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यू एंड मी... द अल्टिमेट ड्रीम ऑफ लव

लेखक द्वय :  मल्लिका मुखर्जी – अश्विन मॅकवान   

दोस्तोंकभी कभी आपको नहीं लगता कि ये जीवन एक चलती हुई ट्रेन की माफ़िक है? अनवरत चलती हुईकभी न रुकने वाली एक छुकछुक ट्रेन। हाँअस्थायी पड़ाव स्टेशनों की तरह आते जाते हैं पर पल भर ठहरकर हम आगे बढ़ जाते हैं क्योंकि बढ़ना ही इस यात्रा की नियति है और रुक जाना इसका अंत है। तो रहते जीवन तक आगे बढ़ना ही होगा। क्या हुआ जो कहीं किसी लम्हे रफ़्तार धीमी मालूम होने लगे तो किसी क्षण इतनी तेज़ कि समय रेत की मानिंद मुट्ठी से फिसलता चला जाए और आप इस अफ़सोस को सीने से लगाये रहें कि मनभर उस लम्हे को जी भी न पाए।

मल्लिका मुखर्जी से पहला परिचय एक समूह के माध्यम से हुआ था। गुजरात में रची बसी एक बंगाली लेखिका। बस इतना भर परिचय और उनकी विनम्र विद्वता का क्षणिक अहसास भर। अब चूंकि पिछले कुछ वर्षों में लेखन के चलते सभी ग्रुप्स छोड़ चुकी थी तो वह क्षीण सा सम्पर्क सूत्र भी खो गया। फिर तब के बिछड़े कब के बिछड़ों को मिलाने वाले फेसबुक से दोबारा मिलना हुआ और कुछ समय पहले मल्लिका जी का चैट उपन्यास मुझ तक पहुँचा। चैट उपन्यास शब्द मेरे लिये नया नहीं था क्योंकि मैं सूरज प्रकाश सर के चैट विधा पर लिखे लेखन से परिचित थी। दो अन्य फेसबुक मित्रों राजीव मित्तल और अनुपम वर्मा ने भी कुछ ऐसा संयुक्त रूप से रचा था पर मेरे हाथों में पहली बार जो चैट उपन्यास आया वह यही था, ‘यू एन्ड मी...द अल्टिमेट ड्रीम ऑफ लव’ - स्टोरी मिरर द्वारा प्रकाशित उपन्यास।

चैट उपन्यास की अवधारणा को कुछ कुछ समझती थी तो भी ये जिज्ञासा बरक़रार थी कि अंततः ये कैसे संभव है कि जीते जागते पात्रों की बीच हुई अनौपचारिक बातचीत एक उपन्यास में बदल जाए। मन हुआ लेखिका से पूछ लूँ फिर सोचा नहीं पहले किताब से जाना जाए और वही किया भी। मल्लिका मुखर्जी और विदेश में बैठे उनके सहलेखक मित्र अश्विन मॅकवान की भूमिका ने ही काफी जाले साफ कर दिये। मैंने मल्लिका जी को प्राप्ति की सूचना के साथ ये बताया भी। कई डेडलाइन्स के दबावों और निजी जीवन की कुछ उलझनों में उलझे रहने के बावजूद मैंने इस किताब को कई रातों को जागकर पढ़ा।

एक विवाहित प्रौढ़ स्त्री और एक विवाहित प्रौढ़ पुरुष जो कभी कॉलेज के सहपाठी रहेएक दूसरे को पसंद भी करते रहे, पर मात्र क्रश बनकर रहे। उस रिश्ते के पड़ाव पर जीवन की ट्रेन क्षणभर भी न रुकी और तब जब पुरुष अंतिम स्टेशन की ओर बढ़ने वाला था, वे फिर मिले। इस बार यह माध्यम इक्कीसवीं सदी का सोशल मीडिया था। उनके बीच चैट से शुरू हुआ ये सम्बन्ध किस तरह एक साथ तीन स्तरों पर चलता हैये तो केवल आप पढ़कर ही जान पाएँगे, पर मैं ये जरूर बताऊँगी कि ये तीन स्तर क्या हैं। साथ बीते कॉलेज दिनों का नोस्टाल्जियाएक दूसरे से बिछड़कर बीता पूरा जीवन और अब वर्तमान के जीवन की आपाधापीक्या कुछ नहीं है इस चैट उपन्यास में!

मैंने मल्लिका जी को बताया था कि पता नहीं यह वरदान है या अभिशाप कि हम लेखक लोग अपने नॉस्टेल्जिया को कभी भूतकाल में बदलने नहीं देते, बल्कि उसे समानांतर जीते हुए अपने आज में प्रासंगिक बनाए रखते हैं। पर एक युग बीतने के बाद मिले साथी/साथियों में जब उस नॉस्टेल्जिया के बदले एक धुंधले अतीत को पाते हैं, तो हमारा भावुक मन बुझने लगता है। दरअसल हमारी प्रवृति है कि उस अतीत को पुनः भरपूर जी चुकने के बाद ही हम वर्तमान से जुड़ पाते हैं। यहाँ बिल्कुल यही हुआ। मल्लिका उर्फ परी और अश्विन उर्फ ऐश अपने उस बिछड़े कल के हर पड़ाव को जीभर जीते हुए अपने आज तक पहुँचते हैं। कहीं कोई प्यासकोई कमीकोई अधूरापन बाकी न रहा। उनकी लगभग दो महीने चली चैट या रोचक वर्चुअल बातचीत में इन तीनों कालखण्डों को बखूबी समेटा है। दोनों की चुहल भरी छेड़छाड़ इसकी रोचकता को अंत तक बनाए रखती है और भाषा शैली बनावट से परे पाठक को जोड़ लेने में पूरी तरह सक्षम है।दोनों के जीवन के संघर्ष की छाप इनकी इस जीवनयात्रा पर स्पष्ट दिखाई पड़ती है।हालांकि मुझे बहुत दुःख हुआ जानकर कि इस चैट उपन्यास के दूसरे मुख्य पात्र यानि अश्विन जी अब इस दुनिया में नहीं रहे।अब इसे नियति का विधान न मानें तो क्या कहें कि वे दो लोग दोबारा इसीलिये जुड़े कि एक अधूरी दिवास्वप्न सरीखी दास्तान इसी जन्म में अपने पूर्णत्व को प्राप्त कर ले, जिसके लिये दोनों ने 45 साल प्रतीक्षा की।

मल्लिका जी मेरी वरिष्ठ हैं परबधाई की बजाय कहूँगी आपको गले लगकर खूब स्नेह, इस किताब के लिये।आपने अपने दोस्त को सदा के लिये नवजीवन दे दिया।धन्य है ऐसी दोस्त और कायम रहे ऐसी दोस्तियाँ।


अंजू शर्मा, दिल्ली