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में कल लगभग कुछ पांच या फिर कहे की छह अलग-अलग स्त्रियों से मिली | सब एक ही समाज से ताल्लुक रखती थी, कुटुंब अलग -अलग था, जिसका की मायना ही नहीं था | मायना है अलग परवरिश और अलग सोच का |

सबसे पहले में बात करुँगी उस स्त्री के बारे में जो की नानी बन चुकी है और अब दादी भी बनने वाली है, उम्रदराज तो है पर ऊर्जा और उत्साह भरपूर है, तन में भी और मन में भी.... वैसे भी वो कहते है न की मन से ही व्यक्ति जवान रहता है | अपने ही गृहस्थ जीवन में खुश तो है वो, पर मायका किसे बुरा लगता है | बीते दिनों कुछ ख़ास सम्बन्ध न थे, पर जब किसी कारनवश भाई - भौजाई, बेटे -बहु नातिन पहुंचे तो किसी नवेली -नव्या की तरह आवभगत में लग गई |

मायना : स्त्री मन वाकई निर्मल सा होता है, प्यार की गुंजाईश मिली नहीं की बहने लगता है अपनापन बनकर | फिर भी लोग कहते है को समझना मुश्किल होता है |

दूसरी जो थी वो भी उम्रदराज थी, माँ और सास दोनों ही रिश्ते निभा रही है पर फिर भी न बेटी के मन और स्वाभिमान को समझ पाई और न ही बहु के मन और सम्मान को | मतलब कहते न है की बेटी अभिमान होती है , तो गुरुर तो करिये और बहु सम्मान होती है, तो उसका मान तो रखिये |  

मायना : माना की रिश्ते निभाना जरुरी होता है, पर स्वाभिमान को किनारे रखकर या रखवाकर नहीं |

तीसरी - वह स्त्री जो की फिलहाल एक पत्नी, बहु और माँ के किरदार में थी, बाकि भी रिश्ते निभा रही है, और शायद इन सारे रिश्तो के बीच खुद को ही भूल गयी थी| जो संज्ञा मिलती उसी में गुम हो जाती, अहंकार नहीं था पर अहम् को को ही भूल गयी थी |

मायना : व्यक्ति विशेष की पहचान ही व्यक्तित्व से होती है, अतः आप संज्ञा की बजाये सर्वनाम बनने की कोशिश करे|

चौथी एक बेटी है, जो की बहु बनने के रास्ते पर चल रही है, फिर और भी नए रिश्ते बनाएगी, पर अफ़सोस उसके आसपास से उसे खुद को भूलकर दुसरो को याद रखनेकी शिक्षा मिल रही है, या फिर ये कहे की उसे जताया जा रहा है की यही सब उसके जीवन का मूल्य उद्देश्य है या फिर यही स्की धरोहर है |

मायाना : ज्ञान अनमोल होता है परन्तु वो आगे बढ़ने की प्रेरणा के साथ, अपने जीवन की अर्थपूर्ण करने वाला हो या निति शिक्षा के अंतर्गत आता हो| संभलकर कदम बढ़ाये, आपको भी नयी पीढ़ी को शिक्षित करना है - ज्ञान देना है |

पांचवी ऐसी स्त्री है जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी कार्य किया और बहुत ज्यादा ही समय व्यतीत किया, ज्ञान भी था पर सोच विचार अत्यधिक करने से सार्थक परिणाम वैसे न मिल सके| आज वो अपनी ही सोच में सर्वाधिक है, पर सर्वाधिक क्षेत्रों में सोच सिमित ही गयी और अब बदलाव का समय नहीं रहा|

मायना : समय की गति से चलते रहना ही समय को असीमित बनाता है, समय ही इंसान को असीमित आसमान के सामान अथाह बना देता है |

छठवीं - ये वह जिसे हर एक बात में कुछ बात नजर आती है, उस बात के हिस्से या फिर कहानिया और किस्से बना लेती है, सबके साथ सबकी बात एक जैसे लगने लगती है, कहानी किसी की भी हो अपनी लगने लगती है|

मायना : मन तो मन होता है, स्वाद-स्वाद होता मीठा हो या खरा मनपसंद होता है |