Image

  सदाशिव समारम्भाम् शंकराचार्य मध्यमाम् अस्मद् आचार्य पर्यन्ताम् वंदे गुरु परम्पराम्। 

सर्वप्रथम भगवान सदाशिव को नमन करता हूँ, मध्य में आदि शंकराचार्य को, तत्पश्चात अपने पूज्य आचार्य को नमन करता हूँ। आदि शंकराचार्य का जन्म 788 ईसा पूर्व नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह वही नंबूदरी ब्राह्मण परिवार है जो उत्तर भारत के ब्राह्मणों से सर्वथा भिन्न है। जैसे- इनकी वंश परंपरा भगवान परशुराम से जुड़ी है, बीसवी सदी के आरंभ तक नंबूदरी परिवार में सिर्फ बड़े लड़के को विवाह का अधिकार था, वह अपनी भांजी से व्याह कर सकता था। परिवार के अन्य सदस्यों को “संबंधम” नामक व्यवस्था से काम चलाना पड़ता था। अर्थात नायर कन्याओं के साथ संबंध बनाना, किन्तु उन नायर कन्याओं और उनकी संतानों को ब्राह्मण के रूप में सामाजिक स्वीकार्यता नहीं थी। 

आदि शंकराचार्य ने अपने जीवन काल में चार मठों की स्थापना की थी। शंकराचार्य अद्वैत परंपरा के इन्हीं चार मठों पर विराजमान संन्यासियों को कहा जाता है। यहाँ एक बात स्पष्ट करना आवश्यक है कि शंकराचार्य एकमात्र हिन्दू धर्म के सर्वेसर्वा नहीं हैं। आदि शंकराचार्य के साथ –साथ माधवाचार्य और रामानुजाचार्य जैसे अनगिनत संतों का हिन्दू धर्म के पुनरोधार, उत्थान और संरक्षण में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। 

चूंकि आदि शंकराचार्य नंबूदरी ब्राह्मण थे, परंपरा से इसी कुल के ब्राह्मण रावल बद्रीनाथ मंदिर के पुरोहित होते थे । ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य की गद्दी पर नंबूदरी ब्राह्मण ही बैठते हैं। लेकिन वास्तविकता इसके ठीक उलट हैं। इस पीठ पर आजकल उत्तर भारतीय शंकराचार्य विराजमान है। 

जीवन के उतरार्ध में आदि शंकराचार्य ने अपने साहित्यिक कार्यों मेंभगवान को नकार दिया था और वर्णाश्रमजाति के निशान पहने हुएमूर्ति पूजा की निंदा की थी।

“निर्वाण षटकम” के अध्ययन से यह पता चलता है कि 

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:, पिता नैव मे नैव माता न जन्म:।                                 न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य:, चिदानन्दरूप: शिवोअहं। 

न मुझे मृत्यु का डर है, न जाति का भेदभाव। फिर ऐसा क्यूँ ? शंकराचार्य पद पर केवल ब्राह्मण ही आसीन हो सकता है? संभवत: यहाँ ब्राह्मण से तात्पर्य एक जाति से नहीं है, वेद वेदांग विशारद और समस्त शास्त्रों के ज्ञाता से है। शंकराचार्य ने चार वेदों के आधार पर चार पीठों की स्थापना की  और उनके अनुसार “मठाम्नाय महानुशासनम्” नामक ग्रंथ की रचना की। 

आज के शंकराचार्य – आज के शंकराचार्य 80 के दशक के शंकराचार्य हैं अर्थात उन्हें शंकराचार्य के रूप 1980 के बाद मान्यता मिली। आज के शंकराचार्यों का विवादों से गहरा नाता रहा है। कई शंकराचार्यों ने गंभीर आरोपों में जेल यात्राएं की। आज के कुछेक शंकराचार्य काँग्रेसी हैं तो कुछ भाजपाई! कोई शंकराचार्य पत्रकार पर थप्पड़ चलाता है, तो कोई स्वयं पुलिस की ज्यादती का शिकार होता है। किसी की गिरफ्तारी होती है तो कोई तीसरा नेत्र रखने और खोलने का दावा करता है। कोई कहता है मैं ही चारों पीठों का आचार्य हूँ, तो कोई दावा करता है कि आदि शंकराचार्य ने पाँचवी पीठ की स्थापना की थी। समय- समय पर इनका विवाद न्यायालय में पहुंचा और न्यायालय ने दावेदार और शिकायतकर्ता अर्थात दोनों को शंकराचार्य मानने से इनकार दिया और यह सुझाव दिया कि काशी विद्वत परिषद जैसी मान्य संस्था इस बात का निर्णय करे कि कौन है असली शंकराचार्य ? आज के कई शंकराचार्य मठाम्नाय महानुशासनम्” में निर्देशित नियमों का उल्लंघन कर स्वघोषित रूप से अपने को अधिकृत किया है। उनके द्वारा कुछ हास्यास्पद दावे किए जाते रहे हैं- यथा वे इस सदी के सबसे बड़े गणितज्ञ हैं, जब कि न तो उन्होने कोई अनुसंधान किया है और न ही उनके अनुसंधान को कोई मान्यता मिली हैं। उनके अनेक दावों यथा उनके पास शिव जी का तीसरा नेत्र है, ईश्वर द्वारा उन्हें अनेक अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए गए हैं- ये सनातन परंपरा और हिन्दू धर्म को जगहँसाई व उपहास का पात्र बना देते हैं। के. राजेन्द्रन बनाम तमिलनाडू राज्य सरकार एवं अन्य दिनांक 27 जून 1984 के अनुसार कांची कामकोठी पीठ मठ 1942 तक अस्तित्व में ही नहीं था। कुम्भकोणम मठ को कांची मठ के रूप में नामकरण किया गया। कांची मठ मिथ्या और बनावटी है जिसे स्मार्त ब्राह्मणों द्वारा 1814 से बढ़ावा दिया जा रहा है। यह मठ आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित नहीं है। शुद्ध और सरल लहजे में कहें तो यह हिन्दू धर्म के साथ धोखा है। एक अन्य कानूनी विवाद में स्वामी परमानन्द सरस्वती बनाम रामजी त्रिपाठी एवं अन्य 21 अगस्त, 1974 के अनुसार- सदियों से ज्योतिर मठ पीठ का अस्तित्व जनता के लिए अज्ञात था और यहाँ तक कि वह स्थान जहाँ मठ खड़ा था, 1940 में भारत धर्म महामंडल काशी नामक समाज ने मठ की खोज का प्रयास किया और प्रयास सफल साबित हुआ। अवशेष बद्रीकाश्रम के पास मिले। जिस भूमि पर अवशेष मिले थे, कुछ अन्य संपत्ति के साथ सोसायटी द्वारा अधिग्रहित किया गया था। सोसाइटी ने 11 अप्रैल, 1941 को ज्योतिर मठ के पक्ष में एक विलेख द्वारा भूमि का एक बंदोबस्त बनाया। स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को मठ के प्रमुख के रूप में स्थापित किया गया था। यहाँ एक बात स्पष्ट करने की भी आवश्यकता है कि चूंकि इस मठ का उद्धार भारत धर्म महामंडल ने किया, शंकराचार्य के रूप में इस संस्था के लोगों ने स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को मठ के प्रमुख अधिकृत किया और एक नई परंपरा की शुरुआत की। निवर्तमान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी को ज्योतिषपीठ बद्रीनाथ का प्रमुख बनाया गया है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य बनाए गए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का वाराणसी से गहरा नाता है। इन्होने अपने आप को बहुत पहले से ही शंकराचार्य घोषित कर रखा था। समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस ने इन्हें और इनके भक्तों को बुरी तरह से पीटा था। इनके शंकराचार्य बनाए जाने की भी घोषणा स्वामी स्वरूपनांद के चेलों ने कर दी। हो गए शंकराचार्य। न कोई शास्त्रार्थ, न ही शास्त्रीय परंपरा। 2017 में बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य की पदवी को लेकर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती के बीच चल रहे विवाद को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्योतिष पीठ को लेकर फैसला सुनाते हुए दोनों को शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया था। बाद में 25 नवंबर, 2017 को फैसला लिया गया था कि जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ही ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य होंगे। श्री भारत धर्म महामंडल वाराणसी द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार सर्व सम्मति से यह निर्णय तीनों पीठों के शंकराचार्य, विद्वानों, पंडितों, संन्यासियों ने लिया था। लेकिन इस परंपरा का पालन अविमुक्तेस्वरानंद और निश्चलानन्द के मामले में नहीं किया गया। 
इसी प्रकार बड़बोले निश्चलानन्द भी हाल के दिनों में शंकराचार्य बने। स्वामी सहजानन्द को भी शंकराचार्य का पद ऑफर किया था लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया था। उनका मानना था कि सफल जीवन से सार्थक जीवन बड़ी होती है। स्वामी जी ने जवाहर लाल नेहरू को गीता पढ़ाया उन्होंने कहा श्री सीताराम आश्रम क्रांति का प्रतीक हैराजनैतिक क्षेत्र में भारत साधु समाज, भारतीय विचारधारा के सभी सम्प्रदायों और धर्मों के विरक्त सन्तों का संगठन है। इस संस्था की स्थापना 1956 में हुई थी। इस संस्था के संगठन की परिकल्पना प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की। इस प्रकार राजनैतिक शंकराचार्यों की परंपरा प्रारम्भ हुई। स्वामी हरिनारायनानंद आजीवन इस संस्था के महामंत्री रहे। इस संस्था से अक्षरधाम और शिवानंद मिशन के लोग भी जुड़े। शंकराचार्य अद्वैत परंपरा के प्रतिस्थापक हैं, वहीं स्वामी विवेकानंद, स्वामी सहजानन्द सरस्वती, स्वामी चिन्मयानन्द, माता अमृतानन्दमयी, इसके संरक्षक और संवर्द्धक हैं न कि 1980 के बाद वाले बड़बोले तथाकथित आज के शंकराचार्य !! आज आवश्यकता इस बात कि है सभी धर्माचार्य चाहे अद्वैतवादी हों, द्वैतवादी, वैष्णव हों, शाक्त हों अथवा शैव- अपने पूर्वाग्रहों की तिलांजलि दे व्यक्ति निर्माण, चरित्र-निर्माण और राष्ट्र के पुनर गौरव के लिए सम्मिलित हो – भेद भाव मिटाएँ, एकता का भाव विकसित करें, सनातन की रक्षा करें!