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यूँ तो मुग़लिया दौर को आधार बनाकर भारत में पहले भी कई हिन्दी फिल्में बनी लेकिन हाल में रिलीज हुई ओम राउत की फिल्म तानाजी उन फिल्मों की श्रृंखला से थोड़ी अलग नज़र आती है। इसका कारण है फिल्म का एक ऐसे गुमनाम मराठा नायक की ज़िन्दगी पर आधारित होना जिसे इतिहास में कम ही पढ़ा गया है या यूँ कहें कि एक राज्य विशेष के बाहर शायद ही जिसकी चर्चा पहले होती रही होगी।सत्रहवीं सदी के योद्धा तानाजी मालुसरे के जीवन पर आधारित इस फिल्म में मराठा और मुग़ल साम्राज्य के बीच के संघर्ष को दर्शाया गया है।


कहानी की पृष्ठभूमि में पुरन्दर की संधी है जिसमें शिवाजी महाराज को 23 किले औरंगजेब को समर्पित करने पड़ते हैं। इन किलों में सामरिक महत्व रखने वाला कोंढ़ाणा भी है जिसे शिवाजी महाराज की माँ जीजाबाई वापस पाने का दृढ़ संकल्प करती हैं। मुग़लों से किले को दोबारा हासिल करने की प्रतिज्ञा ही पटकथा की नीव रखती है। 150 करोड़ की बजट से बनी इस फिल्म की कहानी दिलचस्प है और इसका वर्णन बेहद रोमांचक तरीके से किया गया है। कई असंभव से लगने वाले दृश्यों को देखकर ऐसा लगेगा जैसे पात्रों में अलौकिक शक्ति आ गई हो जोकि योद्धाओं पर आधारित हिन्दी फिल्मों में हमे प्राय:देखने को मिलते हैं।  


मुख्य पात्र तानाजी मालुसरे के रुप में अजय देवगन दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ते हैं और लोगों को खुद से भावनात्मक तौर पर जोड़ने में कामयाब होते हैं। पत्नी सावित्रीबाई के किरदार में काजोल मुख्य पात्र के पूरक का काम करती हैं। काजोल का रोल छोटा लेकिन असरदार है। मुग़लों के सूबेदार उदयभान सिंह राठौर का नकारात्मक किरदार सैफ अली खान ने निभाया है जिसे बेहतर अभिनय के कारण उनकी कुछ खास चुनिंदा भूमिकाओं में शुमार किया जाएगा। फिल्म में अजय देवगन के साथ उनकी अच्छी टक्कर देखने को मिलती है। धैर्यवान,गंभीर और तानाजी के घनिष्ठ मित्र शिवाजी महाराज की भूमिका के साथ शरद केलकर ने न्याय किया है। लूक केनी के चेहरे की बदौलत औरंगजेब के किरदार को नयापन देने की कोशिश की गई है।नेहा शर्मा कहानी में महत्वपूर्ण पात्र हैं लेकिन उन्हें अपने अभिनय को दिखाने का थोड़ा ही वक़्त

मिल पाया है। सहायक किरदारों की अच्छी एक्टिंग फिल्म का मजबूत पक्ष है।


फिल्म के लोकेशन कहानी और वक़्त के अनुसार सटीक बैठते हैं, जिन्हें भव्य तरीके से पर्दे पर दर्शाया गया है। ऐतिहासिक ईमारतों के लुभावने नजारे अच्छी तकनीकी कुशलता को सिद्ध करते हैं। युद्ध के दृश्य और क्लाइमैक्स लोगों को उत्सुकता और रोमांच से भरने में सफल हो पाते हैं। उमंग, आस्था से भरे गानें एक विशेष उर्जा का एहसास कराते हैं। कुल मिलाकर देखें तो फिल्म दर्शकों की उम्मीद पर खरी उतरती नज़र आती है और आने वाले समय में भी लोग इस तरह की अनकही कहानियों को पर्दे पर जरुर देखना चाहेंगे।