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घुमक्कड़ी का आनंद google maps के साथ लेते हुए अचानक पुराने दिनों की  याद आ गई।
ज़्यादा पुरानी बात नहीं करीब 10 साल पहले map my  इंडिया के
सहारे और उससे पहले people ऑफ़ इंडिया के भरोसे रास्ते पूछ पूछ के चला करते थे।😁
कितनी तय्यारी करनी होती थी यात्रा से पहले।
मुझे याद है बहुत छुटपन से मां के साथ रेल की यात्रा का आनंद लेती रही हूं। एक बड़ी सी टोकरी चलती थी जिसमें खाने का एक्स्ट्रा सामान रहता था, खासतौर से पूरी आलू और अचार ट्रेन की यात्रा के दौरान बेहद स्वादिष्ट लगते थे ।देहरादून से निकलते हुए और देहरादून में घुसते हुए डोईवाला से कुल्हड़ वाली चाय एक अनिवार्यता थी ।पानी के लिए एक छोटा कैंटर लेकर चला करती थी मेरी मां, और साथ ही होती थी दोहर और चादर ताकि कहीं लेटना हो तो इंतजाम  रहे और हां, हवा वाले तकिए को तो मैं भूल ही गई ! मुंह से उसमें हवा भरते थे और तकिए का आनंद लिया करते थे ।ज्यादा तैयारियां होने की वजह से ही शायद वो यात्राएं बहुत खास  और यादगार बन जाती थी।
बाद में जब कार से चलना शुरू किया तो सफर थोड़ा आसान हो गया क्योंकि सामान को रखने की परेशानी खत्म हो गई थी ।एक कार में जिसमें पांच व्यक्तियों की जगह होती है, उसमें आठ आठ लोगों ने भी सफर तय किया है । तब दिलों में जगह होती थी, इसीलिए जगह की कमी महसूस नहीं होती थी।
और अब आया जमाना मोबाइल का ।एक दूसरे का हाल जानना आसान हो गया। पल-पल की खबर हम रख सकते हैं।
अब जो यह समय है सन 2000 वाला इसमें तो मोबाइल का मतलब वन स्टॉप सॉल्यूशन। सब कुछ उस एक छोटे से यंत्र में उपलब्ध है। हालचाल पूछने से लेकर रास्ता पूछने तक और अब तो पेमेंट भी मोबाइल के माध्यम से ही आप कर सकते हैं। कोई कंप्लेंट करनी है कोई सहायता मांगनी है ,बस एक यंत्र बहुत है और वह है मोबाइल ।
1996 की बात है जब मैं अकेले देहरादून से मेरठ, भाई के यहां जाया करती थी ,तो  छोटा भाई बहुत परेशान हो जाया करता था ।आखरी मिनट तक बस के पास खड़े रहना और गंतव्य तक पहुंचने के बाद तुरंत से फोन कॉल करना अनिवार्यता थी।अगर 5 मिनट की भी देरी हो जाती, तो समझो भूचाल आ जाता था।
1998 में आया पहला मोबाइल, आउटगोइंग के तो पैसे लगते ही थे , इनकमिंग के भी देने होते थे।
आजकल के बच्चों को शायद इसका मजा समझ में नहीं आएगा ,कैसे मोबाइल पर किसी का कॉल आने पर हम लैंडलाइन से उसे कॉल बैक करते थे पैसे बचाने के लिए। क्युकी लैंड लाइन सस्ता होता था।
सच, बड़े ही सुहाने और मजेदार दिन से वह भी। ये बात अलग है कि हम  घुमक्कड़ों को तो घूमने का आनंद उठाना होता है, वह चाहे जैसे भी उठाएं।
हां, यह सच है कि गूगल बाबा ने आज जिंदगी बहुत आसान बना दी। अभी की ही बात लो, हम उदयपुर की यात्रा पर निकले रास्ते में हाईवे बंद थे किसान आंदोलन के चलते, लेकिन जय हो गूगल बाबा की ,उन्होंने हमें सारे रोडब्लॉक्स से अवगत कराते हुए और बचाते हुए आराम से उदयपुर पहुंचा भी दिया और वहां से वापस भी ना दिया । ना किसी से कुछ पूछने की जरूरत पड़ी और ना ही हम कहीं अटके,  जब जी चाहा, जहां जी चाहा वहां गाड़ी मोड़ने की सुविधा हमे थी,  क्योंकि हमारे साथ थे गूगल बाबा। वरना पहले हम पति पत्नी में आधा समय बहस रास्ता पूछने और गलत टर्न ले लेने पे ही होती थी। होटल बुक करना हो कम से कम दाम में अपनी पसंद का सब अब एक उंगली दूर है।
मीनू
जनवरी 2021