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Book Review - The Leader
 Swapna Peri  
 17 March 2018  

Book Title: The LeaderAuthor : N.S.RaviAbout The Book:From the early 20th century, the then city Bombay now known as Mumbai, its economy was characterised by major textile mills, the base of India's growth in textile and garments industry. Hundreds of thousands of people from all over India were employed in working in the mills. In the 1960s and 1970s, the Mumbai-Thaneindustrial belt witnessed successive working class strikes and protests, with multiple trade unions competing for the allegiance of workers and political control. These primarily included famous political leaders from various Indian Political parties also.Dr. Dattatray Samant or Datta Samant), and popularly known as Doctorsaheb was the  trade union leader, who is most famous for leading 200–300 thousand textile mill workers in the city of Bombay now Mumbai on a year-long strike in 1982, which triggered the closure of most of the textile mills in the city.The book is based on this incident but based on timeline as in the year 82.. The author has made a great research and brought this story to his readers with a immense efforts. For this generation youngsters who are not aware of such incidents in the country from past, this book is like a reference.Such stories carry an impact which in real includes many unsolved conspiracies. These kind of stories make the readers attach to the real world while reading a fiction story. Kudos to the author.The title of the book ' The Leader ' is strong and gives an impression that the book must be about a person.The book cover is an image of an industry in black & white color and a lake's image in orange depicting pain.Superb and intense characterisation of the characters is observed.The narration is fantastic, simple yet effective.Simple and effective language is used.Final Verdict—A good read to know the lesser known facts and the book can be rated 3.8 out of 5

Adventure Sports to Try With Rajasthan Tour
 Royal Adventure  
 13 November 2018  

Rajasthan has dependably been a prominent occasion goal among globetrotters. Be it its way of life, celebrations, food or its recorded landmarks, this nation has dependably been a wellspring of interest and delight for explorers. Rajasthan State is offered with the high mountain tops, spouting waterways, lavish valleys, brilliant deserts, and shining coastline, making it a perfect area for different experience sports. Be it any part or locale of the nation, travelers can discover a dare to fulfill their hunger for some adrenaline surge. Following are some experience sports that have turned into a conspicuous piece of different Rajasthan visit.Rajasthan Tour PackagesMountain Biking with Rajasthan TourismGeography of Rajasthan has constantly energized travelers and now there is another approach to investigate the nation. Mountain biking is a game of riding exceptionally structured uncompromising bicycles on unpleasant territories. It might sound perilous however mountain biking does not really include chance. The country includes a huge bumpy territory that makes it incredible for the movement. The northern and north-eastern piece of Rajasthan shows an ideal area for experience to experiment with this game, and allRajasthan Tour Packagesregularly include mountain biking in their agenda. While different excursions are sorted out in the zones of Udaipur, Jaipur, travelers can likewise investigate the excellence of north-eastern states with these visits.Trekking  with Rajasthan TourismTrekking is a standout amongst the most well known and recreational exercises through which travelers have been investigating the hilly region of Rajasthan for quite a while. A substantial number of trekking outings are offered in different parts of Rajasthan. Probably the most troublesome visits including this action are sorted out in the conditions of Rajasthan. Travelers, who are searching for less demanding or shorter outings, can set out on different excursions that happen in the Western Ghats. Rajasthan visits bundles regularly incorporate different day and night treks close to the city of Udaipur & Mount Abu. With such excursions, sightseers can appreciate this game without getting too a long way from the solaces and extravagances of the cutting edge world.Paragliding with Rajasthan TourismIn the ongoing past, paragliding has picked up a ton of consideration from experience. It is a recreational game that includes the member to sit in a tackle and pilot a manufactured wing. After its presentation in the late 1980s, this game has bit by bit increased critical ubiquity among experience searchers throughout the years. The province of Himachal Pradesh has turned into an outstanding spot for the association of different occasions identified with this movement, and it draws in members from the whole way across the nation. With all Rajasthan visit bundles, you can likewise appreciate this action while you investigate the appeal of different states like Rajasthan.Mountaineering Rajasthan TourismThe northern district of Rajasthan houses probably the most astounding mountain tops on the planet giving a perfect place to sightseers to attempt the game. Different India visit bundles enable travelers to climb probably the hardest mountable summits of the world. A wide exhibit of mountaineering trips offers outings that are appropriate for the range of abilities of climbers with various capacities. Regardless of whether a prepared climber or a man attempting the game out of the blue, these excursions offer something for everybody.  If you want to enjoy this service then visit Jaipur tour package

एक मुलाकात तुलसी तिवारी के साथ
 StoryMirror Hindi  
 18 February 2019  
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देश को आजाद हुए मात्र सात वर्ष हुए थे जब उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक गाँव ‘कोट अंजोरपुर में मेरा जन्म हुआ (16.3. 1954) हमारा घर गंगा जी जी के तट पर था, अपने दरवाजे से हम उनकी उठती-गिरती लहरों को देखा करते थे। पिता जी ने मेरा नाम तुलसी रखा क्योंकि वे तुलसी कृत रामायण के बड़े अध्येता थे। दादाजी तीन सौ बीघे जमीन के स्वामी थे।  फिर भी हमारा परिवार तंगहाल था । कोट गंगा,सरयू और सोन नदी से घिरा है ( ऐसे बहुत से गाँव हैं)पिछली भीषण बाढ़ ने हमारे अधिकांश खेतों को रेत के ऊँचे-ऊँचे टीलों में बदल दिया था। तब से उसी प्रकार की बाढ़ की प्रतीक्षा किया करते थे गाँव के लोग । हर साल बरसात में तीनों नदियाँ विकराल होकर अपने ‘दियर‘ में बसे गाँवों को जलमग्न कर देतं । रहवासी बाढ़ उतरने के बाद फिर से सरपत की छावनी वाला घर बनाते, खरीफ की फसल के समय तो खेत पानी में होते, बाद में बोये जाते, सिचाई का कोई साधन न होने के कारण कभी कभार ही ऐसा होता कि साल भर खाने लायक अन्न पैदा हो जाय। गाँव के अघिकांश लोग काम की तलाश में किशोर वय में ही बंगाल, असम, या महाराष्ट्र के लिए निकल पड़ते। मेरे पिताजी भी बाहर ही रहते थे। अतः  जैसे-जैसे बड़ी होती गई अपने छोटे भाई बहनों की जिम्मेदारी संभालने लगी। उस समय सवर्णों में पर्दा प्रथा का बहुत जोर था। माता जी घर से बाहर निकलती नहीं थीं, बाहर की सारी व्यवस्था जो एक मुखिया करता है मुझे ही करनी होती। मेरे गाँव मे एक स्कूल था जहाँ लड़के लड़कियाँ पढ़ते थे। मैं स्कूल जाने के लिए रोती थी किन्तु जा नहीं पाती थी। रसोई के लिए जंगल से लकड़ियाँ एकत्र करके न लाती तो माँ भोजन कैसे बनाती? छोटी बहन को न संभालती तो माँ जांत  से अनाज कैसे पीसती? ऐसे ही ढेरों आवश्यक कार्य जो मुझे स्कूल नहीं पहुँचने देते थे। वैसे स्कूल के मास्टर ने मेरा नाम कक्षा एक में लिख रखा था। वर्ष में एकाध दिन किसी प्रकार स्कूल पहुँच भी जाती तो वहाँ पढ़ने वाली लडकियाँ मिल कर मुझें बहुत मारतीं, उनकी नजर में मेरा प्रति दिन स्कूल न आना उन्हें यह अधिकार देता था कि वे मुझे  पीटें ।  दो-तीन साल में मेरा नाम न जाने किस प्रकार कक्षा दो में आ गया। वैसा ही बिरला दिन था जब बड़ी माँ ने अपने छोटे बेटे द्वारा की गई गंदगी साफ करने मुझे माँ से कह कर स्कूल भेज दिया था। मैं कक्षा में बैठने का लोभ संवरण न कर सकी। उस दिन गुरूजी आम की घनी छाया में कुर्सी डाल कर हिन्दी पढ़ा रहे थे। पाठ का थोड़ा-थोड़ा अंश प्रति छात्र से पढ़वाया जा रहा था।। मेरी बारी आई तो मेरे पढ़ पाने का प्रश्न ही कहाँ से उठता था? उनके सब्र का बांध टूटा और उन्होंने पुस्तक उठा कर दूर फेंक दी । पुस्तक के फड़फड़ाते पन्नों का हा-हाकार आज भी मेरी आत्मा में शोर मचाता है कभी-कभी। छुट्टी हुई तो लड़कियों ने खबर ली। मैंं रोती हुई घर आई। (बलिका शिक्षा के लिए कार्य इसी हा-हाकार ने कराया) माँ ने मेरी गोद में मेरी छोटी बहन को डाल दिया और घर के काम जल्दी-जल्दी निबटाने लगी।मैं बसंत पंचमी को स्कूल अवश्य जाती थी चाहे जिस प्रकार हो। उस साल सरस्वती पूजा के दिन सुबह से वर्षा हो रही थी, मैंने माँ से पूजा के लिए दो पैसे लिए और स्कूल के लिए निकली, रास्ते में कनेर के पीले फूलो को तोड़ कर अपनी फ्राॅक में जमा करती करती, पानी में भीगती स्कूल पहुँची । दो पैसे की लेमन जूस का प्रसाद चढ़ाकर पीले फूलों से माँ की पूजा की । मैंने मांगा ’’ मँा मैंे रोज स्कूल आना चाहती हूँ बस और क्या मांगू?’’मैंने अपना सारा प्रसाद स्वयं ही खा लिया। इससे सबने मेरी खिल्ली उड़ाई । मैं उस दिन प्रसन्न मन घर आई ं आखिर स्कूल से आई थी।उन्हीं दिनो की बात है, एक सुबह मेरे ददेरे भाई जो कक्षा दो में पढ़ते थे, धूप में बैठ कर अपनी नई आई भाषा की पुस्तक देख रहे थे।,खुले पन्ने में सीता स्वयबर का सुन्दर सा रेखा चित्र था। बालसुलभ उत्सुकता से मैंने पुस्तक अपने हाथ में लेनी चाही, उन्होंने बेदर्दी से मेरे हाथ से पुस्तक छीन ली ’’ फाड़ देगी! तू क्या जाने किताब क्या होती है? जा बरतन मांज!’’ उनके व्यवहार से मेरा बाल मन गहरे तक आहत हो गया। मैं बड़ी देर तक हिलक-हिलक कर रोती रही। माँ को उलाहना दिया कि मुझे स्कूल क्यों नहीे जाने देती? हैैं’’माँ एक पल के लिए अपनी विवशता पर बहुत उदास हो गई  उसने भैया से एक बार पुस्तक दिखा देने के लिए बहुत निहोरा किया परन्तु वह न माना , अपना बस्ता लेकर बाहर भाग गया। माँ ने आव देखा न ताव, चुल्हे के पास पड़े कोयले को उठा लिया । ’’ आव बबुनी हम पढ़ा दी तोके!’’ वह मुझे प्यार से स्ंाभाल कर  आंगन की कच्ची दीवार के पास ले आई और कोयले से हिन्दी के अक्षर लिख दिये। ’’ लऽ ! अइसे लिखऽ!’’मैंने आँसू पोंछे और दीवार के श्यामपट पर लिखना सीखने लगी। मुझे लोक गीतों में गहरी रुचि थी। उन्हे काॅपी पर लिखने का उद्देश्य मेरे सामने था।यूंं  तो माँ भी साक्षर मात्र थी चिट्ठी पत्री बाँचने, कहीें दस्तखत आदि के उदेश्य से पिता जी ने थोड़ा पढ़ा दिया था। अटक-अटक कर रामायण आदि पढ़ लेती थी। बाद में गाँव की औरतों को सीता जी का दुःख सुनाकर रोती थी।पिता जी आसनसोल बंगाल में कहीं नौकरी करते थे। साल में एकाध बार आना जाना करते थे, किन्तु दो जगह के खर्चे के कारण दिक्कतें बरकरार थीं। किसी मित्र से उन्हे कोरबा का पता मिला  कि वहाँ रोजगार आसानी से मिल सकता है। ंवे अपने मित्र के साथ बंगाल छोड़ कर छत्तीसगढ़ आ गये। कोरबा में नये बन रहे पावर हाउस में उन्हें सिक्यूरिटी गार्ड की नौकरी मिल गई। कुछ महिने बाद वे हम लोगों को भी अपने पास ले आयें । तीस मई 1964 को हम लोग कोरबा पहुँचे ,देश के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल  नेहरू का देहावशान हुए दो चार दिन ही हुए थे देश में अफरा-तफरी का माहौल था। हम अपने पहनने के कपड़े और थोड़े से बर्तन ले कर पुराने पावर हाउस के टट्टा खोली में किराये से रहने लगे। पिता जी ने मुझसे छोटी बहन एवं भाई का नाम स्कूल में लिखा दिया । मेरी तो पढ़ने की उम्र निकल गई थी नऽ ?अभी हमारी गृहस्थी जमने का आरंभ भी नहीं हुआ था कि लार्सन एन्ड टूब्रो कंपनी में कर्मचारियों की हड़ताल हो गई, जो सभी कर्मचारियों की छंटनी से समाप्त हुई। अपने गाँव-घर से दूर हम फाकामस्ती की कगार पर आ खड़े हुए। यहाँ हमारे खेत नहीं थे जिन्हें बंधक रख कर हमें तुरंत पैसा मिल जाता न जान पहचान के लोग  थे जो हमें उधार दे देते। पिताजी को उस समय दिहाड़ी मजदूर बनना पड़ा और मुझे बाल श्रमिक ।कुछ महिनों के बाद बांकी मांेगरा में कोयला खान के लिये कर्मचारियों की भर्ती का समाचार मिला । वहाँ यू. पी. बिहार के बहुत से लोग काम पर लगे हुए थे। पिता जी ने वहाँ जाकर अपनी समस्या बताई , उन्हें मदद मिल गई। हमारे जिले के जग्गू प्रसाद गोंड़ ने (जो वहाँ युनियन के नेता थे) बड़े अपनेपन से पिता जी को भर्ती करवाया। कुछ ही दिन में हम लोग कोरबा से बांकी आ गये। वह सन् पैंसठ का जुलाई का महिना था। पिताजी ने सबसे पहला काम जो किया वह था स्कूल में हमारा नाम लिखवाना। गाँव से मेरी दूसरी कक्षा की टी. सी. मंगवाई गई। आदिम जाति कल्याण विभाग प्राथमिक शाला बांकी में हम लोग पढ़ने लगे। मुझे कुछ आता नहीं था पिता जी ने स्वयं मुझे पढाना प्रारंभ किया। पढ़ने लिखने की इतने दिनों से बाधित मेरी क्षुधा जाग उठी। मैंने मन लगाया। मुझे एक बार सुन कर ही पाठ अच्छी प्रकार याद हो जाता था। बचे समय में मैं अन्य किताबें पढ़ती थी । बृहद् सुखसागर जो सभी वेद पुराणों का सार है मैंने कक्षा दो में ही पढ़ा था। । पुस्तकें खरीदने के लिए पिता जी खदान में ओवर टाइम ड्यूटी करते थे। कुछ ही समय में हमारे घर में पुस्तकों की भरमार हो गई। हम न केवल पुस्तकेंं पढ़ते थे उस पर चर्चा भी करते थे। पिता जी काम से आने के बाद स्नान ध्यान से फारिग होकर उच्च स्वर में रामचरित मानस का गायन करते, टीका करते, जिसे  घर का काम करते-करते मैं सुनती समझती। हमारे घर पढ़ने-लिखने के शौकिन और भी लोग आने-जाने लगे। स्कूली जीवन के छः वर्षों में मैंने सात उपन्यास लिखे थे जो आज अप्राप्त हैं । उस समय के अनुसार कक्षा छः पास करते-करते मेरी उम्र विवाह योग्य हो गई और मेरी शादी करके मुझे इलाहाबाद भेज दिया गया। सौभाग्य से वहाँ का माहौल पढ़ने पढ़ाने का था। मेरा स्वाध्याय निरंतर जारी रहा। किंतु स्कूली शिक्षा में व्यवधान आ गया। अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने के लिए सदा छटपटाहट बनी रहती मन में । समय पाकर जब पति के साथ आकर रहने लगी तब सन्1975 में मैंने आठवीं की परीक्षा स्वाध्यायी के रूप में दी। जिसमें सभी विषयों में विशेष योग्यता प्राप्त हुई। उसी वर्ष श्रीमान् का तबादला बिलासपुर हो गया। अब जिन्दगी के फैसले मेरे पक्ष में होने लगे। आर्थिक विषमता, गृहस्थी की हजारों समस्याएं  जन्म लेते बच्चों की जिम्मेदारी , यहाँ तक मुझे स्ट्रीट लाइट में भी पढ़ना पड़ा किन्तु नतीजे मेरे पक्ष में आते रहे सन्1977 में मैट्रिक , सन्1980 में स्नातक और सन्1982 को स्नातकोत्तर की परीक्षा पास कर ली । उसी वर्ष शिक्षक चयन परीक्षा पास कर के शिक्षिका बन गई । इस बीच मेरा कहानी लिखना और समाचार प़त्रों में छपना लगातार जारी था। सन् 2008 में पहली पुस्तक पिंजरा के प्रकाशन से मेरा विधिवत साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ। इन दस वर्षों में ग्यारह कहानी संग्रह, एक वृहद् उपन्यास,चार यात्रा संस्मरण, और चैदह बालोपयोगी पुस्तकें प्रकाशित र्हुइं ( सम्मानों की सूची लेखिका परिचय में देखें )।पुस्तकों के प्रकाशन, विक्रय, प्रचार प्रसार आदि की सुविधा के लिए मैंने  2012 में अपने कनिष्ठ पुत्र विवेक तिवारी के साथ मिलकर श्री अक्षय पब्लिकेशन की स्थापना की। जिसमें लगातार क्षेत्र के साहित्यकारों की पुस्तकें छप रहीं हैंं।आज मैं अपने को संसार की सबसे सम्पन्न महिला समझती हूँ क्योंकि मैं जितना पढ़ सकती हूँ उससे अधिक पुस्तकें हैं मेरे पास, जितना लिख सकती हूँ उससे अधिक विचार हैं, जितना लिखा है उससे बहुत अघिक मुझे पढ़ने वाले हैैं।  

All You Need To Know About Rail Freight Transportation
 Galagali Multimedia  
 24 April 2019  

In the era of freight transportation, ocean and air shipping play a major role in the logistics industry, but there’s one more mode that is usually underestimated – rail.Rail freight transportation has experienced                                                                                                                     dormancy from the 1980’s. The logistics world is varying, and it feels like rail is making a major comeback these days. Latest technology as well as innovations is disrupting every industry and all transportation modes.There are different changes and shifts in the logistics industry that leads to new demands and the requirement to deploy various transportation modes. Issues in the industry, such as the increasing demand of capacity, gas emissions, and the aging generation of drivers are the vital issues most logistics professionals face. Opting rail transportation for the freight may probably solve some of these issues.Greener TransportationThe most common advantage of rail over trucking is being less destructive to the environment. Rail can hold a much higher volume of freight as well as goes through a solid route than other transportation methods. As well, automation and faster transit times, in general, cause fewer carbon emissions into the environment.Eventually, rail can be an immense logistics solution for the business. It is continuously developing into a better way to transport goods and is an eco-friendly and well-organized solution among other transportation methods for your freight.TechnologyLatest technology innovations in rail transportation are at the point of development. Automation, big data, driver-less trains, IoT and artificial intelligence are the new tools striking rail transportation. For instance, the automated system PTC is previously used by 83.2% of the required Class I route miles nationwide and will be completely active by 2020. Many hard works are driven towards eliminating human labor as well as human errors.SafetyThe Association of American Railroads states that, the rate of accidents on railroads lessened by 23% since 1980. There are continuously higher investments being made into rail infrastructure that are raising the safety and efficiency of rail transportation. Rail provides a higher safety level due to less human involvement and the absence of highway congestion. Different technologies are being applied to enhance safety, one of them being Positive Train Control (PTC) – an automated system that slows or halts the train in the case of possible accident or human error.

Wonder Woman 1984: Release Date, Photos, Cast and Plot Details
 Lauren smith  
 8 August 2019  
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Are you also waiting for Wonder Woman 2? If yes, then you are not alone here. There are millions of people excited about the same thing, and they would love to know the updates and the latest news concerning the movie. Recently we have got some new updates about Wonder Woman 1984, and we thought that you would love to know about the movies timeline, plot, cast and revealed photos. Last December the filming was wrapped up, and now the DCEU has launched the final release date of Wonder Woman 1984.Source: Wonder Women 1984Latest UpdatesThe filming was over in December 2018, but Gal Gadot said that some reshoots were made to make some minor improvements. According to the cast, the reshoots were made in three different countries and four different locations, including London. One thousand crew members, along with the shooting team who helped set the movie’s plot and fulfilled the cast requirements.According to a popular news channel, just a few weeks ago, the Wonder Woman team has shot some of its scenes at the iconic waterfall in Snowdonia, Welsh national park. Can you imagine Wonder Woman combating with a baddie in front of the waterfall?Wonder Woman 1884: When the Trailer is Coming Out?The team Wonder Woman didn’t attend the Comic-Con 2019, but they were present in the 2018 event. According to the director Patty Jenkins, the Wonder Woman 1984 will begin its promotion in December 2019. That means the first trailer will be out somewhere in the middle of December. Till then, we have to be patient.Revealed Photos of Wonder Woman 1984 till NowIn 2018, two photos were released, which provided us with an idea about the time and the story of the movie. Well, they can’t be considered as a spoiler for the film. In the first picture, WW is looking at some very old TV displays, and it seems that the screens are 1980’s. In the first picture, in one of the TV screen, you can see the villain “Cheetah” driving a car and looking at the camera.In the second image, Steve Trevor (Chris Pine) is walking alone in a shopping mall, and it seems like he has seen someone. People are wondering how Steve Trevor is still alive?There was one more picture posted by Patty Jenkins in which you can see a new character in the movie which is played by Pedro Pascal. But the role of Pedro is still unknown.The new Wonder Woman costume was also revealed on Twitter by the director of the movie. The outfit is surprisingly strange, and Gal Gadot is looking awesome. It appears that this time she has full body armor which is made of shiny metal. Maybe she now she will not have to block upcoming bullets as she has full-body protection. Perhaps this time our WW has become even more invincible and durable due to the full body armor.We have got one more photo of the supervillain “Cheetah” who is standing in a museum. In the DC comics, she was an archeologist, so her standing in the museum make perfect sense.More About the Cast of Wonder Woman 1984Super Villain-Cheetah: Played by “Kristen Wiig”Super Hero-Wonder Woman: “Gal Gadot”Pedro Pascal: An Unrevealed CharacterSoundarya Sharma: Unknown CharacterSteve Trevor: Played by “Chris Pine”Lauren Smith is an inventive person who has been doing intensive research in particular topics and writing blogs and articles on Brother Printer Support and many other related topics. She is a very knowledgeable person with lots of experience.