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कब रुकेगा सिलसिला ये कन्या भ्रूण हत्या का?
 1 October 2020  

सदियां बीत गयी लेकिन अगर कुछ नहीं बदला तो वो है स्त्री के अस्तित्व की लड़ाई। सदियों से स्त्री की भोग विलास की वस्तु समझते आ रहें हैं , हालांकि बहुत सी वीरांगनाओं ने अपनी प्रतिभा से खुद को साबित किया है। अपने अस्तित्व के साथ सभी नारियों के अस्तित्व की रक्षा की है परन्तु वर्तमान में तो हालात बद से बद्तर हो चले हैं। अब तो कन्या भ्रूण हत्या का नया चलन चल गया है। आजकल तो लोग अत्याधुनिक वैज्ञानिक तकनीक से कोख में पल रहे बच्चे का लिंग पता करवा लेते हैं और उन्हें जैसे ही पता चलता है कि उनके होने वाले बच्चे का लिंग स्त्रीलिंग है तो वो उसे कोख में ही मार देते हैं। गर्भावस्था की चिकित्सा समाप्ति पर भारत में 1971 में निश्चित शर्तो के साथ प्रतिबंध लगा दिया गया था और अभी हाल में ही 1971 के गर्भावस्था समाप्ति के कानून के संसोधन की भी मंजूरी दी गई है। खास बात ये है कि इतना सबकुछ होने के बाद भी कन्या भ्रूण हत्या का धंधा जोरों पर है। सारे डाॅक्टर अपने अस्पताल में मोटे अक्षरों में लिखवाकर रखते हैं कि उनके यहां लिंग की जांच कराना मना है लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। आज भी कई अस्पतालों में धड़ल्ले से लिंग की जांच के साथ कन्या भ्रूण हत्यायें हो रही हैं। मैं खुद गवाह हूं इस घिनौनी सच्चाई की।कई बार देखा है अपने आसपास इस घिनौने कृत्य को होते हुए। कई बार कोशिश भी की विरोध में आवाज उठाने की और उठाई भी मगर समाज के कुछ बड़े लोगों ने अपनी पहुंच से मेरी आवाज़ दबा दी परन्तु मेरे प्रयासों में कभी कमी नहीं आयेगी। मेरी एक सहेली ने मुझे बताया कि उसके चाचा के एक लड़की थी और दूसरा बच्चा उन्हें लड़का चाहिए था जिसके लिए उन्होंने लगातार 3 कन्या भ्रूण हत्यायें की 😭 और आखिर में हारकर अस्पताल में बच्चा बदल लिया। मुझे ये सुनकर तब ज्यादा हैरानी हुई जब पता चला कि इन सब कुकृत्यों में बच्चे की मां की सहमति ज्यादा थी। इस घटना के कुछ दिन बाद ही उसने मुझे बताया कि उसके छोटे चाचा ने भी वहीं घटनाक्रम दोहराया 😡। मैं स्तब्ध थी कि ये सब हो करता रहा है । फिर हम दोनों ने मिलकर उस डॉक्टर का पता लगाने की बहुत कोशिश की ताकि हम उसके खिलाफ कार्रवाई करवा सके।हम इस कार्य में सफल होने ही वाले थे कि हमारे सामने ऐसा सच आया जिसकी हम सपनें में भी कल्पना नहीं कर सकते थे, मेरी सहेली के पिता इन सब में शामिल थे । उन्होंने हम-दोनों को धमकी दी कि हम कुछ न करें और मेरे घर पर भी शिकायत की मेरी और ये सिलसिला वहीं रुक गया मगर मेरे प्रयास जारी रहेंगे। मैं जानती हूं कि जितनी देर में मैं यह लेख लिखूंगी उतनी देर में हजारों बच्चियां काल के गाल में चली जायेंगी और अगर कोख से बच आयीं तो समाज के कुछ दरिंदों के हाथों बलि चढ़ जायेंगी क्योंकि आजकल तो बच्चियों का गैंगरेप जोरों पर है और सरकारें चुप बैठी रहती हैं चुनाव आने तक। खैर मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि हमें अपने अस्तित्व के लिए खुद ही आवाज उठानी होगी और जब तक एक नारी दूसरी नारी के प्रति दयावान नहीं होगी तब तक कुछ नहीं हो सकता। सभी नारियों को एक-दूसरे को सम्मान और सहयोग देना ही इस समस्या का समाधान है।     धन्यवाद ्््््््््््््््््््््््््््््््््््््््््््््््््््््््

फाफ डु प्लेसिस ने आईपीएल 2020 में मुंबई इंडियंस की पारी के दौरान तीन अच्छे कैच पकड़े।
 19 September 2020  

आज दुबई में आईपीएल मैचों की शुरुआत हो चुकी है जहां पहला मैच मुंबई इंडियंस और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच होना था। जहां सभी इस मैच को मनोरंजन के रूप में देख रहे है वही हम स्पोर्ट्स ऑवर की तरफ से कुछ विशेष घटनाओ पर चर्चा करेंगे।  आईपीएल 2020 संस्करण के शुरुआती खेल में  एमएस धोनी की अगुवाई वाली टीम चेन्नई सुपर किंग्स (सीएसके), और डिफेंडिंग चैंपियन रोहित शर्मा की अगुवाई वाली मुंबई इंडियंस (एमआई) के लिए भी ऐसा ही कुछ हुआ।मैच की शुरुआत में सिक्का टॉस जीतने के बाद, एमआई के सलामी बल्लेबाजों ने उड़ान की शुरुआत की। हालांकि, अबू धाबी में विपक्ष की प्रगति को पटरी से उतारने के लिए पीयूष चावला, सैम क्यूरन और रवींद्र जडेजा ने नियमित रूप से सफलता का हिसाब लगाया। दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कप्तान फाफ डु प्लेसिस के मैदान में विद्युतीकरण की प्रक्रिया में सीएसके के विकेट लेने वालों की मदद की गई।36 वर्षीय, MI की पारी के दौरान चेन्नई सुपर किंग्स के खिलाडी लाडिंग डु प्लेसिस तीन शानदार कैच लेकर लौटे, अपनी जबरदस्त फिटनेस से सीमा की रस्सी पर मन की उपस्थिति को प्रदर्शित किया। अपने क्षेत्ररक्षण के लिए लाडिंग डु प्लेसिस, जिसने सीएसके को खेल में वापस ला दिया और एमआई को 9 के लिए 162 तक सीमित कर दिया, फ्रेंचाइजी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल ने अपने नवीनतम पोस्ट पर लिखा, "ईमानदारी से, यकीन नहीं होता कि यह पहला लड्डू या दूसरा लड्डू था। ..लेकिन लड्डू के लड्डू का भोग! # भोले ने हमें खेल में वापस ला दिया!इस मैच को विस्तार से जानने क लिए आप Sportshour वेबसाइट पे जा सकते है।  जहां हमारे स्पोर्ट्स लेखक आपको पूरी और सच्ची न्यूज़ देने क लिए दिन रात जागरूक रहते है, sports hour हिंदी न्यूज़ वेबसाइट है।  जिसके कारण आपको इसे समझने में आसानी होगी।

IPL 2020 मे बढ़ती सट्टेबाज़ी को रोकने के लिए भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने किये ख़ास उपाय
 17 September 2020  

भारत में मशहूर व एक त्यौहार की तरह मनाया जाने वाले PL 2020 की शुरुआत हो गयी 13 वा सन का आईपीएल जिसकी खेले जाने की उम्मीद covid -19 में नामुमकिन थी  अब 2 दिन बाद 19-9-2020 को दुबई में खेला जाने वाला हैं  भारत में आईपीएल को कम समय में बेहतरीन बल्लेबाज़ और गेंदबाजी के लिए पसंद किया जाता हैं  वही इसका दूसरा रूप सट्टेबाज़ी वाला भी है जो आज  के युवकों में बड़ी जोर शोर  में अपनी जगह बना रहा है। तेज़ी  से पैसा कमाने की लालच  में आज के युवको को सट्टेबाज़ी और जुआ घर की तरफ ले जा रही है।  जिसको रोकने के लिए भारतीय क्रिकेट बोर्ड bcci  ने ब्रिटेन में स्थिति कंपनी  स्पोर्ट्स रैदार के साथ करार किया हैं  जो  धोखाधड़ी जांच प्रणाली fdsk के जरिये सेवाएं देगी।  IPL का 13 वा  स्तर covid-19 के कारण खाली स्टेडियम में खेला जा रहा है  ऐसे में bcci की और से अजित सिंह के लिए ACU के साथ मिलकर  भ्रष्टाचार और सट्टेबाज़ी को रोकना एक बड़ी चुनौती है.कुछ समय पहले गँवा में खेले गए फुटबॉल लीग में स्पोर्टरडार कि अहम भूमिका के कारण उन्हें ipl 2020 में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए स्पोर्टरडार  को चुना गया स्पोर्ट्स रैदार ने फूटबाल लीग के आधा दर्जन मैचों को संदेय के घेरे मे रखा  और स्पोर्टरडार ने FIFA, UAF, और विश्व भर की विभिन्न लिग के साथ काम किया है।स्पोर्टरडार का मानना है की वह मैचों के दौरान होने वाले धोखाधड़ी जांच प्रणाली FDS एक विशेष सेवा है, जो सट्टेबाज़ी से संबंधित हेराफेरी का पता लगाती हैं और यह इस्सलिय भी संभव हो पता हैं  क्योंकि अब FDS के पास मैच फिक्सिंग के उद्देश्य से लगाई जाने वाली बोलियों को समझने के लिए उपयुक्त साधन हैं  IPL 2020 में खेले जाने वाले हर मैच की जानकारी आप सब को Sports Hour वेबसाइट पे मिल जाएगी  जहां हमारे सभी लेखक आपको मैचों से जुड़ी जानकारी अपने  आर्टिकल  के माघ्यम से देंगे  आप Sportshour पर मैचों के अलावा खिलाड़ियों के जीवन में घट रही सभी अच्छी और बुरी घटनाओं का अध्ययन कर सकते हैं

मांसाहार का मसला

मैं मांस खाता हुं, मैं मांसहारी हूँ , मैं नहीं मानता कि मांस खाना कोई बुरी बात है ।जो लोग जीव हत्या के तर्क देते हैंं , मॆं उनसे कतई सहमत नहीं।ईद के दिन अगर गोश्त का रिवाज चले, तो उसमें भी कोई हरज नहीं। जो लोग किसी बहाने किसी के गोश्त खाने का विरोध करें, मुझे स्वीकार नहीं ।लेकिन अगर कोई ईद के दिन कुरबानी के नाम पर इसलिए गोश्त खाए या कुरबानी करें कि वो कोई पुण्य कमा रहा हॆ, मेरे हिसाब से बेवकूफी होगी।किसी के कुछ खाने या गोश्त खाने या न खानें से खुदा खुश होगा, यह मात्र भ्रम हॆ ।इसलिए ईद के दिन आपकाअधिकार हॆ कि आप गोश्त खाए या न खाए ,लेकिन आप यह सोच कर किसी जानवर को काटे जा रहे हो कि इससे आपका रब राजी हो रहा हॆ, यह एक बेवकूफी होगी।लोगों का एक वर्ग बड़े गॆर जिम्मेदाराना अन्दाज से जीव हत्या मे आरोप मुस्लमानो पर लगा रहा हॆ, लेकिन उनको यह स्वीकार करने मे तकलीफ होती हॆ कि जीव हत्या का यह काम आपके समाज या अन्य धर्मों में कहाँ कम हॆ।असल में इन लोगों को जीव हत्या से मतलब नहीं बल्कि इनको मतलब माहोल को खराब करने से होता हॆ । क्या आप यह नहीं जानते कि भारत मे कुल 80% लोग मांसहारी हॆं, जिसमें 25% तो बेचारे मुसलमान जीव हत्यारे हुए, बाकि 75% को मांस शायद पेड़ो पर मिलता हॆ???पिछले कुछ वर्षों में जैसे जैसे ईद उल अजहा नजदीक आने लगती है तो यह मुद्दा बड़े जोरशोर से उठने लगता हैं।  लोगों के मन में जीव प्रेम जागने लगता है । आश्चर्य तो तब होता है जब वो लोग जीव प्रेम की पेरवी करते दिखते हैं जिनके घर सप्ताह में दो तीन बार मांस जरूर पकता है । इन भाइयों के अपने तर्क भी जोरदार होते हैं । मुझे एक सजन मिले ,उनके भी अपने तर्क थे। उन्होंने ने मुझे बड़ी उत्सुकता से पूछा - क्यों जी खान सा ईद कब है ? मैंने कहा - जी दस दिन बाद है। बस फिर भाई साहब शुरू हो गए , उन की एक एक बात में जीवों के प्रति दया भरी थी , उन्होंने ने जीव हत्या के सैकड़ों पाप गिना लिए ,दो चार श्लोक भी ठोक दिए , और साथ साथ मुझ से यह अपेक्षा भी कर बैठे कि इस ईद पर तचम हरगिज ऐसा ना करना।मैने भी हां हां कर दिया।मैने बात को कुछ घुमाया ,कुछ ईधर ऊधर की हांकी । फिर मैने भी एक सुझाव उछाला ,क्यों ना एक दिन मिल बैठ के खा पी लें ? भाई साहब को सुझाव अच्छा लगा , धीरे से हां कह दी ,मैने आगे कहा - खर्चा वर्चा मैं कर लूंगा ।  बस आप तो मीनूं और दिन की बात करें ।भाई साहब तपाक से बोले - बस मंगलवार  ना ।मैने कहा - मंगलवार नहीं ? वो क्यों ?भाई साहब बोले - यार वो क्या है ना ,मंगलवार को हमारे नांनवैज नहीं चलता ।बस आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं है। आप खुद (पाठकगण) समझदार हो , जो बंदा मुझे जीव प्रेम का उपदेश दे रहा था , उसको मंगलवार के अलावा  मीनूं में नांनवैज चाहिए।मुद्दा अगर जीव प्रेम का हो तो मैं सहमत हूँ लेकिन मुद्दा जब ईद केदिनही जीव प्रेम का हो तो फिर बात अलग है।आखिर लोगों को हर रोज की जीव हत्या नज़र क्यों नहीं आती ? सिर्फ़ ईद के दिन ही सब का जीव प्रेम क्यों जाग जाता हैं।क्या यह समझ नहीं आता की जितनी भी मवैसी बिकती है वो सीधे बूचडख़ाने जाती हैं , क्या यह समझ में नहीं आता कि जो दुकानों में मीट बिक रहा है वो गोबी टमाटर की तरह बगीचे से सीधा सप्लाई नहीं होता है , इन सबके पीछे जीव हत्या है ,ये क्यों नहीं समझ मेंं आता ?समझ हरेक की अपनी अपनी होती हैं लेकिन में सभी से निवेदन करुंगा कि शाकाहार बेशक बैहतर है ,उसको बढाया जाना चाहिए , लेकिन मानव सभ्यता की कहानी से साबित है कि मनुष्य के लिए मांसाहारी होना कहीं कोई अनुचित या अमानवीय नहीं है।एक व्यक्ति अपने आपको पूर्ण शाकाहारी बनाए रखे ,यह अच्छी बात है , लेकिन किसी का पूर्ण शाकाहारी न रह पाना कोई बुराई नहीं है। लेकिन फिर भी मैं मानता हूँ कि जो लोग पूर्ण शाकाहारी है , वे  एक दर्जा मांसाहारियों से उत्तम है।लेकिन मुद्दा यह नहीं है ,मुद्दा यह है कि जिनके घर सिर्फ मंगलवार को ही मांसाहार पर पाबंदी है ,उनको ईद के दिन मुसलमानों के मांसाहार से तकलीफ है। तब यह कहना पड़ता है कि मुसलमानों को भी मांस खाने का अधिकार है । कम से कम उन बंधुओं से निवेदन रहेगा कि जो खुद मांस खाते हैं ,चाहे किसी भी धर्म या क्षैत्र के हो ,उन्हें ईद की कुर्बानी के खिलाफ प्रोपेगैंडा नहीं करना चाहिए.,  रहीम नादान

विरोध क्यों

यह बहस तवील अरसे से चल रही है कि मुसलमानों को राष्ट्र गीत व राष्ट्र गान  गान चाहिए या नहीं ¦शिक्षा जगत से जुड़े लोगों के लिए व विधार्थियों के लिए यह बहस और भी अधिक पसोपेश की वजह बनती है और इसी का फायदा  कई बार  असामाजिक तत्व उठाते हैं.अपनी बात को अागे बढाता हूं_एक नागरिक के लिए यह राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत या राष्ट्र ध्वज होते क्या हैं?अगर साफ जहनियत से गौर किया जाए तो यह साबित होता है कि ये राष्ट्रीय प्रतीक हैं जिनको किन्हीं विशेष उद्देश्यों के लिए स्थापित किया गया है.और हम सब जानते हैं कि ये उद्देश्य क्या हैं, ये उदेश्य हैं देश प्रेम, राष्ट्रीय एकता,  अखण्डता, को कायम करना.अब बात आती है इन प्रतीकों के अर्थ और इतिहास की. क्या इनका अर्थ व इतिहास इतना महत्वपूर्ण है कि उसपे बहस की जाय.हमारे लिए इनका अर्थ व इतिहास महत्वपूर्ण नहीं बल्कि महत्वपूर्ण यह हैं कि ये किसके प्रतीक हैं, ये किन उदेश्यों के लिए स्थगित किये गये हैं, अगर उदेश्यों से हमें कोई तकलीफ नहीं हैं तो हमें विरोध नहीं करना चाहिए.इस बात के पक्ष में मैं तर्क देना चाहूंगा, हम सब जानते हैं कि राष्ट्र गान टैगोर साहब जब लिख रहे थे तब उनका सम्बोधन 1911का दिल्ली दरबार था, यानी इस रचना में उन्होंने ब्रिटिश राज  का गुणगान किया हैं, यह एक विवादित बात हैै ,अब सवाल यह है कि क्या हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने हमें ब्रिटिश राज के गुणगान के लिए यह गाना दिया है. बिलकुल ऐसा नहीं है. देश के लिए यह रचना एक प्रतीक के रूप में अपनाई गई है और वह है राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रीय सौन्दर्य.इसी तरह से हम राष्ट्र गीत व राष्ट्र ध्वज के इतिहास व अर्थ के विरोधाभास को महत्व न दे कर हमें महत्व इस बात को देना चाहिए कि ये प्रतीक किन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए स्थापित किये गये हैं.अब बात करते हैं इस्लामी नजरिए की, सबसे पहला विरोध यह कह कर किया जाता हैं कि इस्लाम सिवाय अल्लाह के आराधना की इजाजत नहीं देता. अगर एक बन्दा सीधा खड़ा हो कर जन गण मन या वन्देमातरम गाता है, पास में इमारत पर तिरंगा लहरा रहा हो, गाने व सुनने वालों के दिलोदिमाग में देश प्रेम की भावना हो, तो बताओ किस की आराधना हो रही है?  हां अगर आपके दिमाग में 1911 का दिल्ली दरबार या आनन्द मठ की कहानी घूमने लगे तो ये आपके मन का फितूर है.क्योंकि आप से राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत गवाकर यह कोई अपेक्षा नहीं करता कि आप मे इस के अर्थ या इतिहास का प्रचार किया जाए बल्कि अपेक्षा यह की जाती हैं कि हम सब देश प्रेम के लिए सुर में सुर मिला कर एकता व राष्ट्र भक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं.अब कुछ बात व्यवहारिकता की करते हैं, एक आम आदमी अपनी दिनचर्या में अपने धार्मिक सिद्धांतों का पालन कितना करता है? एक आम मुसलमान अपने इस्लामी कानून का कितना पालन करता है?क्या यह सही नहीं है कि एक मुसलमान अपनी सहूलियत के लिए कई सिद्धांतों के साथ समझौता कर लेता है?कुछ नमूने ले लें, नबी ए करीम की कई हदिशे हैं और कुरआन मज्जिद में भी हवाले हैं कि_ ऐ मुसलमानों एसे अकड़ कर मत चलो कि दूसरे परेशान हो_अपनी दौलत का दिखावा मत करो कि गरीब को परेशानी हो_रास्ते में एसे ना चलो कि मुशाफिरों को तकलीफ हो.अब बताइए कि गरीबों के लिहाज से कितने मुस्लिम अपनी शानदार गाड़ियों को तर्क कर पैदल चलते हैं. कितने मुस्लिम नेता मुसाफिरों की तकलीफ को देखकर लालबत्ती को अपनी गाड़ी से हटाते हैं.एक और नमुना, क्या अपने घरों, गाड़ियों वगैरह को राजनीति पार्टियों के झण्डों से सजाना शरियत से ठीक है?  इस्लाम हमें इसकी इजाजत नहीं देता. क्या किसी मुस्लिम नेता ने इसका विरोध किया?ये सब वही बातें हैं जहाँ हमने अपने सिद्धांतों से समझौता कर लिया, जो कि समय और परिस्थितियों के लिए जरूरी भी है.इसी तरह हमें राष्ट्र की खातिर राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत के मामले में भी समझोता करने की बात को अपनाना चाहिए.एक बात और भी, क्या हम अपने पर आरोपों के कोलाहल को सुन कर ही विरोध की राह तो नहीं ले रहे? ध्यान रखें विरोधी का काम भटकाना होता है, और आम मुसलमान के साथ यही हो रहा है.मैं हर मुसलमान को यह संदेश देना चाहता हूँ कि वक्त की नजाकत को देखते हुए यह बात समझें कि हमारे लिए यह कोई मुद्दा नहीं है कि राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत गाने से हम कोई बड़ा गैर इस्लामी या गैर अवलाकी अमल कर रहे हैं.बल्कि हमारे लिए यह जरूरी है कि हम बेवजह मुस्लिम विरोधियों को मौका न फरहाम करें जिससे कि हमको मुख्य धारा से बाहर करने के प्रयास सफल हो.

नकश्लवाद पर डण्डक क्यों

किसी छोटी सी घटना के बाद हमारे देश की जनता से लेकर नेताओं तक का क्या खून उबलने लगता हैं,आप सब जानते ही होंगें।आप सब जानते ही होंगें कि किसी मंदिर या मस्जिद का मामला हो या बीफ का मामला हो ,गाय का मामला हो,किसी व्यक्ति के अपराध पर हो रही बातें हो,सब में हमारा वीर रस फूट पड़ता हैं,देश भक्ति का नशा रंग दिखाने लगता हैं।कई बार तो फिल्मों की काल्पनीक बातों पर ही हम कितने दूरदर्शी बनकर देश के पहरूवे बनकर खड़े हो जाते हैं।पिछले कुछ वर्षों में देश भक्ति का उपदेश कुछ ज़ादा ही परोसा जा रहा हैं।हमारा मिडिया हो ,नेता हो,समाज सेवी हो,सब को देश भक्ति का पाठ पढाते मैंने देखा है।एक फिल्म के सीन के विरोध में देश को जलते देखा होगा,बीफ के नाम पर या गाय के नाम पर हमारे वीरों को जूझतेे भी देखा होगा,पाकिस्तान का जनाज तो लगभग हर भारतीय हर रोज एक बार निकाल कर ही चैन पाता हैं।कश्मीर का भारत का हिस्सा होते हुए भी हमारा दिल नहीं भरता और हम उसे अखण्ड भारत बनाने की कसमेें खाकर अपना पौरूषत्व दिखाते हैं।कहीं भी हम कम समझदार या कम सूरवीर नहीं दिखते।इतना ही नहीं गाहे वगाहै हम दुनिया को अपनी वीरता व कुटनीति ताकत की दुहाई देते नहीं थकते।सब कुझ है,मुझे भी कहीं शक नहीं ,लेकिन मेरी मोटी अक्ल को एक बात कतई समझ नहीं बैठ रही की जिस देश के अंदर इतना राष्ट्रवाद मौजूद हो,किसी मामूली बात पर आसमान पाताल एक करने वाला जूनून पाया जाता हो,जहां घर घर देश भक्त एक नहीं हजार हो।दुनिया की ताकतों को चीर फाड़ देने की ललकार देने वाले हम जहां हो,उन्हीं के बीच ,देश की धरती पर ही, ऐसा तंत्र मौजूद हो,जिसके पास इतनी ताकत हो कि उसे हमारी इस सारी सूरवीरता की परवाह ही नहीं हो?जी हां हम सब अपनी बाहें चढाकर देश की घरेलू खपत की रोटियां पकाते रहते हैं,और वो सूकमा जैसी वारदातों को बड़े आराम से अंजाम दे देते हैं।बात एक ही घटना की नहीं है,एक घटना तो  चलो मामूली मानी जा सकती हैं,लेकिन सवाल मेरा अलग हैं।हर बात पर हाय तोबा मचाने वाला हमारा वो मानस इस मुद्दे पर इतना खामौस क्यों? सवास इतना ही नहीं हैं,सवाल बहूत कडवा है,समझ मैं नहीं आता कि ये नक्सली जो किसी समुन्द्र पार देश में नहीं रहते, बल्कि हमारे देश में ही रहते हैं,वहीं जहां हम घर घर राष्ट्रभक्त होने का दावा करते हैं।आखिर हम उन्हे कैसे नहीं पहचानते?हां अगर इन नक्सलियों की संख्या कुछ सैकड़ा या हजार हो तो माने कि कहीं छुपे रहते होंगे,लेकिन इनकी तो हथियारबरदारदस्तों की संख्या ही हजारों में है।उनके पास हथियार है राशन है,वाहन है,संचार साधन हैै,टैक्नोलोजी है,ये सब कहां से आता है,इलजाम भी किस पर दे? यह सब कुछ हम सब जानते हैं।लेकिन किसी का वीर पौरूषत्व नहीं जागता,किसी को कोई आंदोलन चलाने  की फुरसत नहीं,कहीं पर विरोध प्रदर्शन वगैरा की जरूरत नहीं!सड़कों पर देशभक्त जो तांडव दिखाते हैं वे भी खामौस!जो काबूल पार के तालेबान,दजला पार की आईसिस  के खतरे को तुरन्त भांप कर देश में असुरक्षा माहोल पैदा करते नहीं थकते,उनको अपने आस्तीन का सांप क्यों दिखाई नहीं देता?                            चलो कुछ बात मैं भी कह दूं ,जहां तक मैं जानता हूं इन नक्सलियों का अपना भी एक राष्ट्र वाद हैं,येे भी अपने को राष्ट्र के लिए समर्पित मानते हैं ,ये भी अपना संघर्ष राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर कर रहे हैं।और जब एक देश के अंदर ही राष्ट्र वाद का आंदोलन विकसित हो गया हो,और हमारे सैन्य दलों को ललकार रहा हो और हम गाय के नाम पर या मंदिर या मस्जिद के नाम पर या अपने धार्मिक सिद्धातों के परचार परसार पर या अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिए संघर्ष कर रहे हों,तो यह मान कर चलो की हमारी राष्ट्भक्ति खोखली है और उन नक्सलियों की राष्ट्भक्ति पक्की है,और हमारी हार पक्की!                      याद रखना मेरे देशवासियों दुनिया में वतन परस्तो के दीवाने पन की कई मिसाले मौजूद है,उनका जजबा,हुबवल वतनी,उनकी जांबाजी एसी नहीं होती जैसी आजकल हमारे देश में उन लोगों की दिखाई देती है जो भारत माता की जय जय कह कर अपने आप को वीर सपूत कहते हैं।वे लोग कायर ही नहीं बल्कि मौका परस्त व स्वार्थी हैं जो देेश में घरेलू खपत के लिए देश भक्ति का चोला ओढ़े रहते हैं,लेकिन देश के अंदर इतने बड़े खतरे को नजर अंदाज कर रहे हैं।नक्सलियों से निपना सिर्फ हमारी फौज का ही काम नहीं है। क्या हमारा समाज व जनमानस इस खतरे को समझता हैं? क्या हम हर नक्सली को नफरत से देखते है?कहीं न कहीं हम इन का सहयोग तो नहीं कर रहे?क्या इन सब बातों का सऊर हम देश में फैला रहे है?जहां तक मैं जानता हूं,ऐसा नहीं हैं,सब के लिए यह हल्का मामला हैं।सबके अपने अलग देश भक्ति के मायने है,सब अपने मायने में लगेे है,नक्सली तो सिर्फ सैनिकों के हिस्से की समस्या है!जब देश में ऐसी ताकते पनप चुकी हो और हम घरेलू खपत की राजनिति मैं अपना गौरव खोज रहे हों,मैं समझता हूं हम बहूत गलत राह पर हैं,हमारा भविष्य असुरक्षित नजर आता हैं। हम अपनी मिथ्या गौरव गाथा गढ़ कर अपना मन बहला रहे है और देश अंदर दूसरा देश पैदा हो रहा है।जहां हम चार कोडी के लिए लोगों पर तुष्टीकरण का रोना रोते है वहीं देश की सुरक्षा जैसे मामले के तुष्टीकरण को नजरअंदाज कर रहे हैं जो कि घातक होगा।