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क्या जो कुछ हम सोचते हैं वो सच होता है?और जो कुछ भी सच है ,क्या हमारी सोच वहां तक पहुच पाती है!

सच एक विकसित सत्य है जबकि सोच अभी भी विकासशील भावना है; ये बात और है कि हर कोई खुद को सबसे ज़्यादा बुद्धिमान समझता है, पर दूसरी तरफ ये भी सच है कि हर एक कि सोच का स्तर एक दूसरे से अलग होता है

परन्तु सोच के विषय मे ध्यान देने वाली बात यह भी है कि हमारी सोच अक्सर हमारी संगत दर्शाती है, क्योंकि जिस प्रकार एक रंग में दूसरा रंग मिलने पर भले ही वह रंग पूरी तरह न बदले परंतु उस दूसरे रंग की कुछ छाया आती ज़रूर है। और वह रंग धुंदलता ज़रूर है।

अतः किसी भी विषय पर चर्चा सिर्फ उसी व्यक्ति से करें जो उसकी पूर्ण जानकारी रखता हो । वरना आपके विचारों के छोटे छोटे सत्य भी धुन्दला सकते है।

सच और आपकी सोच के मध्य कौन आये कौन नही इसकी ज़िम्मेदारी आपकी है। हर किसी से किसी विषय का ज्ञान लेने से सच और सोच के बीच खाई और गहरा सकती है।

अतः ऐसे व्यक्ति से ज्ञान लेना ही ठीक है , जिसकी सोच सच के करीब हो।



हुस्न आरा