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रोज सुबह उठते ही चाय की पहली चुस्की के साथ समाचार पत्र का पहला पन्ना पढ़ा जाता है। और यह पहला पन्ना ही पूरे दिन की  आपकी मानसिकता निर्धारित कर देता है। सकारात्मक समाचार जहां चेहरे पर हल्की मुस्कान ले आता है वही नकारात्मक दिन की शुरुआत को दिशाहीन बना देता है।

 कहते हैं "साहित्य समाज का दर्पण" होता है। लेकिन मेरी सोच थोड़ी अलग है। मेरा मानना है कि, साहित्य को न सिर्फ समाज का दर्पण होना चाहिए बल्कि समाज को एक दर्पण भी दिखाना चाहिए कि, साहित्य समाज से क्या अपेक्षा रखता है और साहित्य के अनुसार समाज कैसा होना चाहिए। अतः समाचार पत्र अगर इन दोनों भाव में संतुलन स्थापित कर पाता है तो समाचार पत्र के अंतिम पन्ने तक पहुंचते-पहुंचते पाठक को नया सोचने के लिए बहुत कुछ मिल जाएगा। वह नए समाज की कल्पना कर पाएगा। कहा भी गया है हम जैसा सोचेंगे समाज भी वैसा ही बनेगा अगर हर वक्त दुख की ही बातें करेंगे, क्या खोया का दुखड़ा रोएंगे तो सुकून का मिलना मुश्किल होगा। और अगर सुख, खुशी से साक्षात्कार होता भी है तो उसे उसकी चरम सीमा तक जी नहीं पाएंगे । लेकिन अगर सुखो की ही बात करेंगे तो दुख भी दुख नहीं लगेगा। रचनात्मकता कलात्मकता कुछ नया लिखने में हैं, सोच को, कल्पना को परवाज़ देने में हैं समाज में घटित घटनाओं को व्याकरण व भाषा से सजा देने में नहीं। अतः अगर समाचार पत्र इन बातों का ध्यान रखें तो पाठकों का यह बोलना छूट जाएगा कि पत्र में होता ही क्या है रोज  एक ही खबर मारधाड़ की या फिर कोई और नरक तुल्य घटना की।