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कर्ण पर कविता

सच्चा मित्र वही है जो मित्रता निभाए जैसे महाभारत में श्री कृष्ण ने अर्जुन की मित्रता निभाई और अर्जुन ने श्री कृष्ण की,

लेकिन मैं आज एक बात करने जा रहा हूं महाभारत की वह पात्र की जो धर्म की लड़ाई में भी एक धर्म था जिसे महाभारत के युद्ध में समाप्त करना असंभव था वह वंश जो सूर्य के ताप से जन्मा था|

अनेकों योद्धा में एक वही तो महान था दान देना जिसका स्वाभिमान था |

सभी वीरों में एक वही तो सर्वशक्तिमान था कुंती का वह लाडला बड़ा ही धनवान था|

कहानी कर्ण की

दानवीर कर्ण जिस की वीर गाथा हमें आज भी सुनने को मिलती है | ऐसा कोई भी शख्स नहीं जो महाभारत के इस वीर पात्र को ना जानता हो, बता दूं कि कर्ण का जन्म ऋषि दुर्वासा के दिए गए वरदान से हुआ था|

यह कहानी तब की है जब ऋषि दुर्वासा “राजा कुंती भोज” के महल पधारे , और राजा से यह कहने लगे कि मैं अपनी तपस्या के लिए इस महल में कुछ समय रुकना चाहता हूं। तब राजा ने उनकी देखभाल का ध्यान “कुंती” को रखने को कहा, वैराग्य भाव से कुंती ने उनका ध्यान रखा “क्रोध से जाने – जाने वाले ऋषि दुर्वासा” ने पहली बार उनसे प्रसन्न होकर एक वरदान दिया कि मेरे इस मंत्र को बोलकर तुम किसी भी देवता से वरदान मांग सकती हो।

महर्षि दुर्वासा के इन मंत्रों पर द्रोपती माता को शक था तब उन्होंने सबसे शक्तिशाली देवता सूर्य देव का आवाहन किया , और उनके जैसा ही एक शक्तिशाली तेजस्वी बालक को मांगने की कामना की |

सूर्यांश का वह पुत्र स्वर्ण के कवच और कुंडल के साथ जन्मा था। लेकिन कुंती के अविवाहित होने के कारण उन्होंने उस पुत्र को गंगा नदी में बहा दिया।

आपको बता दें कि कर्ण पांडवों के जेष्ठ भ्राता थे। कुंती माता का विवाह पांडू के साथ हुआ था और कर्ण का जन्म उससे पहले ही हो गया था। गंगा नदी में बहते- बहते कर्ण एक स्त्री “राधे” के हाथ लगा और उन्हीं ने कर्ण को बड़ा किया और तब से कर्ण को राधेय नंदन के नाम से भी जाना जाता है |

कर्ण में खास बात यह थी कि वह किसी को भी दान दे दिया करता था | दानप्रियता अंगराज की एक ऐसी वीर निशानी थी ,और इसी निशानी के कारण महाभारत के युद्ध में कर्ण की मृत्यु हुई|कर्ण का जीवन चरित्र भारतीय मानस में एक ऐसे वीर योद्धा का है जो कि जिंदगी भर कठिनाइयों और कष्टों से भरा था।

कर्ण को कभी भी वह हक और प्रेम नहीं मिला जिसका वह वास्तविक रूप से हकदार था। और अगर बात करें करण के कवच और कुंडल की तो भगवान शिव का “पाशुपतास्त्र” भी कर्ण के कवच और कुंडल को नष्ट नहीं कर सकता था। दुनिया की कोई भी शक्ति कर्ण को क्षति नहीं पहुंचा सकती थी , और इसी बात का डर उन पाठकों को था और घमंड था कौरवों को|

लेकिन आप समझ सकते हैं जहां भगवान की लीला चलती है वहां असंभव कार्य भी संभव होने लग जाते हैं। कुछ इसी प्रकार कर्ण के साथ हुआ।

देवराज इंद्र ने लिए थे कर्ण के कवच और कुंडल

पांडवों को हारता देख भगवान श्री कृष्ण ने एक षड्यंत्र रचाया। श्री कृष्ण ने देवराज इंद्र को यह आदेश दिया कि तुम कर्ण से उसके कवच और कुंडल दान में मांग लो, भगवान श्री कृष्ण ने ऐसा इसलिए किया कि अगर कर्ण के कवच और कुंडल उससे नहीं लिए गए तो वह पांचों पांडवों के प्राण हर लेगा और इतिहास के पन्नों में यह लिखा जाएगा कि धर्म की लड़ाई में अधर्म की जीत हुई|

रावण , कंस , हिरण्यकश्यप इन से भी बड़ा पापी कर्ण कहलाएगा और कर्ण जैसे महान योद्धा को कलंक शोभा नहीं देता।

प्रातः सुबह कर्ण भगवान सूर्य देव की पूजा कर रहा था। तब देवराज इंद्र अपना रूप बदलकर एक साधु के वेश में कर्ण के पास पहुंचे और उनसे दान में उनके कवच और कुंडल मांग लिए। सूर्य देव द्वारा कई बार चेताया जाने के बाद भी कर्ण पीछे नहीं हटा उसने प्रेम पूर्वक अपने कुंडल और कवच इंद्र देव के चरणों में रख दिए | कर्ण कि इस दान प्रियता से प्रसन्न होकर इंद्र ने उसे वर मांगने को कहा तब

“कर्ण ने यह कहा कि दान देने वाला किसी से दान की भीख नहीं मांगता है”

तब इंद्र ने उन्हें अपना सबसे शक्तिशाली अस्त्र “वासवी” प्रदान किया जिसका प्रयोग वह युद्ध में सिर्फ एक बार ही कर सकते हैं | और इसके बाद कर्ण को एक और नाम से जाना जाता है “वेकर्तन”

कर्ण के कवच और कुंडल महाभारत के बाद कहां गए

छल से पाई गई कोई भी चीज इंद्रदेव अपने साथ स्वर्ग लोग नहीं ले जा सकते थे। तत्पश्चात इंद्र ने कर्ण के कवच और कुंडल को धरती लोक पर समुद्र के किनारे किसी गुप्त जगह पर छिपा दिया। उसके बाद चंद्रदेव की उस पर नजर पड़ी और वह उसे चुरा कर भाग रहे थे तब समुद्र देव ने चंद्र से कवच और कुंडल को बचाया |

ऐसा माना जाता है कि तब से सूर्य देव और समुद्र देव इस कवच और कुंडल की रक्षा करते हैं।

लेकिन अगर हम सूर्य देव और समुद्र देव की कहानी समझे तो वह जगह जहां सूर्य की रोशनी सबसे पहले समुद्र को छूती हो उड़ीसा शहर में स्थित पूरी गांव के निकट कोर्णाक सूर्य मंदिर। जिसे 13वी शताब्दी में बनाया गया था वैसे तो इस मंदिर को कहीं बार बनाया गया लेकिन आक्रमणकारियों द्वारा इसे बहुत बार थोड़ा भी गया था|

प्राचीन काल से यहां सूर्य मंदिर ही बनाया गया और कभी भी इस मंदिर में पूजा होने के कोई भी सबूत नहीं मिले हैं। सोचने की बात तो यह है कि क्यों बार-बार इस मंदिर को तोड़ा जाता था आखिर आक्रमणकारी वहां क्या ढूंढने की कोशिश करते थे। कहीं वह कर्ण के कवच और कुंडल ही तो नहीं|

ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर के नीचे गुप्त गुफा जाती है जहां पर कर्ण के कवच और कुंडल है और उसकी रक्षा “तक्षक” नाग करता है। अब सवाल यह उठता है कि इस मंदिर पर सूर्य मंदिर का ही निर्माण क्यों होता है आखिरकार हम समुद्र देव और चंद्र देव की कहानी को समझे तो वह जगह पूरी गांव के निकट कोर्णाक के आगे समुद्र तट पर हो सकती है | जहां सूर्य की रोशनी सबसे पहले समुद्र को छूती हो।

भगवान विष्णु के 10 अवतार कल्कि से जुड़े है कर्ण के कवच और कुंडल

आज के समय में इस कवच और कुंडल का रहस्य सिर्फ चिरंजीवी ही जानते होंगे जैसे हनुमान जी , परशुराम जी आदि।

अगर वह कवच और कुंडल किसी भी इंसान के हाथ लग गए तो वह सबसे शक्तिशाली बन जाएगा और सोच सकते हैं कि इस पाप भरी दुनिया का वह और क्या हाल करेगा।

कहीं ग्रंथ और कहानियों में ऐसा लिखा गया है कि भगवान विष्णु के 10 अवतार भगवान कल्कि उन्हीं को इस कवच की पूरी सच्चाई पता होगी । और वही अवतार इस कवच और कुंडल को उस गुफा से बाहर निकाल पाएंगे|