वतन गई पाई, ॐ हाँ खैरी सदा मेरे भाई || कायमु, दायमु सदा पाति साही, दोम न सेम एक सौ आहि || आबादानु सदा मशहूर, उहाँ गनी बसही मामूर || तिह तिह शैल करही, जिह भावै || महरम महन न को अटकावे || कवि रविदास खलास चमारा ||जो हम सहरी सु मितु हमारा || उनका भक्ति काव्य,अब कैसे छूटे नाम रट लागी, प्रभुजी तुम चंदन हम पानी,जाकी अंग अंग बास समानी, प्रभुजी तुम घनबन हम मोरा,जैसे चितवत चन्द्र चकोरा, प्रभुजी तुम दीपक हम बाती,जाकी ज्योति बरै दिन राती, प्रभुजी तुम मोती हम धागा,जैसे सोन ही मिलत सुहागा, प्रभुजी तुम स्वामी हम दासा,ऐसी भक्ति करे रैदासा,  प्रभुजी तुम चंदन हम पानी ||

एक मुलाकात तुलसी तिवारी के साथ
 18 February 2019  
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देश को आजाद हुए मात्र सात वर्ष हुए थे जब उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक गाँव ‘कोट अंजोरपुर में मेरा जन्म हुआ (16.3. 1954) हमारा घर गंगा जी जी के तट पर था, अपने दरवाजे से हम उनकी उठती-गिरती लहरों को देखा करते थे। पिता जी ने मेरा नाम तुलसी रखा क्योंकि वे तुलसी कृत रामायण के बड़े अध्येता थे। दादाजी तीन सौ बीघे जमीन के स्वामी थे।  फिर भी हमारा परिवार तंगहाल था । कोट गंगा,सरयू और सोन नदी से घिरा है ( ऐसे बहुत से गाँव हैं)पिछली भीषण बाढ़ ने हमारे अधिकांश खेतों को रेत के ऊँचे-ऊँचे टीलों में बदल दिया था। तब से उसी प्रकार की बाढ़ की प्रतीक्षा किया करते थे गाँव के लोग । हर साल बरसात में तीनों नदियाँ विकराल होकर अपने ‘दियर‘ में बसे गाँवों को जलमग्न कर देतं । रहवासी बाढ़ उतरने के बाद फिर से सरपत की छावनी वाला घर बनाते, खरीफ की फसल के समय तो खेत पानी में होते, बाद में बोये जाते, सिचाई का कोई साधन न होने के कारण कभी कभार ही ऐसा होता कि साल भर खाने लायक अन्न पैदा हो जाय। गाँव के अघिकांश लोग काम की तलाश में किशोर वय में ही बंगाल, असम, या महाराष्ट्र के लिए निकल पड़ते। मेरे पिताजी भी बाहर ही रहते थे। अतः  जैसे-जैसे बड़ी होती गई अपने छोटे भाई बहनों की जिम्मेदारी संभालने लगी। उस समय सवर्णों में पर्दा प्रथा का बहुत जोर था। माता जी घर से बाहर निकलती नहीं थीं, बाहर की सारी व्यवस्था जो एक मुखिया करता है मुझे ही करनी होती। मेरे गाँव मे एक स्कूल था जहाँ लड़के लड़कियाँ पढ़ते थे। मैं स्कूल जाने के लिए रोती थी किन्तु जा नहीं पाती थी। रसोई के लिए जंगल से लकड़ियाँ एकत्र करके न लाती तो माँ भोजन कैसे बनाती? छोटी बहन को न संभालती तो माँ जांत  से अनाज कैसे पीसती? ऐसे ही ढेरों आवश्यक कार्य जो मुझे स्कूल नहीं पहुँचने देते थे। वैसे स्कूल के मास्टर ने मेरा नाम कक्षा एक में लिख रखा था। वर्ष में एकाध दिन किसी प्रकार स्कूल पहुँच भी जाती तो वहाँ पढ़ने वाली लडकियाँ मिल कर मुझें बहुत मारतीं, उनकी नजर में मेरा प्रति दिन स्कूल न आना उन्हें यह अधिकार देता था कि वे मुझे  पीटें ।  दो-तीन साल में मेरा नाम न जाने किस प्रकार कक्षा दो में आ गया। वैसा ही बिरला दिन था जब बड़ी माँ ने अपने छोटे बेटे द्वारा की गई गंदगी साफ करने मुझे माँ से कह कर स्कूल भेज दिया था। मैं कक्षा में बैठने का लोभ संवरण न कर सकी। उस दिन गुरूजी आम की घनी छाया में कुर्सी डाल कर हिन्दी पढ़ा रहे थे। पाठ का थोड़ा-थोड़ा अंश प्रति छात्र से पढ़वाया जा रहा था।। मेरी बारी आई तो मेरे पढ़ पाने का प्रश्न ही कहाँ से उठता था? उनके सब्र का बांध टूटा और उन्होंने पुस्तक उठा कर दूर फेंक दी । पुस्तक के फड़फड़ाते पन्नों का हा-हाकार आज भी मेरी आत्मा में शोर मचाता है कभी-कभी। छुट्टी हुई तो लड़कियों ने खबर ली। मैंं रोती हुई घर आई। (बलिका शिक्षा के लिए कार्य इसी हा-हाकार ने कराया) माँ ने मेरी गोद में मेरी छोटी बहन को डाल दिया और घर के काम जल्दी-जल्दी निबटाने लगी।मैं बसंत पंचमी को स्कूल अवश्य जाती थी चाहे जिस प्रकार हो। उस साल सरस्वती पूजा के दिन सुबह से वर्षा हो रही थी, मैंने माँ से पूजा के लिए दो पैसे लिए और स्कूल के लिए निकली, रास्ते में कनेर के पीले फूलो को तोड़ कर अपनी फ्राॅक में जमा करती करती, पानी में भीगती स्कूल पहुँची । दो पैसे की लेमन जूस का प्रसाद चढ़ाकर पीले फूलों से माँ की पूजा की । मैंने मांगा ’’ मँा मैंे रोज स्कूल आना चाहती हूँ बस और क्या मांगू?’’मैंने अपना सारा प्रसाद स्वयं ही खा लिया। इससे सबने मेरी खिल्ली उड़ाई । मैं उस दिन प्रसन्न मन घर आई ं आखिर स्कूल से आई थी।उन्हीं दिनो की बात है, एक सुबह मेरे ददेरे भाई जो कक्षा दो में पढ़ते थे, धूप में बैठ कर अपनी नई आई भाषा की पुस्तक देख रहे थे।,खुले पन्ने में सीता स्वयबर का सुन्दर सा रेखा चित्र था। बालसुलभ उत्सुकता से मैंने पुस्तक अपने हाथ में लेनी चाही, उन्होंने बेदर्दी से मेरे हाथ से पुस्तक छीन ली ’’ फाड़ देगी! तू क्या जाने किताब क्या होती है? जा बरतन मांज!’’ उनके व्यवहार से मेरा बाल मन गहरे तक आहत हो गया। मैं बड़ी देर तक हिलक-हिलक कर रोती रही। माँ को उलाहना दिया कि मुझे स्कूल क्यों नहीे जाने देती? हैैं’’माँ एक पल के लिए अपनी विवशता पर बहुत उदास हो गई  उसने भैया से एक बार पुस्तक दिखा देने के लिए बहुत निहोरा किया परन्तु वह न माना , अपना बस्ता लेकर बाहर भाग गया। माँ ने आव देखा न ताव, चुल्हे के पास पड़े कोयले को उठा लिया । ’’ आव बबुनी हम पढ़ा दी तोके!’’ वह मुझे प्यार से स्ंाभाल कर  आंगन की कच्ची दीवार के पास ले आई और कोयले से हिन्दी के अक्षर लिख दिये। ’’ लऽ ! अइसे लिखऽ!’’मैंने आँसू पोंछे और दीवार के श्यामपट पर लिखना सीखने लगी। मुझे लोक गीतों में गहरी रुचि थी। उन्हे काॅपी पर लिखने का उद्देश्य मेरे सामने था।यूंं  तो माँ भी साक्षर मात्र थी चिट्ठी पत्री बाँचने, कहीें दस्तखत आदि के उदेश्य से पिता जी ने थोड़ा पढ़ा दिया था। अटक-अटक कर रामायण आदि पढ़ लेती थी। बाद में गाँव की औरतों को सीता जी का दुःख सुनाकर रोती थी।पिता जी आसनसोल बंगाल में कहीं नौकरी करते थे। साल में एकाध बार आना जाना करते थे, किन्तु दो जगह के खर्चे के कारण दिक्कतें बरकरार थीं। किसी मित्र से उन्हे कोरबा का पता मिला  कि वहाँ रोजगार आसानी से मिल सकता है। ंवे अपने मित्र के साथ बंगाल छोड़ कर छत्तीसगढ़ आ गये। कोरबा में नये बन रहे पावर हाउस में उन्हें सिक्यूरिटी गार्ड की नौकरी मिल गई। कुछ महिने बाद वे हम लोगों को भी अपने पास ले आयें । तीस मई 1964 को हम लोग कोरबा पहुँचे ,देश के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल  नेहरू का देहावशान हुए दो चार दिन ही हुए थे देश में अफरा-तफरी का माहौल था। हम अपने पहनने के कपड़े और थोड़े से बर्तन ले कर पुराने पावर हाउस के टट्टा खोली में किराये से रहने लगे। पिता जी ने मुझसे छोटी बहन एवं भाई का नाम स्कूल में लिखा दिया । मेरी तो पढ़ने की उम्र निकल गई थी नऽ ?अभी हमारी गृहस्थी जमने का आरंभ भी नहीं हुआ था कि लार्सन एन्ड टूब्रो कंपनी में कर्मचारियों की हड़ताल हो गई, जो सभी कर्मचारियों की छंटनी से समाप्त हुई। अपने गाँव-घर से दूर हम फाकामस्ती की कगार पर आ खड़े हुए। यहाँ हमारे खेत नहीं थे जिन्हें बंधक रख कर हमें तुरंत पैसा मिल जाता न जान पहचान के लोग  थे जो हमें उधार दे देते। पिताजी को उस समय दिहाड़ी मजदूर बनना पड़ा और मुझे बाल श्रमिक ।कुछ महिनों के बाद बांकी मांेगरा में कोयला खान के लिये कर्मचारियों की भर्ती का समाचार मिला । वहाँ यू. पी. बिहार के बहुत से लोग काम पर लगे हुए थे। पिता जी ने वहाँ जाकर अपनी समस्या बताई , उन्हें मदद मिल गई। हमारे जिले के जग्गू प्रसाद गोंड़ ने (जो वहाँ युनियन के नेता थे) बड़े अपनेपन से पिता जी को भर्ती करवाया। कुछ ही दिन में हम लोग कोरबा से बांकी आ गये। वह सन् पैंसठ का जुलाई का महिना था। पिताजी ने सबसे पहला काम जो किया वह था स्कूल में हमारा नाम लिखवाना। गाँव से मेरी दूसरी कक्षा की टी. सी. मंगवाई गई। आदिम जाति कल्याण विभाग प्राथमिक शाला बांकी में हम लोग पढ़ने लगे। मुझे कुछ आता नहीं था पिता जी ने स्वयं मुझे पढाना प्रारंभ किया। पढ़ने लिखने की इतने दिनों से बाधित मेरी क्षुधा जाग उठी। मैंने मन लगाया। मुझे एक बार सुन कर ही पाठ अच्छी प्रकार याद हो जाता था। बचे समय में मैं अन्य किताबें पढ़ती थी । बृहद् सुखसागर जो सभी वेद पुराणों का सार है मैंने कक्षा दो में ही पढ़ा था। । पुस्तकें खरीदने के लिए पिता जी खदान में ओवर टाइम ड्यूटी करते थे। कुछ ही समय में हमारे घर में पुस्तकों की भरमार हो गई। हम न केवल पुस्तकेंं पढ़ते थे उस पर चर्चा भी करते थे। पिता जी काम से आने के बाद स्नान ध्यान से फारिग होकर उच्च स्वर में रामचरित मानस का गायन करते, टीका करते, जिसे  घर का काम करते-करते मैं सुनती समझती। हमारे घर पढ़ने-लिखने के शौकिन और भी लोग आने-जाने लगे। स्कूली जीवन के छः वर्षों में मैंने सात उपन्यास लिखे थे जो आज अप्राप्त हैं । उस समय के अनुसार कक्षा छः पास करते-करते मेरी उम्र विवाह योग्य हो गई और मेरी शादी करके मुझे इलाहाबाद भेज दिया गया। सौभाग्य से वहाँ का माहौल पढ़ने पढ़ाने का था। मेरा स्वाध्याय निरंतर जारी रहा। किंतु स्कूली शिक्षा में व्यवधान आ गया। अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने के लिए सदा छटपटाहट बनी रहती मन में । समय पाकर जब पति के साथ आकर रहने लगी तब सन्1975 में मैंने आठवीं की परीक्षा स्वाध्यायी के रूप में दी। जिसमें सभी विषयों में विशेष योग्यता प्राप्त हुई। उसी वर्ष श्रीमान् का तबादला बिलासपुर हो गया। अब जिन्दगी के फैसले मेरे पक्ष में होने लगे। आर्थिक विषमता, गृहस्थी की हजारों समस्याएं  जन्म लेते बच्चों की जिम्मेदारी , यहाँ तक मुझे स्ट्रीट लाइट में भी पढ़ना पड़ा किन्तु नतीजे मेरे पक्ष में आते रहे सन्1977 में मैट्रिक , सन्1980 में स्नातक और सन्1982 को स्नातकोत्तर की परीक्षा पास कर ली । उसी वर्ष शिक्षक चयन परीक्षा पास कर के शिक्षिका बन गई । इस बीच मेरा कहानी लिखना और समाचार प़त्रों में छपना लगातार जारी था। सन् 2008 में पहली पुस्तक पिंजरा के प्रकाशन से मेरा विधिवत साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ। इन दस वर्षों में ग्यारह कहानी संग्रह, एक वृहद् उपन्यास,चार यात्रा संस्मरण, और चैदह बालोपयोगी पुस्तकें प्रकाशित र्हुइं ( सम्मानों की सूची लेखिका परिचय में देखें )।पुस्तकों के प्रकाशन, विक्रय, प्रचार प्रसार आदि की सुविधा के लिए मैंने  2012 में अपने कनिष्ठ पुत्र विवेक तिवारी के साथ मिलकर श्री अक्षय पब्लिकेशन की स्थापना की। जिसमें लगातार क्षेत्र के साहित्यकारों की पुस्तकें छप रहीं हैंं।आज मैं अपने को संसार की सबसे सम्पन्न महिला समझती हूँ क्योंकि मैं जितना पढ़ सकती हूँ उससे अधिक पुस्तकें हैं मेरे पास, जितना लिख सकती हूँ उससे अधिक विचार हैं, जितना लिखा है उससे बहुत अघिक मुझे पढ़ने वाले हैैं।  

सर्वांगीण विकास की कुंजी-आत्मविश्लेषण
 12 February 2019  
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आज अनायास ही बैठे बैठे मैंने अपने बचपन को दस्तक दी और मन में खुशियों की लहर दौड़ गई । लगा बस वहीं रहूँ फिर एक बार जी भरकर बचपन जी लूँ । हर बच्चे के बुनियादी दिन, बचपन को सहलाकर नींव मजबूत करने का ,एक ठोस आधारशिला बनाने का माता-पिता का भरसक प्रयास ।हमारी किताबें पढ़ने को आदत बनाने का ,हमारी हर आदत को अच्छी आदत बनाने का वो अनूठा तरीका याद आया ।मुझे बचपन में रंग बिरंगी तितलियाँ बहुत आकर्षित करती थी । अतः इसी को आधार बनाकर घर में मेरी उपस्थिति में बातें होती थीं कि अगर किताब को ध्यान से पढ़ा जाए और उसके हर शब्द का गूढ़ अर्थ समझ में आ जाए तो रंग बिरंगी तितलियाँ एक नहीं वरन कई उड़ने लगती हैं और तब तक आसपास रहती हैं जब तक आप चाहें और ऐसा कईयों के साथ हो भी चुका है और बस यही चाह ,इसी खुशी के क्षण को पाने की तीव्र लालसा मुझे किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करती रही । आज भी याद है कैसे तैराकी के लिए प्रेरित करने के लिए हमें स्वीमिंग पूल के पास के ही गार्डन में खेलने के लिए ले जाया जाता था और वहां से हम घंटों तैराकों को देखते रहते थे और एक दिन कब हम तैराकी करने लग गए पता ही नहीं चला ।कहने का अर्थ कभी भी किसी कार्य को करवाने के लिए आदेश नहीं दिया गया कि यह करो अथवा यह न करो। बस सही दिशा दी गई।और हम उसे पकड़कर अनायास ही आगे बढ़ने लगे । माहौल बहुत ही उत्साहवर्धक, सहज,सकारात्मक व खुशी प्रदान करने वाला होता था।ऐसेही और भी कई उदाहरण हैं जैसे भूगोल और देश दुनिया की खबरों से अवगत कराने हेतु घर में विभिन्न खेलोंउनसे जुड़े खिलाड़ियों व उनके देशों के बारे मे बातें होती और यह सब हमें उनके बारे में और भी अधिक जानने की लालसा पैदा करता । गृहकार्य करते समय बताया जाता देख कर कर सकते हो लेकिन जब अध्यापकगण देखेंगे तो समझेंगे कि तुम्हें आता है और यह सिर्फ़ तुम जानते हो कि तुम्हें नहीं आता यानिकी तुम स्वयं को धोखा दे रहे हो वही अगर पढ़कर फिर  देखे बिना लिखोगे तो तुम स्वयं का आकलन भी कर पाओगे कि तुम्हें कितना समय लगता है किसी भी अध्याय को तैयार करने मेंऔर वर्ष के आरंभ से ही तुम किसी भी परीक्षा के लिए सदैव तैयार रहोगे ।यानि कि  हमारा सर्वांगीण विकास करने में घर के सभी बड़े तत्पर रहते थे ।जिस घर में  सकारात्मकता के दीये सदैव ही जलते हो और सदैव ही दिमाग के वक्र बढ़ते हो वहां भला   खुशियाँ कैसे नहीं खेलेगी ।पर इन सबके साथ ही विचारों में तटस्थता, सही गलत का आत्मविश्लेषण करने की क्षमता का विकास होना भी अतिआवश्यक है क्योंकि भले ही हमारे बचपन में हमें सभी  कुछ प्यार और सहजता से सिखाया गया हो लेकिन सामाजिक व्यवहार में अव्वल होना भी उतना ही जरूरी है । हर बात का आकलन करते आना अतिआवश्यक है नहीं तो भटकावकी स्थिति उत्पन्न होने में एक क्षण भी नहीं लगता है ।आत्मविश्वास की प्रबलता ही हमारे मार्ग की रोशनी बन सकती है और यह सब घर की चारदीवारी में बंद रहकर नहीं वरन सामाजिक प्राणी बनकर ही हासिल हो सकता है ।अथिकतर देखा गया है अभिभावक बच्चे का carrier बनाने पर ही ज्यादा जोर देते हैं लेकिन इस सबके बीच बहुत ही जरूरी बात जिसके बिना सर्वांगीण विकास अधूरा है भूल जाते हैं । संतान को एक ऐसा सामाजिक प्राणी बनाने की चाह जो अच्छे पद के साथ साथ आत्म सम्मान भी अर्जित करे। जो हमेशा लोगों की नज़रों में उठा हुआ हो जिसे देखकर लोगों के चेहरो पर सलवटें नहीं वरन मुस्कराहट आए क्योंकि यही मुस्कराहट उसे आजीवन खुश रख सकती है और वास्तविकता में उसे  सफल इंसान बना सकती है ।कई बार हम देखते व सुनते  हैं कि अगर कोई व्यक्ति शिक्षक के परिवार से  या किसी बड़े ओहदे  के व्यक्ति से संबंधित होता है तो उसके प्रति लोगों के मन में डर का भाव आ जाता है कि अगर हमने उसेयह नहीं दिया या उसके लिए यह नहीं किया तो स्वयं मुसीबत में आ सकते हैं जो कि आत्मविश्वास की कमी का ही परिचायक है या फिर अगर वो साधारण पृष्ठभूमि से संबंधित है तो उसके प्रति मनचाहा व्यवहार हमारे दूसरों पर हावी होने की प्रवृत्ति का परिचायक है और दोनों ही गलत है ।यह सब बच्चे बड़े होते हुए अपने आसपास के वातावरण से ही सीखते हैं और इसे अपना आचरण बना लेते हैं फिर इन्हें सम्मान भी परिस्थिति के अनुसार ही मिल पाता है यानिकी जीवन भर तनातनी।भय ही है जो व्यक्ति को ग़लत कार्य करने के लिए प्रेरित करता है ।  भयभीत इंसान अपने भय पर विजय प्राप्त करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं । लेकिन भय पर विजय कभी प्राप्त नहीं कर सकते ।क्योंकि इसके लिए उसने गलत मार्ग का चयन किया हुआ होता है।भय पर विजय सिर्फ भय के   विरूद्ध जाकर सही गलत का आकलन करके ही मिल सकती है और इसी में समाज का उद्धार भी नीहित है। कम शब्दों में प्रभावशाली ,सकारात्मक बात कहना ,किसी के बहकावे में न आकर आत्मविश्लेषण कर उचित निर्णय लेना समाज में व्यक्ति के ओहदे को और भी बड़ा कर देता है।ReplyForward

यूँ ही चलते-चलते....
 29 January 2019  
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यूँ ही चलते-चलते....विधा-आलेखदिनांक- -28/1/2019शीर्षक- -" द्वंद्व "भारतीय समाज इस समय पथभ्रष्ट  है। वह निर्णय ही नहीं  कर पा रहा है कि रास्ता कौन सा सही है। जैसे एक कालिमा की चादर ओढ़े हुए  हैं। सबके अंदर कुछ खदबदा रहा है और वह बाहर निकलने का रास्ता ढूँढ रहा है। सारे आरोप-प्रत्यारोप इसी की देन है। समाज में  संघर्ष हमेशा प्रभुत्व की होती है। आदमी की आदिम लालसा दूसरों पर हुकूमत करने की ही है। आज भारत जातीय संघर्ष में फंसा हुआ है, फंसा हुआ  कहना इसलिए है कि चंद लोगों ने इसे ही अपना आधार बना लिया है और सपने बेचकर सारी जनता को दिग्भ्रमित कर खुद राज कर रहे हैं। जिनके बूते राज कर रहें हैं,  वह उनका वोट बैंक है। यह वह मानते हैं । वह न छिटकने पाए तो झूठी या वाकई में घटित इक्का-दुक्का घटनाओं को हवा देते रहते हैं ।एक सौ पैंतीस करोड़ की जनसंख्या है हमारी। क्या कुछ घटनाएँ सारे समाज का आईना हो सकती है ? एक रोहित वैमूला की आत्महत्या को दलितों पर अत्याचार, मानसिक शोषण के  नाम पर कितना हो-हल्ला मचा था। कितने आरोप लगाए थे तथाकथित बुद्धिजीवियों ने.... अत्याचार हो रहा है दलितों पर, शोषण हो रहा है। बाद में  सच्चाई क्या निकलती है कि वह तो दलित ही नहीं  था, क्रिश्चियन था। या दलित थे उसके पूर्वज, और उन्होंने अपना धर्म बदल लिया था। और जब धर्म परिवर्तन कर ही लिया था तो वह दलित  कैसे  था ?यह तो सीधे- सीधे क्रिश्चियन धर्म पर आरोप लगना चाहिए था कि वह धर्म बदल कर आए हुए  लोगों के साथ भेदभाव करती है। क्योंकि वह क्रिश्चियन था तो दलित हो ही कैसे सकता है। जाति में  बँटने का आरोप  तो सिर्फ हिंदू धर्म पर ही लग सकता है।बाकी धर्म तो कहते हैं कि वह जातियों में  नहीं  बँटे हुए  हैं । तो क्या यह दावा झूठा है ?अगर नही तो.....क्या धर्म परिवर्तन कराकर बनाए हुए क्रिश्चियन मूलतः वही रहते है जो वे थे। सिर्फ नाम बदल गये उनके वे तिमोथी, पीटर या श्याम से सैमुअल हो गये। वे पहले हिंदू दलित थे , अब क्रिश्चियन दलित हो गये है। वे पहले गोंड़ आदिवासी थे, अब क्रिश्चियन आदिवासी हैं। सिर्फ  सरनेम बदला और कुछ  नहीं  ?यह आलेख ही एक सच्ची घटना पर आधारित है। यह मन को आहत करने वाली घटना मेरी एक सखी कीआंखों देखी आपबीती है। उन्होंने बताया कि उनके पड़ोस में  एक क्रिश्चियन परिवार रहता था और उनसे हमेशा चर्च जाने का आग्रह करता रहता था। एक रविवार उन्होंने हामी भर दी चर्च जाने की। वे उस परिवार के साथ गईं चर्च। बहुत बड़ा, बहुत सुंदर चर्च था। जीसस की सलीब पर टंगी मूर्ति के सामनेआधे हाल में  तमाम बेंच-चेयर लगी हुई  थी। और आधे हाल में लंबी- चौड़ी दरी बिछी हुई थी।प्रेयर तक आधी से ज्यादा चेयर खाली थीं और दरी पर गांव देहात से आए लोग बैठाए जा रहे थे। सखी को यह व्यवस्था बहुत अजीब लगा तो उन्होंने पूछ ही लिया कि जब तमाम चेयर खाली हैं तो क्यों लोगों को दरी पर बैठाया जा रहा है। जो जवाब मिला तो उनके होश ही उड़ गये। जवाब यह था कि ये च. ..र हैं  और अभी-अभी क्रिश्चियन बने है। वे वहीं  ठीक हैं । सखी अवाक् रह गईं और उनसे कुछ  कहते ही नहीं  बना। वे वापस आईं तो बहुत खिन्न थी। उनके विश्वास को बहुत बड़ा धक्का लग चुका था। इसी खिन्नता में  इसकी चर्चा उन्होंने  मुझसे किया कि क्या मिला उन्हें,  जो धर्म भी बदल लिए पर आज भी हैं तो वही। यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कभी समाज में अस्पृश्यता थी, भेदभाव था। पर अब कहाँ है ?इतना सुधार तो आ ही चुका है भारतीय  समाज में कि कोई  दुकान,कोई होटल,कोई  सर्व सुलभ साधन, यातायात,  सड़कें किसी से उसकी जाति नहीं  पूछती हैं। सरकारी सुविधाओं में  सभी बराबर के हकदार हैं। आज सभी की जातियाँ उनकी अपनी पहचान में  तब्दील हो चुकीं हैं ।ऊँच-नीच के पायदान से मुक्त हैं। क्योंकि सरकारी नीतियों और सुविधाओं में सभी बराबर के हकदार माने जाते हैं ।फिर कौन है जो जबरदस्ती.... वर्ग-विभेद की बात करता है और उसकी बिशात पर राजनीति कर सिर्फ अपनी रोटियाँ सेंकता है। सावधान रहने की जरूरत उन नेताओं से है। समाज तो वाकई  समरस है। क्योंकि सरकार  किसी की व्यक्तिगत धारणा पर प्रहार नहीं कर सकती है ?अपनी सोच, समझ, कोई भी अपने घर तक कायम रख सकता है। पर समाज में  जब वह निकलता है तो वहाँ  उसकी अपनी धारणा का कोई  महत्व नहीं होता है।वहां वह समाज का एक अंग है और उसी के अनुरूप व्यवहार  करता है। और यह व्यवस्था पूरे देश में  समग्रता से लागू है। और इसका पालन नहीं  करना दंडनीय अपराध माना गया है।तब यह शिकायत कितनी जायज या नाजायज है, इसका निर्णय तो प्रबुद्ध जन कर ही सकते हैं ।यह अर्थतंत्र का युग है। सिर्फ  समाजिक तौर पर गरीबीऔर अमीरी का वर्ग विभेद हैं। जिसकी जेब में  पैसा है , वह किसी भी जाति का हो, सलामी उसे ही मिलती है।यह वह देश हो चुका है जो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश द्रोही नारे लगवा सकता है, पर्चे बँटवा सकता है। किसी को भी सार्वजनिक मंच से धमका सकता है।और यह काम आमजन नहीं करता है। ये जन-नायक करते हैं।सावधान रहने की जरूरत इनसे है। ये सामाजिक प्राणी नहीं  है। इनके  कार्य इन्हें अपराधी की श्रेणी में खड़े करते हैं। इनका अनुकरण तो हरगिज नहीं  करनाचाहिए ।अपने देश, अपने समाज, अपने धर्म पर अपनी आस्था को मजबूत रखने का समय है। क्योंकि विध्वंसक शक्तियाँ तो चाहती ही हैं  कि हम आपस में ही लड़ -मरें।और हमें  प्रण करना है कि हम अपने समाज के लिए, अपने देश के लिए  सदैव एकजुट ही रहेंगे ।क्रमशः ...*समिश्रा *स्वरचित कहानियाँ द्वारा साधना मिश्रा समिश्रा कापी राइट कानून के तहत सर्वाधिकार सुरक्षित

सैनिक
 10 January 2019  
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सैनिक कौन है?राष्ट्र के लिए सैनिक एक नि:स्वार्थ सेवा है तो राष्ट्र शत्रुओ के लिए वेदना।राष्ट्र के लिए सैनिक त्याग और बलिदान का पर्यायवाची है तो राष्ट्र शत्रुओ के लिए दया और करुणा का विलोम।     किन्तु यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है 'क्या सरहद पर तैनात जवान ही सैनिक है?'यदि हां ,तो यह उत्तर सैनिक शब्द्  की व्यापकता को प्रदर्शित नही करता।क्या सैनिक इतना सिमित शब्द है कि इसके अन्तर्गत केवल जवान ही आते है?बेशक बॉर्डर पर देश के दुश्मनो से लोहा लेते हमारे जवान सैनिक शब्द के बहुत से हिस्से को पूर्ण करते है किन्तु सैनिक शब्द की सम्पूर्णता मे उन सभी योद्धाओ का भी योगदान निहित है जो देश के भीतरी दुश्मनो का संहार कर राष्ट्र को उन्नति के पथ पर अग्रसर करते है।        यदि अशिक्षा देश की शत्रु है तो शिक्षा की ज्वाला जलाने वाला हर एक शिक्षक सैनिक है।यदि अस्वच्छता देश के दुश्मनो में एक है तो सड़क ,नाले साफ़ करने वाला हर एक इंसान सैनिक है।             यदि भ्रष्टाचार देश का शत्रु है तो ईमानदारी से अपने कर्तब्य को निभाने वाला हर एक इंसान सैनिक है।देश की क्षुधा मिटाने वाला अन्नदाता सैनिक है,हर एक चिकित्सक सैनिक है।सैनिक एक सिमित शब्द् नही बल्कि व्यापकता की परिभाषा से परे देशभक्ति की वो आधारशिला है जो निर्मित होती है राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव से।