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स्वतंत्रता

देश आज ब्रटिश राज से मुक्ति के 71 वर्ष पूर्ण कर चुका है और हम सभी इसे स्वतंत्रता दिवस के रूप में मना रहे हैं। आप सभी को हार्दिक बधाई।16 अगस्त 1947 से हम कुछ और गुलामी से मुक्ति के लिए संघर्षरत हैं। आज के परिपेक्ष्य में यदि इस दिशा में हुई प्रगति का अवलोकन नहीं होगा तो प्रगति चिन्हित करना बेमानी लगेगा। अंग्रेज गए पर वे विरासत में देश की खस्ता हाल अर्थव्यवस्था छोड़ गए। वे देश विभाजन, संकुचित और आत्म केन्द्रित राजनीति के वे माइन्स छोड़ गए जिनमे अब तक घातक विस्फोट हो रहे हैं। वे फूट डालो और शासन करो के उस राजनैतिक विनाशक सिद्धांत को रोप गए जिससे यदि कुछ मुट्ठी भर लोग थोड़ा विकास कार्य करते भी हैं तो वह भी आज के दृष्टिकोण से गौण बन जाता है।दस साल के लिए जारी आरक्षण की सुविधा चुनाव जिताऊ मन्त्र बन कर आज तक टूल के रूप में उपलब्ध है। जिन लाभार्थियों का जीवन स्तर गुणात्मक रूप से सुधरा भी है वे भी स्वत: इस सुविधा के सतत उपभोग से खुद को अलग नहीं कर पा रहे हैं।अर्थ व्यवस्था का वह पुरसाने हाल है कि एक मध्यम या उच्च वर्गीय कर्मचारी अपने सालाना वेतन के एक से दो माह का वेतन आयकर में चुकाने के बाद भी अनेकों इन डायरेक्ट टैक्स चुका कर देश की अर्थ व्यवस्था पर भार होती तमाम व्यवस्थाओं को पोषित कर रहा है।औद्योगिक विकास का यह आलम है कि 80-90 के दशक में हम जिन कुछ वस्तुओं का उत्पादाब खुद कर लेते थे उत्पादन मूल्य बढ़ने से वे उत्पाद चीन के सस्ते उत्पादों के आगे टिक नहीं पाए और धीरे-धीरे वे इकाइयां बंद हो कर विलुप्त हो गयीं।इतिहास बतलाता है कि अवध पर जब हमला हुआ था तो वहां के सत्ताधीश मनोरंजन में डूबे हुए थे। यह वाकया अपने आप में बहुत बड़ा सामाजिक और राजनैतिक संदेश चेतावनी के रूप में देता है। लोग फेस-बुक और व्हाट्स एप में उलझे रहें या माल्स में फिल्मे और टी वी पर सीरियल देखते रहें किसी एडिक्ट की तरह और समाज तथा देश का धीरे-धीरे पतन और क्षरण होता रहे।ऐसा नहीं है कि देश में विकास कार्य हुआ ही नहीं है, समस्या यह है कि यह कार्य कभी भी भूत काल से सबक सीखकर भविष्य की आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखकर नहीं हुआ। सडके बनाने के बाद ध्यान आया कि नाली बनानी थी, सड़क फिर खोद डाली। फिर ध्यान आया कि टेलीफोन के केबल नहीं डल पाए तो उसे भी डालने के लिए सड़क खोद दी। जिन चौराहों पर नेताओं की आदमकद प्रतिमाएं लगायीं थीं उन्हें पुनरुद्धार के नाम पर रंग कर फवारा लगाने के क्रम में बची खुची सड़क फिर खोद दी गयी। फिर सडक रिपेयर की गयी और फिर लगा कि ट्रैफिक बढ़ गयी है तो मैट्रो ट्रेन चला दी जाए। लीजिये फिर नए सिरे से निर्माण को फिर नई दिश मिल गयी। ऐसा नहीं है कि इप्लीमेंटशन टीम को एग्जक्यूशन टीम को इसका पूर्वाभास् नहीं होता पर वे इन सब से बेखबर रहकर सिर्फ दिए गए काम को पूर्ण करने का यत्न करते हैं। एक आयकर दाता की हैसियत से हमे यह पूछने का हक़ है कि इस तरह जनता का गाढी कमाई का पैसा इस तरह लुटाने वाले लोग कहीं किसी भी प्रकार की जवाबदेही लिए नौकरी कर रहे हैं।विकासशील देशों में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर लंबे समय तक काम चलता है, लेकिन कितने लंबे समय तक यह भी एक प्रश्न के रूप में उभरा है। एक तरफ हम खुद को विश्वस्तर के देश के रूप में साबित करने पर लगे हैं, कहाँ यह उखड़ी सड़कें और परत पर परत खुलते घोटाले विकास की एक दूसरी कहानी कह रहे हैं।बात हताश होने की होगी क्यूंकि बेतरतीब दौड़कर आप किसी लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकते, लेकिन निराश मत होएं, हर व्यक्ति खुद आत्मावलोकन करे, जाने कि संविधान के अधिकार कर्त्तव्यों के अनुपालन पर ही आपको मिलेंगे। आरक्षण आपकी बैसाखी है, इसे विरासत मत बनने दीजिये। किसी भी योजनाओं पर भविष्य की आवश्यकताओं का आंकलन कर ही परियोजना पर अमल करें और अनावश्यक खुद का और आमजन की मेहनत का पैसा ना खर्च करें ना करने दें। सिर्फ सीमा पे सैनिक खड़े करके या उनका बलिदान करवाके तो आप सीमा पर आक्रमण और अतिक्रमण रोक सकते हैं किन्तु जो देश अपनी तकनीकी क्रान्ति के बल पर आपकी मांग अनुरूप तुलनात्मक रूप से सस्ताक उत्पाद लेकर आपके बाजार में घुसपैठ कर चुके हैं और आपके देश को बेरोजगारी की दोजख में धकेल चुके हैं उनसे उनके स्तर पर लड़ने का समय है। इन सब में एक बात जो कहीं छूटी जा रही थी वह परिवार के लिए वांछित समय निकालने का है। आप जानिये कि तमाम छुट्टियों का प्रावधान होने के बावजूद भी बहुत से नियोक्ता अपने कर्मचारियों का इतना अधिक शोषण करते हैं कि वे उन्हें छुट्टियों में भी काम करने को उद्वेलित करते हैं। जबकि परिवार और समाज के प्रति भी किसी भी व्यक्ति की जिम्मेदारी को नकारा नहीं जा सकता। यह श्रमिकों पर गुलामी के हावी होने का एक और मिश्र रूप है, जो अंग्रेजों के जाने के बाद भी लागू है। कोई भी व्यक्ति कम्प्यूटर की तरह मल्टी टास्किंग नहीं हो सकता। कई सारे काम को इकट्ठा करवाने के दबाव में या तो वह अपना आउट्पुट बिगाड लेता है या सोशल बैक ग्राउण्ड में आउट आफ फोकस हो जाता है। आओ समझिये कि देश का नागरिक देश को अपनी सन्तान के रूप में तभी एक सजग विरासत सौप पायेगा जब उसे अपनी सन्तान के उद्भव और विकास में उसका निर्धारित रोल निभाने दिया जाएगा। जीविका के लिए काम का अपना दायरा है और परिवार के लिए समय देने का अपना महत्त्व है। अगर यहाँ सोशल इंजीनियरिंग फेल हुई तो देश को हम विरासत में एक कुंठित और बिखरा हुआ समाज ही दे पायेंगे जहां पड़ोसी तो दूर बच्चों का अपने माँ-बाप से भी कोई सरोकार नहीं होगा। तब देश का क्या होगा??? भावनात्मकता विहीन समाज की परिकल्पना यदि स्वरूप लेगी तो पाषाण युग की तरफ हमारा गमन सुनिश्चित है।निराश नहीं होना है, देश के भीतर कर्मरत तमाम व्यक्ति खुद अपने आप में एक सैनिक समझे जो सीमा के भीतर फैली कुव्यवस्थाओं के खिलाफ लड़ने वाला समझे। ईमानदारी से देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था को सुघड़ रखे, मतदान का हिस्सा बने, योग्य नेतृत्व का चयन करे और देश को समग्र विकास की दिशा में गतिमान करे।तमाम विकासोन्मुखी, समग्र विकास की संभावनाओं का प्रयोग कर देश आर्थिक गुलामी से उबरे, सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग कर सामजिक समरसता लाये, जात-पात के बंधन से मुक्त हो, शोषक और शोषित की परिभाषाओं को इतिहास बनाए और सीमा पर खडे सैनिकों का आत्मबल बन कर देश को शारीरिक रूप से प्रबल करे, प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा करते हुए कुशल और शिक्षित नेतृत् को चुने। पुन:श्च स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक बधाई।

छींक
 13 August 2018  
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छींकछींकतीन प्रकार की होती हैं. पहली. बेमानी छींक. यानी की छींक के नाम पर कलंक. दो तीन छींकों तक, एक भी छीटा बहार नहीं आता. होठों के ऊपर चाट कर देख सकते हो. खुद भी या चाहे कोई और. कोई सबूत नहीं. दूसरी. छिडकाव वाली छींक. तीन चार पाँच..... भूचाल सा आजाता है. दिमाग और शारीर की सभी नस और नाडिया झंकृत हो उठती हैं. कल्पना कीजिये, रुमाल ना हो और सिर्फ हाथों का सहारा हो तो. सोने पे सुहागा, अगर मोटर साइकिल चला रहे हों, बिना हेलमेट के, तो सहरहागिरों को घर जाके निश्चित ही नहाना पड़ेगा. वह अवश्य ही आपको धन्यवाद् देंगे.    तीसरी. इस प्रकार की छींक की रौद्रता और विभत्सता की व्याख्या न कर के सीधे सीधे इसके बारे में बताते हैं, एक छींक यानी की चाहे एक देशी घी का परांठा बना लो या फिर थिकशेक बना लो या फिर धोती में माढ (क्लफ़) लगा लो. यह देखने का सैभाग्य ना ही प्राप्त हो तो अच्छा है. अतुल कुमार अग्रवाल, कानपुर

बुलबुले
 13 August 2018  
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बुलबुलेबुलबुले तीन प्रकार के होतें हैं.पहला. पानी के बुलबुले. जो की अक्सर सभी देखते हैं. दूसरा. साबुन के बुलबुले. मेलों में आपने देखा होगा की एक आदमी एक रिंग सें साबुन के घोल में फूँक मार मार कर बुलबुले उडाता है. यह रिंग एक खेल का सामन है. वह आदमी साबुन के बुलबुले उड़ा कर उस तरह के रिंगो को बच्चों को बेचता है. यह बुलबुले भी ज्यादातर लोगो ने देखे होंगे.तीसरा. बच्चे की नाक के बुलबुले. यह बुलबुले देख कर भी आदमी अनदेखा कर देता है. दो तीन साल के बच्चे को जब जुकाम होता है, तब यह बुलबुले अनायास ही बनते हैं और कभी कभी तो इन बुलबुलों में इन्द्रधनुष के भी दर्शन हो जातें हैं. सतरंगी छटा. यह इन्द्रधनुषी बुलबुले दुर्लभतम होते हैं और अपनी चिर स्मरणीय यादें छोड़ जातें हैं. अतुल कुमार अग्रवाल, कानपुर

मंगलसूत्र
 9 August 2018  
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मैंने नई नौकरी पकड़ी। सोचा रवि की थोड़ी मदद कर दूँ। रवि मेरा पति, उसने भी मेरी बात समझी और हामी भर दी। पहला दिन नौकरी का। रवि ने बोला थोड़ा ठीक से तैयार होकर जाना तुम आफिस, मंगलसूत्र भी निकाल जाना। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने मंगलसूत्र उतारा नहीं पर ऐसे पहना कि दिखाई नहीं दे। सिन्दूर भी थोड़ा लगाया। मुझे नौकरी मिली थी पर्सनल असिस्टेंट की। मुझे एक हफ्ता हुआ नौकरी करते हुए। एक दिन बाॅस मुझे अपने साथ किसी पार्टी में ले गए। पार्टी थी बड़े लोगों की। मन नहीं था फिर भी मना नहीं कर पाई, नई नौकरी जो थी। बाॅस के साथ उस दिन कई सवाल का सामना करना पड़ा। कई प्रस्ताव भी थे। मेरा जवाब देना जरूरी हो गया था। मेरा मंगलसूत्र सामने आ गया था और पार्टी छोड़ मैं घर के लिए निकल गई। दुसरे दिन मैंने मंगलसूत्र को छूपाया नहीं। मेरी और पहचान के साथ, एक और पहचान मेरी.... मेरा मंगलसूत्र।

साहित्य की सामाजिक भूमिका
 26 July 2018  
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संगम नारी मंच के समक्षसाहित्य की भूमिका जानने से पूर्व जानते हैंकि साहित्य  क्या है?क्यों हैं? साहित्य नाम क्यों दिया गया?वस्तुतः किसी भी भाषा के वाचिक और लिखित रुप से प्राप्त सँस्कृति,संस्कार,कला को साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है।वाचिक यानि बोलकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तकग्रहण किया गया।लोक गीत ,लोक कलायें ,परंपरायें इसी तरह हस्ताँतरित होती रही हैं।इस हिसाब से देखा जाये तो आदिवासी भाषाओं,कला आदि का साहित्य सबसे प्राचीन है जिसे फरिभाषित करना थोड़ा कठिन है।जिस प्रकार पानी को परिभाषित करना या हवा को परिभाषित करना ,भावना को परिभाषित करना..।आशय हुआ कि शब्दों में हम  जिसे ढालना चाहे जिस रुप में ढालना चाहे जिस आकार में ढालना चाहे ढाल लेते हैं।पर शब्द के साथ जब उसका अर्थ ,उसका भाव भी सामंजस्य रुप में जुड़ा हो तब वह साहित्य की संज्ञा को प्राप्त हो सकता है।ज्ञातव्य है कि संस्कृत के आचार्य  विश्वनाथ महापात्र  सर्वप्रथम साहित्य दर्पण लिख कर साहित्य शब्द को व्यवहार में लाये थे ।वहीं संस्कृत के ही एक अन्य आचार्य कुंतक जी कहते हैं कि -शब्द और अर्थ के लिये सुंदरता की होड़ लगी हो ,स्पर्धा हो वहाँ साहित्य की सृष्टि होती है।क्लिष्ट शब्द ,तुकबंदी,रचना जो भाव हीन हो लेकिन छंद या मीटर के अनुभावों पर शतप्रतिशत सही बैठती हो ठीक वैसी ही है जैसे अपराह्न में जुगनू।इसका आशय ये हुआ कि भाव ही किसी सृजन को वह गहरायी प्रदान करते हैं जो रचना को साहित्य की परिधि में लाते हैं।निदा फ़ाजली ,गाल़िब ,दाग आदि अनेक कवियों ने बहुत ही सहज ,सरल शब्दों में गहरे भावों की रचना की जिसे रोम रोम महसूस कर सका यही साहित्य है।दुष्यंत कुमार ,जयशंकर प्रसाद रामधारी सिंह दिनकर आदि की रचनायें गहरे भावों को संजोती रचनायें हैं।अर्थात् साहित्य -शब्द ,अर्थ और भावों की त्रिवेणी हैं जो जनहित की धारा के साथ उच्चादर्शों की दिशा में सामाजिक सरोकारों को साथ ले प्रवाहित है।यही है उद्देश्य भी अर्थात् वाचिक,मौलिक ,लिखित रुप से सामाजिक सरोकारों के साथ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्ताँतरित ,हितकारी,संस्कार ,संस्कृति ही साहित्य है।तो अपने भाव सौंदर्य के साथ शब्द अर्थ की विस्तृत व्याख्या करता है।उद्देश्य या भूमिका---एक वाक्य में कहा जाये तो प्राचीन परंपरा को सहेजना,समझना साहित्य का उद्देश्य हो सकता है।लेकिन मूलरुप से कुरीतियाँ मिटाकर सामाजिक बुराइयों से अलग स्वस्थ ,सुंदर, सामाजिकता की परंपरा ही साहित्य का उद्देश्य है।सा-सहित,हित्-हितकारी,य-यत्न पूर्वक।यानि समाज के लिये हितकारी यत्नपूर्वक हित सहित जो मानव ,समाज के लिये जीवन को सहज ,सरल बनाये वही कला साहित्य का उद्देएश्य है।साहित्य में मानव जीवन के सद्विचार ,भाव निहित होते हैं।ऐसे भाव जिनका उद्देश्य जीवन,समाज में व्याप्त कुरुपताओ,रुढ़ियों,दुष्प्रभावों विसंगतियों को को मिटाना है।केवल रस या आनंद प्राप्ति अथवा मनोरंजन मात्र ही साहित्य का उद्देश्य नहीं है।स्वस्थ मन ,दिमाग वाला व्यक्ति हर जगह सौंदर्य और रस खोज लेता है।साहित्य का उद्देश्य है कि वह  समाज की रूढ़ियों,विसंगतियों को नीति उपदेश के साथ  मित्र ,प्रिय के समान मिष्ट बातों द्वारा कलात्मक,सहज,सरल भावपूर्ण शब्दों में बताये और परिवर्तन के लिये प्रेरित करे।इसी लिये साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है।जहाँ समाज में उपजी कलुषता ,विसंगतियों,,अपराधों को इंगित कर उनका निराकरण किया जाता है।एक दिशाबोध दिया जाता है।यही साहित्य का उद्देश्य है। फिर चाहे वह आलोचना हो, व्याख्या हो कथा हो काव्य हो हर धारा दर्पणवत् समाज का चेहरा सामने लाता है।साहित्य मनोरंजन के साथ कल्याण और निर्माण की भावना को भी साथ लेकर चलता है।फ्रांस की क्रांति,रुस की क्रांति,भारत की क्रांति ..सभी के मूल में साहित्य  का प्रभाव था। जब भी जहाँ भी कुछ क्रांतिकारी परिवर्तन हुये ,साहित्य ही सहयोगी रहा।जीवन की सड़ी गली परंपराओं,रुढ़ियों,हीनताओं से जीवन को निकालना ही साहित्य का उद्देश्य हमेशा से रहा है।अर्थात्  मनोरंजक तरीके से मानव समाज के हितार्थ ,शुभकारी,लौकिक पारलौकिक मुक्ति ,साहित्य का चरम  उद्देश्य कहा जा सकता है।जो जीवन को प्रभावित करने वाले व्यवहारिक सत्य हैं उन्हें रोचक ढंग से अभिव्यक्त करना और मानव या व्यक्ति अथवा पाठक को उस से परिचित करा के परिवर्तन करना ही साहित्य का उद्देश्य है ।

एक ग़ज़ल
 26 July 2018  
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ग़ज़ल/ यूसुफ़ रईसये जो मंज़र है कहाँ था पहलेचार सू मेरे  धुआँ था पहले।उसने मिट्टी को उड़ा कर बोला ये जो इंसाँ है यहाँ था पहले।तुम जिसे दरिया कहा करते होमेरी आंखों में रवां था पहले।ख़ुल्द की आप तमन्ना कीजै मैं तो मौजूद वहाँ था पहले।दरमियां जब न कोई मज़हब थाये जहाँ और जहाँ था पहलेतुमने तामीर किया अपना ख़ुदावरना कब उसका निशां था पहले ।उसके चेहरे की इबारत पढ़ करलौट आया मैं जहाँ था पहले।तेरी सोहबत में ग़ज़ल कहने लगाये हुनर  मुझमें  कहाँ था पहले ।~~~~~~~~~~~~~~~~नाम- यूसुफ़ रईस विधा- कविता/ग़ज़ल/लघु कथा/उपन्यास प्रकाशित कृतियाँ- दो ग़ज़ल संग्रह ' इक तन्हा सफ़र ' व ' चेहरा रिश्तों का' एक बहुचर्चित उपन्यास ' मैं शबाना '। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाओं का प्रकाशन ।शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास ' ओ रे हरिया ' व ' मुजफ़्फ़र नगर ।पता- वार्ड नं. 2 , नयापुरा,पिड़ावा,जिला झालावाड़ राजस्थान,पिन -326034मोबाइल नम्बर-9829595160Email- yusufrais025@gmail.com

" माँ नर्मदा के किनारे "

              " माँ नर्मदा के किनारे "आज अपने घर और शहर के कोलाहल से दूर जीवनदायिनी माँ नर्मदा के किनारे प्रकृति की गोद में आज इस साल की पहली बारिश का अनुभव कर रहा हूँ । एक ओर नदी का किनारा है वहीं दूसरी ओर गरजते हुए बादल जहाँ एक ओर नदी की लहराती हुई जलधारा है वहीं दूसरी ओर मचलती हुई हवाओं का झोंके । एक बहुत अद्भुत संगम दिखाई दे रहा है ।                             यहाँ से दूर उस नीले पर्वत पर छाई हुई काली घटाएँ और उस पर्वत के आगोश से निकल कर आने वाली ठंडी हवाए । यह सब मिलकर आस-पास के पूरे वातावरण को एक अद्भुत आकर्षण का केंद्र बना दे रहे है। इसी संगम में सम्मिलित हो जाती है यह बारिश की बूंदे जो कभी तो सीधे धरती पर आकर गिरती हैं और कभी हवा के साथ-साथ अपने रुख को भी मोड़ लेती है              नदी के किनारे पर बैठकर यह सब देखना एक बेहद रोमांचक और मनोहारी है एक ओर जब हम शहर में बारिशों से बचते हैं उन से दूर भागते हैं आज शहर के कोलाहल और तनाव से दूर यहाँ एकांत में एक नदी के किनारे पर बैठकर इस तरह बारिश की बूंदों से भीगना और इस मनोरम दृश्य को देखना ऐसा लगता है जैसे जीवन का सबसे अद्भुत दृश्य जीवन का सबसे सुकून दने वाले पल यदि कहीं हैं तो यहीं पर है।                                        शहर में जो बारिश और हवाएं आफत नजर आती हैं आज वही सुख प्रदान करने वाली नजर आ रही है दोस्तों बारिश में कोई फर्क नहीं है फर्क हमारी मानसिकता में है। शहर की तनाव भरी जिंदगी और शोर-शराबे में हम इतना ज्यादा परेशान रहते हैं कि हम इन छोटे-छोटे सुखों को भी नजरअंदाज कर देते हैं ।                                                  आज यहाँ इस शांत वातावरण में बैठ कर लगता है कि कभी-कभी शहर के कोतूहल और कोलाहल से दूर शांत और एकांत में आकर हम ऐसा बहुत कुछ पा जाते हैं जो हमें शहर की चकाचौंध नहीं दे सकती।                जीवन का वह छोटा सा असीम सुख जो इस स्थान पर मुझे मिला शायद यह इन शब्दों से प्रतीत नहीं होता किंतु हाँ यह एक बेहद अद्भुत, बेहद अनोखा और बेहद मनोहारी समय था । यह एक ऐसा समय एक ऐसा स्थान था जहाँ प्रकृति क्या है और प्राकृतिक सौंदर्य क्या है इसकी एक झलक मुझे देखने को मिली।                          !! धन्यवाद !!भवानी  प्रताप  सिंह  ठाकुर संपर्क - 8989100111ईमेल - thakurbhawani66@gmail.com

सपना शिक्षा का
 14 July 2018  
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रचना - 79✍ ..शिक्षा- का सपना ..✍"""""""""""""""""""""""""""""""""'''''''''''''''''''''कवि जसवंत लाल खटीक💐रतना का गुड़ा ,देवगढ़💐काव्य गोष्ठी मंच, राजसमन्दगाँव धनोली माल , पंचायत - पनोतिया , तहसील - आमेट जिला - राजसमंद में विद्यालय नही होने से बच्चे शिक्षा से वंचित है । SURAT DONATE CLOTHES ORGANIZATION ( SDCO ) संस्था के संस्थापक श्री रमेश जी चौहान साहब का हार्दिक आभार कि आपने सरकार को इस गाँव से और गाँव की पीड़ा से अवगत कराया । आशा है जल्द ही विद्यालय खुलेगा और घर घर में ज्ञान का दीपक जलेगा ।गाँव के बच्चों का सपना - शिक्षा कापेश है मेरी छोटी सी रचनामाँ मुझको भी पढ़ना है ,शिक्षित मुझको बनना है ।कब तक यूँ मजदूरी करेंगे ,अफसर मुझको बनना है ।।देखो , दूसरे गाँव के बच्चें ,हंसते खेलते स्कूल जाते ।मैं भी तो पढ़ना चाहता हूँ ,मुझको भी तो सपने आते ।।कंधे पर बस्ता लटकाकर ,विद्यालय पढ़ने जाऊंगा ।मेहनत करके पढ़ लिखकर ,जीवन सफल बनाऊंगा ।।शिक्षा जब मिलेगी मुझको ,ज्ञान का दीप जलाऊंगा ।माँ बापू के आँख का तारा ,अफसर में कहलाऊंगा ।।सपने सबके पूरे करूँगा ,बहन के गुड़िया लाऊंगा ।बहना को भी पढ़ा लिखाकर ,धूमधाम से शादी कराऊंगा ।।ईमानदारी से पैसे कमाकर ,सब कर्ज़ में चुकाऊंगा ।माँ बापू का सहारा बनकर ,दुःख-दर्द में मिटाऊंगा ।।शिक्षा का मन्दिर बनवा दो ,हम सबको भी ज्ञान दिला दो ।हे सरकार! सुन पुकार हमारी ,अज्ञानता को जड़ से मिटा दो ।।"जसवंत" कहे हे ! सरकार  ,इन बच्चों को भी रस्ता दो ।गाँव में स्कूल बनवाकर ,इनको विद्या का बस्ता दो ।।

क्यों ना फिर से जी ली जाए जिंदगी
 14 July 2018  
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मिसेज शर्मा आजकल बहुत खुश रहती हैं क्योंकि उन्होंने डान्स क्लासेस जॉइन कर ली हैं और वह वहां बच्चों को डान्स सिखाने भी लगी हैं।मिसेज शर्मा को डान्स का शौक शुरू से था।थोड़ा थोड़ा करती भी थी लेकिन पिता ने कभी डान्स क्लासेस नहीं जाने दिया।पति खुले विचारों के मिले लेकिन घर गृहस्थी अयर संयुक्त परिवार की जिम्मेदारी में ऐसी फंसी कि अपने लिए वक्त ही निकाल पायी।अब बच्चे अपनी अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए हैं तो खुद के लिए वक्त ही वक्त है।60 की उम्र में डान्स क्लासेस जॉइन करने का निर्णय लेना आसान नहीं था लेकिन पति और बच्चों ने साथ दिया और कहा अब मौका है तो जिंदगी जी लो अपनी।अपने शौक पूरे कर लो।स्वाति जी ने 50 की उम्र पार कर अपनी नई नवेली बहु को अपनी साथी बनाकर अपने कार सीखने के शौक को पूरा किया।दोनो सास बहु ने साथ साथ ही कार ड्राइविंग स्कूल जॉइन किया और साथ साथ कार चलाना सीखा।रचना आजकल हारमोनियम और तबला बजाना सीख रही है उसने आजकल यह नया शौक बनाया है।दिन का तीन घंटे वह ऐसे ही अपनी रुचियों को देती है और जब एक शौक से मन भर जाता है तो दूसरे शौक बना लेती है।दोस्तों यह तो कुछ ही उदाहरण हैं।जिनके जरिये मैं आज आपको यह बताना चाहती हूँ कि हमें चाहे हमारी कितनी भी उम्र हो जाए अपने शौक अपने अंदर जिंदा रखने चाहिए और उन्हें पूरा भी करना चाहिए।सीखने की चाहत को कभी खत्म नहीं करना चाहिए।हो सकता है किसी कारणवश आप अपने शौक पूरे नहीं कर पाये तो क्या हुआ,अभी भी देर नहीं हुई है चलिए उठिए और अपनी रुचि,अपने शौक को वक्त देकर मन की सच्ची खुशी महसूस कीजिए।और अगर आप सभी को मेरा यह ब्लॉग अच्छा लगा तो कृपया कमेंट जरूर कीजिए ताकि मैं भविष्य में भी आप सभी के सामने इसी तरह अच्छे अच्छे ब्लॉग लिखकर प्रस्तुत करूं।धन्यवाद!गुंजन

तेरी ख़ुशी में ही हम सभी की ख़ुशी निहित है
 14 July 2018  
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कुमकुम की शादी नीरज से हुई।कुमकुम खुद एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी और नीरज एक इंटीरियर डिजाइनर।शादी से पहले कुमकुम पुणे में एक MNC में जॉब करती थी।नीरज कुमकुम के पिता के दूर के रिश्ते में लगता था और उसका इंटीरियर डिजाइनिंग का बिजनेस दिल्ली में था।हालांकि कुमकुम तो एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर से ही शादी करना चाहती थी।चूंकि कुमकुम के पिता को रिश्ता अच्छा लगा और उन्हें नीरज में कोई खामी भी नज़र नहीं आयी इसलिए उन्होंने कुमकुम को भी यह कहकर मना लिया कि शादी दो परिवारों का दो दिलों का मेल है।ना कि प्रोफेशन का।नीरज और उसकी माताजी बहुत समझदार हैं इसलिये वह तुम्हें शादी के बाद दिल्ली में भी जॉब करने देंगे।सबसे मुख्य बात नीरज जब 15 साल का था तभी उसके पिता की मौत हो गयी वह खुद की मेहनत के बलबूते खड़ा हुआ है इसलिए उसे मेहनत का मूल्य भी पता है।नीरज की माँ और उसकी छोटी बहन रीमा आगरा रहते थे।रीमा अभी पढ़ रही थी।शादी के बाद लगभग 2 महीने कुमकुम अपने ससुराल में रही और नीरज दिल्ली।हालांकि हर शनिवार,रविवार को नीरज अपने घर आ जाया करता था।2 महीने बाद कुमकुम नीरज के साथ दिल्ली चली आयी और उसने थोड़े दिन अपना घर सेट करने के बाद जॉब ढूंढनी शुरू कर दी।चूंकि कुमकुम के पहले के रिकॉर्ड्स अच्छे थे इसलिए उसे एक बहुत अच्छी कंपनी में जॉब भी आसानी से मिल गयी।नीरज ने भी कुमकुम को पूरा सपोर्ट किया।वह दोनो अपनी जिंदगी में बहुत खुश थे।हर शनिवार को दोनो कभी कभी आगरा भी चले जाते और कुमकुम अपनी ननद और सास के साथ भी मिलजुल कर रहती।धीरे धीरे 2 साल बीत गए और एक दिन कुमकुम को पता लगा कि वह गर्भवती हो गयी।चूंकि कुमकुम के लिए अकेले सब कुछ मैनेज करना कठिन हो रहा था।इसलिए कुमकुम की सास ने कुमकुम को अब जॉब छोड़कर आगरा आने की सलाह दी।रीमा की भी आगरा में ही एक अच्छे स्कूल में जॉब लग गयी थी।कुमकुम जॉब छोड़कर उनके पास रहने चली गयी।शुरू में तो सब कुछ ठीक रहा लेकिन दिल्ली में नीरज को भी कुमकुम के बगैर अकेला घर खाने को दौड़ता और कुमकुम भी बिना जॉब के आगरा में उदास उदास सी रहने लगी।लेकिन वह अपने आप को यही सोचकर दिलासा देती रहती कि जब बच्चा आएगा तो उसका मन अपने आप लग जायेगा।यह 9 महींने कुमकुम और नीरज पर बहुत भारी गुजर रहे थे।दोनो बस बच्चे के पैदा होने का इंतजार कर रहे थे।कुमकुम को एक बेटा हुआ।उधर रीमा के लिए भी रिश्ते आने लगे।एक रिश्ता बहुत अच्छा आया और कुमकुम की सास उस रिश्ते को छोड़ना नहीं चाहती थी।इसलिए चट मंगनी पट ब्याह हो गया।कुमकुम ने छोटे बच्चे के साथ सब कुछ बहुत अच्छे से संभाला।नीरज तो बस वीकेंड पर ही आ पाता था।सभी कुछ कुमकुम और रीमा ने ही मिलकर मैनेज किया।सभी मेहमानो ने और लड़के वालों ने सारे इंतजाम की बहुत तारीफ की।रीमा के ससुराल जाने के कुछ दिन बाद ही कुमकुम ने अपनी सास से वापस दिल्ली जाने की बात कही और उन्हें भी साथ चलने को कहा।कुमकुम की सास दिल्ली चलने को तैयार भी हो गयी।अब नीरज और कुमकुम के साथ उसकी सास भी रहने लगी।कुमकुम का अपने बच्चे के साथ बहुत दिल लगने लगा।उसने बच्चे की देखभाल और जॉब में से बच्चे की देखभाल को प्राथमिकता दी।धीरे धीरे 3 साल निकल गए और कुमकुम का बेटा स्कूल जाने लगा।अब कुमकुम को फिर से खालीपन काटने को दौड़ता और वह फिर से बुझी बुझी और उदास रहने लगी।चिड़चिड़ी भी हो गयी।कुमकुम की सास और नीरज दोनो कुमकुम की परेशानी समझते थे।उन्होंने कुमकुम को घर पर ही रहकर ऑनलाइन काम या कोचिंग पढ़ाने का सुझाव भी दिया।चूंकि कुमकुम सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी इसलिए उसे कंप्यूटर संबंधित कार्यों में ही रुचि थी।नीरज के एक दोस्त का दिल्ली में ही कंप्यूटर इंस्टिट्यूट था।नीरज ने अपने दोस्त से बात की,सारी जानकारी ली और उसी के इंस्टिट्यूट में कुमकुम को बतौर प्रशिक्षक लगवा दिया।अब जितने समय बेटा स्कूल जाता उतने समय कुमकुम वहां इंस्टिट्यूट में कंप्यूटर का प्रशिक्षण देती।नीरज और उसकी माँ कुमकुम के पीछे से सुबह का सारा काम संभाल लेते।इंस्टिट्यूट से आते हुए कुमकुम अपने बेटे को स्कूल से लेती हुई आ जाती।इस तरह कुमकुम को अपनी पसंद का काम भी मिल गया और उसका मन भी लग गया।एक दिन नीरज ने कुमकुम से पूछा "अब तो तुम खुश हो ना" कुमकुम ने जब उसी सवाल के बदले नीरज से पलटवार सवाल किया खुश तो हूँ लेकिन तुम्हें कैसे पता लगा कि मुझे क्या परेशानी थी?नीरज ने जो जवाब दिया उसे सुनकर कुमकुम की नज़रों में अपनी सास का मान और भी बढ़ गया।"पगली,माँ ने मुझे सभी कुछ बताया और मुझे अपने दोस्त से बात करने को भी कहा।जब मैंने कहा कि कुमकुम के जाने के बाद घर कौन देखेगा तो उन्होंने सुबह के काम की सारी जिम्मेदारी खुद पर ले ली और मुझे यह भी बताया कि तुम रीमा से भी बढ़कर उन का ख्याल रखती हो इसलिए तुम्हें खुश रखना उनका भी फ़र्ज़ है।उन्हें यह भी पता है कि तुम करियर ओरिएंटेड लड़की हो।तुमने सिर्फ हमारे बेटे की वजह से अपनी जॉब छोड़ी।माँ और मेरे लिए पहले तुम्हारी खुशी मायने रखती है।तुम खुश रहोगी तभी तो हमारे बेटे का,माँ का,मेरा,अपना ख्याल ठीक से रख पाओगी।हमारे बेटे को एक अच्छी परवरिश दे पाओगी।कुमकुम के चेहरे पर अनायास ही एक मुस्कान आ गयी।मुस्कान देखकर नीरज भी बोल पड़ाआप सभी को मेरा यह ब्लॉग कैसा लगा कृपया अपने विचार जरूर व्यक्त करें।धन्यवाद!गुंजन

'मेरा अहम'
 7 July 2018  
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एक राजा को जब पता चला कि मेरे राज्य मे एक ऐसा व्यक्ति है जिसका सुबह-सुबह मुख देखने से दिन भर भोजन नही मिलता है।सच्चाई जानने के इच्छा से उस ब्यक्ति को राजा ने अपने साथ सुलाया।दुसरे दिन राजा की ब्यस्तता ऐसी बढ़ी कि राजा शाम तक भोजन नही कर सका ।इस बात से क्रुद्ध होकर राजा ने उसे तत्काल फाॅसी की सज़ा का ऐलान कर दिया।आखिरी इच्छा के अंतर्गत उस ब्यक्ति ने कहा - " राजन - मेरा मुँह देखने से आप को शाम तक भोजन नही मिला , किंतु आप का मुँह देखने से मुझे मौत मिलने वाली है।"इतना सुनते ही लज्जित राजा को संत वाणी याद आ गई....*बुरो जो देखण मै चल्यो , बुरो न मिल्यो कोय।**जो दिल ढूढ्यो आपणो , मुझ सो बुरो न कोय ।।*कमियां अपने में ढूंढो, दूसरों में नहीं...

नाम था मेरा दिव्या
 3 July 2018  

हर रात की तरह उस रात भी सो गया,सुनी जब खबर तो दिल मेरा भी रो गया,तभी कलम मेरी रो पड़ी, जैसे दिव्या मुझसे बोल पड़ी।।छम छम नन्हे पावो से सारा आँगन घुमा करती थी,नटखट शरारतो से अपने सबको खूब हस्या करती थी,नाम था मेरा दिव्या खुल के अपना बचपन जिया करती थी।।अंजान थी जमने से बचपन मे अपने मशगूल थी,मैं नन्ही सी जान किसे के आंगन का फूल थी,क्या बेटी बन पैदा होना मेरी भूल थी,मस्ती में मस्त जमाने से अनजान थी,क्या मालूम था के में उनका अगला शिकार थी,नाम था मेरा दिव्या, अपने कुल की शान थी।।ना तो कपड़े मेरे छोटे थे, ना जिस्म मेरा मोहित करता था;जिसने लूट ली मेरी आबरू क्या वो अपनी माँ का सौदा करता था,मैं घबरा रही थी, ओर वो मुझे छुए जा रहा था;मेरे छोटे छोटे अंगो को हैवानियत से नोचे जा रहा था;में दर्द से कहरा रही थी, ओर वो हँसे जा रहा था;कह ना दु किसी से बस इसी बात का डर सता रहा था;नाम था मेरा दिव्या, ओर आज मेरा शिकार हो रहा था।।

समीक्षा ' मैं शबाना ' - फारूक आफ़रीदी
 20 June 2018  
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#मैं_शबाना उपन्यास में क्या है खास जिसे पढ़ना चाहेंगेआज आप पढ़ेंगे मुस्लिम परिवेश को लेकर Yusuf Rais के शानदार उपन्यास #मैं_शबाना की समीक्षा । शबाना की गमगीन जिंदगी आपको झकझोर कर रसमीक्षा/ जिंदगी की जद्दोजहद और दुश्वारियों का आईना है उपन्यास ‘’मैं शबाना’’-फारूक आफरीदी - शबाना इस उपन्यास का मुख्य किरदार है और सारी कथा इसके इर्दगिर्द ही घूमती दिखाई देती है।इसकी कथा को कुछ इस तरह बुना गया है जिसके जरिए मुस्लिम स्त्रियों के अधिकारों पर कुठाराघात, उनके प्रति समाज के गैर जिम्मेदार और उपेक्षापूर्ण रवैये और सामाजिक सोच को बखूबी समझा जा सकता है।उपन्यासकार ने इसे आज के तीन दशक पहले के हवाले से रचते हुए मौजूदा दौर तक ला खड़ा किया है।शबाना एक अच्छे खासे खाते-पीते जागीरदार परिवार की महिला है।उसकी तालीम और परवरिश भी उसी के अनुरूप हुई और व्यस्क होने पर एक बराबर के ही खानदान के नौजवान असलम से उसका निकाह हो जाता है । वह अपने होने वाले शौहर और उसके खानदान के बारे में पहले से कुछ नहीं जानती । शादी से पहले वह अपनी माँ से सवाल पूछती है- ‘’मैं जिस घर में जा रही हूँ, वहां के लोग कैसे हैं ? क्या मुझे ये जानने का हक़ नहीं था ? आपने मेरे हक़ में बेहतर ही किया होगा लेकिन मैं कोई बेजान खिलौना तो नहीं;जिसे आप सजा कर जिसे चाहें सौंप दें?’’ माँ जवाब देती है- ‘’ये औरतों की बदकिस्मती है कि वो अपनी जिंदगी का कोई फैसला नहीं कर सकती है।‘’ शबाना का शक सही निकलता है क्योंकि ससुराल पहुँचने पर उसे पता चलता है कि जिससे उसका निकाह हुआ वह शख्स किसी दूसरी लड़की से मोहब्बत करता है मगर उसकी मर्जी को तवज्जो देने का तो वहां कोई रिवाज ही नहीं था। सुहागरात के दिन से ही उसके और शबाना के बीच दांपत्य जीवन के वे तार नहीं जुड़े जिनकी दाम्पत्य जीवन की नींव में जरुरी दरकार होती है। इससे शबाना बिलख पडती है किन्तु उसने प्रण कर लिया है कि वह एक दिन असलम का दिल जीतने में कामयाब हो जाएगी।उसे अपनी फूफी जान की यह बात याद आ गई कि ‘’मर्द भले ही दिन भर काबू में ना आए लेकिन बिस्तर पर उसे शीशे में उतारा जा सकता है।’’ मगर उसे वह तरकीब मालूम ना थी। संयोगवश इन कोशिशों के बीच शबाना की माँ के दुर्घटना के हादसे ने दोनों को एक दूसरे के करीब लाने में मदद की जिससे दोनों में मोहब्बत के पुष्प पल्लवित होने लगे। माँ की दुर्घटना के दौरान ही शबाना को अपने और पराए के बीच के रिश्तों की पहचान होती है । घर में उसके मूक बधिर छोटे भाई जुबैर की देखभाल करने को लेकर चिंता और गहरी हो जाती है । एक भाई अपनी पढाई में मशगूल है ।ऐसे ही समय में शबाना अपने ससुराल की एक अजब कहानी से भी रूबरू होती है। असलम, उसके पिता और बड़े भाइयों में आपस में सदभाव का कोई रिश्ता ही नहीं है। सब अपने-अपने फायदों के लिए जी रहे हैं। सब एक बड़ी हवेली में तो जरूर रहते हैं लेकिन उनके दिलों में अप्रत्यक्ष दीवार खींची हुई है।किसी का भी एक दूसरे से सलाम दुआ के अलावा कोई वास्ता नहीं है। शबाना की चूंकि सास नहीं है इसलिए उसके ससुर ने ही बहुओं को रसोई की जिम्मेदारी बाँट रखी है और वे ही तमाम फैसलों के खुद मुख़्तार हैं। ऐसे में शबाना अपने ससुराल में ‘’उस गुलदान की तरह थी, जो घर के एक कोने में नुमाइश के लिए तो रखा जाता है, लेकिन उसमें कभी फूल नहीं सजाए जाते हैं।‘’  शबाना को अपनी जेठानी के जरिये यह बात मालूम होती है कि उसके सबसे बड़े जेठ जुल्फिकार चरित्र के मामले में हद दर्जे तक गिरे हुए एक गलीच किस्म के इन्सान हैं और अपनी ही साली तक को हवश का शिकार बना चुके हैं, जिसने बाद में आत्म हत्या कर ली और इसके बाद उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए उनकी जिंदगी से जा चुकी है। यह सुनकर शबाना बुरी तरह घबरा जाती है । वह जब दुल्हन बनकर हवेली में आई तभी से जुल्फिकार उस पर बुरी नज़र रखने लगे, लेकिन वह उससे बचने की हर चन्द कोशिश करती रही ताकि कोई अनहोनी ना हो जाए। सब कुछ पटरी पर चल रहा होता है और उसको पहला बच्चा भी हो जाता है किन्तु शबाना की किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और एक दिन अचानक मौका पाकर जुल्फिकार अपनी अश्ली