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हम खुद को कर्ता मान बैठते हैं | परन्तु कर्ता तो कोई और ही है, जिसने पूरी पृथ्वी के घटनाक्रम को संभाल रखा है | जैसे हम घर का संचालन करते हैं, ठीक वैसे ही पूरी कायनात को एक सूत्र में पिरोकर, उसकी बागडोर को अपने हाथों में थाम रखा है | वह हमें दिन-प्रतिदिन एहसास कराता है कि कर्ता तो मैं हूँ | मेरी मर्ज़ी के बगैर एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, फिर तू अपने - आप को कर्ता क्यूँ मान बैठा है |


श्रीकृष्ण जी ने गीता में कहा है कि - धनंजय! जिनको तू ज़िंदा समझ रहा है वह तो मरेंगे ही, उनकी मौत निश्चिन्त है | वह काल द्वारा मारे ही जायेंगे | तू अपने - आप को उनकी मौत का ज़िम्मेदार मत समझ | अधर्म पर धर्म की विजय के लिये युद्ध करो और श्री कृष्ण जी अपना विराट रूप अर्जुन को दिखाते हैं, तो लगता है, सब - कुछ ईश्वर हाथ है | जन्म, मरण, परण - फिर हम नाहक ही अपने - आप को कर्ता मान बैठते हैं | वह हमें कठपुतली जैसे धागे में बाँधकर नचाता रहता है और हम भी एक कुशल कलाकार की भाँति अभिनय करते रहते हैं | जब हमारा दाना - पानी यहाँ सिमट जाता हैं, तो हम शरीर रूपी चोले को बदलकर चल देते हैं दूसरी यात्रा पर | सृष्टि का यह खेल निरंतर चलता रहता है |


84 लाख योनियाँ हैं, जो हम जीते हैं, ईश्वर हमें एहसास कराता रहता है कि तू अपने - आप को अकेला मत समझ बंदे, मैं तेरे साथ हूँ | सुख - दुःख, यश - अपयश सब विधि हाथ है | सब कर्मों का लेखा - जोखा हमें यहीं चुकाकर जाना पड़ता हैं | समय - समय पर हमें चमत्कार देखने को मिलते हैं | आपने अक्सर देखा होगा, जब सभी रास्ते बंद हो जाते हैं, अंधकार ज़्यादा बढ़ जाता हैं, हमें उससे पार होने की कोई युक्ति नज़र नहीं आती, तब अचानक अँधकार रूपी बादल छटकर, रोशनी साफ़ नज़र आने लगती है, जैसे कोई हमारा मार्गदर्शन कर रहा हो या यों कहें कि हमारी ऊँगली थाम कर कोई चल रहा हो | वह ईश्वर नहीं तो और कौन हैं |


ऐसा प्रतीत होता है कि ईश्वर यहीं - कहीं हैं, जो हमारे सभी क्रिया - कलापों को नियंत्रण कर रहा हैऔर हमें समय - समय पर चेता रहा हैं | परन्तु हम ही अज्ञानी की तरह नकारते रहते हैं और एक दिन ऐसा आता हैं कि हम ईश्वर सत्ता के आगे हथियार डालकर नतमस्तक हो जाते हैं और हमें वास्तव में लगने लगता हैं कि ईश्वर है "यहीं - कहीं" | मैं अपनी ज़िन्दगी के आस - पास के चंद चमत्कारों और अनुभवों सेअवगत कराना चाहूँगी | फिर आप नज़र दौड़ायेंगे तो पायेंगे कि हाँ, मैंने भी यह अनुभव किया है |


- शकुंतलाअग्रवाल, जयपुर