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               कोई भी मनुष्य अपने जीवन को परिपूर्ण तथा महत्तम आनन्दमय बनाने लिए मनपसंद मार्ग चुनने के लिए स्वतंत्र है पर उस मार्ग की दशा और दिशा का पूर्णतः निर्धारण नियति ही करती है। उस मार्ग की अनुकूलता, प्रतिकूलता, उत्तेजक मोड, चोटी के चढाव एवं घाटी के उतराव सब अनिश्चितता के गर्भ में छिपे रहते हैं । अतः राह पर चलते चलते कहीं न कहीं उसके इच्छा के विपरीत क्षण आते है जिसको वह स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा, ऐसे में खुद को ठगा भी महसूस करता है और वह किसी मुकाम पर कसक बनकर सालता है। हमारे विचार से जीवन की परिपूर्ण एक ऐसी मृगमरीचिका है जिसको पाने के लिए वह जीवन भर यत्र तत्र भटकता रहता है पर प्राप्त नहीं कर पाता।जिसके कारण उसके मन में क्षोभ या मलाल रह जाता है और अवगुंठित होकर सोचता है कि यह वह जगह नहीं जिसे हमने सोचकर जीवन मार्ग में चलना प्रारम्भ किया था।यह तो मानव स्वभाव का दोष नहीं और न ही नियति का, बल्कि मार्ग पर चलते चलते जनित परिवर्तन से मनोरथों में बदलाव मुख्य कारण है।मानव की बुद्धि से कल्पना की उडान इतनी बृहद होती है जिसकी पार पाना मुश्किल है।
              हम समझते है कि इसके चलते प्राणी समाज में कमोवेश हर एक दिल में कोई न कोई मलाल रह ही जाता है।अतः जीवन में अक्सर एक अधूरापन बना रहता है,जो बार बार उठकर टोकता है-यह वह राह नहीं जिस पर चलने की सोची थी।मतलब यही कि अंततः कुछ न कुछ अधूरा रह जाना है

 फिर अपूर्णता से परहेज को?