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बातें न हों तो कितना सूना सूना लगेगा। है न ? सुना है देश का विकास बातों से होता है। बातें ही देश के विकास का प्रतीक होती हैं। यानी बातों की भी सरकार होती है। बातों का क्या है करते जाओ। सुनने वाले के कान तो खुले ही होते हैं। इस लिए बातें करने वाले अच्छी तरह जज कर लेते हैं कि कुर्सियों पर बैठकर ज्यादा मशक्कत करने की जरूरत नही है। जब बातों से ही देश चलाया जा सकता हो। तो बातें करने की अपनी हसरतों को पूरा किया जाना पहली प्रायरोरिटी होनी चाहिए। 

                 यहाँ बातें ही बिकती हैं। कहीं भाषण बटते हैं। इन्ही चीज़ों में महसूस कराया जाता है कि यही विकास है। और हम भी कितने ज्ञानी हैं कि आसानी से विकास रुपी बातों के इस ठन्डे ठन्डे झरनों के नीचे बैठकर पांच साल नहाने का आनंद उठाते रहते हैं। यहाँ बातों का अमल ही बड़ा कमाल का है। जो अमल नही होता यहाँ वही घोषित कर दिया जाता है। अमल करने और करवाने वाले बड़ा उम्दा दिमाग रखते हैं। 

               जब बातें इंटरनेशनल हों। और सुनने वाले का कोई नेशनल - वेशनल ही न हो। तो बातों का विकास हौसले की उड़ान भर लेता है। बातों का रूप भी माशूका की तरह होता है। जहाँ मीठी तथा लुभावनी बातों का मुँह खुला। जनता जनार्दन आशिक बनकर बातों पर फ़िदा हो जाती है। बातों ने ही हर मसले को जन्म दिया है। बातों ने ही हर विरोध को पोषित किया है। जहाँ बातें बनने की होती हैं। वहां बातें ही बात को बिगाड़ देती हैं। 

                समाज हो या परिवार इन बातों ने ही पतन की तरक्की में चार चाँद लगाएं हैं। बातें न हों तो इंसान अपनी पुश्तैनी बातों का ज़र्रे बराबर भी विकास नही कर सकता। बातें ही हमारी पहचान हैं।बातें ही हमारे इनाम हैं।बातें ही शादियों का डाइवोर्स हैं। बातें ही मोहल्ले के दादा होने की प्रतीक हैं। बातें ही बीमार कुंठित लोंगो का इलाज़ हैं। 

            बातें ही खुशियों का उपहार हैं। सोचिए बातें न होतीं तो बड़े बड़े राष्ट्रीय मंच न होते। बातें न होती तो नेता न होते। और नेता न होते तो बातें कब की दफ़न हो गई होतीं। बातों का अपना अलग वक़ार होता है । बातें औरतों की पहचान हैं। बातें जब होती हैं ,तो बातें ही होती हैं। बातें रुकने की रुकने की परंपरा नही निभातीं। बातें हर हाल में अपनी बातों को मनवाने की सलाहियत रखती हैं। 

          बातें घर घर को आबाद कम नकारात्मक ढंग से बर्बाद ज्यादा करती हैं। बातें जहाँ चाहती हैं ,वहां अपने झंडे गाड़ देती हैं। बातें अपनी बातों से मीडिया से रिश्ता बनाकर चौथे स्तम्भ को मजबूत करती हैं। बातें सियासी दलों में हौसला पैदा करती हैं। कोई दल दलबदल हो जाए तो बातों का बहुत बड़ा योगदान होता है। बातें ही सियासत और सियासतदानों को सियासत करना सिखाती हैं। बातें ही विरोध का स्वर तय करती हैं। आंदोलनों को मजबूत करती हैं।


          .  बातें ही इस संसार को जोडे रखती हैं। बातें ही बातों की गरिमा बनाए रखती हैं। बातें हैं तो सब कुछ है। बिना बातों के बातों की हस्ती के माएने ही क्या ? बातें हैं तो सब कुछ और बातें नही तो कुछ भी नहीं । तो कीजिए न बातें यहाँ हर इंसान सुनने के लिए बेकरार है। 

   

    आसिम अनमोल