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कोरोना काल, ख़ौफ़ का ऐसा मंज़र जिसमें मौत बेख़ौफ़ होकर तांडव मचा रही हो,
जिसने मानव के स्वाभिमान को चकनाचूर कर, एक कीड़े के समान रेंगने को मजबूर कर दिया।आज मनुष्य और कीड़े–मकोड़ों में कोई फ़र्क नहीं।
वक़्त का ऐसा सितम कि स्वर्ग की चाहत रखने वाले मनुष्य को आज नर्क तक नसीब नहीं।
इससे बुरा और क्या हीं होगा, हर मानव चाहे अच्छे या बुरे कर्मों वाला,
अपने आख़िरी वक़्त पर अपनी गलतियों की प्रायश्चित करके, ईश्वर से अपने भूल की क्षमा और स्वर्ग की कामना जरूर करता है।
शायद इसलिए एक मृतक शरीर का दाह–संस्कार माँ गँगा के किनारे उनके पवित्र जल में किया जाता है।
पर आज वक़्त का ये कैसा क़हर टूट पड़ा अब तो ख़्वाबों में ख़ौफ़ का मंज़र है और आंखों को खोलने पर नर्क से भी बत्तर दृश्य का भौकाल तांडव मचा रही है।
आज इंसानों को श्मशान घाट पर दाह–संस्कार के लिए लाइन लगाकर घंटों इंतजार के बाद भी उनकी लाशों को अग्नि नसीब नहीं हो रही,और शव को कुत्ते मुँह मार रहे।
स्वर्ग की आश रखने वाले ईश्वर की सबसे खूबसूरत कृति ’मनुष्य’ को आज नर्क तक नसीब नहीं हो रही।
कोरोना काल के इस क़हर ने मनुष्य के अस्तित्व की पतन कर दी, अब इससे बत्तर हालात नहीं हो सकते और वक़्त का इससे बुरा सितम शायद संभव नहीं।।