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अग्नि, दर्पण और गर्भ !!!

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्‌ ॥

जैसे प्रकाश स्वरुप अग्नि अपने साथ उत्पन्न हुए धुएँ से और दर्पण जैसे मल से आच्छादित हो जाता है तथा जैसे गर्भ अपने आवरण रूप जेर से आच्छादित होता है वैसे ही उस काम से यह (ज्ञान) ढका हुआ है।

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय - ३, श्लोक - ३८)

ऊपर जो काला धुआँ और नीचे आग जलती हुई दिखती है - यह सात्विक आवरण है। धुआँ है तो अग्नि अवश्य है। दर्पण (आईना) पर जो धूल छा जाती है और उससे कहीं दिखता है, कहीं नहीं दिखता - यह राजसिक आवरण है और जेर से जरायु से गर्भ परिवेष्ठित होता है तो कहीं भी नहीं दिखता - वह तामसिक आवरण है।

"संवाद" (communication) किसे कहते हैं ? संदेश भेजने वाले और उस भेजे हुए सन्देश को ग्रहण करने वाले के बीच सेतु (Bridge) ही संवाद है।

औसतन १६ घंटों की जाग्रत अवस्था में स्थूल इन्द्रियाँ क्रियाशील रहती हैं। मंदिर की घंटी बजी और सबसे पहले यह हमारे कान तक पहुँचती है। अब यदि हमारा कान मन के साथ संलग्न है तभी हमें घंटी सुनाई देगी अन्यथा नहीं ! किसी विषय की स्मृति भी इन्द्रिय विशेष के मन के साथ संलग्न होने पर ही संभव है। मन में जन्म-जन्मान्तर में इन्द्रियों से किए गए कार्य, मन से किए हुए विचार/मनन, कल्पित पदार्थ, वस्तुएं, भाषाएँ, इत्यादि दबे रूप में संचित रहते हैं जो प्रारब्धवश या निमित्त कारण से स्मृति पटल पर उभर आते हैं। जैसे प्रेमी - प्रेमिका का पहली बार आमने-सामने आना और परस्पर आकर्षित हो जाना ! साथ ही, इस जन्म में इन्द्रियों से किए गए कार्य, मन से किए हुए विचार/मनन, कल्पित पदार्थ, वस्तुएं, भाषाएँ, इत्यादि भी मन में संचित हो जाते हैं।

मन का काम है विषय से उत्पन्न संवेदनाओं को भीतर ले जाकर एकत्र करना और बुद्धि तक पहुँचा देना। बुद्धि उन सब विषयों का निश्चय करती है। बुद्धि प्रकृति की पहली अभिव्यक्ति है। हमारे कान में मंदिर की घंटी सुनाई दे रही है। घंटी की ध्वनि कान से संलग्न मन के पास पहुँचती है। मन उसे बुद्धि को प्रेषित करता है। बुद्धि पहले से बने हुए संस्कारों के अनुसार निश्चय करता है और स्थिर सत्ता आत्मा को प्रेषित करता है और यहीं से बाहर की ओर एक प्रतिक्रिया प्रवाह आती है। बस, इस प्रतिक्रिया के साथ ही विषय की अनुभूति होती है।

एक सत् बुद्धि से युक्त और गुणातीत (सत्व, रज और तम के परे) संत जो निरंतर भगवान् में मन वाले और जिन्होंने भगवान् में ही प्राणों को अर्पण कर दिया है, अत्यंत सामान्य वेश-भूषा में भग्वद्गीता पर व्याख्यान प्रस्तुत कर रहे हैं। सत्वगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी श्रोतागण व्याख्यान सुनने पहुंचे हैं। भगवान् और देवों की पूजा का प्रकरण चल रहा है। संत के द्वारा प्रेषित सन्देश उसे ग्रहण करने वाले श्रोताओं के सर्वप्रथम कान तक पहुँचा। फिर वह सन्देश कान से संलग्न मन के पास पहुँचा। कान तक सभी श्रोताओं की उपलब्धि एक जैसी है। लेकिन, जैसे ही कान से मन संलग्न हुआ, संत द्वारा प्रेषित संदेश का अर्थ मन के भिन्न-भिन्न संस्कार के कारण प्रत्येक श्रोता के लिए भिन्न हो गया। मन से बुद्धि पर पहुँचते ही यानी निर्णय/निश्चय की स्थिति में, संदेश संपूर्णतया बिखर गया। प्रेषित संदेश के अर्थ का अनर्थ हो गया।

सत्वगुणी श्रोता ध्यान केंद्रित करके पूर्ण जाग्रत अवस्था में व्याख्यान को आत्मसात कर रहा है। उसे भगवान् और देवों के बीच का अंतर भली-भाँति समझ आ रहा है। लेकिन सत्वगुण के बंधन के कारण वह देवों के प्रति मोहित हो रहा है और निश्चय के क्षणों में उसकी बुद्धि देवों की पूजा को भी नकार नहीं पा रहा है और भगवान् के साथ-साथ देवों की पूजा भी उसे अनिवार्य प्रतीत हो रहा है।

रजोगुणी श्रोता का ध्यान बीच-बीच में विचलित हो रहा है किन्तु पूर्ण जाग्रत अवस्था में व्याख्यान सुन रहा है। भगवान् और देवों के बीच का अंतर वह नहीं समझ पा रहा है। स्वभावतः वह देवों का पूजक है। संत के द्वारा आधी बात ही सुनकर कि देवों की पूजा भी भगवान् की ही पूजा है चहक उठता है कि मेरे द्वारा की जाने वाली देवों की पूजा बिल्कुल सही है। उसकी बुद्धि का निश्चय है कि मैंने देवों की पूजा कर ली तो हो गयी भगवान् की पूजा !

तमोगुणी श्रोता का ध्यान सम्पूर्णतया विचलित है। उसे कई बार झपकी भी आ गई है। जैसे ही सन्देश उसके मन तक पहुँचा, चूँकि इस विषय से सम्बंधित संस्कार मन के पास हैं ही नहीं, तो बुद्धि भला क्या निश्चय करे ! उसके मन के पास तो केवल संसार का ही संस्कार है। वह मनुष्य जाति के अपने समान काया वाले ही किसी मनुष्य की पूजा में तत्पर है। भगवान् की पूजा तो दूर की बात है, वह देवों के प्रति भी आकर्षित नहीं है क्योंकि उसका मन ही उस संस्कार से युक्त नहीं है।

कान या अन्य ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, इत्यादि स्थूल हैं। जन्म के साथ इनकी उत्पत्ति और मृत्यु के साथ इनका विनाश है। जबकि मन, बुद्धि सूक्ष्म हैं। अतः जन्म से पहले भी और मृत्यु के बाद भी मन और बुद्धि का अस्तित्व है। खून का रंग एक समान अवश्य है, उपकरण रूप ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ भी एक समान अवश्य हैं। किन्तु मूल अंतर मन और बुद्धि का है। भिन्न-भिन्न मन के जन्मान्तर के संस्कार और परिणामस्वरूप बुद्धि के अंतर के कारण ही कोई ब्राह्मण तो कोई क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र है।

जय श्री कृष्ण !!