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"शरीर में तैंतीस देबताहैं।"
 22 November 2018  

शरीर मन्दिर में मुख्य देबता आत्माराम है।स्तूल पंच भूत_ अग्नि, वायु जल, आकाश पृथ्वी यह स्थूल पंच भूत में शरीर गढा है। सूक्ष्म पंच महा भूत मुलाधार-पृथ्वी तत्व स्वाधिष्ठान जल तत्व , मणिपुर- अग्नि तत्व, अनाहत_ वायु तत्व , विशुद्ध - आकाश तत्व- ये दस देबताऍ है।शरीर में दस वायु है। _मुख्य वायु पांच _ प्राण , अपना, ब्यान, उदान, समानगौण वायु - नाग, कुम॔ , देबदत्त, धनंजय, कृकलये बीस होगए।दस इन्द्रियाँ है। -मुख्य दो आँख, दो कान , जीभ और त्वचा। नाक ज्ञानेन्द्रिय यह पांच है।कम॔न्द्रीय- पांच - दो हाथ में इन्द्र दोनों पाँव में- बिष्णु,मल द्वार, उपस्त बाक् शक्ति हो गये 30।31_ मन_ राम,32- बुद्धि _ सरस्वती,33- अहंकार _ शिवआत्मा राम इस सभीको सजाके अन्दर में बैठी हैइसलिए शरीर को देवालय बोला जाता है।शरीर में दस वायु है।हमारा शरीर एक मंदिर है। इस शरीर में 33 गोटिदेबता है। यों सात समुन्दर, सात पर्वत सात ॠषियों सब के सब बैठे हैं।हमारा ये दोनों कान, दाहिने गौतम और बाएँ भरद्वाज ॠषि बैठे हैं। ये दोनों ऑखे दाहिने बिश्वमित्र बाऍ जमदाग्नी है। ये दोनों नाक के छिद्र दाहिने वशिष्ठ बाऍ कश्यप हुऍ है। जो ब्रह्म को कथा सुनाते हैं और खाते हैं। जिस प्रकार कथा जिह्वा से होती है भोजन भी जिह्वा से होती है और संस्कृत में जो खाता है उसे अत्रि भी कहते हैं। इस प्रकार जो बिश्वासकरता है, वह सब भोजनो का करने का अधिकार हो जाता है। सब भोग उसे मिलते हैं।

थोड़ा पहचानता हूँ
 17 October 2018  
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मैं ये नही कहता की, मैं तुमको, तुमसे ज़्यादा जानता हूँ |बस ये कितने मुश्किल हालात है, इन हालात को थोड़ा पहचानता हूँ ||पहले दिल के किसी हिस्से को, किसी और मे यूँ खो देना |अब उस खोए दिल को, खुद की तन्हाई मे ढूँढना ||पहले दिल की सारी बातों को बेखौफ़ होकर बोलना |अब वो बातें कहने के लिये, तन्हाई मे उसका चेहरा टॅंटोलॅना ||मैं बस ये बाते जानता हूँ, तेरी तन्हाई नही जानता हूँ |लेकिन किसी टूटे दिल की तन्हाई है, इसलिये थोड़ा पहचानता हूँ ||1||पहले उसकी हर बात और आदत को भी समझ लेना |और अब उस कहानी को सोच कर, बेवजह रो देना ||तब हर छोटी बात को, सपनो के रंग मे रंग देना |अब उन बिखरे रंगो मे, अपने सपनो को खो देना ||मैं बस ये बाते जानता हूँ, तेरी कहानी नही जानता हूँ |लेकिन किसी अधूरे इश्क़ की कहानी है, इसलिये थोड़ा पहचानता हूँ ||2||– धीरज सारड़ा

नारी
 13 October 2018  
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पतित हो तुम पावन हो तुम ,एक पुत्र की माता हो तुम !सक्ति हो तुम सामर्थ हो तुम ,एक पुरूष की भार्या हो तुम !शीतल हो तुम निर्मल हो तुम ,एक भ्राता की अनुजा हो तुम !चंचल हो तुम सुन्दर हो तुम ,एक जनक की तनुजा हो तुम !मेरी ये पंक्तियाँ नारी और पुरुष के उन विषेश चार संबंधों को दर्शाती हैं जिसमें नारी तो एक ही है पर अपने इन अलग-अलग संबंधों में पुरूष को क्या क्या रूप दिखाया है एक पुत्र के लिये माँ से पावन दूसरी कोई नारी नहीं , एक पुरूष को उसकी पत्नी से ही वह सक्ति और सामर्थ प्राप्त होता है जिससे वह अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते हुये संसार सागर को पार करता है , एक भाई के लिये उसकी बहन का गुस्सा भी सीतल और निर्मल छाँव की तरह होता है क्यों की वह उसकी एक सच्ची दोस्त की तरह होती है खुद तो डाँट लेती है पर उसकी छोटी मोटी गलती को माता पिता से छुपा लेती है , एक पिता के लिये उसकी बेटी मन से भी चंचल और फूलों से भी सुन्दर होती है इस लिये एक पिता को संसार की सारी चंचलता और सुंदरता अपनी बेटी में ही दिखती है !!

पत्थर के फूल
 11 October 2018  
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वह एक फूल ही तो था , छोटे-छोटेनन्हे-नन्हे हाथ थे उसके ठुमक-ठुमककर चलता था , तोतली भाषा बोलताथा , कितना प्यारा था गोल मटोल सा ,अभी 3 साल का ही तो हुआ था ! गरीबमां बाप का वही तो एक लाडला था !प्यार से उसको कृष्णा बुलाते थे उसकेमाँ बाप , आवाज लगाते ही अपनेनन्हे-नन्हे कदमों से दौड़ा चला आताथा ! और आकर अपनी माँ के सीने सेलिपट जाता था ! यूँ ही वक्त गुजरतारहा , गरीब माँ बाप का फूल सा बेटाधीरे-धीरे बढ़ता रहा , कब वह 11 सालका हुआ पता ही ना लगा , सरकारीस्कूल में पढ़ता था , और अपने हीबचपन में मगन रहता था , इसी दौरानगरीबी और लाचारी के कारण बीमारहुए पिता को इलाज के लिए सरकारीअस्पताल में दम तोड़ना पड़ा ! यहीं सेबदल गई उस नन्हे से फूल की किस्मत ,भूख और लाचारी के कारण हाथ मेंमजदूरी का लोहा पकड़ना पड़ा ! औरबाकी सभी फूलों की तरह इस फूल कोभी पत्थर का बनना पड़ा !!

पिंजरा
 29 September 2018  
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एक बहुत भोली, मासूम और प्यारी चिड़िया थी। नित नव गगन में नई-नई ऊंचाई को चूमा करती थी। फिर एक दिन उसे एक इंसान से प्यार हो गया। वो उस इंसान से मिलने रोज आती और वो इंसान भी उससे मिलकर बहुत खुश होता और कहता के चिड़िया तुम बहुत प्यारी हो, मैने आज तक तुम्हारे जैसी प्यारी चिड़िया कहीं नही देखी। फिर एक दिन उस इंसान ने उस चिड़िया को अपने साथ चलने को कहा, वो बोला के तुम मेरे साथ मेरे घर में रहो, मैं तुम्हारा पूरा ख्याल रखूँगा और फिर हम हमेशा साथ रहेंगे और हम एक-दूसरे के साथ ज्यादा वक्त भी बीता सकेंगे। चिड़िया खुशी-खुशी उसके साथ चलने को राजी हो गयी और दोनो इंसान के घर की ओर चल दिए।चिड़िया ने देखा के इंसान का घर छोटा सा मगर बहुत सुंदर और प्यारा था। उसके घर में बहुत सुंदर और रंग-बिरंगे फूलो से भरा एक बगीचा था। वो बगीचा बहुत खूबसूरत था, उस बगीचे को देख चिड़िया आनंद विभोर हो उठी। कुछ दिन वो इंसान और चिड़िया एक-दूसरे के साथ खूब वक्त बिताते, बाते करते, घूमते-फिरते और एक-दूसरे के संग अपार सुख का अनुभव करते। फिर एक दिन इंसान को अपने काम पर लौटना था तो वो चिड़िया के लिए एक खूबसूरत सा पिंजरा ले आया। चिड़िया ने उसे देखकर पूछा के यह क्या है? इंसान बोला के मैं तो सारा दिन काम के सिलसिले में बाहर रहूँगा तो तुम इसमें रहोगी तो तुम सुरक्षित रह सकोगी और मैं भी चिंता मुक्त हो अपना ध्यान काम पर केंद्रित कर सकूँगा। इंसान की बातो में आकर चिड़िया उस पिंजरे में चली गई और इंसान उसमे दाना-पानी रखकर उसे पेड़ की शाख पर टांग कर अपने काम पर चला गया। चिड़िया दिनभर इंसान के लौटने का इंतजार करती रही। शाम को इंसान थकान हारा घर आकर सो गया। चिड़िया बहुत दुखी हुई पर उसने इंसान की हालत समझते हुए कुछ न कहा। चिड़िया को लगा के इंसान पहले कभी किसी चिड़िया के साथ नही रहा इसलिए समझ नही है अभी के चिड़िया को कैसे रखते है, उसकी क्या जरूरत होती है, पर मेरे साथ रहते-रहते सब समझ आ जाएगा। दिन बीतते गए, इंसान अपने काम, नाते-रिश्ते और दोस्तो में व्यस्त हो गया और चिड़िया की तरफ बिल्कुल ध्यान न देता। बस सुबह पिंजरे में दाना पानी रख जाता और चिड़िया का एक पर ले जाता बेचने के लिए।चिड़िया बहुत दुखी रहने लगी उसने इंसान को बोला के अगर तुम्हे मेरी परवाह नही, मेरे साथ वक्त नही बीता सकते तो मुझे जाने दो यहां से, इस पिंजरे में तो मैं ठीक से अपने पंख भी नही पसार सकती तो उड़ना तो दूर की बात है। इंसान बोला क्या कमी है तुम्हे, आराम से खाने को मिल रहा है, रहने को मिल रहा है, क्या चाहती हो बस तुम्हारे आगे पीछे घूमता रहूं अपना जीवन न जीउं। चिड़िया भगवान से अपनी आजादी की फरियाद करती। एक दिन इंसान के घर में एक जंगली बिल्ली घूस आयी। उस बिल्ली को चिड़िया को लगा के आज उसे इस पिंजरे से आजादी मिल जाएगी।बिल्ली पिंजरे की ओर लपकी और पिंजरा जमीन पर गिर गया। चिड़िया के छोटे-छोटे पर हवा में इधर-उधर तैरने लगे। शाम को जब इंसान वापस आया तो उसने जमीन पर पड़े हुए पिंजरे, पर और खून देखकर बहुत दुखी हुआ। उसने पिंजरा उठाया सब साफ किया।अगले दिन उसने एक नई चिड़िया को लाकर उस पिंजरे में रख दिया।

मोहब्बत
 24 September 2018  

जमाना अड़ कर खड़ा हुआ सदा प्यार की राहो मेंतू छोड़ न देना साथ मेरा आकर उनकी बातो मेंउल्फत भरी राहो में हाथ न मेरा छोड़ देनाजमाने ने अपने गुरूर में बहुत प्यार दफनाए हैजलाए है, कुचले है और नामो निशान मिटाए हैतू डर कर इनकी करनी से मुँह न मुझसे मोड़ लेनाभटकती राहो में तू गुम न हो जानाआंधी-तूफान और पर्वत से भी मैं लड़ जाऊँगीगर छोड़ दिया तूने दामन फिर न मैं जी पाऊँगीजीवन-मरण अब सब मेरा मैने तेरे हाथो सौंपा हैमर्ज़ी तेरी अब कहाँ मुझे ले जाना हैमैने तो संग तेरे अब पग-पग पर चलना हैवादा है मेरा तुझसे चाहे मुश्किल हो जितनी डगरअकेला न खुद को कभी पाओगे मगररंग में अब तो मुझको तेरे ही रंगना हैसाथ तेरे अब उम्रभर मुझको चलना हैफना खुद को अब मुहब्बत में तेरी करना हैवादे किए जो तुझसे उन्हे मर कर भी निभाएंगेडर-डर कर इस जमाने से अब न हम जीएंगेजाते-जाते भी दुनिया से, मोहब्बत का नाम अमर कर जाएँगेआग के इस दरिया में डूब कर भी हम जी जाएँगेदास्ताने मोहब्बत एक खूबसूरत सी लिखेंगेपैगामें मोहब्बत जमाने पर लिखेंगेमोहब्बत, मोहब्बत बस मोहब्बत करेंगे

Aakhiri khwahish
 21 September 2018  
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शीर्षक .........'आखिरी ख्वाहिश 'दिनेश ने दोनों बहिनो को फोन कर दिया था कि माँ अब इस दुनियां में नहीं रहीं lअचानक हृदय घात से उनकी मृत्यु हो गयी है lयह सुनकर दोनों बहिने लीला और कमला सुन्न रह गयीं क्योंकि अभी पंद्रह मिनट पहले ही तो माँ से बात हुई थी उन्होंने बताया था कि चाँद को जल चढ़ा दिया है हालांकि बादल छाए हुए थे इसलिए चाँद दिखाई नहीं दे रहा था इसलिए माँ तीन मंजिल की छतपर बैठकर बहुत देर तक इन्तजार करती रहीं जब चाँद दिखाई दे गया तभी उन्हौने जल चढ़ा कर पति के हाथ से पानी पीकर व्रत को तोड़ा था lजिंदगी के नब्बे बसंत देख चुकी माँ को करवाचौथ का बेसब्री से इन्तजार जो रहता था lपिताजी बच्चों के सामने पानी पिलाने से हिचकते थे व्रत खुलवाने के लिए तो वह झट से कहतीं कि बच्चे तो उनके विवाह के बाद हुए हैं lघर में सब रो बिलख रहे थे l भरा पूरा परिवार हाथों हाथ रखता था उनको lलतीनों बहुओं का रो रोकर बुरा हाल था lलछोटी बहु को सुबह की बात याद आ गयी l कैसे आज माँ ने बक्से से आज सुबह अपने विवाह की साड़ी निकलवाई , प्रेस कराई और खुद ही रात को करवा चौथ के लिए तैयार हुई lमृत्यु शैया पर दुल्हन की भांति सजी हुई लेटी थी lजब सब उनको कफ़न पहनाने लगे तो तीनों बहुये एक स्वर में बोलीं ,"माँ जी को इसी साड़ी में ले जाइये ,यह उनकी आख़िरी ख्वाहिश थी आज सुबह ही तो कह रहीं थी कि मुझे मेरी अंतिम समय पर यही साड़ी पहनाना l"सभी फफक कर रो पड़े माँ जी ने खुद ही आख़िरी ख्वाहिश पूरी जो कर ली थी lलेखिका .....राशि सिंह मुरादाबाद उत्तर प्रदेश (अप्रकाशित एवं मौलिक लघुकथा )

राजनैतिक प्रदूषण
 18 September 2018  
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एक साल में मूलत: चार मौसम बदलते बचपन से देखा है। प्रजातंत्र की देन से हर पांच साल में चुनाव का मौसम भी आता है। किसी राजनैतिक उथल पुथल के कारण कभी कभी यह मौसम मध्यावधि के रूप में भी आ टपकता है।तो चलिए 2019 में चुनाव का होना तय है और पांच सालों में सुसुप्त पड़े तमाम छुट भैय्या और आदम कद नेता अचानक ज्वालामुखी से फट कर इस संविधान सृजनित मौसम का शंखनाद देना प्रारंभ कर चुके हैं। सत्ताधीश अपने कार्यकाल को जस्टिफाई करते दिख रहे हैं और विपक्ष सत्ता पक्ष को नकारा साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहा है।अचानक जिस काले धन को मोदी साहब पिछले पांच सालों से खोज रहे थे और तमाम यत्न के बाद भी सरकारी खजाने में नहीं ला पाए चुनाव प्रचार के दौरान सड़क पर आ गया है। दिग्गज नेता यदि शहर भ्रमण पर हो तो पूरा शहर उनके पोस्टरों से पाटने का दृश्य आम होने लगा है।अभी 16 सितंबर को राहुल गांधी भोपाल आये। यूं लगा की जैसे आज ही यह फैसला हो जाएगा कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस आयेगी और जिस पन्नी को कई राज्यों में बैन कर दिया गया है उनमे से एक मध्य प्रदेश भी है उसी पर कांग्रेस का प्रचार कर खूबसूरत फिजा को झंडी और आदमकद पोस्टरों से पाट दिया गया। क्यों भाई क्या आम जनता ने राहुल गांधी का चेहरा नहीं देखा ?? फिर किसी भी राजनैतिक दल को क़ानून अपने हाथ में लेने की इजाजत किसने दी? यदि पन्नी पर प्रतिबन्ध है तो आपने यह राजनैतिक प्रचार में कैसे इस्तेमाल की? आपको किसने इजाजत दी कि खूबसूरत ताल तल्लैय्यों, पार्कों और साफ़ सुथरी सड़कों पर सार्वजनिक स्थानों का दुरूपयोग कर टेंट लगा कर काम के समय सड़कों पर प्रायोजित भीड़ जुटा कर शहर की रफ़्तार को धीमा या कुछ घंटों के लिए बंद कर दें??अब सभी राजनैतिक दलों से यह स्पष्टत: कहने का वक्त आ गया है कि यह कृत्रिम प्रचार से चुनाव नहीं जीते जाते। बंद कीजिए राजनैतिक कचडा फैलाने का काम। यदि आपने बीते पांच साल में कुछ भी किया है जो जनता के लिए और इस देश के लिए था तो जनता आपको चुनेगी।लोग साक्षरता से परे शिक्षा की अलख से लबरेज होने लगे हैं आप उन न्यूज चैनलों की टी आर पी देख लीजिये जो रात दिन केवल पेड़ न्यूज चलाते आ रहे हैं और जिनका हमारी आम जिन्दगी से कोई लेना देना नहीं है। मुझे औरों का पता नहीं किन्तु कम से कम मैंने तो न्यूज चैनल देखना छोड़ दिया है।आप सभी से गुजारिश है कि हो सके तो कम से कम अपने आगे पीछे और दाए-बाये खड़े व्यक्ति को इस राजनैतिक प्रदूषण को स्वीकार नहीं करने की हिदायत दे। और वर्तमान सरकार के तमाम जिम्मेदार विभाग इस पन्नी जनित प्रदूषण का विधि सम्मत विरोध करें। तमाम दल यदि अपना प्रचार करें तो नियत हाल/मैदान में बिलकुल सादगी से करें और इसके लिए वही समय चुने जिस दिन अवकाश हो या शहर/गाँव की दैनिक गतिविधियाँ प्रभावित ना हो।नेताओं का विदेश भ्रमण आम है। कम से कम यह एक अच्छी संस्कृति और प्रचलन तो वहां से सीख आए होते। आयकर विभाग कृपया वास्तविक चुनावी खर्चे और घोषित खर्चे का हिसाब रक्खे। समय आने पर हम यह हिसाब पूछेंगे। इस बार नीरव मोदी या मेहुल चौकसे जैसी चूक नही  होनी चाहिए। जिम्मेदार हो तो जिम्मेदार बनो, यह देश है पांच साल के लिए खैरात में लिखी जाने वाली विरासत नहीं। सत्तर साल विकास के लिए कम नहीं होते। प्रमाणित करो वरना हटो। प्रदूषण मत फैलाओ।