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कोई कॉलेज के पहले बरस में किसी को नज़र भर देखकर उसके प्रेम में पड़ जाए, पर कभी कह न सके ...आप कहेंगे इसमें नया क्या है, ऐसा तो होता ही रहता है। जीवन में ऐसे कई लम्हे आते-जाते रहते हैं। कभी हम उन्हें जी लेते हैं तो कभी वे हाथ से निकल जाते हैं । फिर हम चाहे जितना दुःख मना लें...पर जीवन नहीं रुकता...गुजरता वक्त बीते चित्रों को धुँधला भी कर देता है और घावों पर मलहम लगाकर उन्हें सहला भी देता है....लेकिन अगर कोई उस प्रेम को 41 बरस सीने में छिपाकर रखे, कॉलेज की मेगजीन पर छपी एक श्वेत-श्याम तस्वीर को सहेज कर, उसे ही अपना संबल बना ले...सारे दुन्यवी फर्जों और जिम्मेदारियों को ईमानदारी और प्रेम से निभाए....और जब सोशल मीडिया मुहैया करा दे बिछड़ों को ढूंढने के अवसर, तो बार-बार उस एक नाम को टाइप करके सर्च भी कर ले....और बिना किसी जवाब की उम्मीद के उसे मेसेज भी कर दे, बस इसलिए कि 41 बरस तक सँभाले गए इस सच को अब  बोले बिना चैन से मरा नहीं जाएगा....तो आप सब यही कहेंगे न कि ऐसा तो बस फिल्मों में होता है। मैं भी यही कहती अगर ये मल्लिका जी की आपबीती न होती।

एक सांवली सी लड़की, जिसने अपने चारों तरफ बचपन से ही धर्म और जाति के बंधन देखे। जिसे कॉलेज में पढ़ने के एवज में माँ-बाप के विश्वास को बनाए रखना है, वह कैसे किसी गोरे-चिट्टे, हैंडसम विधर्मी लड़के जिसका नाम अश्विन है, को अपने मन की बात बता सकती है!
41 बरस के बाद मल्लिका मेसेंजर में एक मैसेज छोड़ती है उस लड़के के लिए, जो अब लॉसएंजेलिस में रहता है....धीरे-धीरे लड़के को भी याद आती है मल्लिका...और शुरू होती है चैट....जिसमें अतीत के किस्से हैं, चुहल है, छेड़खानी है....अश्विन का संघर्ष भरा जीवन है,  भारतीयों के अमेरिका मोह का दुःखद सच है, और इतने बरस बाद वर्तमान में एक दूसरे से बात कर पाने का सन्तोष है। इस पूरी बातचीत को एक किताब की शक्ल देने का वायदा भी ताकि बच्चों की परवरिश में होने वाली गलतियाँ समाज तक पहुँच सके। बिना किसी व्यवस्थित शिक्षा और डिग्री के विदेश का जीवन कितने संघर्षो से भरा है, यह बताया जा सके; लेकिन क्या यह निर्णय लेते वक्त अश्विन और मल्लिका को यह रूहानी प्रेम, दुनिया और परिवार के सामने आ जाएगा, यह डर न सताया होगा?

मैं सोचती हूँ कि कोई और लड़की होती तो क्या वो भी मल्लिका की तरह साहस करती? शायद नहीं, लेकिन यह तो मल्लिका है, जो अपनी हर कमजोरी को पछाड़ते हुए आगे बढ़ी है। जिसने सच का साथ कभी न छोड़ा और जो जीवन भट्टी में तप कर सोना हुई। यहाँ एक पुरुष हर पल खड़ा है मल्लिका के साथ। उसके पति पार्थो, जो उसके जीवन के हर सच से परिचित हैं और उसे मजबूती से थामे हुए हैं, लेकिन अश्विन को चाहने वाला सच तो पार्थो को भी नहीं पता, क्योंकि जो बात कभी शुरू ही न हुई हो, उसे क्या बताना! अगर पता हो तो भी उसे अतीत मानकर स्वीकारने वाले और सहजता से लेने वाले पुरुष मिल जाएंगे, मगर 41 साल बाद फिर से उस पात्र का जीवन में आना, उससे बात करना और अपने सच को किताब की शक्ल देना यह कौन पुरुष स्वीकार कर पाएगा? मगर पार्थो न सिर्फ इस सच को सुनते हैं बल्कि कई बार मल्लिका, अश्विन से बात कर सके इसलिए उसके हिस्से के कुछ काम भी निपटा देते हैं। और अगर इस तरह देखूं तो पार्थो के प्रति मैं असीम श्रद्धा से भर उठती हूँ। अश्विन के लिए यह निर्णय शायद कुछ सरल रहा होगा, क्योंकि एक तो वो भारत बीते तीस  बरसों से आए ही नहीं है, अतः कौन क्या कहेगा यह मुश्किल कुछ कम रही होगी, दूसरा अपनी बीमारी के कारण भी वे अपने शेष जीवन को लेकर शंकित होंगे और यह निर्णय ले सके होंगे।

मैंने इस उपन्यास को किसी विधा की कसौटी पर नहीं तौला, क्योंकि यह संभव ही नहीं था मेरे लिए। मैं तो बस इतना जानती हूँ कि इस उपन्यास को मैंने तब पढ़ा जब मैं खुद अपनी स्प्रिंग एलर्जी के कारण बेहद कठिन दिनों में थी। यहां एक बाद स्पष्ट करना चाहूंगी कि यह एलर्जी इतनी सीवियर होती है कि एक महीने तक मेरी आँखें और नाक बर्बाद हो जाते हैं। मुझे किसी से बात करना, कुछ लिखना-पढ़ना अच्छा नहीं लगता। इन दिनों में, अगर मैं किसी से बात करती हूँ तो निश्चित ही वे लोग मेरे जीवन में मायने रखते हैं। ऐसे दिनों में इस उपन्यास ने खुद को मुझसे पढ़वा लिया। इस उपन्यास के दूसरे मुख्य पात्र अश्विन अब इस दुनिया में नही हैं, लेकिन आपने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया, मल्लिका जी। आपने दोस्ती और प्रेम को अमर कर दिया।

आपको ढेर सारा प्यार। अहमदाबाद अब जब मिलेंगे, तब आपके गले लगकर एक बार इस मल्लिका को मिलूँगी। अब तक अहमदाबाद आने पर आपसे मिलती थी, अब एक बार पार्थो जी से भी मिलना चाहूँगी, और पूछूँगी ईश्वर से कि ऐसे पुरुष अब क्यों नहीं बनाते प्रभु...?

- डॉ. मालिनी गौतम,
एसोसिएट प्रोफ़ेसर, संतरामपुर
गुजरात