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हमारा देश सनातन परंपराओं का देश है।  श्रेष्ठ परंपराएं पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती हैं।जिसका प्रमाण है कि प्रत्येक दिन  कोई न कोई उत्सव- त्यौहार होता है।इन सभी परंपराओं के अपने-अपने ठोस वैज्ञानिक आधार हैं। हर  तथ्य की सटीक जानकारी को जन मानस को समझना और समझाना आसान कार्य नहीं है इसलिए इन्हें धर्म से जोड़ दिया गया है।इस धार्मिक आस्था के कारण जाने -अनजाने रूप में परंपरागत तौर पर इनका लाभ समाज को मिलता रहता है।छोटे-छोटे शहरों , कस्बों और गांवों में भी कुछ सामाजिक चेतना के केंद्र होते हैं जिनकी अपनी धार्मिक आस्था और ग्रामीण अंचलों में सामाजिक विश्वास के साथ इन परंपराओं का अनवरत निर्वहन होता रहता है। ऐसे केंद्र जन चेतना के केंद्र होते हैं पूरे समाज को एकता के सूत्र में पिरोए रखते हैं । सामाजिक मान्यताएं हमारे विश्वास को दृढ़ रखती हैं। सामाजिक चेतना के इन केंद्रों के महत्त्व को कभी भी कम नहीं आंका जाना चाहिए । क्षेत्रीय स्तर पर यह केंद्र बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं जो विविध परंपराओं का निर्वहन करते हैं। स्थानीय स्तर पर यह समाज के लोगों के बीच उनके व्यवसाय और जीविकोपार्जन का भी आधार होते हैं । छोटे-छोटे देवस्थान एवं सामान्य सी लगने वाली परंपराएं लोगों को धार्मिक आस्थाओं से जोड़े रखते हैं। इससे लोगों के आपसी संबंधों में प्रगाढ़ता आती है। सबके मन में एक दूसरे के प्रति सहयोग का भाव जाग्रत होता है ।यह त्यौहार किसानों की फसलों से भी संबंधित होते हैं । अधिकतर त्योहार खरीफ की या रबी की फसल तैयार होने के समय मनाए जाते हैं। इस बीच में लोगों के पारस्परिक संबंधों अपने आने वाली प्रगाढ़ता स्पष्टता रूप से दृष्टिगोचर होती है ।आवश्यकता है सामाजिक समरसता और भाईचारे के पोषक इन स्थानीय स्तर अधिकाधिक  बढ़ावा दें । सरकारें भी अपने स्तर पर इस कार्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान देकर सामाजिक विकास में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी निभा सकती हैं। यह उनकी भागीदारी आवश्यक भी है।

ऐसे स्थलों के बारे में जानकारी और प्रचार -प्रसार के विविध माध्यम हैं। भारतीय संस्कृति के विभिन्न ग्रंथों में हम सबके हृदयों में तपस्या रूपी परिश्रम और परोपकार की भावना की प्रेरणा जाग्रत करने वाले विविध प्रसंग हैं। ऐसे ही दया की मूर्ति स्वरूप महाराज रन्तिदेव की परीक्षा त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने ली थी।महाराज रघु के वंशज महाराज रन्तिदेव सुकृति नाम के परम प्रतापी राजा के पुत्र थे। वे ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि हे प्रभु मैं आपसे अष्ट सिद्धि या मोक्ष की कामना नहीं करता। मेरा आपसे निवेदन है कि समस्त प्राणियों के दुखों का मैं भोग और उन्हें दु:खरहित बना सकूं। उनके द्वार से कभी कोई भी याचक विमुख नहीं पड़ता था अपने इस सद्गुण के कारण उनका यश संपूर्ण भूमंडल पर फैल गया। दीन दुखियों को काटते काटते महाराज रंतिदेव का सारा अन्न-धन समाप्त हो गया ।यहां तक कि उनके पास खाने के लिए एक मुट्ठी भर अनाज भी ना बचा। वे अपने परिवार के साथ जंगल में निकल गए वहां उन्हें परिवार सहित बिना कुछ खाए अड़तालीस दिन बीत गए। उनचासवें दिन उन्हें खाने  के लिए खीर, हलवा और जल प्राप्त हुआ। वे प्रभु का स्मरण करके अपने परिवार के सदस्यों के साथ वितरित करके उसे ग्रहण करना चाहते थे ।तभी अचानक एक ब्राह्मण देवता आ गए । ब्राह्मण देव ने रंतिदेव से कहा कि मैं भूख से बहुत ही व्याकुल हूं ।कृपया मुझे भोजन देकर तृप्त करें । महाराज रन्तिदेव ने ब्राह्मण को बड़े ही सत्कार से भोजन करवाया ।ब्राह्मण देव संतुष्ट होकर राजा को आशीर्वाद देते हुए चले गए । इसके पश्चात महाराज ने बचे हुए भोजन को उन्हें वितरित करने के लिए सोचा। इतने में एक शुद्र आया और उसने भी भोजन की याचना की ।महाराज जी ने भोजन देकर उसे भी तृप्त किया ।उसके जाते ही कुछ देर बाद एक व्यक्ति कई कुत्तों के साथ आया और उसने भी अपने और अपने कुत्तों को भोजन देकर उनकी आत्मा को तृप्त करने का आग्रह किया ।महाराज रंतिदेव अपनी भूख प्यास को भूल गए और बचा हुआ सारा भोजन उन्होंने उस व्यक्ति को दे दिया ।अब उनके पास केवल एक व्यक्ति की प्यास बुझाने के लायक जल्द ही बचा हुआ था तभी एक चांडाल ने आकर उनसे जल की याचना की। महाराज ने जल भी प्रसन्नता पूर्वक उसे प्रदान कर दिया ।वास्तव में ब्राह्मण ,शूद्र और चांडाल के भेष में स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने महाराज रंतिदेव की परीक्षा ली थी ।प्राणिमात्र पर दया करने के कारण ही महाराज देव को अपने परिवार के साथ भगवान का दुर्लभ परमधाम प्राप्त हुआ।

श्रीमद्भागवत महापुराण के नवें स्कंध में महाराज रंतिदेव की यह प्रेरणादायक कहानी मिलती है। ऐसा वर्णन भी कुछ दंतकथाओं में मिलता है कि स्वर्ग के द्वार पर यमदूतों से उन्होंने वार्तालाप किया था। यमदूतों के अनुसार उन्हें नर्क मिलना है क्योंकि एक दिन उनके द्वार से एक बार एक ब्राह्मण उनके द्वार से भोजन ग्रहण किए बिना चला गया था। महाराज रन्तिदेव ने अपने जीवन के समस्त पुण्यों के बदले अपना प्रायश्चित पूरा करने के अपनी मृत्यु को एक वर्ष टालने की बात यमराज से मनवा ली थी। एक वर्ष में उन्होंने अपना पूरा किया और इसके पश्चात उन्हें स्वर्ग में परम पद की प्राप्ति हुई। यह सारे प्रेरक प्रसंग हम सबको परमार्थ के लिए प्रेरित करते रहते हैं। हमें मानव धर्म निभाने के लिए ऐसे प्रसंगों से प्रेरणा लेकर निर्बलों की सदैव सहायता करते रहना चाहिए।