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यह बहस तवील अरसे से चल रही है कि मुसलमानों को राष्ट्र गीत व राष्ट्र  गान  गान चाहिए या नहीं ¦
शिक्षा जगत से जुड़े लोगों के लिए व विधार्थियों के लिए यह बहस और भी अधिक पसोपेश की वजह बनती है और इसी का फायदा  कई बार  असामाजिक तत्व उठाते हैं.
अपनी बात को अागे बढाता हूं_
एक नागरिक के लिए यह राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत या राष्ट्र ध्वज होते क्या हैं?
अगर साफ जहनियत से गौर किया जाए तो यह साबित होता है कि ये राष्ट्रीय प्रतीक हैं जिनको किन्हीं विशेष उद्देश्यों के लिए स्थापित किया गया है.
और हम सब जानते हैं कि ये उद्देश्य क्या हैं, ये उदेश्य हैं देश प्रेम, राष्ट्रीय एकता,  अखण्डता, को कायम करना.
अब बात आती है इन प्रतीकों के अर्थ और इतिहास की. क्या इनका अर्थ व इतिहास इतना महत्वपूर्ण है कि उसपे बहस की जाय.
हमारे लिए इनका अर्थ व इतिहास महत्वपूर्ण नहीं बल्कि महत्वपूर्ण यह हैं कि ये किसके प्रतीक हैं, ये किन उदेश्यों के लिए स्थगित किये गये हैं, अगर उदेश्यों से हमें कोई तकलीफ नहीं हैं तो हमें विरोध नहीं करना चाहिए.
इस बात के पक्ष में मैं तर्क देना चाहूंगा, हम सब जानते हैं कि राष्ट्र गान टैगोर साहब जब लिख रहे थे तब उनका सम्बोधन 1911का दिल्ली दरबार था, यानी इस रचना में उन्होंने ब्रिटिश राज  का गुणगान किया हैं, यह एक विवादित बात हैै ,अब सवाल यह है कि क्या हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने हमें ब्रिटिश राज के गुणगान के लिए यह गाना दिया है. बिलकुल ऐसा नहीं है. देश के लिए यह रचना एक प्रतीक के रूप में अपनाई गई है और वह है राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रीय सौन्दर्य.
इसी तरह से हम राष्ट्र गीत व राष्ट्र ध्वज के इतिहास व अर्थ के विरोधाभास को महत्व न दे कर हमें महत्व इस बात को देना चाहिए कि ये प्रतीक किन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए स्थापित किये गये हैं.

अब बात करते हैं इस्लामी नजरिए की, सबसे पहला विरोध यह कह कर किया जाता हैं कि इस्लाम सिवाय अल्लाह के आराधना की इजाजत नहीं देता. अगर एक बन्दा सीधा खड़ा हो कर जन गण मन या वन्देमातरम गाता है, पास में इमारत पर तिरंगा लहरा रहा हो, गाने व सुनने वालों के दिलोदिमाग में देश प्रेम की भावना हो, तो बताओ किस की आराधना हो रही है?  हां अगर आपके दिमाग में 1911 का दिल्ली दरबार या आनन्द मठ की कहानी घूमने लगे तो ये आपके मन का फितूर है.क्योंकि आप से राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत गवाकर यह कोई अपेक्षा नहीं करता कि आप मे इस के अर्थ या इतिहास का प्रचार किया जाए बल्कि अपेक्षा यह की जाती हैं कि हम सब देश प्रेम के लिए सुर में सुर मिला कर एकता व राष्ट्र भक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं.

अब कुछ बात व्यवहारिकता की करते हैं, एक आम आदमी अपनी दिनचर्या में अपने धार्मिक सिद्धांतों का पालन कितना करता है? एक आम मुसलमान अपने इस्लामी कानून का कितना पालन करता है?
क्या यह सही नहीं है कि एक मुसलमान अपनी सहूलियत के लिए कई सिद्धांतों के साथ समझौता कर लेता है?
कुछ नमूने ले लें, नबी ए करीम की कई हदिशे हैं और कुरआन मज्जिद में भी हवाले हैं कि_ ऐ मुसलमानों एसे अकड़ कर मत चलो कि दूसरे परेशान हो
_अपनी दौलत का दिखावा मत करो कि गरीब को परेशानी हो
_रास्ते में एसे ना चलो कि मुशाफिरों को तकलीफ हो.
अब बताइए कि गरीबों के लिहाज से कितने मुस्लिम अपनी शानदार गाड़ियों को तर्क कर पैदल चलते हैं. कितने मुस्लिम नेता मुसाफिरों की तकलीफ को देखकर लालबत्ती को अपनी गाड़ी से हटाते हैं.

एक और नमुना, क्या अपने घरों, गाड़ियों वगैरह को राजनीति पार्टियों के झण्डों से सजाना शरियत से ठीक है?  इस्लाम हमें इसकी इजाजत नहीं देता. क्या किसी मुस्लिम नेता ने इसका विरोध किया?

ये सब वही बातें हैं जहाँ हमने अपने सिद्धांतों से समझौता कर लिया, जो कि समय और परिस्थितियों के लिए जरूरी भी है.

इसी तरह हमें राष्ट्र की खातिर राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत के मामले में भी समझोता करने की बात को अपनाना चाहिए.
एक बात और भी, क्या हम अपने पर आरोपों के कोलाहल को सुन कर ही विरोध की राह तो नहीं ले रहे? ध्यान रखें विरोधी का काम भटकाना होता है, और आम मुसलमान के साथ यही हो रहा है.
मैं हर मुसलमान को यह संदेश देना चाहता हूँ कि वक्त की नजाकत को देखते हुए यह बात समझें कि हमारे लिए यह कोई मुद्दा नहीं है कि राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत गाने से हम कोई बड़ा गैर इस्लामी या गैर अवलाकी अमल कर रहे हैं.
बल्कि हमारे लिए यह जरूरी है कि हम बेवजह मुस्लिम विरोधियों को मौका न फरहाम करें जिससे कि हमको मुख्य धारा से बाहर करने के प्रयास सफल हो.