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जिंदगी पार्ट 2
 23 May 2018  

जिंदगी की सच्चाइयों से रूबरू होकर बस इतना जान पाई हूँ मै हम सब यहाँ एक अभिनय करते हैं जिसका लेखक ऊपर वाला है ये बात हम सभी जानते हैं फिर भी ना जाने क्यों परेशान रहते हैं ...शायद उस परेशानी की वजह हमारे आने वाले कल की फिकर या किसी अपने को खो देने का डर या फिर कोई हमसे आगे ना निकल जाये इस बात की चिंता या फिर हम इस जिंदगी के सफ़र मैं कहीं पीछे ना छूट जाये इस बात का डर.....वजह कोई भी हो सच्च तो यही है कल क्या होगा इसकी खबर नही और इसकी फिकर है की महज से  जाती नही शायद इसी का नाम जिंदगी है......             बेफिकर होकर हम भी उड़ते आसमान मैं             अगर हम इन्सान ना होते तब शायद कल की फिकर हमें भी ना सताती अगर हम इंसान ना होते तब शायद जिंदगी का फसाना कुछ और ही होता और तराने भी ....

Book Review- Mission NPA
 23 May 2018  

मिशन NPA यह शीर्षक है प्रखर कथाकार रमेश यादव के ताज़ा तारीं कहानी संकलन का ।किसी भी देश का तंत्र उसके अर्थ तन्त्र पर आधारित होता है ।अर्थ को विषय बना कर बहुत कम लिखा गया है ।रमेश यादव ने अपने बैंकिंग दीर्घ अनुभव और चिंतन के बल पर यह महत्वपूर्ण संकलन रचा है । इसमें सोलह कहानियाँ हैं जो अर्थ की सोलह कलाओं से समृद्ध हैं ।एन पी ए अब पहचाना बोध है ।ऋण न उतारे जाने और वसूल न हो सकने पर नान पर्फ़ोर्मिंग ऐसेट यानी एन पी ए घोषित होता है और......इसका लाभ (या कहें दुरुपयोग )लिया जाता है...अमरीका में इसकी वजह से कई बैंक अचेत हो गए थे...और उसकी अर्थ व्यवस्था डगमगा गई थी जिसे किसी भाँति ओबामा ने उभारा...भारत के तथाकथित कई बड़े आदमी ऋण लेकर चुकाते नहीं और अर्थव्यवस्था को पंगु किए रहते हैं ....ये कहानियाँ विरल कहानियाँ हैं ।इनमे बड़ी व्यंजक स्थितियाँ हैं...कथाकार ने सार्थक शब्द प्रयोग और ध्वनित अर्थ के बल पर इनकी सहित्यिकता क़ायम रखी है ।बैंक कर्मियों के जीवन के ख़ाकों को रमेश यादव ने बहुत सशक्त ढंग से उकेरा है ...हम सब बैंक जाते हैं किंतु उसके भीतर की संवेदनाओं स्थितियों को भाँप नहीं पाते ...कहानीकार ने हमें बैंक जगत के बाशिंदों से वास्तविक परिचय कराया है ।मैं अभिनंदन करता हूँ ऐसे मेधावी कहानीकार का जिसने हिंदी कहानी में एक नया आयाम जागृत किया ।                         डॉक्टर हरीश नवल              सम्पादक ‘गगनांचल’ नई दिल्ली 

Book Review-Mission NPA
 23 May 2018  

मानवीय संवेदनाओं के नवीन आयाम का बोध कराती कहानियां ।रमेश यादव जी एक सिद्धहस्त कथाकार हैं। उनके नवीनतम कथासंकलन ‘ मिशन एन.पी.ए.’ में मानवीय संवेदनाओं के नवीन आयाम का बोध होता है। जमीन से जुड़ी इन रचनाओं में कथ्य और शिल्प दोनों का सुंदर विन्यास देखा जा सकता है। बैंकिंग जगत और जीवन से जुड़ी ये कहानियां हिन्दी साहित्य जगत के लिए एक अनूठा प्रयास है जो काउंटर के इस पार और काउंटर के उस पार की दास्तां को बयां करती हैं। ऐसे कई प्रसंग इन कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत होते हैं जो इंसानियत के रंगों में सराबोर होते हुए उखड़ने और उजड़ने की जद्दोजहद से गुजरती हैं। इस संग्रह की सभी कहानियां अलग–अलग परिवेश से गुजरती हुई कई नई चीजों का बोध कराती हैं और हमें यह सोचने पर मज़बूर करती हैं कि जिस व्यवस्था से लगभग हम रोज रूबरू होते हैं क्या उसकी ज़मीनी सच्चाई और हकीकत को हम जानते हैं या हम इसे जानने के लिए कितनी कोशिश करते हैं ? अनुज रमेश की हिंदी साहित्य में पैठ महज संयोग मात्र नहीं है। उन्होंने अपने दैनंदिन जीवन के अनुभवों को कलम की नोंक पर सहेजने की साधना की है। उनकी प्रत्येक कहानी मानवीय मूल्यों का दस्तावेज कही जा सकती है। एक मौलिक रचनाकार होने के नाते इंसानियत के दर्द को चेतना की अतल गहराई से समाज तक पहुँचाना उन्का मकसद है। इस पुस्तक के लोकार्पण समारोह को और इसके लोकप्रिय होने के लिए मैं अपनी समस्त शुभाशंसाएं देती हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि वे इसी प्रकार सृजन धर्म में जुटे रहे और शतायु हों।डॉ. ऋता शुक्ल. ( वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित साहित्यकार, कहानीकार – रांची )कहानी संग्रह– ‘ मिशन एन.पी.ए.’– कहानीकार– रमेश यादव, प्रकाशक– स्टोरी मिरर 

Book Review-Mission NPA
 22 May 2018  

आदरणीय श्री रमेश यादव जी का ये पहला कहानी संग्रह जब पहली बार हाथ में आया तो लगा कि ज़रूर कोई सेना का या किसी जुनूनी युवा दल का कोई मिशन होगा,जिसका नाम होगा ‘एन.पी.ए.’ किन्तु शुरुआत में ही समझ आ गया कि ये कुछ अलग तरह का मिशन है. एक ऐसा मिशन जो पाठकों को ऐसे जगत के भावनात्मक सफ़र पर लेकर जाता है, जिससे हर आम और ख़ास आदमी का वास्ता तो रोज़ पड़ता है लेकिन सिर्फ ऊपर-ऊपर से, यानी बैंकिंग जगत. डेस्क के इस पार खड़े हम, और डेस्क के उस पार के लोग...चेहरे पर मुस्कान और जुबान में मिश्री घोले सलीकेदार कपडे पहने हुए लोगों को हम समझ ही कितना पाते हैं कि उनका अंतर्जगत कैसा होता है, उनकी मुश्किलें, उनकी भावनाएं उनकी पीड़ाएं और मुस्कुराहटों के रंग हमसे कितने भिन्न हैं ? साहित्यकारों ने काफी अलग-अलग विषयों पर लिखा है किन्तु बैंकिंग जगत पर नहीं के बराबर लिखा गया है, ऐसा मेरा मानना है.      ‘ मिशन एन.पी.ए.’ की अधिकतर कहानियाँ उसी जगत से जुडी हुई हैं. कभी डेस्क के इस पार के मनोभावों को, तो कभी डेस्क के उस पार के मनोभावों को कागज़ पर बड़ी साफगोई के साथ उकेरा है. रमेश यादव जी की पहले भी मैंने एक दो कहानियाँ जैसे “राजू इंजिनियर” और “खेल बनाम साहित्य” हंस पत्रिका में पढ़ी ज़रूर थीं, लेकिन मैं उन्हें मूलरूप से एक स्थापित अनुवादक, कुशल बाल साहित्यकार, लोक साहित्यकार, कलाकार और एक जागरूक पत्रकार के तौर पर ही जानता था. मगर इस संकलन को पढ़ते हुए मुझे बार- बार ये महसूस हुआ कि वो एक बहुत ही मझे हुए और संवेदनशील कहानीकार भी हैं. कहानियों के बीच में उनके द्वारा दिए गए बिंब आपके मन में एक तस्वीर बनाने में कामयाब होते हैं और रमेश जी कहानी को आगे बढ़ाने के साथ-साथ बीच में कहानी के किसी नुक्कड़ पर दो पल रूककर जो आस -पास के माहौल या मन अम्बर पर हवाओं की तरह उठती गिरती भावनाओं का विवरण करते हैं वो आपको एहसास कराता है कि आप हर उस मोड़ पर स्वयं खड़े हैं, जहाँ ये कहानी करवटें ले रही है. जैसे- “ट्रेन देश के दक्षिणी क्षेत्र को पार करके उत्तरी क्षेत्र के सीमा में प्रवेश कर गयी थी, ताप के दिन, जलती दोपहरी, झुलसते सपने, प्लेटफोर्म पर आते जाते लोगों को मैं निहारने लगा. कुछ देर तक मौन होकर सब कुछ देखता रहा. सामने से चाय वाला आ रहा था उसे बुलाया और चाय की चुस्कियां लेते हुए अपनी सीट पर जाकर बैठ गया. सीटी बजी और लहराती हुई ट्रेन चल पड़ी” इत्यादि. मिशन एन.पी.ए. कहानी की ये शुरूआती पंक्तियाँ ही पूरा दृश्य खींच देती हैं. इसी तरह “राजू इंजिनियर” कहानी पढ़ते हुए हनुमान गली की गुमटी से लेकर, बैंक के अन्दर मिन्नतें करता, फूट- फूट कर रोता राजू और साहब वेणुगोपाल के हाव-भाव सब कुछ आपको अपनी आँखों के सामने घटता दिखाई देता है, मानो कोई चलचित्र चल रहा हो. “ राजू का धैर्य टूट गया, वहीं बैंक में सबके सामने रो पड़ा. उसकी चीख़ कातर थी. हाथ जोड़कर वो कह रहा था “साहब मेरी मदद कर दें...मैं बर्बाद हो जाऊंगा.. आप लोगों के भरोसे पर मैं इतने दिनों तक इंतज़ार करता रहा..मेरा बयाना डूब जायेगा सर... मैं सड़क पर आ जाऊंगा... अगर कहें तो मैं फर्जी पेपर भी बनवा लूँगा...आप लोगों को पार्टी भी दूंगा...मुझ पर रहम करें सर...”       अक्सर ये होता है कि हम जो पक्ष होते हैं उस पक्ष को सही साबित करने की कोशिश करते हैं और ये जताने की कोशिश करते हैं कि दूसरा पक्ष हमें समझ नहीं पा रहा, मगर रमेश जी ने खुद बैंकिंग प्रणाली का हिस्सा होते हुए बैंक के कर्मचारियों की मुश्किलों, मजबूरियों, अच्छाईयों के साथ-साथ बैंक में व्याप्त अव्यवस्था, अफसरशाही और ख़ामियों को भी बेबाकी और बिना किसी भेदभाव के साथ लिखा है. इन कहानियों की यही सच्ची पहचान है. साथ ही बैंक के ग्राहकों की सोच को भो बहुत ही इमानदारी से उकेरा है. जैसे शिवा फ्रूटवाला में एक तरफ बैंक मैनेजर शर्मा जी के चरित्र का मानवीय पहलू सामने आता है कि किस तरह वो एक छोटे मोटे धंधे वाले को सलाह और लोन देकर व्यापार का रास्ता दिखाते हैं तो दूसरी तरफ़ एक आम ग्राहक शिवा के चरित्र का सकारात्मक रूप दिखाई देता है कि वो जीवनभर उस एहसान के प्रति अपना सम्मान ज़ाहिर करने के लिए शर्मा जी को तलशता रहता है. रमेश जी ने बहुत ही करीने से कहानी के कैनवास पर भावनाओं के रंगों को बिखेरा है. बैंकिंग प्राणली के दायरों से बाहर निकल कर बीच में वो  “फैसला ज़िन्दगी का” और “सिक्के का दूसरा पहलू” जैसी प्यारी-सी कहानी भी लिखते हैं और फिर लौट कर “पानी रे पानी” और “ नई शाखा का उद्घाटन” में व्यंग्यात्मक शैली का प्रदर्शन करते हैं. “फैसला ज़िन्दगी का” आधुनिक परिवेश की बड़ी ही बेहतरीन कहानी है और युवा पीढी को एक नई सोच देती है. ‘ बिल्ला नम्बर 64 ’ भी लाइव घटना पर आधारित एक बेहतरीन कहानी है जो रोंगटे खड़ी कर देती है. इसी तरह पारिवारीक जीवन के ताने–बाने को बुनती ‘ एक ही थैले में आंसू और मुस्कान, ‘दादाजी’, ‘मुक्ति’ जैसी कहानियां संवेदनात्मक संदेश देती हैं. बदलते समय काल और परिवेश पर आधारित ये कहानियां मन को झकझोर कर रख देती हैं. इस दौर में डॉक्टरी पेशे और निजी अस्पतालों के लूट की पोल खोलती ‘मुक्ति’ कहानी पाठकों की आंखें खोलती हैं. खैर सभी कहानियों पर विस्तार से भाष्य करना संभव नहीं है, अत: आप सभी सुधी पाठक गण स्वयं इनसे रूबरू हों और अपनी कसौटी पर इन्हें परखें.      पत्रकारिता, अनुवाद और बाल साहित्य रचते- रचते अचानक कहानी संग्रह का प्रकाशन और पूरे संग्रह को एक से एक बेहतर ढांचे में ढालना उन्हें करीने से सजाना वाकई एक सराहनीय और स्वागत योग्य कदम है. मैं बैंक बहुत बार गया हूँ लेकिन हमेशा अपना नज़रिया ओढ़ कर, लेकिन इस कहानी संग्रह को पढने के बाद मैं इस बार जब बैंक जाऊंगा तो डेस्क के उस पार को भी रमेश यादव जी के नज़रिए से देखूँगा. श्री रमेश यादव को ‘ मिशन एन.पी.ए.’ के इस सफल मिशन के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं और एक बेहतरीन कहानी संग्रह के प्रकाशन के साथ साहित्य जगत में बहुत कम समय में अपनी सशक्त पहचान बना चुके स्टोरी मिरर को भी साधुवाद. रवि यादव, मुंबई.  ( चर्चित कवि, अभिनेता, प्रोड्यूसर )  

कल के विचार आज के लिए उपयुक्त कैसे?????
 22 May 2018  

ज़िंदगी भी अजीबोगरीब है, न जाने कब कहा और क्यों?? बहुत कुछ नया सिखाती हैराहों पे चलते चलते दोड़तें दोड़तें हर एक मोड़ पर नया आयाम दे जाती हैजो आज सच लगता है कल शायद झूठ दिखे अथवा विपरीतआज जो विचार किसी विषय को लेके है वो जरुरी नहीं कल भी वेसे ही रहेअसल में अगर इस पहलु पर गौर फ़रमाया जाये तो एक अजीब परन्तु कटु सत्य प्रकट होता है कीज़िन्दगी है ही ऐसी यह समान नहीं हो सकतीअथा॓त बदलाव निश्चित है और बदलाव के साथ अपने विचारो,सिधान्तो को बदल लेना है चातुर्यताजैसे जाे आज है वो कल नहीं हो सकता तो वेसे ही कल के विचार आज के लिए उपयुक्त कैसे?????

क्या कहती हैं विज्ञापन की छवियाँ

जीवन एक बहुत बड़ा फ़लक है जिसमें तमाम तरह के अनुभव सांस लेते हैं। यह किसी बैंक खाते के अंदर मौजूद दूसरा छोटा खाता होता है जिसमें हम अपनी थोड़ी थोड़ी बचत रखते जाते हैं और जरूरत के समय उसका उम्दा इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। जब रोज़मर्रा में कुछ अलहदा टकराता है तब एक के बाद एक अनुभव खुलने लगते हैं। ये अच्छे और बुरे तो होते ही हैं और संख्या में भी अधिकहोते हैं।हम औरतों के लंबे से अनुभव संचय होते रहे हैं। हमारे समय की एक विशेषता यह भी है कि अनुभवों के कई तरह की सतहें जुड़ रही हैं और इनका रुख बाहर की दुनिया की ओर भी है। अब किसी भी औरत के पास अपने दफ़्तर, स्कूल, कॉलेज, सड़क, दुकान, बाज़ार, पार्क आदि जगहों से जुड़े कई तजुर्बे बनते हुए दिखाई और सुनाई देते हैं। निश्चित तौर पर हम एक लंबा सफर कर के आ रहे हैं और आज अपने हकों के लिए लगातार आवाज़ उठा रहे हैं। फिर भी हमें उन छवियों से सावधान रहना ही पड़ेगा जिनमें एक ‘इंसान’ को वस्तु या एक ही फ्रेम में क़ैद करके पेश किया जा रहा है। वास्तव में विज्ञापन की दुनिया में या फिर डिजिटल जगत में छाई हुई कुछ छवियों पर एक संज्ञान लेने की इस युवा महिला-पुरुष पीढ़ी को ज़रूरत है। हमारे साथी पुरुषों को यह सोचना ही होगा कि औरत कोई बे-दिमाग प्राणी या रोबोट नहीं है जो एक अदना सा सेंट सूंघकर उस पर फिदा हो जाएगी। जब भी इस तरह के विज्ञापन टीवी पर प्रसारित हों, तब यह जरूर सोचें कि यह अपने उत्पाद को बेचने की घटिया रचनात्मकता भर है और उन पर तरस खाएं। महिलाओं को यह जरूर मुंह खोल कर और तेज़ आवाज़ में बताना चाहिए कि यह एक घटिया विज्ञापन है जो सरासर भ्रामकता पैदा करता है। प्रेम और मोह जैसे भाव नितांत आत्मिक होते हैं जिनका सेंट और उसकी महक से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है। फोन सेवा देने वाली भारत की एक बड़ी कंपनी का विज्ञापन बेहद आराम से आधी आबादी को एक सेविका के ही फ्रेम में फिट करने का गेम खेल रही है। विज्ञापन का सार यह है कि पत्नी दफ़्तर में मालकिन है और पति एक कर्मचारी। वह महिला काम के प्रति प्रतिबद्ध है। लेकिन दूसरे ही दृश्य में वह घर पर जाकर खाना बनाती है और वीडियो कॉल करके इंतज़ार करने की बात कहती है। यह विज्ञापन पहली नज़र में बिलकुल सादा और आकर्षक है। लोगों को प्रेम सा एहसास देने के लिए काफी है। लेकिन यह बहुत खतरनाक है कि दफ्तर में भी काम करो और घर पर जाकर खाना बनाओ। वास्तव में जिस बात को हल्के से लिया गया है वह महिला श्रम है। थकान दोनों को होती है। घर और उसके अंदर के भाग भी लंबे समय से औरतों के लिए पक्के किए जाते रहे हैं। जैसे दहलीज़ पर नहीं खड़ा होना चाहिए, खिड़की से नहीं झांकना चाहिए आदि। जब मेहमान आए तो कोई लड़की उनके सामने न आए, जैसी रस्म आज भी हमारे कस्बों और शहरों में दिखती है। दरवाज़ों पर लगे पर्दों का पूरा विमर्श ही हम औरतों को इंगित करता है। इन सब से अधिक रसोई के अंदर जमी हुई छवि माँ व पत्नी के नाम ही सुपुर्द है। इसलिए कहीं न कहीं इन परंपरागत छवियों को चटकाना जरूरी है। एक बार चटकी तो टूटेंगी जरूर। इसी तरह एक मोटर साईकिल का विज्ञापन टीवी पर दिखाया जाता है। विज्ञापन के नेपथ्य में एक राजस्थानी गाना चलता है जो सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन इस विज्ञापन पर पर्याप्त निगाह डालकर समझना जरूरी है। महिला पानी भरने दूर रेगिस्तान में गई है और उसके पास लगभग पाँच पानी के धातु के छोटे-बड़े घड़े हैं। वह राह पर खड़ी है। तभी एक मोटर साईकिल वाला आता है और वह पीछे बैठती है। अपने सिर पर लगातार पाँचों घड़ों को लिए बैठी, वह यह देखती है कि घड़े गिर नहीं रहे हैं। मोटर साईकिल ऐसे चलाई जाती है कि महिला को झटके नहीं लगते और उसका पानी नहीं गिरता। अंत में गाने में कहते भी हैं- ‘झटका झूठ लागे रे!’ विज्ञापन भले ही मोटर साईकिल के पुर्जों और बनावट का है फिर भी राजस्थानी महिला की वही पूर्ववत छवि है। अब या तो राज्य सरकारों ने अपना काम इतने सालों से ठीक नहीं किया कि आज भी उन्हें पानी लेने जाना पड़ता है। या फिर इन कंपनियों के रचनात्मक विभाग इतने दयनीय क्यों होते हैं कि वे किन्हीं दूसरी छवियों के बारे में सोच नहीं पाते? एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जब गूगल पर अंग्रेज़ी में विलेज़ विमीन टाइप किया जाता है तब महिलाओं के घिसे-पिटे चित्र भी साथ में दिखाये जाते हैं। उनमें से अधिकतर गाँव की महिलाओं को चूल्हा-चौका, खेतों में काम करते हुए, पनघट में पानी भरते हुए मटकों के साथ, रोटी थापते हुए, घर की चार दीवारी में, किसी के इंतज़ार में रहते हुए दिखाया गया है। दिलचस्प यह है कि उनके पास गाँव की महिलाओं की किसी दूसरी छवि की कल्पना ही नहीं है। यह एक अदृश्य पर भयानक तथ्य है। जिसे हम बेहद सामान्य तौर-तरीकों से लेते हैं। इसलिए गढ़ी गई छवियों से डर लगता है। यह ख़्वाहिश है कि ये सभी गढ़ी हुई छवियाँ टूटे और हम भी किसी कलाकार के रूप में, यात्री के रूप में, किसी फोटोग्राफर के रूप में, जंगल में सफारी करते हुए, आसमानी राइडिंग करते हुए, समुद्री ट्रिप का मज़ा लेते हुए आदि छवियों में दिखें और पहचानी जाएँ। ये सब छवियाँ ऐसा नहीं हैं कि मौजूद नहीं हैं पर वे सिर्फ एक वर्ग तक सीमित हैं। एक आम महिला भी यह सब कर ही सकती है तो वे क्यों न दिखे! अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के आने पर हम महिला सशक्तिकरण की बातें करने के मोड में आ जाते हैं। रैलियाँ निकाली जाती हैं। बैनर बड़े आकार में दिखने लगते हैं। कुछ ख़ास क़िस्म के नारे तेज़ आवाज़ों में सुनाई देने लगते हैं। सरकारी और गैरसरकारी संगठन अपनी आवाज़ें बुलंद करते हैं। आधी आबादी तुरंत ब्रेकिंग न्यूज़ की तस्वीरों में बदल जाती है। ये सब अच्छा है लेकिन उन मुद्दों का क्या जिनकी वास्तव में खबर लेनी चाहिए। देश में अब भी उन कच्चे और पके हुए औरताना अनुभवों की सुध नहीं ली जाती जो आधी आबादी के सशक्तिकरण के संकेतक हैं। पढ़ चुकी बिटियाओं के लिए अब भी रोजगार दूर का चाँद है जो बस दिखता है पर कभी हासिल नहीं होता। सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है। इन सब मुद्दों के साथ बाज़ार द्वारा घटिया और परंपरागत जली-कुटी छवियों को भी महत्वपूर्ण मानना पड़ेगा। आज हर हाथ में मोबाइल है और हर कोई वीडियो-फिल्म्स देखने का दीवाना है। ऐसे में ये बाजारी विज्ञापन औरतों की गलत छवि पेश करते हैं जिनका हमें संज्ञान लेना ही होगा।  (Painting by Thomas Hammer)

बादल सरकार की रंगचेतना और "पगला घोड़ा"
 17 May 2018  
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बादल सरकार की रंगचेतना और'पगला घोड़ा'                                भारतीय भाषाओँ में बांग्ला रंग-समृद्धि के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण भाषा है | बांगला भाषा में योगेन्द्र चन्द्रगुप्त, दीनबंधु मिश्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि प्रसिद्ध नाटककार हुए | इन्होने मुख्यतः सामाजिक , ऐतिहासिक , एवं काव्यात्मक प्रतीकात्मक नाटकों की सृष्टि की है |बदल सरकार ने रंगमंच पर रंग-संकेतों और नाटकों के माध्यम से जीवन को चित्रित किया है |बदल सरकार ने अपनी रचनाओं में समाज और व्यक्ति की परिस्थिति को सरलता सेपात्रों के माध्यम से मंचित करने के लिए अति सामान्य साधनों का प्रयोग करतेहैं | वे पार्श्व संगीत , प्रकाश व्यवस्था , मंच उपकरण और वेशभूषा आदि का भी बखूबी प्रयोग अपनी रचनात्मकता को मूर्तता प्रदान करने के लिए करते है | इन सभी के माध्यम से वे अपने नाटकों के लिए रंगभाषा का निर्माण करते हैं |गौरतलब है कि बादल सरकार ने परम्परागत रुढ़िग्रस्त उपकरणों को त्यागते हुए नवीन उपकरणों की सहायता से नाटक लिखे है | नाट्यशास्त्र में उल्लेखित रंगमंचीय वर्जनाओं को तोड़ते हुए दर्शकों से सीधा संवाद स्थापित करने की सफल कोशिश करते हैं | नई राह तलाशते हुए वे कम खर्चीले रंगमंच (तीसरा रंगमंच) की भी परिकल्पना करते हैं और नाटक को आम आदमी तक पहुँचाने का कार्य करते हैं | बकौल जयदेव तनेजा " तीसरा रंगमंच- शहरी आभिजात्य एवं देहाती लोक रंगमंच के संश्लेष से जन्म लेता है | रंगकर्म को वस्तु ,रंगकर्मी को विक्रेता तथा दर्शक को खरीदार उपभोक्ता बनने से रोकता है | टिकट -बिक्री का विरोधी है | रंगकर्म को 'कला कला केलिए' शुद्ध सौंदर्यवादी प्रदर्शन या व्यवसाय बनाने के बजाय कला को जीवन एवंसमाज को बेहतर और जागरूक बनाने का माध्यम समझता है |”[1] बादल सरकार ने नाटकों का प्रणयन करने के क्रम में नाटकों को दृश्यों और अंको में नियोजित ढंग से बाँटने , काल को एक क्रम में सजाने ,स्पेस कीसीमाओं को बाँधने आदि के यांत्रिक नियमों से खुद को अलगाते हैं | उनका कहना है " मैंने मंच को एक ही साथ विभिन्न काल और स्थान के लिए प्रयोग किया | साथ ही मेरा आग्रह समूह अभिनय , मूकाभिनय, छंदमय गति, गीत और नृत्य परज्यादा रहा और इस प्रकार 'भाषा' के महत्त्व को हम काफी हद तक कम कर सके | सेट आदि इतने साधारण थे कि उन्हें कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता था |"[2]बादल सरकार की खासियत यह रही है कि पात्र के माध्यम से ही समाज के कड़वेसत्य को उद्घाटित करते हैं | जीवन के यथार्थ को दर्शकों के सम्मुख लाने के लिए वे पात्र के मुख से ही जीवन के सार को भी व्यक्त करते हैं | उनका मानना था कि " नाटक एक जीवंत प्रस्तुति है - वह स्वाभाविक रूप से मनुष्य पर ज्यादा निर्भर करता है तो अभिनेता और दर्शक भी है | इसी से उसे इस बात का भी गहरा एहसास होता है कि रंगमंच की कला का मूलभूत उपकरण मनुष्य का शरीर हीहै | प्रकृतिवादी रंगमंच से बेहतर उसके इन एहसासों को एक नया आधार मिला |"[3] बादल सरकार रंगमंच को जनता के लिए सहज बनाना चाहते थे ,जिसके लिए नाटक का मंचन सामान्य करना आवश्यक था | बादल सरकार ने प्रश्न उठाया है कि रंगमंच के लिए उपकरणों की क्या आवश्यकता है | मंचन के लिए साधारण मंच भी सफल अभिनय से प्रभावी बन जाता है | गौरतलब है कि बादल सरकार के नाटकों के संवादों में नैरेशन होता है | प्रश्न होते हैं | अभिनेता से अभिनेता के संवाद हैं तो वहीँ समूह में संवादों को दोहराने की प्रक्रिया भी है |                                             बात जब हम 'पगला घोड़ा' की करते है तो यह नाटक स्त्री-विमर्श के इस दौर  में पुनर्व्याख्या की भी मांग करता है | जहाँ चारों स्त्री पात्र अपनी अतिभावुकता , असफल प्रेम , और सामजिक छद्म का शिकार हो मृत्यु का वरण कर लेती हैं | पुरुष के छद्म प्रेम, बनावटी सामजिक मर्यादा और पुरुषवादी मानसिकता किस तरह स्त्री मन का शिकार का करती है उसे यहाँ पर सहज देखा जाताहै | ख़ामोशी जो एक चीख बनकर पाठक और दर्शक का ह्रदय झकझोर देती है | जहाँ तक रंगशिल्प की बात है इस पूरे नाटक में एक ही दृश्यबंध है |  सभी स्त्री चरित्रों की मूलभूत समानता और विडम्बना दिखाने के लिए नाटककार ने एक ही अभिनेत्री द्वारा विभिन्न नारी चरित्रों के अभिनय की परिकल्पना की है,जिसका प्रयोग आगे चलकर मुद्राराक्षस .विजय तेंदुलकर और मोहन राकेश भी करते हैं | वे नाटक के सन्देश को भाषित करने के लिए एक निर्जन गाँव के शमशान ,जिसके पास एक कोठरी जिसमें मुर्दा जलाने वाले रुकते हैं ,का चयन करते हैं |इसी केअनुरूप मंच का सयोजन करते हैं | मंच को दो भागो में विभाजित किया गया है ,जिसमे दाहिनी ओर की जगह कोठरी के बाहर का है , जहाँ दूर जलती हुई चिता है |रात का समय है और कमरे में पेट्रोमेक्स जल रहा है | खिड़की खुली हुई है | दरवाजे के पीछे दूर कहीं आग जलने का आभास मिलता है ,उसकी लाल रौशनी रह-रह कर नाच उठती है | कोठरी के पीछे की ओर एकदम अँधेरा है | मंच पर पर्दा खुलने पर कोठरी में चार आदमी ( सातू, कार्तिक, हिमाद्री, शशि ) बैठे 'ट्वेंटी नाइन ' खेल रहे हैं , दो चौंकी पर बैठे हैं दो स्टूल पर | खेल 'एक हाथ' पूरा होने के बाद उनके बीच बातचीत शुरू होती है | यहीं से बदल सरकार के रंगशिल्प की चेतना का निदर्शन होने लगता है |चिता जलाने आए चारों आदमियों की बातचीत शुरू होती है और "अचानक अन्धकार भेदकर लड़की की हँसी सुनायी पड़ती है | कमरे के बाहर का अँधेरा हिस्सा आलोकित हो उठता है | लड़की के बाल खुले हैं, आँचल कमर में बंधा है | वह हँसे ही जारही है | कमरे की रौशनी बुझ गई है, तीनों छाया जैसे दिख रहे हैं | वे तीनों स्थिर हैं, उनमें से किसी ने लड़की की हँसी नहीं सुनी है |"[4] लड़की जलती चिता से उठकर आती है | वह मुर्दा जलाने आए चारों पुरुषों को छेड़कर उनके अवचेतन में दबी-घुटी उनकी दमित इच्छाओं और जीवन के प्रेम-प्रसंगों को याद करने के लिए उकसाती है | यहाँ तक बादल सरकार ने मंच को बहुत ही सामान्य रखा है | वे जीवन के शाश्वत सत्य मृत्यु जैसे प्रसंग से नाटक का प्रारम्भ करते हैं | यह एक प्रकार से उनकी गहरी प्रयुक्तात्मक नजरिए का परिणाम है और वे इस नाटक के द्वारा समाज में व्याप्त हताशा, निराशा, कुंठा आदि को दर्शाने का प्रयास करते हैं | वे मानव जीवन में प्रेम के आभाव के पक्ष को सामने लाने का प्रयत्न करते हैं साथ ही आदिकाल से स्त्री की अतिभावुकता, जिसका शिकार वह स्वयं होती आयी है उसे भी स्वर दिया है |ध्यातव्य है कि लड़की अपने जीवन में एक पागल की विवाहिता और एक नपुंसक , अय्याश (मलिक बाबू) के मन-बहलावका साधन रह चुकी है | कभी किसी का प्रेम न पा सकने की पीड़ा को सहने में असमर्थ होकर और इसी कारण जीवन को अर्थहीन मानकर वह आत्महत्या कर लेती है | यह लड़की शराब से शिथिल - चेतन हुए चारों आदमियों के आसपास मंडराती है और उन्हें छेड़कर अपने अतीत में झाँकने को विवशकरती है | लड़की के द्वारा प्रेरित करने पर वे चारों पुरुष जीवन के उन प्रेम प्रसंगों को जीने लगते हैं, जिनमे उनकी कायरता, नपुंसकता, उपेक्षा, अहंकार भाव आदि के कारण उनकी प्रेमिकाओं को विवश होकर आत्महत्या करनी पड़ती है | प्रतिभा अग्रवाल लिखती हैं  " नाटक की लड़की का प्यार खोजना , उसके लिए तड़पना ,भटकना आज के इस युग के वैयक्तिक अकेलेपन का तीव्र एहसास है - जो हम बार-बार महसूस करते हैं | कोई अपना नहीं | अपने भी अपने नहीं | हम सन कटेकटे अकेले | आकाश की सीमाहीनता में भटकती उल्काएँ और जो कहीं कुछ अपना मिलने की आशा होती है ,वहां हम उसे आगे बढ़कर ले नहीं पाते | हमारी कायरता , हमारी अकर्मण्यता और नपुंसकता हमारे सामने दीवार खड़ी कर देती है |"[5]                                                        'पगला घोड़ा' के सन्दर्भ में प्रतिभा अग्रवाल जी का कथन एकदम सटीक है | बादल सरकार 'पगला घोड़ा' को 'मिष्टी प्रेमेर गल्प' अर्थात 'मधुर प्रेम कहानी' कहते हैं | यहाँ पर शमशान और मृत्यु की बीभत्सता को बादल सरकार ने प्रेम की मधुरता में रूपांतरित कर दिया है जिसमें पुरुष के तथाकथित संभ्रांत रवैये को भी देखा जा सकता है जहाँ वह अपनी कायरता, नपुंसकता, द्वंद्व ,कमजोरी आदि को छिपाता है तो वहीँ स्त्री के शोषित रूप को भी देखाजा सकता है और इन सब के बीच बादल सरकार के जीवन के प्रति आस्था का अवलोकनभी संभव है | जयदेव तनेजा लिखते हैं  "एक ही लड़की बार-बार कभी उच्च वर्ग की आधुनिक मिली , कभी मध्यवर्ग की आदर्शवादी पढ़ीं- लिखी मालती और कभी निम्न वर्ग की अनपढ़ किन्तु मानी और अनन्य - प्रेमिका लक्ष्मी बनकर आना और पुरुष के अहंकार अथवा कायरतापूर्ण स्वार्थ से टकराकर आत्महत्या के लिए विवश होना ...आदिकाल से लेकर आज तक अलग-अलग रूपों में पुरुष द्वारा स्त्री के शोषण की बेबस स्थिति का जीवंत रेखांकन कर देता है |"[6] नाटककार के शब्दों में “लड़की का एक मात्र दोष यह था कि वह लड़की थी |”[7]         किन्तु ध्यातव्य है कि लड़की मानती है कि प्रेम में पीड़ा पाकर मार जाना भी जीवन की सार्थकता है | इसलिए लड़की मालती, मिली और लक्ष्मी को भाग्यवान समझती है क्योंकि ये सभी प्रेम पाकर और प्रेम देकर मरती है |                                बादल सरकार ने रंग-संकेतों के माध्यम से कोठरी के पात्रों और कोठरी के बाहर जलती चिता को प्रस्तुत किया है लेकिन नाटक में रौशनी का प्रयोग भी एक चलते और संवाद करते हुए पात्र के भांति हुआ है | पीछे मंच पर रह-रह कर चिता की आग की रौशनी दिखाई पड़ती है जो चेहरों के दुःख –दर्द और खालीपन को उभारती चलती है |नाटककार ने नाटक में बांग्ला बाल कविता के माध्यम से दर्शकों के भाव–संवेदना के तंतुओं को हिलाने का प्रयास किया है | लड़की की वेदना कविता के स्वर की तरह उसके चेहरे पर भी उभरने लगती है –                                  “आम का पत्ता जोड़ा –जोड़ा                                    आम का पत्ता जोड़ा-जोड़ा मारा चाबुक दौड़ा घोड़ा |छोड़ रास्ता खड़ी हो बीबी                      आता है यह पगला घोड़ा |”[8]   वास्तव में यह एक बाल कविता है लेकिन उस लड़की के आंतरिक भावनात्मक उथल पुथल को भी स्पष्ट करता है | जयदेव तनेजा लिखते हैं-“ बादल सरकार ने बांग्ला के इस लोकप्रिय बाल –गीत में आए पगला घोड़ा का शीर्षक में ही नहीं बल्कि नाटक के कथ्य और मूल चरित्र को उद्घाटित करने में भी एक प्रतीककी तरह अत्यंत रोचक और नाटकीय प्रयोग किया है | जीवन शक्ति या ऊर्जा के उन्मत्त और अनियंत्रित रूप ‘प्रेम; को ‘पगला घोड़ा’ कहना वास्तव में इस परिचित शब्द का व्यंजनापूर्ण एवं सार्थक प्रयोग ही कहा जायेगा |”[9]                                     ‘पगला घोड़ा’ प्रेम के पागलपन का बिम्ब तैयार करता है ,जिसे एक ट्रेजिक बिम्ब कहा जा सकता है | इस पागलपन का शिकार चारों स्त्रियाँ हो चुकी हैं | चरों ने एक तरह से अपने जीवन काक अंत कर लिया | रंगमंच पर नाटक के प्रभाव को बनाए रखने के लिए बादल सरकार ने शमशान , आधी रात , जलती चिता ,कुत्ते का रोना , सातू का अट्टहास ,लड़की की हंसी ,शराब की उन्मुक्तता आदि का कल्पनाशील, एवं नाट्यानुभूति  की दृष्टि से सारगर्भित प्रयोग किया है | सम्पूर्ण नाटक को प्रभावपूर्ण बनाये रखने के लिए नाटककार ने जिस प्रकार पूर्वदीप्ति तथा स्थिरीकरण की तकनीक का उपयोग किया है वह भी अनुकरणीय है |                                गौरतलब है कि विरोध वैषम्य के माध्यम से बादल सरकार ने अद्भुत नाटकीयता पैदा की है | कहानियों को तोड़ने और जोड़ने के लिए मनोविज्ञान के साहचर्य नियम का अत्यंत कुशलता के साथ प्रयोग किया है जो रंगशिल्प की दृष्टि से महत्वपूर्ण है | सातू के संवाद में आए खाते-पीते शब्द से ‘पीते’ शब्द को पकड़कर कार्तिक पीने के लिए बोतल निकालने की बात कहता है | कुत्ते के रोने की आवाज से सातू को लक्ष्मी के कुत्ते भुलुआ की स्मृति ,उसे बार–बार अतीत में ले जाती है | शराब पीते ही शशि का सर भारी होने लगता है और मन में उमड़ता-घुमड़ता मालती प्रसंग मुखर हो उठता है | कार्तिक के सामान्य से प्रश्न “क्या वैसी कोई चीज आपको नहीं मिली ?” तथा सातू के साधारण से उत्तर “कहाँ मिली?” में अनायास आ गए ‘मिली’ शब्द से हिमाद्री को अपनी प्रेमिका ‘मिली’ की याद में खो जाना स्वाभाविक ही है |                कहना न होगा कि बादल सरकार संवादों के माध्यम से दृश्य-बिम्ब तैयार करने में माहिर थे | वे स्थितियों और संवादों  के नाटककार थे | लड़की कहती है –“क्या करोगे जानकार ? उससे क्या बनता – बिगड़ता है ? मैं जिंदा ही क्यों रही ? मैंने जिंदगी में क्या पाया ? किसी को क्या दिया ,कोई बता सकता है |”[10] यहाँ इस संवाद से पता चलता है कि लड़की अपने जीवन में घटी घटनाओं से विचलित होकर आत्महत्या कर लेती है | मन की दबी हुई पीड़ा भी इस संवाद के माध्यम से मुखर होता है | बादल सरकार की विशेषता है कि वे मंच परिकल्पना के द्वारा ही पातेरों केव अभिनय को अधिक विश्वसनीय बना देते हैं |बकौल जयदेव तनेजा “संवाद इस नाटक की प्रभावशीलता का एक प्रमुख तत्व है | चरित्रों के शारीरिक-मानसिक और परिस्थितिगत भेद को रचनाकार ने व्यवहार और कथोपकथन की विशिष्ट शैली द्वारा बड़ी विश्वसनीयता से स्थापित किया है | चरों पुरुष पात्र समय-असमय हँसते हैं लेकिन नाटककार ने चारों की हंसी के फर्क का स्पष्ट निर्देश भी गाहे-ब-गाहे आलेख में किया है | कार्तिक का तकिया कलाम की तरह बार-बार ‘तारा-तारा काली ब्रहमई माँ’ की गुहार लगाना उसे फ़ौरन बांकी सबसे एक अलग पहचान देता है |यही बात निम्नवर्ग की अपढ़-गंवार लक्ष्मी के संवादों के ग्राम्य-स्पर्श के बारे में कही जा सकती है |मार्मिकता ,विदग्धता, हास्य-व्यंग्य, विडंबना और प्रभावशीलता इन संवादों की प्रमुख विशेषताएँ हैं |”[11]                                               कहना न होगा कि बोलचाल के शब्दों और मुहावरों का प्रयोग भाषा को  प्रभावी बनता है |वह किरदार की आंतरिकता से जुड़कर उसे ज्यादा मुखर बना देता है | सातू के द्वारा- ‘बावन तोले पाव रत्ती’, ‘चक्कर में पड़ना’,’सोलह आने खड़ी’,’न घर का न घाट का’ , जैसे मुहावरों का प्रयोग करना उसके चरित्र को अधिक स्पष्टता के साथ सामने लाता है |बादल सरकार ने चरित्रांकन में मनोविज्ञान का सराहनीय प्रयोग किया है |’गलतियों का मनोविज्ञान’ इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है |अवचेतन की दमित भावनाओं के जोर और चेतन पर शराब के प्रभाव के कारण पात्र असली बात को छिपाने और बताने के द्वंद्व में कई जगह बोलने का कुछ बोलता कुछ और है जो उसके अतीत के पन्ने तो खोलता ही है साथ ही उसके व्यक्तित्व को समझने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मालूम होता है |रंगमंच की दृष्टि से यह नाटक के रंगशिल्प की उपलब्धि है जिसे यथार्थवादी मंच सज्जा में भी मंचित किया जा सकता है |इस नाटक में प्रकाश व्यवस्था और ध्वनि व्यवस्था का माकूल प्रयोग किया जा सकता है |नाटक की प्रस्तुति में बदल सरकार द्वारा प्रणीत दृश्य अत्यंत प्रभावी है | इसके लिए वे लिखित रूप से स्पष्ट निर्देश देते हैं-“लड़की अंधकार में खो जाति है | बाद की बातें अँधेरे में ही उसकी रुलाई में डूब-सी जाती है |”[12] वस्तुतः इस नाटक का रंगशिल्प संवादों के आधार पर ही खड़ा है | नाटककार ने संवाद के माध्यम से कार्य-व्यापार को बढ़ाने,वर्तमान जीवन की यांत्रिकता ,एकाकीपन ,और विसंगत स्थिति में व्यक्ति की छटपटाहट और आक्रोश को शब्द देने में अद्भुत सफलता हासिल की है |संवादों के माध्यम से जीवन के प्रति साकारात्मक और नकारात्मक दृष्टिकोणों के द्वंद्व और अंततः जीवन के प्रति साकारात्मक  दृष्टि की जीत को बहुत प्रभावशाली रूप में व्यक्त किया गया है |रंगशिल्प पर विचार करते हुए जयदेव तनेजा लिखते हैं –“रंगशिल्प की दृष्टि से पगला घोड़ा एक अनूठी रचना है |मृत लड़की का जलती चिता से उठकर आना और जीवित व्यक्तियों से छेड़छाड़ करके उन्हें मन के अवचेतन में दबी-घुटी स्मृतियों को याद करने के लिए प्रेरित करना ,अतीत के क्षणों को वर्तमान में जीते इन पात्रों के लिए उनकी पप्रेमिकाएँ बनना ,अतीत और वर्तमान की काल-विभाजक सीमाओं को मिटा देना एक ऐसी अद्भुत रंग-युक्ति है,जो नाटक को यथार्थ से हटाकर अयथार्थ या फैंटेसी की दुनिया में ले जाती है |”[13] नाटक के रंगशिल्प और कथ्य की प्रासंगिकता ने श्री टी.पी. जैन, शम्भू मित्र, श्यामानंद जालान, सत्यदेव दुबे,दिनेश ठाकुर,जैसे रंगकर्मियों को अपनी ओर आकर्षित किया और उन्होंने उसका सफल मंचन भी किया |‘पगला घोड़ा’ बादल सरकार की रंग चेतना की महत्तम उपलब्धि है | जिस तीसरे रंगमंच की परिकल्पना बादल सरकार ने की उस दृष्टि से भीं यह नाटक सफल है | नाटक जहाँ शिल्प और कथ्य की दृष्टि से भारतीय नाट्यशास्त्र की वर्जनाओं  को तोड़ता वहीँ मृत्यु के माध्यम से जीवन को देखने –समझने का जो अवसर प्रदान करती वह महत्वपूर्ण है | प्रकाश और ध्वनी इस नाटक इस नाटक के रंगशिल्प में अत्यंत महत्वपूर्णबनकर सामने आते हैं |यह नाटक महज प्रेम कहानी नहीं है बल्कि इसके माध्यम से नाटककार पुरुष के अहम् ,मिथ्या डर,छद्म मानसिकता और तथाकथित नैतिकता पर भी आघात करता है | वहीँ स्त्री-मन के कोमल पक्षों को शब्द देकर नाटककार उसे संवेदनात्मक धरातल पर मार्मिक बना देता है |वहीँ नाटककार जिंदगी के प्रति ललक पैदा करता है और दर्शाता है कि जिंदगी हर हाल में खुबसूरत है क्योंकि जिंदगी है तो संभावनाओं का खुला आसमां हमारे पास है |अंततः यही कह सकते हैं ‘जिंदगी महज एक उम्र नहीं ,जिसे यूँ ही बर्बाद किया जाए|’गौरव भारती शोधार्थी भारतीय भाषा केंद्र जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय कमरा संख्या-108झेलम छात्रावास पिन कोड-110067मोबाईल-9015326408इमेल-sam.gaurav013@gmail.comसन्दर्भ :- [1] . आधुनिक भारतीय रंगलोक, जयदेव तनेजा ,पृष्ठ संख्या - 132, भारतीय ज्ञानपीठ , प्रथम संस्करण -2006, नई दिल्ली[2] . बादल सरकार - व्यक्ति और रंगमच , अशोक भौमिक ,पृष्ठ संख्या - 51 ,अंतिका प्रकाशन ,पेपरबैक संस्करण - 2009[3] .वहीँ ,पृष्ठ संख्या -81[4] . पगला घोड़ा, बादल सरकार, अनुवाद-प्रतिभाअग्रवाल, पृष्ठ - 29, राजकमल प्रकाशन, दूसरा संस्करण-2014[5] पगला घोड़ा, बादल सरकार, अनुवाद-प्रतिभा अग्रवाल, पृष्ठ - 13, राजकमल प्रकाशन, दूसरा संस्करण-2014[6] .आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श , जयदेव तनेजा, पृष्ठ संख्या - 223-224, राधाकृष्ण प्रकाशन ,प्रथम संस्करण -2010 [7] .पगला घोड़ा, बादल सरकार, अनुवाद –प्रतिभा अग्रवाल,पृष्ठ संख्या -29 [8] . वही ,पृष्ठ संख्या- 35 9 . आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श , जयदेव तनेजा, पृष्ठ संख्या – 220, राधाकृष्ण प्रकाशन ,प्रथम संस्करण -2010[10] .पगला घोड़ा, बादल सरकार, अनुवाद –प्रतिभा अग्रवाल,पृष्ठ संख्या -112[11] . आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श , जयदेव तनेजा, पृष्ठ संख्या – 228-229 , राधाकृष्ण प्रकाशन ,प्रथम संस्करण -2010[12] . पगला घोड़ा, बादल सरकार, अनुवाद –प्रतिभा अग्रवाल,पृष्ठ संख्या -79[13] . आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श , जयदेव तनेजा, पृष्ठ संख्या – 229, राधाकृष्ण प्रकाशन ,प्रथम संस्करण -2010

इच्छा शक्ति
 10 May 2018  
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                    इच्छा शक्ति   अभी गर्मियों की छुट्टियां पड चुकी हैं।साल भर बच्चे पढ़ाई पूरी करके और मम्मियां घर के काम करके त्रस्त हो चुकी हैं।इसीलिए सबको गर्मी की छुटियों की इंतज़ार रहता है ।अपनो से मिलने की और अपनी थकान दूर करने की तलब सी लगती है ,ऐसा लगता है जैसे सबको और एक साल के लिए पावर बुस्टर मिल जाता है । चाहे दादा दादी हो या नाना नानी हो,साल भर से पलकें बिछा के बैठे रहते हैं अपनी पोते पोतियों को मिलने के लिये और कुछ वक़्त बिताने के लिए ।        चलिए आप सबको मै  अपनी गर्मी की छुटियों की एक कहानी बताती हूँ । एक बार गर्मी की छुट्टियों में मैं अपने मम्मी पापा और बहनों के साथ मामा के घर गई थी । बहुत जगह घूमे,मामा के साथ खेलना,मामी के मज़ेदार जोक्स,नानी की कहानियां और कई मज़े किये । अब घर वापस आने का समय आ गया था ।जिस दिन घर वापस अपनी गाड़ी में लौट रहे थे तब मेरे मन में घटगावँ स्थित माँ तारिणी मंदिर जाने की बहुत इच्छा हुई क्यों कि मेरी उनमें बहुत श्रद्धा है , उनके मंदिर तो बहुत बार गई हूँ लेकिन आज कुछ ज्यादा ही इच्छा हो रही थी माँ से मिलने की । मै पापा और ड्राइवर अंकल को पूछी की क्या हम मंदिर के रास्ते से जा सकते हैं,मुझे माँ के दर्शन की बहुत इच्छा हो रही है, पापा बोले नही बेटा अब तो सात बज रहे हैं और रात को चोरों का भी डर रहता है और रास्ता भी ठीक नही  है । मै थोड़ा दुखी हो गई क्यों कि मै अपनी माँ तारिणी के लिए नारियल भी लायी थी । मेरी माँ को नारियल बहुत पसंद है । लोग तो अपनी मन्नत के लिए एक सौ आठ नारियल का दान करते हैं  और उन्हें नारियल की देवी भी बुलाते हैं । पापा जैसे ही मना किये मै थोड़ा दुखी होकर अपने स्थान पर बैठ गई , दुख के कारण आखों से आंसू  भी निकलने लगे । मन ही मन माँ तारिणी जी को स्मरण की और बोली माँ आपसे मिलने की बहुत इच्छा हो रही है पर अब मै क्या करूँ  सोचते सोचते और रोते रोते कब आँख लग गई पता नही चला । करीबन रात 9 बजे के आस पास मुझे पापा की और ड्राइवर अंकल की आवाज़ सुनाई दी और दोनों मुझे जगा रहे थे कि देखो बेटा तुम्हारी माँ का मंदिर आ गया।  मै चौंक गई और पूछी आप तो इस रास्ते से नही आने वाले थे । तब ड्राइवर अंकल बोले कि जहां से रास्ता दो हिस्से में बंट रहा  था ,वहाँ मै समझ नही पाया कि  किस तरफ जाना है और उसी समय पता नही मुझे जैसे लगा कि कोई मेरे हाथ से स्टीयरिंग को मंदिर की रास्ते की तरफ मोड़ रहा है । कुछ देर बाद मुझे पता चला कि ये तो माँ तारिणी जी के मंदिर वाला रास्ता है । मै बहुत अचंभित थी,मंदिर के सामने गाड़ी रुकी । मंदिर की रोशनी, उसका तेज़ ,मानो लग रहा था कि माँ अपना आंचल फैलाए मेरी ही प्रतीक्षा कर रही हो और यही बोल रही हो कि जिसे मुझसे मिलने की इतनी इच्छा हो उसे मैं निराश कैसे कर सकती हूँ । दौड़ के अंदर गई,पंडित जी को नारियल सौंप के ,माँ तारिणी जी की वो ममता रूपी आंचल में लिपट गई ।तब पता चला, मन की शक्ति   के आगे तो भगवान भी हार मानते हैं  ।           दोस्तों जब भी आप ओडिशा जाएंगे घटगावं स्थित माँ तारिणी मंदिर  देखना मत भूलियेगा । साथ में नारियल भी लेके जाना,बहुत दयालु है मेरी माँ। सबके ऊपर कृपा करती हैं , लेकिन मन में इच्छा होनी चाहिए  जय माँ तारिणी   संकट हारिणी                                                    आप सबकी                           मिताली।।

सज़ा की गूँज
 2 May 2018  

कमाल की बात है न। सज़ा में भी सज़ा पाने वाले को प्रभावी पुरुष होने से ख़ुशी मिलती है। सज़ा में सहजता होती है। सज़ा में कोर्ट की गूँज होती है। जो देश भर में मीडिया और चैनल बनकर फैलती है। गूँज का असर इतना व्यापक होता है। रोके से भी नहीं रुकता। सीधे सबको बता देता है कि उम्र क़ैद की सज़ा हो गई है। इसी लिए सज़ा याफ़्ता इंसान सज़ा पर अब ज़्यादा रोना धोना नहीं करता । बल्कि अच्छे दिनों की तरह खुश रहकर उसका आशीर्वाद पाने के लिए उत्सुक रहता है।                     सज़ा मुंसिफ को सुनने तक ही सज़ा रहती है। बाद उसके सज़ा खुशहाली में औपचारिक तौर पर परवर्तित हो जाती है। इधर सज़ा पाने वाले के अंदर हिम्मत और हौसले का संचार भरता है। उधर फैसला सुनाने वाले जज साहब की सुरक्षा बड़ा दी जाती है। देश में सज़ा भी बड़ी अद्धभुत चीज़ बनती जा रही है। सज़ा की सुनवाई से सज़ा पाने वाला मायूस नहीं होता। न हीं सज़ा का अपराधवोध करता है । उसके द्वारा अपने व्यग्तिगत ग़ुमान से क़ानून के हो चुके निर्णय के उपरांत अपने मानसिक फ़ैसले की गरमाहट में अच्छे दिनों की ठंडी ठंडी लस्सी पीते हुए जब यह कहा जाता है। चिंता की कोई बात नहीं है। जेल में कम रहूँगा। खुदा की कसम क़ानून की सज़ा के प्रावधान का पूरा व्यक्तितत्व निखरकर रह जाता है।                     सज़ा जेल के अंदर भी घर का सुख देती है। स्वंम खाना बनाकर खाने का नया रुतवा  क़ायम रखती है। सज़ा का हाल चाल और उसकी प्रतिष्ठा पर सज़ा का ज़ोर नहीं चलता। सज़ा में मज़ा ढूंढ़कर यूँ इस तरह जीना प्रारम्भ हो जाएगा । इसकी बड़े बड़े कानूनविदों तक को खबर न थी। अब तो सज़ा पाने वाला भी सज़ा समझकर सज़ा नहीं भोग रहा । उसको अच्छी तरह पता है कि हम सज़ा नहीं झेल रहे हैं। सज़ा को अपने मन मुताबिक़ जीने की कोशिश कर रहे हैं। सज़ा भी अपने आपमें चिंतित है कि हम करे तो क्या करें। प्रभावशाली लोग सज़ा पर उल्टा अपना प्रभाव डालकर सज़ा को इतनी शान से जी रहे हैं, कि सज़ा भी एक सज़ा लगने लगी है ।   आसिम अनमोल 

हद हो गई बातें ,बातें ,बातें
 2 May 2018  

बातें न हों तो कितना सूना सूना लगेगा। है न ? सुना है देश का विकास बातों से होता है। बातें ही देश के विकास का प्रतीक होती हैं। यानी बातों की भी सरकार होती है। बातों का क्या है करते जाओ। सुनने वाले के कान तो खुले ही होते हैं। इस लिए बातें करने वाले अच्छी तरह जज कर लेते हैं कि कुर्सियों पर बैठकर ज्यादा मशक्कत करने की जरूरत नही है। जब बातों से ही देश चलाया जा सकता हो। तो बातें करने की अपनी हसरतों को पूरा किया जाना पहली प्रायरोरिटी होनी चाहिए।                 यहाँ बातें ही बिकती हैं। कहीं भाषण बटते हैं। इन्ही चीज़ों में महसूस कराया जाता है कि यही विकास है। और हम भी कितने ज्ञानी हैं कि आसानी से विकास रुपी बातों के इस ठन्डे ठन्डे झरनों के नीचे बैठकर पांच साल नहाने का आनंद उठाते रहते हैं। यहाँ बातों का अमल ही बड़ा कमाल का है। जो अमल नही होता यहाँ वही घोषित कर दिया जाता है। अमल करने और करवाने वाले बड़ा उम्दा दिमाग रखते हैं।                जब बातें इंटरनेशनल हों। और सुनने वाले का कोई नेशनल - वेशनल ही न हो। तो बातों का विकास हौसले की उड़ान भर लेता है। बातों का रूप भी माशूका की तरह होता है। जहाँ मीठी तथा लुभावनी बातों का मुँह खुला। जनता जनार्दन आशिक बनकर बातों पर फ़िदा हो जाती है। बातों ने ही हर मसले को जन्म दिया है। बातों ने ही हर विरोध को पोषित किया है। जहाँ बातें बनने की होती हैं। वहां बातें ही बात को बिगाड़ देती हैं।                 समाज हो या परिवार इन बातों ने ही पतन की तरक्की में चार चाँद लगाएं हैं। बातें न हों तो इंसान अपनी पुश्तैनी बातों का ज़र्रे बराबर भी विकास नही कर सकता। बातें ही हमारी पहचान हैं।बातें ही हमारे इनाम हैं।बातें ही शादियों का डाइवोर्स हैं। बातें ही मोहल्ले के दादा होने की प्रतीक हैं। बातें ही बीमार कुंठित लोंगो का इलाज़ हैं।             बातें ही खुशियों का उपहार हैं। सोचिए बातें न होतीं तो बड़े बड़े राष्ट्रीय मंच न होते। बातें न होती तो नेता न होते। और नेता न होते तो बातें कब की दफ़न हो गई होतीं। बातों का अपना अलग वक़ार होता है । बातें औरतों की पहचान हैं। बातें जब होती हैं ,तो बातें ही होती हैं। बातें रुकने की रुकने की परंपरा नही निभातीं। बातें हर हाल में अपनी बातों को मनवाने की सलाहियत रखती हैं।           बातें घर घर को आबाद कम नकारात्मक ढंग से बर्बाद ज्यादा करती हैं। बातें जहाँ चाहती हैं ,वहां अपने झंडे गाड़ देती हैं। बातें अपनी बातों से मीडिया से रिश्ता बनाकर चौथे स्तम्भ को मजबूत करती हैं। बातें सियासी दलों में हौसला पैदा करती हैं। कोई दल दलबदल हो जाए तो बातों का बहुत बड़ा योगदान होता है। बातें ही सियासत और सियासतदानों को सियासत करना सिखाती हैं। बातें ही विरोध का स्वर तय करती हैं। आंदोलनों को मजबूत करती हैं।          .  बातें ही इस संसार को जोडे रखती हैं। बातें ही बातों की गरिमा बनाए रखती हैं। बातें हैं तो सब कुछ है। बिना बातों के बातों की हस्ती के माएने ही क्या ? बातें हैं तो सब कुछ और बातें नही तो कुछ भी नहीं । तो कीजिए न बातें यहाँ हर इंसान सुनने के लिए बेकरार है।        आसिम अनमोल 

ग्लोबल वार्मिंग और हम

Happy earth day 2018विषय-वैश्विक तापमान कारण और निवारणसदियों से तपती इस धरा पर जाने कितने अत्याचार और बदलाव आये है।वैसे तो कुदरत से मिली हरेक सम्पति से वो भरपूर है,लेकिन मानवजाती ने खुद को और अपनी आनेवाली पीढी को ब्रह्मांड में एक नयी पहचान देने की जब से ठान ली हैऔर इसके लिए जाने कितने ही आविष्कारों से धरती को सजायें जा रहे है।क़ुदरत की अखुट संपत्ति से लबरेज़ हरियाली धरती अब कहीं कहीं से बंज़र दिखती जा रही है।अपने आपको विश्वमानव बनाने की धुन थी तब तक तो ठीक था,लेकिन वहाँ से ओर ऊपर उठकर अवकाश में भी अपनी जगा बनाकर सब से ताकतवर बनने की होड़ लगी है।औद्योगिक क्रान्ति तो मानवजात के उज्जवल भविष्य के लिए बहुत ही आवकारदायक कदम है लेकिन केमिकल के उपयोग से दूषित पानी की समस्या और समुद्रजीवो के निकंदन से जैविक संतुलन बिगड़ रहा है।सरकार के द्वारा क़ानून बनाकर ठोस कदम उठाये गए है, लेकिन अपनी महत्वकांक्षाओ को "स्काय इस घ लिमिट "समजनेवाले ग्लोबल विकासी कहीं रुकने को तैयार नहीं।कन्स्ट्रक्शन इंन्डस्ट्री में भी काफी पेैबंदिया लगाने के बावजूद बेफाम बढ़ती बहुमाली इमारतों की वजह से महानगरों में काफी दिक्कतों का सामना कर रहे लोग।जैसे न्यूयॉर्क में कभी ऐसा भी हुआ था की ऊँची इमारते बनने लगी और आमने सामने स्ट्रीट बन गयी तो कम गेप छोड़ने की वजह से अन्धेरा रहने लगा और फिर नियम बनाये गए ,उसी के मुताबिक़ डेवलोपमेन्ट बढ़ाया जा रहा है लेकिन अब भी जैसे जैसे डेवलोपमेन्ट बढ़ा मार्किट एरिया और रहेने की पुरानी जगाओ पर वही समस्याए खड़ी हे। जैसे ट्राफिक की वजह से कितने मानवसमय का क्षय हो रहा है और मेरे ख्याल से जल्दी पहुंचने की दौड में जो आविष्कार किये गए उस के बावजूद वहीं के वहीं रहे जा रहे है।टेक्नोलोजी -मोबाईल-कमप्युटर उद्योगों का धुंआ और पेट्रोल डीज़ल का प्रदुषण दोनों मानवजीवन की शारीरिक क्षमता को क्षीण कर रहे है।समजदार देश भी अपनी ताकत दिखाने के लिये अणुपरिक्षण का मोह छोड नहीं रहें।खुले वातवरण से मिलनेवाली शुद्ध हवा जैसे महानगरों में एक याद बन गयी है।दूषीत पानी और दूषीत हवा से कितनी भयंकर बीमारियों का शिकार बन रहा हे मानवी।वैसे तो सरेराश आयु बढ़ी है मेडिकल संशोधन के कारण,लेकिन फिर भी समस्याएं कम नहीं हुई।सो साल जीने की तमन्ना करने वाला इंसान एक के बाद एक समस्याओ से ज़ुज़ रहा है, ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह जंगलो का काटना,और प्लास्टिक का ज्यादा उपयोग होने की वजह से "ओज़ोन "लेयर में ब्लेक हॉल का विस्तार बढ़ा जिसकी वजह से सूरज की तेज रेडियन किरणे बढ़ने लगी,जो स्किन कैंसर वगैराह बढ़ने का मुख्य कारण है। ये तो सब समस्याए है,लेकिन उसका उपाय भी वही बुद्धिजीवियों को ढूंढना होगा जिन्होंने ये सब खड़ा किया है,नयी पिढी को इस समस्या से अवगत कराके उन्हें कुदरत से ज्यादा नजदीक रहने से लिए सामाजिक जागृति अभियान और हमारे गाँवों में भी जिस तरह से आधुनिकरण हो रहा है वहाँ पर वर्कशॉप करके और स्कूल के विद्यार्थी और शिक्षकों द्वारा ज्ञानजाग्रुति अभियान चलायें तभी सब आनेवाली पीढ़ी के लिए पानी,हरियाली शुद्ध हवा और हमारे जरुरी खनिज वगैराह बचा सकेंगे ।सिर्फ हमारी सरकार के प्रयत्न ही नहीं सभी को खुद समज़कर अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारना बंध करना चाहिए।"जय ग्लोबल विश्व”जब सब अच्छे से जियेंगे तभी तो जीवन आगे बढ़ेगा।-मनीषा जोबन देसाई सूरत -गुजरात -इण्डिया

अपने या पराये?

कहानीअपने पराये      सुजीता दोपहर  की चाय बना रही थी, की डोरबेल बजी।सोफे पर बेठी उसकी सासने उसके हस्बैंड का लेबोरेटरी से आया नया रिपोर्ट लिया और पढ़कर,'हे भगवान ये कैसी मुसीबत हमारे परिवार पार आ गिरी है?"किचन में से भागती सुजीता आयी और जल्दी से रिपोर्ट देखा,साथ में डॉक्टर ने बम्बई के किसी बड़े अस्पताल में जाजा़कर इलाज कराने की चिट्ठी भी लिखी थी।सुजीता की आँखों से आंसू बरस पड़े।उसकी सास तो अगली पिछली बाते निकालकर सुनाती रही।"तेरा कुछ ध्यान नहीं है,तेरी पार्ट टाइम नौकरी और छुट्टी के दिन सहेलियों के साथ किटी पार्टी …"वगैराह'धीरे बोलिये मम्मीजी अभी उनकी तबियत ठीक नहीं है, आज डेढ़ महीना हो गया ऑफिस भी नहीं जा रहे,ये सब सुनेंगे तो और ज्यादा दुखी होंगे।अब तो हमें कैसे उनको जल्दी इलाज करके ठीक करना है और इतने लम्बे समय तक चलनेवाली ट्रीटमेंट का खर्च भी तो जुटाना है।उनके इन्शयोरन्स का पैसा भी काफी नहीं हैऔर हम सब महिला किटी में सिर्फ मज़ा करने थोडे जाते है ?सामजिक कार्यो से भी तो जुड़े है,आप हमेशा मेरी गलती निकलती रहती है और हमारी नन्ही सी गुड़िया बेटी  त्रीया से भी रुखा व्यवहार करते है।ये सुनकर सुजीता की सास शांत होकर अपने रुम में चली गयी।सुजीता ने सबको चाय दी और अपने पति रूवीन को धीरे धीरे बाते समजा़ने लगी की, अब हमें बाहर जाकर इलाज करवाना पडेगा।दूसरे दिन से सुजीता तैयारी में जुट गयी।अपनी पांच सालकी बेटी त्रिया की रेसीडेंशल स्कूल से इतनी तो राहत थी की बच्ची उतने समय स्कूल की होस्टेल मे अच्छी निगरानी में रहे सकेगी।त्रीया को समजा़कर  उसकि दो तीन फ्रेंड वगैराह को बुलाकार समजा़ लिया।अपनी ऑफिस से बिना सेलेरी से दो महीने की छुट्टी भी लीउसकी सास ने दो तीन सम्बंदिओ से फोन करके बात की और कुछ आर्थिक मदद के बारे मे भी बताया लेकिन सबने कुछ न कुछ बहाने बनाकर ताल दिया।सुजीता की दो तीन सहेलियों का फोन आया और सुजिताने अपनी मुश्किल बतायी लेकिन सबने हाँ सोचेंगे वगैराह बाते की।उसकी सास भी साथ आने को तैयार हुई लेकिन सुजिताने कहा,आप को तकलीफ होगी मेरा भाई थोड़े दिन छुट्टी लेकर साथ रहेगा फिर जैसे ट्यूमर का  पहला माइनर ओपरेशन हो जाएगा बाद मे रिपोर्ट आये फिर आप आना"बातें कर रहे थे उतने में सुजीता की किटी पार्टी के प्रमुख नीताबेन और साथ में ओर दो बहेनें आयी और सुजीता को आश्र्वस्त करते हुए एक चेक दिया और कहने लगे,"आप बिलकुल चिंता मत करना,अपनी संस्था के भंडोल से सबने मिलकर ये रकम आपको इलाज के लिए दे रहे है जिसमें आधा तो हम सब की तरफ से है और आधी रकम आप धीरे धीरे करके भर सकेंगे ,ईश्वर की कृपा से सब कुछ ठीक हो जाएगा”बोलते सबकी आँखे भर आयी और सुजीता आंसू भरी आंखो से धन्यवाद करते हुए अपनी सास की सबसे पहचान करवाई।सुजीता की सास भी एकदम से रो पड़ी और सबसे धन्यवाद करते हुए बोली,"सुजीता,सचमें समय बदलते ही कभी अपने पराये  हो जाते है और जिन्हें पराये समझते है वो अपने बन जाते है "-मनीषा जोबन देसाई