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एक साल में मूलत: चार मौसम बदलते बचपन से देखा है। प्रजातंत्र की देन से हर पांच साल में चुनाव का मौसम भी आता है। किसी राजनैतिक उथल पुथल के कारण कभी कभी यह मौसम मध्यावधि के रूप में भी आ टपकता है।

तो चलिए 2019 में चुनाव का होना तय है और पांच सालों में सुसुप्त पड़े तमाम छुट भैय्या और आदम कद नेता अचानक ज्वालामुखी से फट कर इस संविधान सृजनित मौसम का शंखनाद देना प्रारंभ कर चुके हैं। सत्ताधीश अपने कार्यकाल को जस्टिफाई करते दिख रहे हैं और विपक्ष सत्ता पक्ष को नकारा साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहा है।

अचानक जिस काले धन को मोदी साहब पिछले पांच सालों से खोज रहे थे और तमाम यत्न के बाद भी सरकारी खजाने में नहीं ला पाए चुनाव प्रचार के दौरान सड़क पर आ गया है। दिग्गज नेता यदि शहर भ्रमण पर हो तो पूरा शहर उनके पोस्टरों से पाटने का दृश्य आम होने लगा है। 

अभी 16 सितंबर को राहुल गांधी भोपाल आये। यूं लगा की जैसे आज ही यह फैसला हो जाएगा कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस आयेगी और जिस पन्नी को कई राज्यों में बैन कर दिया गया है उनमे से एक मध्य प्रदेश भी है उसी पर कांग्रेस का प्रचार कर खूबसूरत फिजा को झंडी और आदमकद पोस्टरों से पाट दिया गया। क्यों भाई क्या आम जनता ने राहुल गांधी का चेहरा नहीं देखा ?? फिर किसी भी राजनैतिक दल को क़ानून अपने हाथ में लेने की इजाजत किसने दी? यदि पन्नी पर प्रतिबन्ध है तो आपने यह राजनैतिक प्रचार में कैसे इस्तेमाल की? आपको किसने इजाजत दी कि खूबसूरत ताल तल्लैय्यों, पार्कों और साफ़ सुथरी सड़कों पर सार्वजनिक स्थानों का दुरूपयोग कर टेंट लगा कर काम के समय सड़कों पर प्रायोजित भीड़ जुटा कर शहर की रफ़्तार को धीमा या कुछ घंटों के लिए बंद कर दें??

अब सभी राजनैतिक दलों से यह स्पष्टत: कहने का वक्त आ गया है कि यह कृत्रिम प्रचार से चुनाव नहीं जीते जाते। बंद कीजिए राजनैतिक कचडा फैलाने का काम। यदि आपने बीते पांच साल में कुछ भी किया है जो जनता के लिए और इस देश के लिए था तो जनता आपको चुनेगी।

लोग साक्षरता से परे शिक्षा की अलख से लबरेज होने लगे हैं आप उन न्यूज चैनलों की टी आर पी देख लीजिये जो रात दिन केवल पेड़ न्यूज चलाते आ रहे हैं और जिनका हमारी आम जिन्दगी से कोई लेना देना नहीं है। मुझे औरों का पता नहीं किन्तु कम से कम मैंने तो न्यूज चैनल देखना छोड़ दिया है।

आप सभी से गुजारिश है कि हो सके तो कम से कम अपने आगे पीछे और दाए-बाये खड़े व्यक्ति को इस राजनैतिक प्रदूषण को स्वीकार नहीं करने की हिदायत दे। और वर्तमान सरकार के तमाम जिम्मेदार विभाग इस पन्नी जनित प्रदूषण का विधि सम्मत विरोध करें। तमाम दल यदि अपना प्रचार करें तो नियत हाल/मैदान में बिलकुल सादगी से करें और इसके लिए वही समय चुने जिस दिन अवकाश हो या शहर/गाँव की दैनिक गतिविधियाँ प्रभावित ना हो।

नेताओं का विदेश भ्रमण आम है। कम से कम यह एक अच्छी संस्कृति और प्रचलन तो वहां से सीख आए होते। आयकर विभाग कृपया वास्तविक चुनावी खर्चे और घोषित खर्चे का हिसाब रक्खे। समय आने पर हम यह हिसाब पूछेंगे। इस बार नीरव मोदी या मेहुल चौकसे जैसी चूक नही  होनी चाहिए। जिम्मेदार हो तो जिम्मेदार बनो, यह देश है पांच साल के लिए खैरात में लिखी जाने वाली विरासत नहीं। सत्तर साल विकास के लिए कम नहीं होते। प्रमाणित करो वरना हटो। प्रदूषण मत फैलाओ।