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        हम सभी जानते हैं कि स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्र को एक मंच पर लाने और  एक साथ स्वर मिलाकर आवाज उठाने में हिन्दी की अहम् भूमिका रही है।आज हिंदी इतनी सक्षम है कि उसमें चिकित्साप्रौद्योगिकीकृषि,कम्प्यूटर आदि विधाओं में वैज्ञानिक रचनायें लिखना सरल और सहज हो गया है। हमारे भारतीय वैज्ञानिक श्री जयंत नार्लीकर ने भी यह प्रमाणित किया कि चरक और सुश्रुत ग्रंथ वास्तव में सर्वोत्कृष्ट हैं।

अब ऐसे में सवाल यह है कि जब हम अपनी प्रजातंत्र शासन में देश को विकास की गति दे रहे हैं तो इसको राष्ट्रभाषा से क्यों नही विभूषित करते आखिर वर्ष में एक दिन हिंदी दिवस,हिंदी सप्ताह या हिंदी पखवाडा मनाने की जरूरत क्या है?यह दिवस तो हम भारतीयों का विजय पर्व है इस दिन तो 'हिंदी भाषा के समृद्धि और अंतार्राष्ट्रीय मंच पर राष्टृभाषा के समान आदर के लिए' पूरे देश को संकल्प लेना चाहिये I यह हमारे लिए गंभीर चिंतन और मंथन का विषय होना चाहिए कि हिंदी भाषा को इस स्तर तक लाने में हमारी हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता और संस्कृतिपूर्वजों के बलिदान और नेताओं का निः स्वार्थ मार्गदर्शन रहा है और आज इसी हिंदी से योग, प्राणायाम और वेदांत है।आज हिंदी है तो संस्कृत भाषा है। तमिल और मलयालम भाषायें फली फूली हैं।हिंदी से ही दीवाली,ओणम आदि पर्व हैं।यह अक्षरश: सत्य है हिंदी ने हिन्दुस्तान की आत्मा को अक्षुण्ण रखा है।हिंदी तो अपनेपन का प्रतीक है।हम सभी को हर हिंदी दिवस पर यह सोचना है कि मानव सक्रियता के हर क्षेत्र में  हिंदी को उसके जरूरतों के मुताबिक कैसे समृद्ध करेंउन्नत करें ताकि आने वाला हर हिंदी दिवस हमारे लिए विजय पर्व के साथ उन्नति पर्व भी बने।

           यह नया सहस्राब्दि तीव्र परिवर्तन का है,इस सूचना क्रांति के युग में भीषण प्रतिस्पर्धा भी है।इसमें तनिक भी शक नहीं होना चाहिये कि नये युग की अपेक्षाओं के अनुरूपहमारा भारत एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरेगा। अत: हिंदी को तदनुसार ढालने की चुनौती स्वीकार करना होगा कि वह अपने देश के उत्तरोत्तर विकास में अपनी अहं भूमिका निभा सके। इस अ पर गंभीर आत्मनिरीक्षण और अपनी उपलब्धियों के निष्पक्ष आकलन करना अपेक्षित है।

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