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आजकल ऐसी कई निजी संस्थाओं की बाढ़-सी  गई है,जो बच्चों के लिए विविध हॉबी क्लासेस चलाते हैं, या फिर छुट्टियों में समर कॅम्प का आयोजन करते हैं । ऐसे कई लोग भी हैं,जो व्यक्तिगत तौर पर इस तरह का उपक्रम चलाते हैं। जैसे ड्राइंगपेंटिग,व्यक्तित्व विकासडांसकराटेसंगीत, गायन -वादन,स्वीमिंग इत्यादि।अब नई तकनीक के चलते कंप्यूटर क्लासेस की भी बाढ़  गई है । रोज इस तरह के क्लासेस संबंधी पत्रक घर में या अखबार में मिल जाते हैं । कई बार इस तरह के जानकारी भरे पोस्टर्स,बैनर्स से सड़कों और दीवारों को पाट दिया जाता है ।  

हॉबी क्लासेस बच्चों के लिए बड़े आवश्यक हैं। कई स्कूलों में भी आजकल इस तरह की शिक्षा दी जाती है। सिर्फ बच्चों के लिए ही नहीं तो हर व्यक्ति के जीवन में हॉबी का अपना एक विशेष महत्त्व होता है । इससे मानसिक तनाव दूर होता है । बतौर मनोरंजन इस तरह का प्रशिक्षण व्यक्तित्व को भी निखारता है । इसके लिए रियाज बहुत जरुरी होता है। पर जब यह बोझ लगने लगता है,तो कुंठा का कारण भी बन सकता है ।

दो साल की बच्ची पिंकी को दोपहर के समय दो घंटे के लिए प्ले हाउस जाती है । शाम को म्यूजिक क्लास जाती है। सुबह वह रियाज करती है। उसके मम्मी- पापा यह सब उसे स्मार्ट और होशियार बनाने के लिए करते हैं ताकि तीन साल की उम्र में उसे अच्छे नर्सरी में दाखिला मिल जाए और उसके बाद पांच साल की उम्र में किसी अच्छे से कॉंन्वेंट में वह जा सके । एरिया के सबसे अच्छे स्कूल में यदि दाखिला मिल जाता है तो सोने पे सुहागा । मगर इसके लिए बच्चे को तोता बनाना जरूरी है  क्योंकि आजकल सभी स्कूलों में ( कुछ अपवादों को छोड़कर इन बच्चों का इंटरव्यू लिया जाता है । बच्चे के माता-पिता से भी औपचारिक पूछ-ताछ की जाती है  

ये हुई एक बात, दूसरी अहम बात यह है कि आधुनिक माता-पिता कुछ घंटो के लिए बच्चों को घर से दूर रखना चाहते हैं, ताकि उन्हें कुछ समय के लिए एकांत मिल सके । आधुनिकता के चलते या बदलते दौर में जाने – अंजाने में बच्चों से उनका बचपन छीना जा रहा है । इस बात का एहसास हमें तब होता है, जब हम उम्र के एक विशेष पड़ाव पर पहुंच जाते हैं, हमें अपना बचपन याद आने लगता है । याद आने लगते हैं गीत, कविता की कुछ पंक्तियां जिसमें ईश्वर से गुजारिश की जाती है कि हे प्रभु, मुझे मेरा बचपन लौटा दो  कितना सुनहरा होता है बचपन ! कितना निष्पाप,कोमल,सुंदर,प्यारासलोनाआजाद, सबकी आंखों का तारा होता है बचपन । काश ! हम अपने बचपन में पुन: लौट पाते ....... !

छोटा सा बच्चामानो कोई खिलती कली हो  प्रकृति की बड़ी सुंदर- सी देन, मगर प्रतियोगिता और आधुनिकता के चलते बड़े शहरों के बच्चे भी यंत्रवत जीवन जीने को मजबूर हैं । असमय ही लोग उस तोतली ज़ुबान को परिपक्व बनाने की कोशिश करने लगते हैं । बेटे तुम जल्दी से बड़े हो जाओ ताकि हम अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाएं। ’ आज हर आधुनिक मां का यही सपना होता हैं, ताकि वह जल्दी से जिम्मेदारियों से आज़ाद हो जाए । अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पाने के लिए असमय कई जिम्मेदारियों को इन बच्चों पर आज लादा जा रहा है । बच्चे ठीक से समझ भी नहीं पाते, उनकी इच्छा हो या  हो, पर वे इस तरह के हॉबी क्लासेस में जाते हैं । अपने माता-पिता और गुरुजनों की इच्छा की खातिर  इस तरह के क्लासेस चलानेवाले लोग एरिया के अनुरूप अच्छी खासी फीस भी वसूलते हैं । अपनी मनभावन और आकर्षक शैली से वे अभिभावकों को लुभाते हैं और अपना बिजनेस कम हॉबी क्लासेस चलाते हैं । 

यशराज आज 14 साल का हो गया है । उम्र के दूसरे साल से ही वह कराटेस्विमिंग,म्युजिकड्राइंग क्लासेस जाता है । अब कंप्युटर और ट्यूशन क्लास से भी जुड़ गया है । छुट्टी के दिन भी वह घर पर नहीं होता है, इस बात को लेकर वह खीझ उठता है । उम्र के साथ अब उसमें विद्रोह की भावना पैदा होने लगी है  अब वह किसी भी क्लास में नहीं जाना चाहता, अपने माता-पिता की बात भी अनसुना कर देता है  यहां तक कि ट्यूशन क्लास भी अब वह बहुत जोर जबरदस्ती से जाता है। उसका मन किसी बात में नहीं लगता, सीधे अपनी मां से लड़ जाता है । अब वह अपने मित्रों के साथ खेलना चाहता है, या फिर टीवी के कार्यक्रम देखना चाहता है, मगर घरवालों के दबाव में ज़बरन उसे क्लासेस जाना पड़ता है । किसी भी क्लास में उसका मन नहीं लगता ।

यशराज आज विद्रोह पर उतर आया है, उसके इस प्रवृत्ति लिए कौन जिम्मेदार हैयशराज की तरह कई उदाहरण मिल जायेंगे, जो असंतुष्टी ( फटीक ) दौर से गुजरते हुए मिल जाएंगे । बच्चे घर से बाहर तो चले जाते हैंपर स्कूलकॉलेजक्लास  जाकर चोरी – छिपे सायबर कैफेमनोरंजन पार्कवीडियो पार्लर या फिर सिनेमा देखने चले जाते हैं। हो न हो जाने – अंजाने में आखिर अभिभावक ही इस स्थिति के लिए जिम्मेदार होते हैं। जिस बोझ को बच्चे ढो नहीं सकते,उस बोझ को कच्ची उम्र में ढोने के लिए हम उन्हें मजबूर करते हैं। बच्चों की रुचि का हम ख्याल नहीं करते । बस अभिभावको को लगता है कि मेरा बच्चा सचिन बन जाये, लता मंगेशकर बन जाए, अमिताभ बन जाए और ना जाने क्या क्या ! वास्तव में ये उनके अपने सपने होते हैं जिसे वे पूरा ना कर सके इसलिए बच्चों के माध्यम से इन सपनों को साकार होते देखना चाहते हैं. यह एक स्वाभाविक इंसानी स्वभाव है. मगर अपने इन सपनों को साकार करने के चक्कर में ये भूल जाते हैं कि बच्चे की रुचि क्या है ! आगे चलकर क्या ये उसके जीवन में सहायक सिध्द होगा ! या फिर बच्चे के पास स्कूल, क्लासेस, ट्युउशन करने के बाद इतना समय या एनर्जी है कि वह इसे राजी- खुशी से कर लेगा ! इस तरह कई प्रकार के हॉबी क्लासेस करनेवाले ये बच्चे प्रायः जॅक ऑफ़ आल, मास्टर ऑफ नन ही होते हैं 

आंखों पर मोटे-मोटे सोडाग्लास नुमा चश्मा पहननेवाला रोहित कक्षा आठ का छात्र है। शरीर से दुबला – पतलाचेहरे पर निराकर भाव रखनेवाला रोहित अच्छे अंकों से  पास होता है। पढ़ने में वह तेज है , गणितसाइंस में वह होशियार है। कंप्युटर का उसे अच्छा ज्ञान है। मन लगाकर वह वर्ल्डबुक भी पढ़ता है। मगर सड़क पार करते समय लड़खड़ाता है । अन्य बच्चों के उपहास का शिकार होता है। उसे व्यवहारिक ज्ञान लगभग नहीं है। खेल उसके जीवन का अंग नही हैं। लोगों से मिलना – जुलनामजाक – मस्ती जैसा उसे कुछ भी नहीं भाता क्या इसे हम पर्सनालिटी डेवलपमेंट कहेंगे ? क्या हम अपने बच्चे को ऐसा ही बनाना चाहते हैं ? यही प्रशिक्षण देना चाहते हैं क्या उसे कुंठित जीवन जीने को मजबूर करना चाहते हैं ?

नहीं ना फिर बच्चे में विद्रोह की भावना जगे, इससे पहले हर अभिभावक को चेत जाना चाहिए  उन्हे उनके बचपन का भरपूर आनंद उठाने का मौका देना चाहिए। कागजी शेर की बजाय मैदानी शेर भी बनाने की कोशिश की जानी चाहिए। अन्य बच्चों से तुलना करने के बजाए अपने बच्चे की रुचिक्षमताउसकी पसंद और परिवेश के अनुसार उसे किसी एक क्षेत्र में मास्टर बनाने की कोशिश की जानी चाहिए। बच्चे तो बच्चे जैसे ही रहेंगेखेलने – कूदने से मानसिक और शारीरिक विकास तो होता ही है साथ ही व्यक्तित्त्व का भी विकास होता है  सिर्फ़ पढ़ाई, कंप्यूटर, इंटरनेट से बच्चे होम सीक हो जाते हैं  जो बच्चे किताबी कीड़े होते हैं वे किताब के गणित को बेहतर ढंग से हल कर लेते हैं पर जीवन के गणित में फेल हो जाते हैं  टॉनिक और इंजेक्शन से बच्चों को गोल-मटोल बनाने की बजाय प्राकृतिक विकास से यदि बच्चों को फलने -फूलने दिया जाना चाहिए हॉबी जरूरी है पर कब कितना इसका अध्ययन और भी जरुरी है। बचपन के इस दौर में हर बच्चे को कागज की कश्ती और बारिश का पानी का खेल भी खेलने का मौका देना चाहिए । वास्तविक विकास के लिए यह बेहद जरूरी है ।