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सभी बच्चे अपने मां बाप के लिए स्पेशल होते हैं। ये हमारा दुर्भाग्य ही कहूंगी कि हमारे देश में इस स्पेशल वर्ड को हमारे स्पेशल नीड़ बच्चों के साथ जोड़ दिया गया है।
आसान शब्दों में कहूं तो वो बच्चे जिन्हें हमारी सरकार ने दिव्यांग का नाम दिया है।
नाम तो सरकारों के साथ साथ बदलते रहे कभी विकलांग, कभी दिव्यांग। पर बच्चों की स्थिति को किसी ने नहीं बदला।

जब भी इस टॉपिक पर बात करो तो लोगो के जहन में सिर्फ दो तरह की तस्वीर ही उभरती है या तो शारीरिक रूप से दिव्यांग , या मानसिक रूप से दिव्यांग।
कुछ लोग तो सिर्फ शीर्षक पढ़कर ही आगे बढ़ जाते हैं कि ये तो उन लोगों के लिए जरूरी है जिनके बच्चे दिव्यांग हैं।

कितने ही लोगों को पता होगा कि सरकार ने अब 21 प्रकार की विकलांगता को अपने एक्ट में शामिल किया है।
और भी बहुत है जिनको शामिल नहीं किया गया।

आज इतना बदलाव तो आया है कि मां बाप कहते हैं की मेरा बच्चा स्पेशल है।
असल बात तो ये है किसी ने उन्हें बताया ही नहीं की बच्चा स्पेशल नहीं है, बच्चा तो बाकी बच्चों कि तरह बच्चा ही है । बस उसकी जरूरतें बाकी बच्चों से अलग है।
ऐसी जागरूकता की कमी इसलिए है,क्योंंकि सरकार द्वारा कोई प्रोग्राम नहीं चलाए गए जो बता सके कि बच्चों की जरूरतें स्पेशल कैसे होती है??

एक छोटी सी बात से समझाने कि कोशिश करूंगी - क्या कभी मोर पानी में तैर  सकता है ?
क्या कभी मछली हवा में उड़ सकती है???

नहीं!! क्योंंकि दोनों के शरीर की संरचना अलग है, उनका शरीर जरूरतों के अनुसार बना है।

अगर मोर की दुनिया होती , जैसी हमारी है तो सब मोर मिलकर  मछली को स्पेशल घोषित कर देते।

जब लोगों की पसंद अलग होती हैं, शोक अलग होते है, भगवान ने रंग रूप अलग दिया है। तो क्या जरूरतें अलग नहीं हो सकती???
ऐसे ही हमारे बच्चों की जरूरतें अलग है, बच्चे अलग नहीं है।
उन्होंने भी मां के गर्भ से ही जन्म लिया है, उनकी मां ने भी 9 महीने उन्हें गर्भ में रखकर, असहनीय प्रसव पीड़ा के बाद उन्हें जन्म दिया है।

हमारे देश में योजनाएं बहुत चल रही है -
3 वर्ष की आयु से ही आंगनवाड़ी में बच्चों को उचित देखरेख , पूर्व हस्तक्षेप (early intervention) की सुविधा मिले।

पर क्या आपने किसी दिव्यांग बच्चे के लिए आंगनवाड़ी में स्पेशल एजुकेटर या कोई रिसोर्स पर्सन देखा है?

लोगों को पता ही नहीं है , की ऐसी भी कोई योजना  है। इस योजना के बारे में जागरूकता ही नहीं है।
जागरूकता होगी तो लोग सवाल कर पाएंगे।
अब ना जागरूकता है ना कोई सवाल कर रहा है।
इस योजना के लिए फंड मिल रहा है, खर्च हो रहा है। कहां हो रहा है, इसका किसी को पता  ही नहीं है।

एक तो हिंदी में जागरूकता की सामग्री उपलब्ध नहीं हैं , जो है उसके शब्द इतने कठिन है की अच्छे अच्छे ज्ञाता को भी शब्द कोश की जरूरत पड़ जाए, जैसे कि
"ऑटिज्म - स्वलीनता, सेरेबल पाल्सी - प्रमस्तिष्क पक्षाघात। "
कोई मां बाप अपने बच्चों की जरूरत समझने के लिए पढ़ना भी चाहे तो समझ ही नहीं सकता।
हां जो पढ़े लिखे हैं अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान है, उनके लिए फायदा है बस!!





मैं सबसे यही कहना चाहती हूं कि, हमारे बच्चे स्पेशल नहीं है, बाकी बच्चों कि तरह आम बच्चे है। बस उनकी जरूरतें स्पेशल है।
उनकी जरूरतों को जानने और दूसरों को बताने का फ़र्ज़ हमारा ही है। तभी हम अपने बच्चे के हक के लिए लड़ पाएंगे।
तो आइए एक जुट हो जाएं।

आप भी अपने विचार जरुर बताइएगा
आपकी स्नेह प्रार्थी
अनीता भारद्वाज