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जब मैं छठी कक्षा या उसके आसपास थी तब बड़े शौक से डिस्कवरी चैनल पर आने वाले दो कार्यक्रम देखा करती थी। नियमित और नियम के साथ। कार्यक्रम वाकई थे भी बहुत अच्छे। नाम था 'मेडिकल डिटेक्टिव' और 'एफ बी आई फाइल्स'। नाम से ही इनके बारे में पता चल रहा है। होता यह था कि किसी का क़त्ल हो जाता था और फिर सबूतों की मदद से खूनी का पता लगाया जाता था। इसमें मेडिकल साइन्स की मदद ली जाती थी। ऐसे ही दूसरा कार्यक्रम भी था। हादसे की जगह को अगर कोई चालाक खूनी दुरूस्त भी कर देता था तब भी डिटेक्टिव बाल तक से भी डीएनए का पता लगा लेते थे। अगर कुछ भी हाथ न लगे तब एक 'ल्युमिलोन' नामक रसायन का छिड़काव किया जाता था। मेरे लिए यह कमाल की जानकारी थी। यदि कहीं खून गिरा हो और उसे साफ कर दिया गया हो तब इसे छिड़क कर अंधेरा कर दिया जाता था। जहां जहां खून गिरा होता वह जगह हरे रंग की चमकने लगती थी। यह एक पक्का सबूत होता था क़ातिल के झूठ के खिलाफ। कार्यक्रम के अंत में कहा जाता था- 'क़ातिल कितना भी चालाक क्यों न हो वह कुछ न कुछ गलती कर ही देता है। इसे पकड़ने के लिए मेडिकल साइन्स एक शानदार उपकरण है। किसी को इंसाफ दिलाने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।' वाह! क्या बात है! मुझे इस कार्यक्रम की लत ही (समझ लीजिये) थी। आराम से पढ़िये। इस कहानी की वजह है।

सरकारी स्कूल की उपज हूँ। पाठ्यक्रम इतने सपने दिखाने के लिए बने होते थे कि सच का मालूम ही नहीं चलता था। टीचर ने निबंध लिखने को दिया- 'आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?' सच में इससे घटिया काम कुछ और हो ही नहीं सकता था। यह क्यों नहीं पढ़ाते की आप हो क्या? किसी बीज की रुपाई कैसे करते हैं? लकड़ी का बक्सा कैसे बना सकते हैं, बीज हर चीज से क्यों क़ीमती होते हैं, अपने जीने खाने का सामान कैसे उगाया जाता है.., आदि आदि। मुझे आज तक पाइथागोरस प्रमेय का फायदा ही नहीं मिला। एक्स(x) और वाय(y) का वैल्यू निकाल कर अभी तक समझ नहीं आया कि आखिर चक्कर क्या था! वो क्या है न, मैं आर्ट्स की फ़ेलो हूँ सो गणित में हाथ तंग ही है।

ख़ैर, मैंने साफ लिखा कि मुझे डीएनए स्पेशलिस्ट बनना है। मैम चार दिन बाद जब कॉपी चेक करने लगी तो हंस दीं। उनकी हंसी अच्छी नहीं लगी। मुझे मालूम चल गया था। मुझे अच्छा नहीं लगा। दसवीं कक्षा के बाद जब अगली पायदान पर गई तो पता चला कि स्कूल में साइन्स की शाखा नहीं है। मैंने वाणिज्य की पढ़ाई कर ली। कॉलेज में कला के विषयों में हाथ लगा लिया। जो भी पढ़ा मन से। आज मैं डीएनए विशेषज्ञ नहीं हूँ। लेकिन मैं ज़िंदा हूँ। अब उस सपने की जगह दूसरे सपने सेट कर लिए हैं। अगर वो भी नहीं हुए तो दूसरे सपनों का उत्पादन कर लूँगी। ज़िंदगी से बढ़कर कोई चीज नहीं है। हर रोज़ उठना और जीना, यही है सबसे बड़ा काम। इससे बड़ा कुछ भी नहीं।

कुछ दिनों पहले मेरी रोज़मर्रा से कुछ ऐसे लोग टकराए जो हारे हुए ही नहीं बल्कि मानो जी भी नहीं रहे थे। उन्हें इस बात की चिंता थी कि आखिर आगे क्या होगा, नौकरी मिलेगी या नहीं, इतनी पढ़ाई कर के कोई काम नहीं मिलेगा तो पढ़ना ही बेकार है, हमारे पास तो सिफ़ारिश ही नहीं है, हर जगह आपाधापी है, कुछ नहीं पाया तब...कुछ ऐसी ही वाजिब चिंताएँ मैंने अपने खुद के लोगों में महसूस की हैं। मुझमें भी कुछ हद तक हैं। मैं भी इनसे फारिग नहीं हूँ। यह कुछ न बनने या कुछ हासिल न हो पाने का अहसास डरपोक बना गया है। दिमाग में यह इतना हावी हो जाता है कि हम अपने आसपास के बाकी खुले हुए विकल्पों को पहचान ही नहीं पाते। वास्तव में होता तो बहुत कुछ है, पर हमारे पास विकसित नज़र नहीं होती। इसमें गलती हमारी भी नहीं होती कई बार। स्कूल में ही लाईन लगवाकर एक दिमागी सेटिंग कर दी जाती है। एक ही दिशा। एक  ही ओर देखने के लिए प्रेरित किए जाते हैं हम। जबकि दिशा हर जगह होती है। गौर कीजिये मुझे ऐसा लगता है। आपको नहीं लगता तो इसमें कोई गुस्से वाली बात भी नहीं। बहुत पहले एक निजी स्कूल का टीवी पर विज्ञापन आता था। उसमें बच्चों  के संदर्भ में कहते थे- (स्कूल) 'यहाँ स्टैंडर्ड बनाए जाते हैं!' हद है इंसान बना रहे हो या मशीन। इन कमबख्तों ने ही सबसे ज़्यादा फ़ेल किया है।

कुछ दिनों पहले एक शख़्स ने कहा कि लड़कों में करियर बनाने का दबाव ज़्यादा होता है। शायद ऐसा हो सकता है। क्योंकि यह बात साफ दिखती है कि लड़कों के लिए आर्थिक क्रियाओं में रहना अनिवार्य है। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि औरतें या लड़कियां आर्थिक क्षेत्र में सक्रिय नहीं होतीं। उनकी भी अब के समय में अनिवार्यता बढ़ रही है। यही नहीं, उनका भी लंबा इतिहास रहा है। शहरों मैंने देखा है कि बारहवीं पास करने वाली लड़कियां भी किसी न किसी तरह के काम की तलाश में जुट जाती हैं। बाकायदा उनका एक ऐसा सर्कल है जो एक दूसरे को काम से जुड़े हुए लीड्स मुहैया करवाता है।

घर से आने जाने के रास्ते में मुझे एक लड़की मिलती है उसकी उम्र मुश्किल से बीस या इक्कीस बरस की होगी। धीरे-धीरे मेरी और उसकी एक अच्छी जान पहचान हो गई है। उससे बात कर के मालूम चला कि वह किसी तरह के बीमा करने के काम से पिछले दो साल से जुड़ी है। उसकी तरक्की हो चुकी है। सैलरी का मैंने कभी किसी से नहीं पूछा। लेकिन उसके हाव भाव और उसकी समझदारी भरी बातें सुनकर मैं हैरान हो जाती हूँ। इतनी कम उम्र में इस तरह की समझदारी उसे घर से बाहर के माहौल और लोगों से मिली है। मैंने उससे पूछा, 'किताब पढ़ती हो?' वो अनमना चेहरा बनाते हुए बोली- 'मेरी बस की बात नहीं। ऐसे ही वक़्त नहीं मिलता।' इसके अलावा मैंने यह भी देखा है कि यदि बस में कोई बड़ा-बूढ़ा आ जाए या कोई ऐसा जिसे सीट की जरूरत हो, वह तुरंत उठ जाती है। कभी किसी बात से कोई शिकायत नहीं सुनने को मिली। उसकी एक दोस्त है। उसे भी मैंने लगभग इसी तरह की विशेषताओं में पाया है। जब मैं उन लोगों से उन दोनों की तुलना करती हूँ जो बहुत पढे लिखे हैं, जिनको हर तरह का किताबी कला ज्ञान है, जो उम्र में बड़े हैं, जो नफासत से पेश आते हैं, जो ढेरों लोगों में उठते बैठते हैं, जिन्हों ने देश ही नहीं दुनिया की भी सैर की है, जिन्हों ने किताबें लिखी हैं...तब ये लोग मुझे बेहद हल्के मालूम होते हैं।

यकीन मानिए जितना मैं किताब से नहीं सीख पाई उतना इन दो कम उम्र लड़कियों से सीखती हूँ। दोनों शाम को काम से एक मुस्कुराहट के साथ लौटती हैं। दोनों मिलकर और पैसे मिलाकर मोमोज़ खाती हैं। कोई फिक्र नहीं। बस यही की कल काम पर जाना है। कुछ जरूरी काम निपटाने हैं। इसलिए अब मुझे अपने आप में रहने वाली बहुत सी शिकायतों से शिकायत नहीं होती। ठीक है न कुछ नहीं बन पाऊँगी। पर इतना है कि एक बेहतर उम्र जरूर जिऊंगी। खुद से अपेक्षा भी बहुत नहीं है। दो जोड़ी कपड़े और दो वक़्त का खाना मिल जाये तो यह भी बेस्ट बात है। मुझे गाड़ी नहीं चाहिए। घर की इच्छा है लेकिन जो न भी बना पाई तो यह कहकर अफसोस को ठंडा करूंगी कि शहर में महंगे घर मिलते हैं। अपने बस में नहीं खरीदना। एक मंत्र यह भी कि जितना कम सामान उतनी कम फिक्र। यह सब छोटी छोटी बातें जिन पर गौर करना बेहद ज़रूरी है। क्या हम गौर कर रहे हैं इन बातों पर? सोचिए!

अब बात रिश्तों पर की जाये। यह सबसे नाजुक होते हैं। शर्तें बहुत हैं। वो कहते हैं न टर्म एंड कंडीशंस अप्लाई टाइप का कुछ। मैंने बहुत लोगों को कहते सुना है कि रिश्तों में शर्त नहीं होती। सब झूठ लगता है। होती है, होती है ...पचास बार कहूँगी होती है। चाहे दोस्ती हो या कोई और रिश्ता। हर चेहरा अपना काम निकलवाने के मकसद को हाथ में लेकर आपके सामने खड़ा है। (कुछ रिश्ते बाहर हैं इन सब से) यही वक़्त की दरकार है। 

हमारी चाहत और जरूरत हमारे एक्शन को भयंकर तरीके से बदल देती है। जितनी बड़ी चाहत या उम्मीद उतनी बड़ी पहेली या दुविधा। फिर पूरा हुआ काम तो खुशी और नहीं हुआ तो डबल झटका। दिमाग में निराशा और चेहरे की रंगत उड़ जाएगी। मेरे से कई भयंकर काम हुए हैं शायद। मैंने तुरंत अहसास होते ही माफी भी मांग ली। इसके अलावा मैं जान नहीं दे सकती। ज़िंदगी से बढ़कर कुछ भी नहीं। जो आपके साथ रहना चाहेगा वह जरूर रहेगा चाहे आप कितनी ही गलतियाँ कर दें। लेकिन जो आपको अपनाता ही नहीं उसे आपका हर एक एक्शन खराब मालूम होगा। खुद निकाल दीजिये ऐसे लोगों को। जो नहीं निकाल सकते तो एक कम्फर्ट मोड-ज़ोन बनाइये और सुरक्षित रहिए। एक बात और कहीं तो बुरा भी बनिए। भगवान बनने की ज़िद्द अच्छी बात नहीं।  

मेरी किसी दोस्त ने वाट्स एप पर एक चित्र लगाया है जिसमें लिखा है- 'जैसे ही आप मरते हो, आपका खुद का नाम भी आपका सम्बोधन नहीं रह जाता। लोग आपको डेड बॉडी या लाश कहकर बुलाने लगते हैं। लोगों को आपको जल्द से जल्द दफ्न करने की या अंतिम संस्कार करने की पड़ी रहती है। इसलिए आप जियो। खूब जियो। हंसो इतना जब तक पेट दर्द न होने लगे। डांस बहुत बुरा करते हो फिर भी नाचो अगर मन है, फोटो खिंचवाते समय बेवकूफी वाले जेस्चर बनाओ, बच्चे की तरह रहो, याद रखो! मौत ज़िंदगी का सबसे बड़ा घाटा नहीं है। घाटा तो वह है जब आप जीते हुए अपने अंदर ही अंदर मरते हो।'

हैं न गज़ब की बात! बस यही चीज समझने की जरूरत है। हम दूसरे को खुश करने के लिए जब तक जिएंगे तब तक खुद नहीं जी पाएंगे। हमारी जिंदगी में जो भी हो रहा है उसे हम पूरी तरह से नियंत्रित नहीं कर सकते। इसलिए 'बीटल का मशहूर गीत सुनिए - 'let it be...' अच्छा लगेगा। जितना हो सके लोगों से अच्छे बुरे अनुभव बटोरिए। यही सब आगे बहुत काम आएगा। करियर भी आगे बन ही जाएगा। मेरी माँ कहती हैं, 'वो भी (डॉक्टरी) भला क्या पेशा है। हाड(हार्ड) दिल वाले करते हैं। खून-खांसी...राम राम!अच्छा है जो नहीं बनी। जो है वही अच्छी है। सब अच्छा है। क्या चाहिए!' यह बात सही है कि पढ़ाई लिखाई से हमें अपने करीयर को भी बनाना है लेकिन क्या सिर्फ वही है ज़िंदगी का एक पहलू? जवाब है- जी नहीं। कतई नहीं। जीने के लिए कुछ बनने की जरूरत नहीं है। जो हो जैसे हो...उसी में कुछ घोल लो। अपना प्रयोग कर के अपना विलयन तैयार करो।

कुछ वक़्त से ऐसे लोगों से मिल रही हूँ जो किसी न किसी तरह की परेशानी में हैं। लेकिन जब बात कर के देखा तो वे परेशानियाँ उतनी बड़ी नहीं थीं, जितनी उनको माना गया था। मेरे साथ भी ऐसा ही है। मैं इन सब से इतर नहीं हूँ। लेकिन अभी सीख रही हूँ। यह सीखना बेहद रोमांचक है।

कुछ समय पहले दीदी ने एक औरत के बारे में मुझे बताया कि वह एक सुबह काम पर जाती है और देर रात तक आती है। फिर घर के काम निपटाना वो भी गाते हुए। 'चेहरा क्या देखते हो दिल में उतर कर देखो ना...दिल में उतर कर देखो ना...' दीदी को इसलिए वह खास लगी कि तमाम तरह की परेशानियों और बातों के बावजूद वह गीत गाती है। कुछ तो सीखना ही चाहिए, इन आम किरदारों से।  

सोचिए पाइथागोरस प्रमेय जानकार भी जी ना पाये तो क्या जिये! इसलिए कुछ ऐसी प्रमेय तो खोजनी ही चाहिए। ...उफ़्फ़! अब गणित का दर्द लेकर मत बैठ जाना। मैं इस प्रमेय को 'पथ में मिलने वाले परम रस' मान कर याद  रखती थी। इसलिए अपनी शैली चिपका ली। आपकी शैली भी होगी। खोज निकालिए अपने अंदर के हुनर बाबा को..!

...........चित्र- स्टारी नाइट- विंसेंट वॉन गॉग