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गणेश चतुर्थी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ, गणपति आपकी हर मनोकामना पूरी करें। पंडालों में, घरों में आपकी धूम अगले कुछ दिनों तक रहेगी। हम आपको पूजेंगे आपकी आराधना करेंगे। सनातन देवी देवताओं में आप और कृष्ण हम सभी के भगवान न हो कर मित्र और माताओं के पुत्र माने जाते हैं। हम आपको मेहमान के रूप में घर आमंत्रित करते हैं आपके साथ रहते हैं और आप भी उतने ही स्नेह से हमारे साथ। फिर आपके जाने का वक़्त आता तब हम नम आँखों से पुढच्या वर्षी लवकर्या विदा करते हैं।

आपको पंडालों में स्थापित करने का इतिहास ज़्यादा पुराना नहीं है। दौर आज़ादी के लिए जारी क्रांति का है,लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे के संघर्ष के बाद अगले बीसवीं सदी की शुरुआत में भारतीय क्रांति धार्मिक धरातल पर शुरू हुयी। स्वामी विवेकानंद ने इसकी वृहद् शुरुआत की। तत्पश्चात लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने धार्मिक अनुष्ठानों के ज़रिये भारतियों को अंग्रेज़ियत या अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ किया। इन्हीं अनुष्ठानों में गणपति स्थापना प्रमुख है। पंडालों में उत्सव के दौरान तिलक लोगों को अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ जागरूक कर रहे थे और क्रांतिकारीयों की ये योजना अंग्रेजी प्रशासन को समझ नहीं आई । धीरे धीरे ये उत्सव देशभर में मनाया जाने लगा और अंग्रेजों से आज़ाद होने के बाद आज भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

तिलक और अन्य क्रांतिकारियों के सपनों का भारत क्या यही भारत है? अंग्रेजों से आज़ादी तो मिल गयी किंतु क्या अंग्रेज़ियत से मिली? आज हम हिंदी में बात करने से कतराते हैं। विद्यालय हिंदी को ताक पर रखते हैं। मेरा खुद भी हिंदी में हाथ तंग है लेकिन मैं इसे अपनी कमी समझकर इसे दूर करने के लिए प्रयासरत हूँ। हमारे देश के भविष्य उन हाथों में हैं जिन्हें नमस्कार सुन कर बड़ा अजीब ख़याल आता है वे अजीब सा मुँह बना लेते हैं। विद्यालयों में अंग्रेज़ी का बोलबाला है और मैं इसके ख़िलाफ़ भी नहीं हूँ क्योंकि यह एक अंतराष्ट्रीय भाषा है लेकिन उसी विद्यालय में राष्ट्र भाषा को तुच्छ समझने वाले भी हैं। आज कई बच्चे ऐसे हैं जिन्हें जूता नहीं पता कि क्या है किन्तु शूज़ पता हैं और इसी को शिक्षक और अभिभावक साक्षरता समझते हैं।
जिन्हें हिंदी कमज़ोर लगती है  मैं उन्हें बता दूँ "चीनी के बाद विश्व में बोली जाने वाली यह दूसरी बड़ी भाषा है। अंग्रेज़ी नहीं। भाषा विकास वैज्ञानिकों के अनुसार यह आने वाले समय में विश्व स्तर की भाषा बनने का माद्दा रखती है।

भाषा सीखें किन्तु अपनी भाषा का अपमान न करें । ख़ास तौर पर शिक्षक क्योंकि आपके जिम्मे देश की भावी पीढ़ी है आपको मैंने जिस तरह हिंदी के प्रति जिस तरह खिन्नतापूर्ण देखा है उससे मैं विचलित हूँ। क्योंकि आपने एक ऐसी पीढ़ी पहले ही तैयार कर दी है जो हिंदी को तुच्छ मानते हैं और अब ऐसी तैयार कर रहे हैं जिन्हें अपनी ही भाषा में रोज़ाना उपयोग की वस्तुओं के नाम तक हिंदी में नहीं पता।

इस गणपति आओ हम कोशिश करें, कि अंग्रेज़ों से आज़ाद होने के बाद हम अंग्रेज़ियत से भी आज़ादी पाएँ।
मतलब यह नहीं की अंग्रेजी से परहेज करें भाषा सीखें किन्तु अपनी भाषा का सम्मान करें।

गणपति उत्सव की ढेरों शुभकामनाओं के साथ आपका अपना

प्रियेश पाल "अज्ञात"