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"अनकही बातें"माय ब्लॉग
 25 May 2019  
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स्त्री ही तो फर्क करती है .अगर दिया होता बेटी, बहन, माँ, बहु को सम्मान तो समाज में कुछ और स्थिति होती ।न ये मामला आता है लड़के के लड़के तो गाय ही होती है चाहे वो तेड़ा ही हो माता-पिता आज भी अपने बूढ़ापन की लाठी समझते हैं अक्सर औरतें या यूँ कहें बड़े-बुधि आज भी जहाँ घर में एक से दूसरी लड़की हुई नहीं उसके बेटे की टेर लग रही हैं, ये अक्सर सास ही अपनी बहुओं को बात बे बात पर ताने मारने लगती हैं। कहीं एक बेटा होता है तो हमारे वंश का नाम तो उठता है, लेकिन ये कम अक़्लों को कौन समझाये ..... इस 'मेरी' कविता"घी का लड्डू टेड़ो भलो,लड़के "घी" के लड्डू होते हैं,और हम "लड़कियां?स्त्री ही बेटी की तुलना मेंधड़कता है, बेटों को ऊँचा रेटेड,हर तरह से स्त्रियाँ हैं।सभी मापदंड का स्रोत हैं, फिर क्यों बिसुरती हैं,अपने अधिकार के हनन से?क्यों सहती है?माँ, बहन, बेटी, बहु के रूप में पीड़ा।महिला ही कहती हैं ......"घी का लड्डू टेढ़ा भलो"फिर बिसलाई क्यों है?यही नियति स्त्री को गर्त में ले जाती है।यदि दिया  होता बेटी, बहु,बहन को स्त्री ने सम्मान न होता 

दस रुपये के नोट से लखपति
 15 May 2019  

एक सम़य की बात है, एक दिनेश नाम का युवक रहता था !वह काफी गरीब था, परिवार की जिम्मेदारी दिनेश के हाथों मे थी !कभी-कभी ऐसा भी होता खाने को कुछ नही मिलता था ! एक दिन रास्ते से वह जा रहा था, उसको 10 रुपये का नोट मिला। वह देखकर खुश इतना नहीं हुआ क्योंकि दस रुपये में उसका क्या होने वाला हैं। तो वो सोचता है- क्या किया जाए।उसने दस रुपये के नोट से एक लॉटरी खरीदी जिसका नम्बर भी दस था। वह अखबार में लॉटरी का नम्बर देखा। वह हैरान रह गया कि लॉटरी में उसका इनाम निकला हैं तो भागते भागते घर गया।परिवार वालो को ये बताया। परिवार वाले काफी खुश हो गए पर लड़कियों की शादी के लिए जो पैसे जोड़े थे, वह लोग खुशी खुशी में वह खर्च कर दिये, अगली सुबह वह लॉटरी लेकर जहाँ से खरीदी थी वहाँ गया और लॉटरी वाला काफी हँसा क्योंकि उसकी कोई लॉटरी नही निकली थी। वह लॉटरी वाला नंबर दिखाता 01 उसका नंबर था 10 वह बोला तुमने लॉटरी ढंग से नहीं देखी। वह गरीब आदमी काफी पछताता है ! वह कहता है कि अगर नहीं खरीदता तो सही रहता नुकसान भी नहीं होता !शिक्षा :- हमेशा पूर्ण जानकारी लेनी चाहिए अधूरी नहीं !

जहेज़ क्यों ?
 10 May 2019  
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हमारे मआशरे में निकाह और शादी की ताख़ीर का सबसे बड़ा सबब जहेज़ की तलब है, वालिद या लड़की वाले अपनी बहन या बेटी को रज़ामंदी या ख़ुशी से बतौर तोहफा अगर कोई चीज़ देतें हैं तो इस में कोई हर्ज व क़बाहत वाली बात नहीं अगर लड़के वाले कोई चीज़ को ज़बरदस्ती लड़की वालों से तलब करते हैं तो ऐसी चीज़ को दुरुस्त क़रार नहीं दिया जा सकता ।इब्तिदाई तौर पर निकाह व शादी में तहज़ीब और इख्लाक़ को तरजीह दी जाये तो हमारा मआशरा बहुत सी क़बाहतों से बच सकता है। सूरत और सीरत का टकराव हो तो इन्सान को कभी सूरत को सीरत पर तरजीह नहीं देनी चाहिए, सूरत की चमक दमक आरज़ी और सीरत की चमक दमक दाईमी होती है । चुनानचा जो रिश्ते सीरत व किरदार की वजह से कीए जातें हैं उनमें बहुत ज़्यादा पुख़्तगी होती है और जो रिश्ते फक़त माल और ज़ाहिरी चमक दमक की वजह से कीए गये उनके नताएज अक्सर व बेश्तर मिस्बत नहीं निकलते ।अगर इन तमाम उमूर पर नज़र कर ली जाए और उससे मुतालक़ा तक़रीबात को सादगी से अंजाम दिया जाए और तकल्लुफ से बचा जाए तो निकाह व शादी के बाद में आने वाली ज़िन्दगी में ख़ुशगवार असरात मुरत्तब हो सकते हैं, और निकाह और शादी के बाद आने वाली ज़िंदगी में पेचीदगियों और दुश्वारीयों से बचा जा सकता है ।।अगर आप पैसों के ज़रूरतमंद हों तो आप ज़कात के मुस्तहक़ है, जहेज़ के नहीं।मआशरा = समाजताख़ीर = देरीसबब = कारणजहेज़ = दहेजहर्ज = हानि, क्षतिक़बाहत = दोषइब्तिदा = प्रारंभिकइख्लाक़ = शिष्टाचारतरजीह = प्राथमिकताआरज़ी = अस्थायीदाईमी = स्थायीपुख़्तगी = परिपक्वता, दृढ़ता, मज़बूतीनताएज = परिणामबेश्तर = अधिकांशमिस्बत = सकारात्मकउमूर = कार्यसमूह, मसलेमुतालक़ा = संबंधिततक़रीबात = आयोजनमुरत्तब = संकलित, व्यवस्थितपेचीदगी = उलझावज़कात = दान, ख़ैरातमुस्तहक़ = हक़दार, योग्य होना

KARAM FAL

 सभी को नमस्कार, इस समय में आपको  जीवन में आने वाली  कुछ समस्याओं  के बारे में बात करूँगा क्या आपको किसी समय ऐसा महसूस होता है कि आप जो भी करना चाहते हैं वह नहीं कर पाते और जो नहीं करना चाहते या नहीं होना चाहिए वह जाने अनजाने में ना चाहते हुए भी हो जाता है इसके कई कारण हो सकते हैं आप सोचे तो आपके हिसाब से यह ग्रह गोचर, भाग्य दशा और उनके विभिन्न फल- फलादेश एवं आपके कर्म बंधन हो सकते हैं इन सब के समाधान  प्रत्येक  के / सब के हिसाब से अलग अलग हो सकते हैं किंतु फिर भी कुछ लोगों का यह विचार है कि हम अपने कर्मों का फल जो भी हो प्राप्त करते हैं . कर्म अच्छे भी हो सकते हैं कर्म  बुरे भी हो सकते हैं अच्छे कर्मों का फल अच्छा ही मिलता है और बुरे कर्मों का  बुरा फल भी हमको भोगना पड़ता है  मैं यदि किसी के मार्ग  में काँटे डालूंगा  तो यह निश्चित है कि  काँटे मुझे ही   तकलीफ पहुंचाएंगे .  जब भी में किसी के साथ अच्छा कर्म करूंगा या  भलाई  करूंगा तो निश्चित मानना कि यह  भलाई  भी मेरे साथ ही  बंध जाती है और इसका अच्छा फल भी मुझे ही प्राप्त होता है और यह मुझे भी नहीं मालूम कि वह सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा इसका फल मुझे कहां पर दे देता है यह भी मान्यता है कि यदि कोई भी  कर्म  बगैर  फल की प्राप्ति के लिए किया जाता है तो बंधन के रूप में हमारे साथ नहीं  बंधता और उसका अच्छा फल या    बुरा फल भी हमको नहीं प्राप्त होता इसी को भगवान श्री कृष्ण ने गीता में निष्काम कर्म की तरफ बढ़ने के लिए हम सब को मार्गदर्शित किया है .यह भी निश्चित है कि यदि कोई भी   कर्म किसी भी फल के लिए या किसी को परेशान करने के लिए किया जाता है तो वह हमको बंधन में   डालता है और इसको हमको अच्छे या बुरे रूप में भुगतना पड़ता है आज के समय में निष्काम कर्म के बारे में बहुत मुश्किल से ही सोचा जा सकता है क्योंकि इस  युग धर्म  के अनुसार हर  कर्म किसी न किसी भाव   या फल के लिए ही किया जाता है और यदि किसी देवता के,  देवी के चरणों में  या उनके मंदिर में भी  हम देखें तो सभी भक्त भगवान से कुछ ना कुछ मांगते हुए दिख जाते हैं और कई दफा तो हमको यह भी सुनने में मिल जाता है कि भक्त भगवान से व्यापारिक सौदेबाजी की तरह सौदा करता दिखाई देता है कि भगवान मेरा यह कार्य करो, मदद कर दो, यह करो ,वह करो, मैं वहां आऊंगा,  प्रसाद चढ़ा दूंगा ,   ब्राह्मणों को भोजन  करवा दूंगा  या इतने रुपए चढ़ा दूंगा इत्यादि इत्यादि. यह क्या है? क्या हम भगवान से भी सौदेबाजी करने से नहीं चूकते. जब भक्त की भावना भगवान के प्रति ऐसी हो जाती है तथा भक्तों की श्रद्धा भी  व्यापार -तोल-मोल हो जाती है तो देव मूर्ति भी भक्तों की प्रार्थना उसके हिसाब से ही सुनती है इसलिए हमारे यहां यह   भी कहा गया है कि जैसी रही भावना जैसी  प्रभु मूरत तिन देखी तैसी. क्या वह सर्वशक्तिमान हमारे धन का, रुपयों का  भूखा है बिल्कुल भी नहीं .यह सब श्रद्धा एवं भावना की बात होती है इसलिए हो सके तो  हमको हमारी इस व्यापारिक  सोच से मुक्त होकर ही देवालय में जाना चाहिए किंतु इसका कहीं भी यह मतलब नहीं है कि हम को अपनी देव प्रतिमा के प्रति श्रद्धा भक्ति को  प्रदर्शित नहीं करना चाहिए.  देवालय  में हम देव  प्रतिमा के समक्ष नमस्कार कर, प्रणाम कर, सिर झुका कर अपनी श्रद्धा और भक्ति दिखा सकते हैं फिर भी यही करनी चाहिए कि यदि हम किसी के साथ अच्छा न कर सके तो उसका बुरा भी नहीं करें क्योंकि यह निश्चित है कि बुराई का फल हम को भुगतना ही पड़ता है और यही बंधन है .  हम यह कह सकते हैं कि अच्छे या बुरे कर्म हमको बंधन में डालते हैं और उनका फल हमको निश्चित रूप से भुगतना पड़ता है इसलिए कई दफा हमारे चाहते हुए भी या न चाहते हुए भी वह कुछ घटित हो जाता है जिसकी उम्मीद हमको पहले से नहीं होती है क्योंकि यह हम नहीं जानते क्यों  और कैसे समय के चक्र के हिसाब से कौन सा अच्छा फल या बुरा फल हमको कब कहां और कैसे भुगतना पड़ जाए.  इसलिए कोशिश यही होनी चाहिए कि हम प्रत्येक कर्म बगैर किसी फल के,  निष्काम रुप से करें यदि कोई भी कर्म निष्काम रूप से भी नहीं कर पाए तो  हमारी भरसक कोशिश यही होनी चाहिए कि किसी दूसरे प्राणी मात्र के साथ हम किसी भी रूप में मन, कर्म, वचन से कोई भी बुरा कार्य नहीं करें क्योंकि यह परमपिता ही जानता है कि किस वक्त  उसने किस प्राणी को किस तरह  का फल  भुगतने का समय निश्चित किया हुआ है. यह मेरे निजी विचार हैं.इनको यहां तक पढ़ने के लिए आपका कोटि - कोटि धन्यवाद .

कौमार्य: एक मिथ

......कौमार्य: virginity........(एक सामाजिक जागरूकता संदेश)हम कल महिलाएं कौमार्य के बारे में चर्चा कर रहे थे और बहुत सारे लोग ये मानते हैं कि कोई लड़की कुंवारी है या नेहीँ ये उस लड़की को अपने पहले सेक्स के दौरान खून निकलता है या नेहीँ, उस से ही पता चलता है। लेकिन यह गलत है .. रक्तस्राव यह निर्धारित नहीं करता कि कोई लड़की कुंवारी है या नहीं, इसलिए मैंने इस लेख को जारी करने का फैसला किया है ताकि लड़कियों के इस मुद्दे पर हमारे युवा पुरुषों और महिलाओं को शिक्षित करने में मदद मिल सके .....क़ौमर्ज्य के बारे में मिथक-ज्यादातर महिलाको अपने पहले सेक्स के दौरान रक्तस्राव  क्यों होती। दक्षिण और मध्य एशिया (पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश, अफगानिस्तान इत्यादि) और अफ्रीका (नाइजीरिया और कई अन्य राष्ट्रों) में एक बहुत ही आम मिथक है की कोई महिला कुंवारी है या नेहीँ पहली सेक्स के दौरान  रक्तस्राव  हुआ कि नेहीँ इस आधार पर आप बता सकते हैं ,  ये बिल्कुल  सत्य नेहीँ है। पहली बार यौन  संबंध बनाने पर सभी महिलाको खून नहीं निकलति। ऐसा क्यों आइये समझते हैं।  यह समझने के लिए कि क्यों कुछ महिलाएं खून बहाती हैं और क्यों कुछ नहीं बहती हैं, यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि हाइमेन क्या है। हाइमेन एक झिल्ली है जो योनि खोलने के हिस्से को कवर करती है (यह हमेशा पूरे योनि को अवरुद्ध या कवर नहीं करती है, क्योंकि कुछ लोग गलती से सोचते हैं)।सभी महिलाओंका एक समान हाइमन नहीं होता है। हाईमेन भी महिला से महिला से अलग होता है - जैसे कि सभी महिलाओं की अलग-अलग ऊंचाई और वजन और फीचर्स होते हैं, सभी महिलाओं के पास अलग-अलग प्रकार के हाइमेन होते हैं। कुछ महिलाओं में मोटी टाइप  होते हैं, कुछ में बहुत पतले टाइप  होते हैं, और कुछ महिलाओं में कोई हाइमेन नहीं होता है। कुछ महिलाओं में बड़े होते हैं, कुछ महिलाओं में स्वाभाविक रूप से बहुत कम मात्रा में हाइमेन होता है जो उनके योनि खोलने के केवल एक छोटे हिस्से को कवर करता है (और इसलिए वास्तव में पहली बार सेक्स के दौरान, रास्ते में नहीं मिलता है)। इसके अलावा, जब आप बड़े होते हैं तो हाइमेन अपने आप नस्ट हो सकता हैं। अधिकांश महिलाओं के लिए, हाइमेन व्यायाम, साइकिल चलाना, घुड़सवारी के साथ अपने आप नस्ट हो सकता हैं - बहुत अधिक शारीरिक गतिविधि, यहां तक कि नाचने के साथ भी नस्ट हो सकते हैं! - या मासिक धर्म के दौरान टैम्पन का उपयोग करने से भी। विशेष रूप से यदि हाइमेन बहुत छोटा या पतला होता है, तो इसमें से अधिकांश एक लड़की के ग्रोथ के साथ साथ में खुद ब खुद नस्ट होने लगती है। अगर एक महिला एक हाइमेन के बिना पैदा होती है, तो वह पहली बार यौन संबंध के समय खून नेहीँ बहती।  अगर एक औरत के पास छोटे या पतले हामेन होते हैं, तो वह भी पहली बार यौन संबंध के टाइम खून नेहीँ बहती है। अगर एक महिला के हाइमेन अपने आप नस्ट हो जाती है  (जो लड़कियां बड़े होने के समान ही आम हैं), तो वह भी नेहीँ । नतीजा यह है कि ब्रिटेन मेडिकल जर्नल द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, कम से कम 63% महिलाएं यौन संबंध के समय खून नेहीँ बहती। जो महिलाएं खून बहती हैं उनमें शामिल हैं: - मोटी भजन वाली महिलाएं (जो आबादी का एक छोटा प्रतिशत बनती हैं) - छोटी लड़कियां। क्योंकि हाइमैन समय के साथ अपने आप नस्ट हो सकते हैं। 16 वर्षीय महिला के पास 25 वर्षीय की तुलना में खून बहने का अधिक मौका होता है। जब तक एक लड़की सहमति की कानूनी आयु से ऊपर या उससे अधिक हो - 18, 20, 24 वर्ष की आयु, उदाहरण के लिए - उसके अधिकांश हाइमेन अपने आप से नस्ट होने  की संभावना है, जिसका अर्थ यह है कि वह  खून बहने की संभाबना कम होता है।  अक्सर, जो महिलाएं खून बहती हैं वे ऐसी महिलाएं होती हैं जिन्हें सेक्स के दौरान दर्द से गुजरना पड़ताहै।  अगर  लड़की के अंदर दर, असहज, उत्तेजित न होना ऐसे हालात होता है  तो  चोट लगने से खून बहने की संभावना है। चूंकि ज्यादातर लोग सोचते हैं कि पहली बार महिलाओं के यौन संबंध होने पर महिलाओं के लिए खून बहना जरूरी है, उन्हें यह नहीं पता कि यह खून किसलिए है,  है कि महिला को चोट लगी है, या  न कि हाइमैन तोड़ने के कारण। ज्यादातर मामलों में चोट ही कारण है।   महिला कौमार्य का आकलन करने का कोई तरीका नहीं है। रक्तस्राव में कौमार्य के साथ कुछ भी संबंध नहीं है -हाइमेन के प्रकार पे डिपेंड करता है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, पहली बार सेक्स के दौरान केवल 37% खून बहती है। यह जानना इतना महत्वपूर्ण क्यों है? दुनिया भर में महिलाएं 'कुंवारी खून बहने की मिथक के कारण दुर्व्यवहार, घायल और यहां तक कि मारे गए .. क्योंकि ज्यादातर लोग (पुरुष और महिलाएं) सोचते हैं कि खून बहना कौमार्य का संकेत है, जो महिलाएं पहली बार खून नहीं बहती वे  तलाक, घरेलू हिंसा और संदेह से पीड़ित होते हैं, और यहां तक कि सम्मान के लिए भी मारे गये है।लोगों को ये शिक्षित करना है  कि लड़की को पहली बार यौन संबंध रखने से  खून बहना जरूरी नेहीँ है  - क्योंकि सभी लड़कियों में मोटी हाइमेन नहीं होते हैं, और कुछ हाइमेन जन्म के बिना पैदा भी होते हैं - यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सचमुच जीवन को बचा सकता है। कृपया समझे और समझाये।Source: Bannu institute of medical sciencesRajabala

लिल्लीथ की कहानी

*लिलीथ की कहानी*एक लंबे समय पहले मुझे लिलीथ की इस कहानी को पढ़ने का मौका मिली थी। मेरे लिए वह एकमात्र विद्रोही पौराणिक नारी चरित्र है।.........................................................................पारंपरिक बाइबिल कई धार्मिक फिल्टरों से गुजर चुका है और यह कुछ महत्वपूर्ण वर्गों और टुकड़ों को भी खो दिया है। हालांकि, इसमें एक हिस्सा है जो इसमें छोड़ा गया है जो बताता है कि ईश्वर ने मनुष्य सृष्टिके पहले मुहुर्त में न केवल एक आदमी बल्कि एक महिला को बनाया है। कहा जाता है कि ओ  लिलिथ थी दुनिया की पहली महिला और उसे   भगवान ने उसी मिट्टी से बनाया था जिस मिट्टी से  उसने आदम को बनाया था। ऐसा कहा जाता है कि लिलिथ को तब भगवान ने त्याग दिया और खारिज कर दिया जब यह पाया गया कि वह आदम से मजबूत और अधिक बुद्धिमान है  और वह आदम के आदेशों का पालन नहीं कर रही थी। मानवता की उत्पत्ति को समझने के लिए बाइबिल में इस चरित्र का उल्लेख नहीं किया गया था क्योंकि लिलीथ  चर्च की परंपरा के खिलाफ थी जो कहता है कि महिलाओं को पुरुषों को मानना होगा और उनके स्तिति  पुरुषों की तुलना में कम   होना चाहिए। लिलिथ एक ऐसी महिला थी  जो दृढ़ थी, और वह बुद्धिमान थी और आदम से बेहतर  थी। हालांकि, आदम के चरित्र अधिक प्रभावशाली था। अंतरंगता के समय में, लिलीथ ने मांग कि ओ आदम के ऊपर  हो सकती है, लेकिन आदम ने इनकार कर दिया। ऐसा कहा जाता था कि एहि सुरुवात थी झगड़े का। इसलिए दोनों को अलग किया था और  भगवान द्वारा लिलिथ पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। किताब कहती है, लिलिथ: "मुझे तुम्हारे नीचे क्यों होना  चाहिए?  मुझे भी उसि मिट्टी से बनाया गया है जिस में तुम बने हो,  और इसलिए मैं तुम्हारा बराबर हूं।" पर आदम ने नेहीँ मानी और  जैसे ही  ने उसे आज्ञा मानने के लिए मजबूर करने की कोशिश की, लिलिथ ने गुस्सा किया, भगवान के नाम का उच्चारण किया, और छोड़ कर चालि गयी।  उसके बाद ईस्वर ने इव  को आदम की पसलियों से बनाया  था। लिलीथ की चरित्र को बाइबल से सेंसर किए गया  क्योंकि उसने महिलाओं को सशक्तिकरण के विचार देती है। लेकिन अगर लिलीथ चले गए, तो बड़ा सवाल यह है कि वह कहाँ गई थी? यह कहा गया है कि  कि वह सीधे शैतान की बाहों में भाग गई। लिलीथ पहली महिला थी, इव से पहले, लेकिन वह अधिक बुद्धिमान और विद्रोही थी और मनुष्य की तुलना में एक बेहतर चरित्र थी, इसलिए उसे दंडित किया गया और उसकी गाथा बाइबल से काट दिया गया ।.................................................. ..........................यह लिलीथ की दुखद कहानी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, हम ईव के वंशज है लिलीथ के नहीं । सायेद इस लिए  किसी भी असमानता के खिलाफ हमारी आवाज उठाना इतना  सहज नहीं होता है। एक राशनलिस्ट होने के नाते मैं जीवन की पौराणिक उत्पत्ति में विश्वास नहीं करति हूं, फिर भी यदि मुझे चयन करने को कहा जाए, निश्चित रूप से में अपने  पूर्बज के रूप में  रूप में इव के बजाय लिलीथ का चयन करूंगी।Rajabala

राजनीति में चुनाव और चुनाव की राजनीति ...!! _ तारकेश कुमार ओझा
 27 March 2019  
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कद्दावर नेता के निधन की सूचना ऐसे समय आई जब समूचा देश चुनावी तपिश मेंतप रहा था। काल कवलित नेता की प्रोफाइल चीजों को अलग नजरिए से देखने कीसीख दी गई। शिक्षा - दीक्षा ऐसी थी कि राजनीति से दूर रहते हुए ऐशो -आराम की जिंदगी जी सकते थे। लेकिन लीक से हट कर उन्होंने राजनीति कोकर्मक्षेत्र बनाया तो जरूर कुछ सोच कर। चुनाव के चलते राजनीति का हेवीडोज दिमाग में घुस रहा है। चौक - चौराहों से लेकर हर कहीं बस चुनाव की हीचर्चा। वाकई हमारे देश की राजनीति विरोधाभासों से भरी है। बातचीत मेंराजनीति या चुनाव की चर्चा होते ही लोग मुंह बिचकाते हुए बोल पड़ते हैं... अरे छोड़िए ... सब धंधेबाज हैं...। लेकिन छुटभैया नेता से भी सामनाहोते ही आत्मिक अभिवादन तय। मतदान की बात आई तो जवाबी आश्वासन ... वोट तोआपकी पार्टी को ही देंगे... यह भी कोई पूछने वाली बात है। उम्मीदवार तोछोड़िए उनके चंपुओं के बैठकखानों में भी अच्छी - खासी भीड़ नजर आती है।ज्यादातर फरियादी ही दिखाई देते हैं। खादी पहने शख्स हर किसी की बातविनम्रतापूर्वक सुन रहा है...। मानो किसी को भी नाराज नहीं करने की भीष्मप्रतिक्षा कर रखी हो। इस बीच भीतर से प्लेट निकला जिसमें दर्जनोंमिठाइयां रखी हुई हैं। नेताजी निर्देश देते हैं कि कोई भी मीठा के साथपानी पीने से वंचित न रह जाए। थोड़ी देर में काली चाय भी आ जाती है।नेताजी विनम्रतापूर्वक कहते हैं... भैया इसी से काम चलाइए ...। दूध वालीचाय पिलाने की हमारी औकात नहीं है। हम कोई बड़े लोग थोड़े हैं... बस जनताकी सेवा का नशा है। अपने देश में सच्चाई है कि मौका चुनाव का हो तोबेचारे उम्मीदवार सबसे सीधी गाय बन जाते हैं। जिसकी इच्छा हो दुह ले...।नेताजी को ठगे जाने का बखूबी अहसास है। लेकिन हंसते हुए सब कुछ सह रहेहैं। बकौती में कोई सीमा पार कर रहा है लेकिन जनाब शालीनता से सब कुछबर्दाश्त कर रहे हैं। यह सब देख  मैं सोच में पड़ गया कि क्या वाकईराजनीति और इससे जुड़े सारे लोग बहुत ही  बुरे हैं। इनमें लेशमात्र भीअच्छाई नहीं है। फिर क्यों लोग इनके सामने सिर झुकाते हैं। मैने कई ऐसेजनप्रतिनिधियों को देखा है जो औसतन 16 से 18 घंटे काम करते हैं। उन्हेंदेख कर अनायास ही ख्याल आता  है  ठंडे कमरों में कुर्सियों  पर पसरे  उनसरकारी बाबुओं व कर्मचारियों का जो महज इस बात से बिफर पड़ते हैं कि किसीने उनके सामने खड़ा होकर उनके अखबार पढ़ने या मोबाइल पर चैटिंग  का मजाकिरकिरा कर दिया। जबकि  तनख्वाह हजारों में पाते हैं। हर पांच साल मेंजनता की चौखट पर मत्था टेकने की कोई मजबूरी उनके सामने नहीं है। करोड़ोंमें बना पुल भले ताश के पत्तों की  भरभरा कर  गिर जाए लेकिन क्या मजाल किकायदे का कोई भी काम बगैर मीन -मेख निकाले आगे  बढ़ा दे।  सरकारी अस्पतालमें मरीज बाथरुम में औंधे मुंह गिरा पड़ा है, लेकिन शोर मचने के बावजूदअस्पताल के कर्मचारी अपने में मस्त हैं कि गिरे को उठाना हमारा काम थोड़ेहैं। मेरे शहर में संगठित अपराध के गिरोह ने करोड़ों के वारे - न्यारेकिए। कालचक्र में गिरोह की कमर टूट गई। कईयों को जेल जाना पड़ा। कई अच्छे- भले लोगों पर बदनामी के कीचड़ उछले। लेकिन काली कमाई की आधी मलाई खानेवाले  सरकारी अधिकारी, कर्मचारी और पुलिस का बाल भी बांका नहीं हुआ।चुनाव या राजनीति से आप निराश हो सकते हैं ... राजनेताओं को गालियां भीदे सकते हैं। लेकिन इसकी कुछ अच्छाइयों को नजरअंदाज करना भी गलत होगा।सामान्य वर्ग के कई नेताओं पर खास वर्ग को जरूरत से ज्यादा महत्व देने काआरोप लगता है तो एक मायने में यह सुखद ही है कि वोटों की खातिर ही सहीलेकिन कोई  उपेक्षित तबके का ख्याल तो रख रहा है। अल्पसंख्यक समुदाय केएक ऐसे नेता को जानता हूं कि जिसके क्षेत्र में बहुसंख्यक - अल्पसंख्यकहैं। वो खुद भी अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। लेकिन रक्षाबंधन के दिन  हाथोंमें राखियां सजा कर वो नेता अपने क्षेत्र  के हर हिंंदू के घर जा धमकाताहै और शिकायती लहजे में कहता है कि क्या इस भाई की कलाई में राखी नहींसजेगी।  फिर लगातार कई दिनों तक राखियां उसकी कलाई पर बंधी नजर आती है।यह भी राजनीति और चुनाव का करिश्मा है जो एक अदने से नेता को इतना उदारबनने को मजबूर कर सकता है। लिहाजा हम चुनाव या राजनीति की बुराइयों कीजरूर आलोचना करें, लेकिन इसकी अच्छाइयों की ओर ध्यान देना भी जरूरी है।इसके कई सकारात्मक पक्ष भी हैं....।