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          हमें ज्ञात है कि बचपन में बड़े लोगों के पास पाकेट डायरी और जेब से उसे निकाल उन्हें उसके छोटे-छोटे पन्ने पलटते और उनमें से किसी एक लिखते हुए जब देखता तो मेरी उत्सुकता बढ़ जाती और अपनी ललचाई निगाहों से देखता कि काश मुझे भी ऐसा करने को मिल जाते। घर आकर मां से जिद करता और कहता मां! मेरे लिए डायरी बना दो ना। मां किसी पुरानी कापी के पन्ने निकाल कर उसके चार बराबर साइज़ के टुकड़े कर उसे सुई धागे से सिल डायरी नुमा बना मुझे दे देती। तब मैं खाली पन्नों में कभी पड़ोसी साथियों के नाम लिखता ,कभी पाउडर दंत मंजन के कांच की शीशी का लोहे का ढक्कन निकाल उस पर गोलाकार आकृति में उभरे अक्षर वाले भाग को गाढ़ी नीली स्याही में डुबोकर पन्नों पर लगाया।पता नहीं क्यों,यह सब करने से आनन्द मिलता। जैसे जैसे मैं बड़ा होता गया , मुझे और भी डायरी को सजाने और संवारने का चस्का लगा । कभी उसके कवर पर हार्ड कार्नर लगाता और कभी पन्नों को किनारों को ब्लेड से काटकर ए0 बी0 सी0 डी0 वगैरह लिखता। खैर यह तो रही बचपन की बात,पर जब से मुझे समझदारी आयी, मुझे पता नहीं क्यों,डायरी से रिश्ता बड़ा प्रगाढ़ लगा। हमें। याद आ रहा कि घर अथवा स्कूल की छोटी छोटी घटनाओं वह समस्याओं को इसके पन्नों में तारीख और समय डालकर लिखता, बच्चों के टियूशन के महीने के अंत में धनराशि मिलने पर आवक और खर्च को जावक कम रूप में लिखता । शहर की वेल्फेयर या पब्लिक लाइब्रेरी जाकर कुछ कठिन अंग्रेजी के शब्द, महत्व पूर्ण खबर, कादम्बिनी, धर्मयुग, नन्दन , कंप्टीशन मास्टर आदि पत्रिकाओं से विचारोत्तेजक लेख वह कविता पढ़कर उसका सार भाग डायरी में लिखता।            सच कहूं, तो इस डायरी ने मां या कभी उससे बढ़कर सच्ची मार्गदर्शिका , मेरे पूजास्थल बन मेरी आत्मरुदन की प्रार्थना सुन वाहक,देर रात तक स्वाध्याय करते एकाकीपन में आत्मिक होकर जीवन के क्षण क्षण उठते लहरों, झंझावातों में सच्चा साथ निभाया।आपको अत्युक्ति लग रहा होगा कि डायरी को मां से बढ़कर बताया,पर  यह ऐसा नहीं। कारण मेरी मां मेरे साथ हर जगह न रह सकती थी,न जा सकती थी और न ही हम अपनी पीड़ा को आत्म रुदन के रूप में कह सकते थे। पर डायरी ने अपने पन्नों को हर क्षणों  में सहर्ष खोले रखकर हमें बहुत सम्हाला। हमें सदा संयम और नियम सिखाया। हमें अच्छी तरह याद है कि जब इसके पन्नों की पीठ पर कुछ लिखता तो पहले"सदा सहायं भारती," लिखता।ऐसा लगता कि जैसे हमको प्रेरित करती हो। उम्र के आख़िरी पड़ाव पर अब मैं हूं। अतः मैं कह सकता हूं कि हमने जो कुछ भी पाया इसकी वजह से पाया,और खोया तो अपनी लापरवाही से।


 

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Date: Fri, 16 Jul 2021 11:52:32 +0530

Subject: पुरानी डायरी,,,

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