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कितना अजीब है ना. हुमेशा से मुझे ऐसे वक़्त की आस रही जहाँ में कुछ कर सकूँ. ऐसा कुछ जिसमें में अपनी क्रियेटिविटी, टॅलेंट ओर इंटेरेस्ट को इस्तेमाल करके कुछ कर सकूँ, कुछ प्रोडक्टिव. सोचती थी अपने इंट्रेस्ट्स को बिज़्नेस में बी तब्दील कर लूँगी. पर आजकल जैसे कुछ सूझ ही नही रहा है. 

मैं लिखने की शौकीन हूँ पर ज़्यादा कुच्छ दिमाग़ में आता नही आजकल. हो सकता है की निशांत के साथ रहते हुए मुझे केवल खुशी का ही एहसास है ओर सूकून का भी. मुझे ऐसा पति मिला भी है. 

कल रात में ज़िंदगी गुलज़ार देख रही थी दोबारा. बहुत ही खूबसूरती से लिखा हुआ सीरियल है. पहली बार जब देखा था तो कहीं कहीं पर वो सारी रोमॅंटिक बातें देख के ओवर दा टॉप लगती थी. लेकिन कल रात में निशांत के बारे में सोचने लगी. सीरियल की हेरोयिन की तरह मुझे भी शायद निशांत से गहरी मोहब्बत हो रही है.

 मोहब्बत पहले भी थी पर मैं उसे शदीद आकर्षण का ही नाम दूँगी. पहले मैं काफ़ी हद्द तक उसके अच्छे नेचर ओर अपने लिए उसके ढेर सारे प्यार से मुतासिर थी पर अब एक अजीब सी आदत बनती जा रहा है वो मेरी. उसके हाथों की च्छुअन- दा टच, उसके बदन की महक से मेरी अच्छी ख़ासी पहचान हो गयी है. 

कई बार सोचती हूँ ऐसा वाकई हो सकता है क्या की मुझे कोई इतना पसंद करे. ना केवल पसंद बल्कि इतना प्यार करे. सच बताउन तो मुझे लगता था की कुछ दिनो में वो मुझसे परेशान हो जाएगा पर वो मेरा ख़याल करने में ओर मुझे समझने में वो मेरी इनसेक्युरिटीस से दो कदम आगे ही रहता है. 

पता नही ये सारी इनसेक्युरिटीस आई कहाँ से हैं मुझमें. शायद बहुत सारे रिजेक्षन्स देखें हैं मैने ज़िंदगी के. ओर शायद ये भी की ज़िंदगी की काफ़ी सारी चीज़ों का रिजेक्षन मैने खुद भी किया है. सबसे बड़ा रिजेक्षन  तो मुझे ज़िंदगी ने तब दिया जब मेरी माँ को मुझ से छिन गयी. लगने लगा किस्मत, भगवान सबने ही मुझे रिजेक्ट किया है. 

उसके बाद से ही मुझे हर चीज़ से बदगुमानी, अविश्वास होने लगा. कुछ माज़ी के तज़ुरबों ने भी मेरी पर्सनॅलिटी में अतियात की जगह बना ली थी. निशांत से पहली मुलाक़ातों में भी काफ़ी कुछ अपने अंदर समाए हुए थी. आज पूरे एक साल बाद भी ओर शादी के चार महीने बाद भी कयि सारी दीवारें हैं जो मेरे दिल के आस पास हैं. काफ़ी कुछ में शेयर नही करती हूँ आज भी उससे. डर लगता है की कहीं ये इनसेक्युरिटीस उसके सामने ना आ जाएं. 

लेकिन पता है ज़्यादा इन्हे च्छुपा नही पवँगी . क्यूंकी ये श्क्स अपने प्यार ओर ख़ूलुस से मेरी अंदर च्छूपी सारी दीवारों को धीरे धीरे गिरा रहा है. ओर मैं कैसे ना पिघलू, वो इस कदर अपने आपको मुझे सौंप देता है की मेरे सारे कवच ढीले पढ़ जाते हैं. इस तरह से मेरा बन जाता है, मुझे पे इस तरह से अपनी ज़िम्मेदारी सौंप देता है की मैं बहुत सारे एहसासों के बवंडर में डूब जाती हूँ. एक दम से विश्वास तो नही हो पाता किी में किसिके लिए इतनी ख़ास कैसे हूँ. पर यकीन मानिए ये एहसास इंतिहाही हसीन है. बहुत खुमारी है इसमें


आजकल निशांत को नींद में ताकते ताकते वक़्त का पता ही नही चलता. ऐसा नही है की मैं उसे देखते हुए दंपत्या जीवन से जुड़ी हुई बातों पे विचार करती हूँ. ओर उसके ओर मेरे भविष्या के बारे में भी नही सोचती. सोचना भी नही चाहती चाहे इसमें रिस्क ही क्यूँ ना हो. बस उसे देखना बहुत अच्छा लगता है उसे.  इन एहसासों को में समझा नही सकती क्यूंकी मुझे ये खुद समझ नही आ रहे. फिर भी इन एहसाँसों में रहना आजकल मेरे लिए दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ है. शायद  प्यार के समुंदर में लोग ऐसे ही डूबते होंगे.