Home
Quotes New

Audio

Forum

Read

Contest


Write

Write blog

Log In
CATEGORIES
लालसा
 13 November 2019  
Art

बात भी सही है और काम भी कि बचत हमारी रग-रग में है लेकिन किसकी बचत ? जिसे हम पैसों से खरीदते हैं उसकी ।अगर ऐसा है तो वाकई में यह बहुत गलत है। सही है ना ? क्योंकि पानी नल में कितना भी बहे। पेड़ कितने भी कटे कोई फर्क नहीं पड़ता ।क्योंकि इससे पॉकेट हल्का नहीं होता। फिर हम क्यों जहमत उठाएं ? हवा कितनी भी दूषित हो खुद का मनोरंजन होना चाहिए । तरजीह तो खुद की खुशियों को ही देना चाहिए ।सही है ना? समझने वाले इशारों में कहीं बात भी समझ जाते हैं। लेकिन जिसे करना ही नहीं है उसके लिए तो भैंस के आगे बीन बजाने जैसा ही है।टूथपेस्ट की ट्यूब से अंत तक पेस्ट निकालते है। सॉस की बोतल को अंतिम बूंद तक खालीे करते  हैं। लेकिन जब दांत साफ करते हैं नल में पानी बहता रहता है। इलेक्ट्रिसिटी खर्च होती रहती है। प्रकृति का दोहन होता रहता है। यह सब आदत बनने का परिणाम है। बचपन से जिन चीजों की बचत की आदत डाली जाती है उसी को अपनाने की गांठ बांध लेते हैं। लेकिन इस समझ को लाने से नकारा नहीं जा सकता कि, वक्त के साथ बदलाव आते हैं। प्राथमिकताएं बदलती हैं। समाज में जागृति का संचार होता है। और इसके साथ ही हम सभी को भी दिन-प्रतिदिन अपनी जीवन शैली को ढालना होता है और बचत के क्षेत्रफल का विस्तार करके ही प्रकृति के दोहन पर पूर्णविराम   लगाया जा सकता है। ये सब बातें खुशबू के झोंके की तरह आती हैं फिर चली जाती हैं लेकिन आदत नहीं बन पाती हैं। चलिए बचत को बहुआयामी बनाते हैं। आज लिफ्ट से न जाकर सीढ़ियों का इस्तेमाल करते हैं । इस तरह बिजली की बचत के साथ-साथ तंदुरुस्ती  मैं बढ़ोतरी करते हैं। आज पैदल या साइकिल से जाते हैं। पेट्रोल की बचत के साथ-साथ खुद को थोड़ा दुबला करते हैं। घर में सोलर कुकर ले आते हैं और एलपीजी की बचत करते हैं ।सोलर पैनल लगवाकर फिर से बिजली बचाते हैं ।फिलहाल साइकिल चलाते-चलाते या चलते चलते थकने पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट की लाइफ लाइन मौजूद है लेकिन कब तक ? पेट्रोल-डीजल हमेशा तो नहीं रहेगा। हमें गुरुर होता है कि, हमने मानव जीवन लिया लेकिन इस अहम् के चलते उसने दूसरे जीवन की अवहेलना कर दी। जिसका नतीजा सामने है दूसरे जीव लुप्त हो रहे हैं और प्रकृति- रहेगी या नहीं के सवाल पर है। जल्द ही न अहम् बचेगा और नाहि रहेगा सर्वोच्च होने का वहम्। बस बचेगी तो प्लास्टिक से लिपटी हुई उजाड़ धरती और तब पीछे मुड़कर देखोगे तो उल्टे कदम चल नहीं पाओगे लेकिन आज समय है और साधन भी इसलिए उल्टा चलना शुरू कर सकते हैं। ताकि फिर से खुशहाल, आबाद धरती मिल जाए ।  क्योंकि धरती का कोई विकल्प नहीं है ।आज उठ रहे ढेरों सवालों का जवाब भी आज ही ढूंढना होगा क्योंकि कल जवाब ढूंढने से भी नहीं मिलेगा और हो सकता है जवाब ढूंढने वाला भी न हो।अभी तो सिर्फ सांसे कम चल रही हैं लेकिन तब सांसे भी नहीं रहेंगी। अभी हम ख्वाब देखते हैं लेकिन तब हम खुद ख्वाब बन जाएंगे। तो फिर जब अस्तित्व ही नहीं रहेगा तो फिर इस तकनीकी क्षेत्र में हुई अतिवृद्धि को संभालेगा कौन ? दिल में सजी अंतहीन गुत्थियां ज्योति के बुझने के साथ ही कपूर हो जाएंगी । फिर इतने बोझ  के साथ अस्तित्व की जंग? तोबा!तोबा!  मेरे हिस्से में क्या है ?तेरे हिस्से में क्या? मुझे तुझसे एतराज तू मुझसे नाराज । अभी तो हम अपने स्तर पर ही सुलझे नहीं है। अब तो सब को मान लेना चाहिए कि सबका लक्ष्य भी एक है और मंजिल भी एक ही फिर इतनी सारी कटुता को ढोकर कौन सी जन्नत मिलने वाली है ।"चिराग जलाए रखना है हरदम, निरंतरता बनाए रखना है हर पल, अफसोस दूर करना होगा प्रतिपल।  प्रकृति को पाने की लालसा जगानी होगी इसी क्षण ।सबको अपना- अपना किरदार निभाना होगा जमकर। हाथों की लकीरों को मिटने से बचाना होगा तत्क्षण ।कल से क्यों आज से क्यों नहीं, आज से क्यों अभी से क्यों नहीं ।बदलना है गर तस्वीर तो इंतजार किसलिए, तकरार किसलिए। फिर ऊहापोह किसलिए, मलाल किसलिए?

लालसा
 12 November 2019  
Art

बात भी सही है और काम भी कि बचत हमारी रग-रग में है लेकिन किसकी बचत ? जिसे हम पैसों से खरीदते हैं उसकी ।अगर ऐसा है तो वाकई में यह बहुत गलत है। सही है ना ? क्योंकि पानी नल में कितना भी बहे। पेड़ कितने भी कटे कोई फर्क नहीं पड़ता ।क्योंकि इससे पॉकेट हल्का नहीं होता। फिर हम क्यों जहमत उठाएं ? हवा कितनी भी दूषित हो खुद का मनोरंजन होना चाहिए । तरजीह तो खुद की खुशियों को ही देना चाहिए ।सही है ना? समझने वाले इशारों में कहीं बात भी समझ जाते हैं। लेकिन जिसे करना ही नहीं है उसके लिए तो भैंस के आगे बीन बजाने जैसा ही है।टूथपेस्ट की ट्यूब से अंत तक पेस्ट निकालते है। सॉस की बोतल को अंतिम बूंद तक खालीे करते  हैं। लेकिन जब दांत साफ करते हैं नल में पानी बहता रहता है। इलेक्ट्रिसिटी खर्च होती रहती है। प्रकृति का दोहन होता रहता है। यह सब आदत बनने का परिणाम है। बचपन से जिन चीजों की बचत की आदत डाली जाती है उसी को अपनाने की गांठ बांध लेते हैं। लेकिन इस समझ को लाने से नकारा नहीं जा सकता कि, वक्त के साथ बदलाव आते हैं। प्राथमिकताएं बदलती हैं। समाज में जागृति का संचार होता है। और इसके साथ ही हम सभी को भी दिन-प्रतिदिन अपनी जीवन शैली को ढालना होता है और बचत के क्षेत्रफल का विस्तार करके ही प्रकृति के दोहन पर पूर्णविराम   लगाया जा सकता है। ये सब बातें खुशबू के झोंके की तरह आती हैं फिर चली जाती हैं लेकिन आदत नहीं बन पाती हैं। चलिए बचत को बहुआयामी बनाते हैं। आज लिफ्ट से न जाकर सीढ़ियों का इस्तेमाल करते हैं । इस तरह बिजली की बचत के साथ-साथ तंदुरुस्ती  मैं बढ़ोतरी करते हैं। आज पैदल या साइकिल से जाते हैं। पेट्रोल की बचत के साथ-साथ खुद को थोड़ा दुबला करते हैं। घर में सोलर कुकर ले आते हैं और एलपीजी की बचत करते हैं ।सोलर पैनल लगवाकर फिर से बिजली बचाते हैं ।फिलहाल साइकिल चलाते-चलाते या चलते चलते थकने पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट की लाइफ लाइन मौजूद है लेकिन कब तक ? पेट्रोल-डीजल हमेशा तो नहीं रहेगा। हमें गुरुर होता है कि, हमने मानव जीवन लिया लेकिन इस अहम् के चलते उसने दूसरे जीवन की अवहेलना कर दी। जिसका नतीजा सामने है दूसरे जीव लुप्त हो रहे हैं और प्रकृति- रहेगी या नहीं के सवाल पर है। जल्द ही न अहम् बचेगा और नाहि रहेगा सर्वोच्च होने का वहम्। बस बचेगी तो प्लास्टिक से लिपटी हुई उजाड़ धरती और तब पीछे मुड़कर देखोगे तो उल्टे कदम चल नहीं पाओगे लेकिन आज समय है और साधन भी इसलिए उल्टा चलना शुरू कर सकते हैं। ताकि फिर से खुशहाल, आबाद धरती मिल जाए । अभी तो सिर्फ सांसे कम चल रही हैं लेकिन तब सांसे भी नहीं रहेंगी। अभी हम ख्वाब देखते हैं लेकिन तब हम खुद ख्वाब बन जाएंगे। तो फिर जब अस्तित्व ही नहीं रहेगा तो फिर इस तकनीकी क्षेत्र में हुई अतिवृद्धि को संभालेगा कौन ? दिल में सजी अंतहीन गुत्थियां ज्योति के बुझने के साथ ही कपूर हो जाएंगी । फिर इतने बोझ  के साथ अस्तित्व की जंग? तोबा!तोबा!  मेरे हिस्से में क्या है ?तेरे हिस्से में क्या? मुझे तुझसे एतराज तू मुझसे नाराज । अभी तो हम अपने स्तर पर ही सुलझे नहीं है। अब तो सब को मान लेना चाहिए कि सबका लक्ष्य भी एक है और मंजिल भी एक ही फिर इतनी सारी कटुता को ढोकर कौन सी जन्नत मिलने वाली है ।"चिराग जलाए रखना है हरदम, निरंतरता बनाए रखना है हर पल, अफसोस दूर करना होगा प्रतिपल।  प्रकृति को पाने की लालसा जगानी होगी इसी क्षण ।सबको अपना- अपना किरदार निभाना होगा जमकर। हाथों की लकीरों को मिटने से बचाना होगा तत्क्षण ।कल से क्यों आज से क्यों नहीं, आज से क्यों अभी से क्यों नहीं ।बदलना है गर तस्वीर तो इंतजार किसलिए, तकरार किसलिए। फिर ऊहापोह किसलिए, मलाल किसलिए?ReplyForward

राम
 9 November 2019  
Art

श्रीराम कोई व्यक्ति नहीं एक युग है, जिसमें जीने वाला प्रत्येक व्यक्ति खुशहाल था । लेकिन, उस युग को समय के थपेड़ों ने ख़ूब झंगोरा ! पर वह संयम एवं विवेक के बल से सभी अप्रिय घटनाओं का डटकर सामना करते रहें । तभी वह भगवान कहलाए । भगवान कभी प्रकट नहीं होते अपितु हम सभी में से कोई एक होता है जो अनगिनत समय के मारे थपेड़ों का सामना करते हुए भी अपने कर्तव्य भाव के पथ से विचलित नहीं होता ।और ऐसा व्यक्ति ही श्री राम कहलाता है । जब वह धरती पर आए तो उन्हें अनेक कष्ट उठाने पड़े । तब भी वह कर्तव्यों का पालन दृढ़ता पूर्वक करते रहे, बिना किसी निजी महत्वाकांक्षा के !तथा उनके पृथ्वी छोड़ने के कई वर्षों बाद भी आज तक उन्हें अपने जन्म भूमि के लिए न्याय का इंतजार करना पड़ा और बिना किसी चमत्कार के उन्होंने किसी आम व्यक्ति की भांति न्याय की ताक में कुछ वर्षों से अपने जन्मभूमि में किसी बनवासी के जैसे किसी टेंट में आश्रय लिया तथा वहीं से लोगों के दुखों का निवारण किया । राम कोई ईश्वर नहीं अपितु ईश्वर से भी ऊपर का सोच है । राम जीने की कला है । राम एक ऐसा गीत है जिसे सभी समाज के लोग प्रेम और भाईचारे के साथ गुनगुना सकते है । इस गीत को गाकर कोई भी तृप्त हो सकता हैं, राम किसी विशेष धर्म के नहीं हैं, अपितु राम पूरे मानव जाति के आदर्श हैं । जो प्रेम और सदभाव के अमृत का पान निरन्तर कराते नजर आते हैं । राम एक नीर हैं जिसपर सबका अधिकार हैं ।और आज जब माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया उस वक्त भी उस राम के आदर्श का छाप उस फैसले में दिखा तथा सभी पक्षों को उचित न्याय मिला ।मैं ऐसे युगपुरुष राम लल्ला को प्रणाम करता हूं 🙏~ मयंक कुमार09/11/19

चमत्कृत हैं हम
 1 November 2019  
Art

हम मनुष्य हैं।स्त्री भी हैं पुरूष भी हैं।सीमित भी हैं असीमित भी हैं।हम चमत्कृत हैं भारतीय होकर।पृथ्वी के एक ऐसे भूखण्ड से जुड़े हैं जहां लोगों का विश्वास है जब जब हमपर संकट आते हैं परमात्मा हमारी सहायता के लिये आ जाते हैं।उनके आने जाने की कहानियों से इतिहास भरा पड़ा है।भारतीय सभ्यता का इतिहास ऐसा ही है।भारत के सबसे प्रिय ग्रन्थ गीता में कृष्ण जिन्हें भारतीय भगवान मानते हैं खुद ही कहते हैं जब जब धर्म की हानि होती है में समय समय पर आता रहता हूँ।हमारा भी विश्वास है गीता में कही गयी इस बात पर।पर ये कोई जीवनधारा नही है जीवन का समुन्दर है।ये ईश्वरवादिता नही कर्म का दर्शन है। गीता में ही है काम करना हमारा अधिकार है उसके फल की चिंता हमे नही करनी चाहिये।फल कोई और देता है।यह एक मान्यता है।वस्तुतः कर्म का फल मिलता ही है।फल रहता ही है कर्म के आस पास।हम तो चमत्कृत हैं भारत से जुड़कर।भारतीय होकर।आप इस चमत्कार को खो नही सकते।कुछ लोग इस चमत्कार को भुलाने की कोशिश कर रहे हैं।भारत मन्दिरों का देश होकर रह गया है।इसे भगवान का देश भी होना चाहिये।जहाँ वो आते जाते रहे हैं।उनका आना जाना आदमी के आने जाने की तरह ही है।अब मैं उनके कितने नाम गिनाऊँ।हाँ उनके जाने के बाद हमने उन्हें भगवान का नाम दिया।हम राम की बात करते हैं लेकिन किसी एक शिकायत पर अपनी प्रिय पत्नी को घर से निकालकर जंगल भेज देने का साहस हममे में नही है।हम शिकायतों से घिरे हुए है लेकिन उनका निस्तारण नही कर पा रहे हैं।कर्मवादी हम नही रहे।ईश्वरवादी भी हम नही रहे।कर्म अगर कर भी रहे हैं तो शिकायतें कम नही हो रही हैं।इस सबकी एक वजह है हम अपना भारतीय होना भूल गये हैं।हम चमत्कार को भुलाने की कोशिश कर रहे हैं।क्रमशः

सीमितता भी ब्यापक है
 31 October 2019  
Art

हम मनुष्य हैं।स्त्री भी हैं पुरुष भी हैं।सीमित भी हैं असीमित भी हैं।आखिर हम सीमित क्यों हैं जैसा कि लोग कहते हैं हमारी सीमायें हैं।है भी अगर हम मान लें तो भी हमारी सीमितता बड़ी असीमित है।क्योंकि आदि और अंत के बीच हमारा समायोजन है।हम पैदा होते हैं और एक दिन तथाकथित मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।बीच का जो समय है उसे जीवन काल कहते हैं।तो क्या हम इसलिए सीमित हैं कि हमारा जीवन काल निर्धारित है।हम हैं और एक दिन नही रहेंगे।इसलिए हम सीमित हैं।हम आये कहां से यह भी असीमित है और हम जाएंगे कहाँ यह भी असीमित है।कोई नही कह सकता कि हम पृथ्वी पे कहाँ से आ गए हैं और मरने के बाद कहाँ चले जायेंगे।यकीनन हम पैदा हुए हैं और एक दिन भर जाएंगे।इसे सीमितता माना जा सकता है।एक तरह की मान्यता है यह।मान्यता यही है कि हम मनुष्य हैं इसलिए हमारी सीमायें हैं पर हम मनुष्य तभी तक हैं जब एक असीमित हमारे अंदर है।हमारे साथ है।जैसे ही हम अपने अंदर रहने वाले का साथ रहने का एहसास करते हैं हमारी सीमायें टूटने लगती हैं और हम असीमित होने के दायरे में प्रवेश करने लगते हैं और तब हम मरने के बाद भी शेष रह जाते हैं यहीं पृथ्वी पर जीवन में,विचार में प्रकृति में।इसलिए हमें ये धारणा बदलनी चाहिये कि हम सीमित हैं और हमारी सीमायें हैं।क्रमशः

शुरुआत
 29 October 2019  
Art

हम मनुष्य हैं।स्त्री भी हैं,पुरूष भी हैं।सीमित भी हैं असीमित भी हैं।स्त्री इसलिये कि बिना स्त्री गुणों के हमारा निर्माण हीसम्भव नही है।एक वैज्ञानिक तथ्य भी है कि स्त्री पुरुष गुणों के योग से ही मनुष्य का निर्माण सम्भव है। हम दिखते हैं पुरुष लेकिन स्त्री का गुण हमारे अंदर हैं।हम स्त्री दिखते हैं लेकिन पुरुष गुण हमारे अंदर है।तो इसलिए हम कहते हैं कि हम मनुष्य हैं स्त्री भी हैं पुरूष भी हैं।आगे भी ऐसा ही कहते रहेंगे।हम स्त्री भी हैं पुरुष भी हैं।दिखते भिन्न भिन्न हैं।ये एक सच भी है एक मान्यता भी है।आजकल तो दुनिया मे दोनों को अलग अलग मानकर विचार आ रहे हैं।।एक निराधार मान्यता है कि स्त्री कमजोर है और उसे शक्ति दी जानी चाहिये।सरकारें बड़ी बड़ी योजनाएं बना रही हैं चला रही हैं स्त्री को शक्तिशाली बनाने के लिये।महिला सशक्तीकरण के विचार और उसकी सम्पूर्ति में क्रियान्वित होती हुई योजनाएं चारो तरफ दिख रही हैं। जब कि हम मनुष्य हैं स्त्री भी हैं पुरुष भी हैं।दिखे जिस भी रूप में चाहे स्त्री के रूप में चाहे पुरुष के रूप में।हम मनुष्य है। हम स्त्री भी हैं पुरुष भी हैं।आगे आने वाले दोनों में यह बात औऱ स्पष्ट हो जाएगी।स्त्री पुरुष को अलग अलग रूप में देखने का नज़रिया बदल जायेगा। और इस बात पर आधारित हो जाएगा कि हम मनुष्य हैं।स्त्री भी हैं  पुरुष भी हैं।क्रमशः

लौट आये
 27 October 2019  
Art

हमे तो ठहरकर देखनभर है कि हम जो उत्तरों के झुंड का हिस्सा हैं,उस विचार से हमारे जीवन का रिश्ता क्या है।हमारे जीवन की सार्थकता में उस विचार की भूमिका क्या है।वो विचार जो झुंड में हमारे पास कैसे आया।उस विचार को देने वाला कौन है।क्या मकसद है उस विचार को देने वाले का।क्या हम उसके मकसद के लिये अपना जीवन जी रहे हैं।अब हम धीरे धीरे अपने मंतब्य के करीब आ रहे हैं झुंड में रहते हुये भी झुंड से अलग हो रहे हैं।अब हमारे पास हम हैं,एक विचार है और एक उस विचार को देने वाला है।    हम मनुष्य क्यों हैं इस प्रश्न का उत्तर ढूंढते ढूंढते यहां तक पहुंचे हैं।जहां हम है एक विचार है और उस विचार को देने वाला कोई एक है।उस झुंड में कौन प्रतिपादक है इस विचार का,उसे हमे ढूंढना है यानि फिर झुंड में जाना है।यह काम कुछ ऐसा है कि यात्रा करते करते फिर लौट आये वहीं जहाँ से चले थे।पर एक परिवर्तन हुआ है हमारे अंदर जाने या अनजाने अब हम उस विचार की सार्थकता ढूंढ रहे हैं जिस पर हम चल रहे हैं।यकीनन कुछ अधिक सार्थक होने की तलाश है हमे।क्रमशः

ठहरना तो होता है
 25 October 2019  
Art

क्रमागतहमें उत्तरों के झुंड से बाहर निकलना है और एक उत्तर ढूंढना कि हम मनुष्य क्यों हैं।थोड़ा ठहरना है उत्तर के लिये।ठहरकर थोड़ा सोचना है।ठहरकर थोड़ा महसूस करना है।सोच के केंद्र में के खुद को रखना होगा।देखना होगा खुद को उत्तरों के झुंड में।उत्तर से या उत्तरों के झुंड में उस एक विचार से हमारा रिश्ता क्या है।देखना होगा कि वो विचार जिसे हमने अपनाया हुआ है उसका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। क्या हम उस विचार के अनुरूप अपने जीवन की गतिविधियों का निर्धारण कर पा रहे हैं और ये भी की ये विचार हमे क्या दे रहा है और ये भी क्या इससे सुंदर विचार भी हो सकता है हमारे लिए।यह सब सिर्फ इसलिये करना है हम उस विचार से अपने जीवन का रिश्ता निर्धारित कर रहे हैं जिसका हम एक हिस्सा हैं।कभी कभी विचारों का सौंदर्य भी जीवन को कुरूप बना देता है।कभी कभी विचारों का सच भी जीवन का सच नही होता।जीवन विचारों पर चलने वाला कोई यंत्र नही है मनुष्य के रूप में।जीवन विचारों के उतपन्न होने का केंद्र भी है।तो हमे अभी उतना भर देखना है कि हम जिस विचारों के झुंड का हिस्सा बने हुए है उससे सुंदर विचार भी सम्भव है क्या।क्रमश

कोई एक बात।क्रमागत
 24 October 2019  
Art

जैसे यह बात निर्विवाद है कि हम सब मनुष्य हैं,वैसे ही ढेर सारी बातें भी निर्विवाद हैं।तर्कों से परे हैं।इस बात कि हम सब मनुष्य क्यों हैं के ढेर सारे उत्तरों के बीच।बस उस एक उत्तर की खोज ही तो हमें करनी है।वो उत्तर जो है ही उस तक पहुंचना है।प्रश्न तो यही है न कि हम मनुष्य क्यों हैं,और इसके ढेर सारे उत्तर हैं।उतने उत्तर हैं जितने कि मनुष्य हैं और कोई उत्तर गलत नही है।गलत इसलिए नही हैं क्योंकि वे एक मनुष्य के उत्तर हैं और उसके जीवन से जुड़े हैं।हालात तो यही हैं,यही थे भी।मनुष्य पैदा हुआ,बड़ा हुआ,अपना जीवन जीना शुंरु किया।ढेर सारे विचार उसके आस पास थे उसने उनमें से किसी एक को पकड़ा और अपने जीवन का आधार बना लिया।हर आदमी के साथ यही हुआ है हर आदमी के साथ यही हो रहा है हर हर आदमी ऐसे जी रहा है।इसलिए इस एक प्रश्न के ढेर सारे उत्तर आ गए कि हम मनुष्य क्यों हैं।मनुष्य उत्तरों का झुंड बन गया।हमे उत्तरों के झुंड से बाहर निकलना है और इस प्रश्न का एक उत्तर ढूंढना है कि हम मनुष्य क्यों हैं।क्रमशः

मनुष्य
 23 October 2019  
Art

हम मनुष्य हैं और जब हम ये महसूस करते हैं कि हम मनुष्य हैं तो विचारों की एक नई श्रृंखला का उदय शुंरु हो जाता है हमारे अंदर।सवाल भी आते हैं कि हम मनुष्य तो हैं ही और ढेर सारे विचारों से पहले से ही घिरे हुये हैं तो फिर मनुष्य होना महसूस करने का क्या आशय है।यह सवाल हमें खुद से भी करना चाहिए।जब हम कहते हैं कि हम मनुष्य हैं और ढेर सारे विचारों से घिरे हुए हैं तो इसे महसूस करने की क्या जरूरत है कि हम मनुष्य हैं और नये विचारों की क्या जरूरत है।इस प्रश्न के उत्तर से ही उतपन्न होता है या होगा एक नया मनुष्य।आखिर हम मनुष्य हैं जैसा कि हम खुद ही कहते हैं तो आशय क्या और जिन विचारों से हम घिरे हुये हैं उनसे सम्बन्ध क्या है हमारा।इसको जीवन के धरातल पर खुद ही समझने की जरूरत है।कोई समझाने वाला नही आने वाला है।हमे इन सवालों का उत्तर खुद ही ढूंढना है कि हम मनुष्य हैं तो क्यों हैं और उन विचारों का हमारे जीवन से क्या सम्बंध है जिससे हम घिरे हुये हैं।जितने भी आदमी हैं न सबके अलग उत्तर हो सकते हैं।लेकिन उत्तर एक होना चाहिये जो किसी तर्क से परे हो। जैसे कि अगर हम कहें कि हम सब मनुष्य है तो कोई ये नही कहेगा का नही हम मनुष्य नही है।क्रमश

किसी के चेहरे की मुस्कान बनिए।
 19 October 2019  

यारो,किसी ने मुझसे पूछा:-तुम इतने व्यस्त (Busy) होते हुए भी, इतने पोस्ट करने के लिए, ▪️टाईम कैसे निकाल लेते हो?▪️कितने पैसे मिलते हैं?▪️तुम्हें इन पोस्ट के लिए?▪️क्यों इतने पोस्ट डालते हो?▪️क्या मिलता है तुम्हें??दोस्तों, बस उन लौगों से में सिर्फ.....इतना ही कह पाता हूँ कि, ....रिश्तों को ‘कीमत’ देना सीखो, ‘वक़्त’ अपने आप मिल जायेगा…▪️अगर कुछ लोगों की लाईफ में थोड़ा सा भी सकारात्मक बदलाव और लोगों की सोच को बदल सकूँ, लगेगा जीवन सार्थक हो गया, थोड़ा भी लोगों के चेहरे पर मुस्कान बिखेर सकूं, उनकी जिदंगी को एक तर्क संगत परिणाम तक पहुंचा सकूं, दिल को बहुत सकून प्राप्त होगा, उनकी जिदंगी में खुशियां प्रदान कर पाया, तो अपने आप को इस दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान समझूंगा। ▪️दोस्तों मेरा अनुभव कहता है कि किसी के चेहरे की मुस्कान तो बन कर देखिये, एक हसीन और सुखद एहसास होगा। और दिन प्रतिदिन आपके चेहरे की चमक दोगुनी हो जायेगी, यकीन मानिये जो एक मंहगी से मंहगी फेयरनेस क्रीम से भी नहीं आयेगी, बहुत सम्भाल के लिखना पड़ता है, ज़हन-ए-जज़्बात को, वरना स्याही पे नहीं,गहराई पे सवाल होता है। तुम्हें जीत कर फिर तुम्हीं से हार जाना,यही तो रवायत है, रिश्ता निभाने की। दो लाइने जिनमे बड़ी गहराई है,कुछ रिश्ते हैं.....इसलिए चुप हैं,कुछ चुप हैं.....इसलिए रिश्ते हैं। सुनील माहेश्वरी

बच्चो के संस्कार
 27 September 2019  
Art

कच्ची उम्र मे अच्छे संस्कार नही दिए तो आपके बिन संस्कार आपका बच्चा बिगड़ सकता हैं आपकी परवरिश पर उंगली उठ सकती हैं आप बच्चो को संस्कार के अभाव मे पालोगे तो बच्चा कुछ बड़ा कर सकता हैं. बच्चे तो बड़ो को देखकर सिखते हैं बड़े गलत कर रहे हो तो बच्चे भी वही करेगे. बचपन मे बच्चो की जिम्मेदारी समझो फिर वह आपकी जिम्मेदारी बड़ेपन मे बखूबी निभाऐगे बच्चो की संगत पर ध्यान नही दोगे तो वह हाथ से निकल जाऐगे. जिस घर मे बचपन से ही बच्चो को अच्छे का पाठ पढा दिया जाए तो वह अच्छे-बूरे की समझ बखूबी समझेगे. कहते हैं घर से संस्कार निकलते हैं लेकिन वह बाहरी बनावट मे काफी घुल-मिल जाते हैं. जब आपका बच्चा ही आपकी बात ही न सुने तो इसका मतलब वह भटक चुका हैं |बच्चो को दौलत के अभाव मे जीना मत सिखाओ कुछ उड़ान भरना सिखाओ. बच्चो को बचपन न खो जाए इसलिए उन पर किसी प्रकार का दबाव न बनाओ|अगर सुख का भोग करना चाहते हो तो संस्कार सिखाओ फिर भोग का प्रसाद अवश्य मिलेगा. बच्चे तो बच्चो वाली हरकते करेगे लेकिन बड़े ही अपने मार्ग से भटक जाऐगे तो बच्चे क्या करेगे?माँ-बाप की हर बातो को बच्चे अगर नजर अंदाज करेगे तो आगे जाकर निश्चित गलत परिणाम मिलना तय हैं