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"जीव, जिस क्षण मां की कोख में आता है,उसी समय से ही जननी के शरीर में बहता लहू,लगातार धड़कता दिल और नियतिवश परिवेश का प्रत्यक्ष क्रियाओं, प्रतिक्रियाओं का समावेश उसके जीवन की भावी यात्रा के लिए पगडंडी बनाना शुरू कर देते हैं। मां भी ,उस नवजात के जीवन के प्रत्येक पहलू से भावनात्मक रूप से संचारित करने की सुकोमल,प्राकृतिक और प्रारम्भिक पगडंडी होती है। चेतन शरीर के रूप में जीव जब अपनी जीवन यात्रा में आगे बढ़ता है तो ये "अतीत की पगडंडियां" बन मन को शीतल करती हैं, क्योंकि इनके भीतर पूर्वजों के याद स्वरूप पलों के इबारती पदचिन्ह छिपे होते हैं। यह सत्य है कि ये पल बीते स्मृतियों के अनुपयोगी फ्रेम में मढ़े होते हैं पर यह शाश्वत है कि अतीत कितना ही धूंधला हो,उसकी आहटें हरसिंगार की तरह अनबोली महक लिए होती हैं।इसका आकर्षण पुराने बरगद के जड़ की तरह इतनी गहरी होती है कि ये परिवर्तित वक्त के पैरों में घुंघरू बांध देती हैं और उसे अपने साये में ले पूरे अहसासों से संवेदनाओं को महकाने लगती हैं।"