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जब 2020 कोरोना का दौर चल रहा था। जिसकी शुरुआत चीन से हुई थी। और धीरे - धीरे इस बिमारी ने पूरी दुनिया को अपने कब्ज़े में ले लिया था जिससे पूरी दुनिया अस्त व्यस्त हो गई थी। दिन प्रतिदिन इस बिमारी के बढ़ते आंकड़ों ने सबके मन में डर पैदा कर दिया था। इसने सबके काम काज को ठप्प कर दिया। बच्चों की पढ़ाई लिखाई सब पीछे छूटी जा रही थी। गरीब, मजदूर, किसान जो शहर आए थे अपने और अपने परिवार का पेट पालने अपनी आँखों में कुछ सपने लिए। वे सभी लोग इस कोरोना के कारण शहर से गाँव कि ओर स्थानांतरण हो रहे थे। सड़कों  पर कई ऐसे गरीब जो कोरोना से तो नहीं लेकिन भूख से हर रोज़ मरते हैं। कोरोना के इस अंबार के कारण पूरा विश्व अपनी वर्तमान गति से पीछे चल रहा था। और यह कबतक चलेगा इसकी दूर - दूर तक कहीं संभावनाएं नज़र नहीं आ रही थी। भारत की 138 करोड़ की आबादी वाला देश संक्रमण के कारण सुनसान पड़ा था। कई वर्षों में ऐसा पहली बार देखा गया था कि देश ठप्प होना किसे कहते हैं । बच्चा, बुढा़ , युवा सब परेशान थे। और एक उम्मीद की प्रतीक्षा कर रहे थे की कब इस बीमारी से छुटकारा मिले।

इस संक्रमण के कारण लॉकडाउन, पढाई कि छुट्टी, काम काज का ठप्प होना लोगों के लिए बहुत हानिकारक साबित हुआ था। जिसके कारण आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कार्यकलापों में भी हानि हुई थी। 
इस संक्रमण के डर से लोग अपने - अपने घरों में ही थे। लेकिन जहाँ एक तरफ बस, ट्रेन, हवाई जहाज के आने जाने पर पाबंदी थी। घर से निकलने किसीसे मिलने जुलने की मनाही थी। वहीं दूसरी ओर घर बैठे आराम फरमाने की छूट भी थी। 

वैश्विक संक्रमण के इस दौर में लोग यह ज़रूर देख रहें थे कि देश में कितनो की कोरोना के कारण मौत हो रही है। देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति कहाँ तक पहुँची है। लोग घर बैठे यही देख रहे थे लेकिन कोई यह देख नहीं रहा था कि उन्हें  अपने परिवार, बीवी, बच्चे, माता-पिता के साथ कैसे वक़्त भी मिल रहा है।
जो वक़्त उन्हें काम के कारणवश कभी नहीं मिल सका। जहां बीमारी को लेकर डर था वहां परिवार के साथ मन संतुष्ट था। माना कि बाहर जाने पर पाबंदी थी लेकिन बीवी, बच्चे, माता - पिता के साथ घर में ही दुनिया रंगीन थी। आर्थिक स्थिति बिगड़ी ज़रुर थी लेकिन मिल बाटंकर खाने का मज़ा ही कुछ और था। बच्चों को बाहर खेलने न जाने देना थोड़ा मुश्किल ज़रूर था पर पापा अपने बच्चों के साथ खेले ये दृश्य देखने का आनंद ही कुछ और था।

माना बाहर जाना त्यौहार नहीं मनाया जा रहा था लेकिन घर में ही औरतों का हाथ बटाने में मज़ा बहुत आ रहा था। इस बिमारी के बुरे सफर में एक बात सबसे ज्यादा दिल को छू गई की जब मंदिर ,, मस्जिद, गिरजाघर बंद पड़े थे तो अपने ही घर में इबादत करने में दिल तो जैसे प्रसंन हो गए हों। पहले लोग अपने घर को मंदिर, मस्जिद और गिरजाघर बोलते थे लेकिन इस संक्रमण ने वास्तव में घर को इबादत करने का पाक या पवित्र स्थान बना दिया। वैश्वीक संक्रमण के कारण बुरा तो बहुत देखा है पूरे देश ने लेकिन कुछ ऐसे पलो को भी संजोया है इस दिल में। पैसो की तंगी तो बहुत हुई पर मुहब्बत कम न हुई। सुनसान सड़कें ज़रुर  थी पर घर में कुछ हलचल सी थी। , इस कोरोना के कारण से एक बात और सामने आई की जो मर्द यह सोचते थे कि घर में रहना बहुत आसान है, औरतों को परम्परागत तरीके से एक ग्रहणी बनकर ही घर में रहना चाहिए। वह दकियानूसी सोच कहीं न कहीं ख़त्म भी हुई है। मर्दो को लॉकडाउन के समय में यह एहसास हुआ कि घर में ही रहना काम करना कितना कठिन है।

कोरोना के इस बुरे सफर में एक और बात पर रोशनी डाली गई थी की जो लोग औरतों को यह ताना देते थे कि ग्रहस्ती का काम आसान होता है और बाहर का काम मुश्किल और कठिन होता है। लेकिन वह लोग गलत साबित हुए क्योंकि इस वैश्विक संक्रमण के कारण पूरे विश्व का काम - धाम ठप्प हो गया था, लेकिन केवल एक ग्रहणी का ही काम बढ़ गया था। सबका ध्यान कोरोना, काम काज, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक क्रियाकलापों पर था लेकिन किसी का भी ध्यान एक महिला की ग्रहस्थी पर नहीं गया। जिन्होंने पूरी मेहनत और लगन से अपनी हरेक ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाया था। बिना किसी शिकायत के धन की कमी होते हुए भी अपने फर्ज को निभाया।

कहने का पूरा तात्पर्य यह है कि "जहां बाहर कोरोना का अंबार था, वहीं घर में खुशीयों का बाहार था" लोगों के मन में लंबे समय तक यह बात घर कर जाएगी की कोरोना के कारण से पूरा विश्व सुनसान पड़ा था। लेकिन यह बात कोई नहीं सोच रहा होगा की घर में कितनी  रौनक, हलचल सी थी। पूरे देश में इस मुसीबत के कारणवश कई भारतीय अभिनेताओं जैसे कि सोनू सूद, सुनिल शेट्टी आदि ने गरीब, लाचार, मज़दूर जो काम काज ठप्प होने के कारण बुरा वक़्त झेल रहे थे उनकी मदद की। उन्होने सड़क पर रहने वाले सभी लोगों को खाने - पीने, उनके बच्चों के लिए पुस्तकों की सहायता प्रदान की। "हम ऐसे लोगों का आभार व्यक्त करते हैं, और उन्हें लोगों की मदद करने के लिए प्रोत्साहन भी करते हैं"।

इस कोरोना ने इंसान को इंसानियत याद दिला दी थी। एक वक़्त था जब अपने काम के कारण से कोई किसी की मदद करने में असमर्थ हुआ करता था। लेकिन इस वैश्विक संक्रमण के कारण एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की सहायता करने लगा। हमारे देश के डॉक्टर, पुलिसकर्मी, सरकारी कर्मचारी की दिन रात की मेहनत ने लोगों की सहायता की और उन्हें यह आश्वासन दिया कि सब बेहतर होगा। इस संक्रमण के कारण अत्यधिक बूरा तो हुआ था लेकिन कुछेक चीजें बेहतर और अच्छी तरह से भी हुई थीं। लोग हमेशा कोरोना के कारण से वैश्विक तबाही को भूल नहीं पाएंगे पर उसके कारण घर में अपने परिवार बीवी, बच्चे, माता-पिता के साथ गुज़रे अच्छे वक़्त को भी भूलना नामुमकिन होगा।

आज की यह हक़ीकत है कि भारत और अन्य देशों के नागरिकों ने इस बिमारी को कही हद तक समाप्त करने की जो कोशिश की थी जिसमें यह एक नारा "दो गज़ दूरी मास्क है ज़रूरी" काफी असरदार साबित हुआ। और आज इतनी कोशिशो के बाद भारत के योग्य और क़ाबिल वैज्ञानिक की कड़ी मेहनत के कारण ही इस संक्रमण का टीका यानी की वैक्सीन तैयार हो गई है। और इसी कारण कोरोना के आकडों में कमी आई है। जिससे बच्चों की पढ़ाई लिखाई, काम काज, देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक क्रियाकलाप अपनी गति पर फिर आने की कोशिश में लगे हुए हैं ।]

हमारे कुछ योगदान के कारण से पूरा देश इस बिमारी के चंगुल से धीरे - धीरे निकल रहा है। और इसमें सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले भारतीय डॉक्टर, पुलिसकर्मीयो को हम कभी नहीं भूल सकते हैं ज़िन्होने लोगों की मदद उस वक़्त की जब कई लोगों ने ज़िंदगी जीने की उम्मीद ही छोड़ दी थी। उस समय सबका हाथ थामकर हौसला देते हुए आगे बढ़ने की हिम्मत दी। और कोरोना के बुरे दौर में सबने यह देखा की इंसानियत आज भी ज़िंदा है क्योंकि वह कभी मरी ही नहीं थी बस लोगों के मशरुफी के कारण लुप्त हो गई थी। और संक्रमण के बुरे दौर में देखी गई। बस यूँही एक दूसरे का साथ देना और आगे बढ़ते रहना। और बुरी यादों को भूलकर अच्छी यादों को याद रखें। " Think Positive and Keep Smile " क्योंकि बाहर कोरोना का अंबर था, लेकिन घर में खुशीयों का बहार था "।

बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि कोरोना 2021 में फिर वापस आ गया है एक नऐ रूप में अधिक शक्तिशाली होकर । जिसने फिर से लोगों के मन में डर पैदा कर दिया है। जिसके कारण देश में फिर लॉकडाउन हो गया है। और देश की स्थिति खराब हो गई है लेकिन डरने और घबराने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि यह याद रखना होगा की जिस तरह से हमने एकजुट होकर कोरोना को हराया था उसी प्रकार आज के इस नए कोरोना को भी हराया जा सकता है। बस ये याद रखिए की “ बाहर से कोरोना का अंबार था, लेकिन घर में खुशीयों का बहार था”। और बीते दिनों की यही बाते याद रखते हुए घर में रहें और सुरक्षित रहें। हम एक दूसरे के साथ है तो कोरोना को हरा देंगें। 

(अंजुम खातुन)