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भ्रष्टाचार, ग़रीबी, बेरोज़गारी से ज़्यादा बड़ी समस्या रहती है समाज में अचानक से बवासीर बनकर उठने वाले दंगो की.

वैसे तो सरकार का काम रोज़गार देना, सड़के बनवाना, और भी बहुत कुछ होता है पर इसके साथ ही साथ एक और काम होता है समाज में शांति बनाए रखना और दंगे जैसी स्थिति को क़ाबू में रखना. पर बाक़ी कामों की तरह दंगे भी सरकारी हो गए हैं हर महीने दो महीने पर होने ही हैं बस मेनिफ़ेस्टो में नहीं आता. बीमा की छिपी शर्तों जैसा फटकर बाहर आता है और सामान्य जनता की फाड़कर फ़्लोवर कर देता है.

दंगा करना हर किसी के बस का नहीं, वो इसलिए क्योंकि जिसने अपनी मेहनत से एक पैसा नही कमाया वो उसे कमाने और उसके पीछे लगने वाली मेहनत का महत्व नहीं जानता. वो इंसान जो लोन लेकर गाड़ी ख़रीदता है उसे पता है ये लेने के लिए उसे कितने पहाड़ों से गुजरना पड़ा या  आने वाले समय में कितने पहाड़ों से टकराना होगा. या फ़िर अपना घर या दुकान या परिवार बनाने वाले को ही पता है  कि उसने कितनी ख़ूबसूरत शामें अपनी बीवी की बाहों में या बच्चों की मुस्कान में न गुज़ारकर, चार बाई चार के अपने ओफिस के वर्क स्टेशन पर सपनो को हक़ीक़त बनाने में गुज़ार दीं.

घर, गाड़ी के लोन जल्दी पूरे नहीं होते और उजड़े हुए परिवार कभी वापस नहीं आते. किश्तें हर महीने सर पर चढ़कर किश्तों में तांडव करती है. हर बार ख़ुद से समझौता करके आगे बढ़ना होता है.
इतनी जद्दोजेहद और रोज़मर्रा की परेशानियों से आजिज़ आने के बाद जब आदमी अपनी दिली ख्वाहिश पूरी करता है तो वो साथ ही साथ दूसरे का दर्द भी समझने लगता है. उस आदमी के लिए ये आगजनी ये तोड़ फोड़ ये क़त्लेआम मुनासिब नहीं.
घर पर लगी हर ईंट, सड़कों पर उसके सपनो के साथ भागती उसकी गाड़ी और परिवार की पूरी होती ज़रूरते कम ख़्वाहिशें और बढ़ती मुस्काने उसकी मेहनत की गवाह होती है.

यही मेहनत ज़ब धूँ धूँ करके जलते हुई दिखती है तो आत्मा पसीज़ उठती है और अंतर्मन से एक बेआवाज़ और बेबस चीख निकलती है जो लाईलाज होती है.

ये कदम वही लोग उठा रहे हैं जिनका कुछ है नहीं, और न ही शायद आगे कुछ हो भी. किसी की हत्या करना हो या आग लगानी हो इन्हें बस सामान दिखना चाहिए.

ये सब मिडिल क्लास के बस का नहीं. मिडिल क्लास आदमी ख़ुद से ही फ़ुर्सत नहीं पाता, बवाल क्या घंटा करेगा. शाहिन बाग पर जाम लगा तो रस्ता बदल लिया क्यों..क्योंकि कौन पड़े पचड़े में बे, उधर से दूसरा रस्ता है वहाँ से चलेंगे. सरकार निराली है या यूँ कहे रसायनिक प्रक्रिया पर चलती है. जब तक दंगो का एक्शन न हो कुछ रीएक्शन ही नही देती.

अब क्या फ़ायदा जब कितनो ने कितना कुछ खो दिया. मुफ़्तख़ोरी या मुफ़्तख़ोरों को कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि जियो का सिम सबने ख़रीदा था और आज अगर सरकार हार्पिक भी मुफ़्त में बाँटने लगे तो देश में चाईना तक लम्बी लाईन लग जाएगी. टोयलेट के साथ २ लोग दांत भी इसी से साफ़ करने लगेंगे....का जा रो है लल्ला मुफ़्त का तो हे.

दिल्ली सरकार और किस बात का इंतेज़ार कर रही थी समझ नही आता, इससे ज़्यादा तो उत्तर प्रदेश सरकार बाक़ी राज्यों की तुलना में कुछ हद तक कामयाब रही है नहीं तो उत्तर प्रदेश संवेदनशीलता के मामले में एक़ प्रश्न की तरह है. परंतु अभी तक सरकार ने जिस तरह से स्थिति पर क़ाबू बनाया हुआ है और उम्मीद करते हैं बाक़ी के राज्यों में भी बना रहे.
बाक़ी सामान्य वर्ग के सामान्य लोगों के जन जीवन सामान्य बना रहे यही आशा है और यही लता.

बाक़ी वहट्सप्प यूनिवर्सिटी के डीन चच्चा रब्बिश कुमार न बने और न ही दो हज़ार के नोट की चिप के सिग्नल कैचर सुधीर.

शांति बनाए रखें

#बैरागी😌