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भूमिहार प्रसंग

भूमि में हार प्रत्यय लगाने से भूमिहार शब्द बनता है।  हार शब्द की व्युत्पति हृ धातु से है, जिसका अर्थ है ग्रहण करना, स्वीकार करना, छीनना, हरण करना, चुराना, बलात अधिकार करना इत्यादि । अत: जिसने  भूमि को प्राप्त किया हो, वही भूमिहार है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में परसुराम-लक्ष्मण संवाद में लिखा है भुजबल भूमि भूप बिनु किन्हीं, विपुल बार महीदेवन दिन्हीं”। आजकल भूमिहार शब्द का प्रयोग बिहार और उत्तर प्रदेश की एक जाति विशेष बाभन के लिए प्रयुक्त किया जाता रहा है। आधिकारिक तौर पर 1911 की मनुष्य गणना में बाभनों को भूमिहार ब्राह्मण के रूप में दिखाया गया। बाभन, महीदेव, महीहार, मोहयाल अथवा महीवाल और भूमिहार पर्यायवाची हैं। जिस प्रकार हम गंगा या गंगा नदी, हिमालय या हिमालय पर्वत का उपयोग करते हैं ठीक उसी प्रकार भूमिहार अथवा भूमिहार ब्राह्मण, सोबर्निया या सावर्ण्य बाभन, सोनभद्र या सोनभदरिया बाभन कहते हैं।  गोस्वामी तुलसीदास ने अपने भूमिहार मित्र और भदैनी के एक  जमींदार टोडर की मृत्यु पर लिखा- 

चार गाँव को ठाकुरो मन को महामहीप। तुलसी या कलिकाल में अथए टोडर दीप॥ तुलसी रामसनेह सिर पर भारी भारु। टोडर काँवा नहिं दियोसब कहि रहे 'उतारु'
रामधाम टोडर गएतुलसी भए असोच।जियबो प्रीत पुनीत बिनुयहै जानि संकोच॥* 

यहाँ यह ध्यातत्व है कि उन्होने टोडर ठाकुर अथवा ठाकुर टोडर न लिखकर “चार गाँव को ठाकुरो” लिखा है। “ठाकुर” शब्द अनेकार्थी है और इसके अनेक अर्थ है। बंगाल में यही शब्द बिगड़कर टैगोर हो गया है।  1901 की मनुष्यगणना में बनारस और गोरखपुर में भूमिहारों को ब्राह्मण और आजमगढ़ और मिर्ज़ापुर में क्षत्रिय के रूप में दर्शाया गया है। हालांकि 1911 में इसे सुधार कर ब्राह्मण लिखा गया।  शिव प्रसाद मिश्र ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘बहती गंगा’ में भूमिहार को सिंह उपाधिधारी ब्राह्मण लिखा है। हालांकि मिथिला के राजा भी सिंह उपाधिधारी ब्राह्मण ही हैं।  

भूमिहार प्रसंग नया नहीं है, कभी यह चार गाँव को ठाकुरों, ‘अथ भूमिहार गाथा’, भूमि-अग्रहार ब्राह्मण, भूमि-अग्रहारभोजी ब्राह्मण सामंत, ऋषि-महर्षि और ब्रह्मर्षि लेख,  जिज्ञासा, शंका-समाधान और अनेक प्रकार के सोशल-मीडिया पर यदा-कदा प्रकट होता ही रहता है।  भारत बाबाओं का देश है। यहाँ इनकी दुकान अच्छी चलती है। ये शांति बांटते हैं, संतान प्राप्ति के उपाय बताते हैं, अपनी सुविधा के अनुसार जाति निर्णय और वर्ण निर्धारित करते हैं। ऐसे ही एक बाबा ने जगनाथ पुरी के शंकराचार्य निश्चलानन्द जी ने भूमिहार प्रसंग के नाम से यू ट्यूब पर एक विडियो अपलोड किया है। पुरी के शंकराचार्य निश्चलानन्द जी ने पहली बार ऐसा नहीं किया। इसके पूर्व भी कायस्थ का वर्ण क्या होमें ब्रह्मर्षि ब्राह्मणों को वैश्य कहते नज़र आ रहे हैं। इस विडियो में वे कहते हैं कि काशी के राजा "भूमिहार" थे, इसलिए काशी के ब्राह्मणों ने उन्हें "द्विजराज" और शर्मदेव लिखना प्रारम्भ कर दिया। (श्री काशी विश्वनाथ पंचाङ्ग के मुख पृष्ठ पर लिखा रहता है, “स्वस्ति श्रीमन्महाराजाधिराज द्विजराज काशीराज श्री १०८ महाराज डॉ श्रीविभूतिनारायणसिंहशर्मदेव ‘एम.ए.वीरपुङ्गव पदभाजामाज्ञानुसारम॥) वे कहते हैं कि इस संबंध में (भूमिहारों के) मैंने कोई छान-बीन करना उचित नहीं समझा। वे यह भी कहते हैं कि जिस क्षेत्र का उनका शरीर है, वहाँ ‘भूमिहार’ होते ही नहीं है। लेकिन जो भूमिहार होते थे वे अपने को वैश्य कहते थे, फिर अपने को क्षत्रिय कहने लगे, इतने से उनका मन न भरा तो अपने को ब्राह्मण कहने लगे, और फिर ब्रह्मर्षि। इस बात की इन्हें बड़ी पीड़ा है कि आजकल बहुत सारे ‘जगतगुरु’ संत होने लगे हैं। इनका कहना है कि जगतगुरु तो सिर्फ शंकराचार्य हो सकते हैं, फिर ‘काशी विद्वत परिषद’ किसी को ‘जगतगुरु’ कैसे बना सकती है। परंपरा से तो ‘शंकराचार्य’ भी सिर्फ नम्बोद्री ब्राह्मण ही हो सकता है, लेकिन आज दक्षिण को छोडकर लगभग सारे शंकराचार्य के मठों पर लोगों ने कब्जा कर लिया। यहाँ तक कि भारत और नेपाल के प्रमुख मंदिरों के दक्षिण भारतीय पुजारियों को स्थानीय पुजारियों ने अपदस्थ कर दिया। 

ब्राह्मण लड़ते भूमिहारों से – आखिर ब्राह्मणों और भूमिहारों में किस बात की लड़ाई है जबकि उत्तर प्रदेश में मात्र 1% जनसंख्या वाले “भूमिहार ब्राह्मण” “ब्राह्मणों” के लिए चुनौती कैसेहैं? जनसंख्या में कम होने के बावजूद काशी,गाजीपुर, बलिया, जौनपुर और मिर्ज़ापुर तक कैसे भूमिहारों ने अपना साम्राज्य विस्तार किया होगा। एक तरफ भूमिहारों ने काशी को मुगलों और अंग्रेज़ो के काल खंड में हिन्दू राज के रूप में कायम रखा तथा निकट के सभी राजपूत सामंतों को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया। इस बात की टीस काशी के समीपवर्ती राजपूत समुदाय में देखी जा सकती है। स्वामी दयानन्द के काशी शास्त्रार्थ में काशी नरेश निर्णायक की भूमिका में हैं। 20 सदी के प्रारम्भ में स्वामी सहजानन्द सरस्वती के जीवन काल में भूमिहार-ब्राह्मणों के बीच की लड़ाई थोड़ी शिथिल पड़ती हुई दिखाई देती है। भूमिहार ब्राह्मण सभा, भूमिहार ब्राह्मण परिचय और अनेक विवरण के आधार पर लिखी गयी रचना ब्रह्मर्षि वंश विस्तर के कारण किसी ने भूमिहार प्रसंग पर बोलने, लिखने और विवाद का साहस नहीं किया, स्वामी जी के सामने किसे के टिकने की सामर्थ्य नहीं थी। ब्रह्मर्षि वंश विस्तर में स्वामीजी लिखते हैं-कान्यकुब्ज वंशावलियों में स्पष्ट ही लिख दिया हैं कि : 

अथकाश्यपमाख्यास्ये गोत्रां तु मुनिसम्मतम्।

पूर्ववंशावलि दृष्ट्वा ज्ञातं षष्टिशतत्रायम्॥ 1

मदारादिपुराख्यस्य भुइहाराद्विजास्तु ये।

तेभ्यश्चयवनेन्द्रैश्च महद्युद्धमभूत्पुरा॥ 2॥ इत्यादि।

अर्थात् ''कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की पूर्व रचित 360 वंशावलियों को देखकर

उनके अनुसार ही काश्यप गोत्र का विवरण लिखते हैं। मदारपुर के अधिपति

भुइंहार (भूमिहार) ब्राह्मणों और मुसलमानों से युद्ध हुआ'', इत्यादि।

एक-दो नहींकिन्तु 360 वंशावलियाँ यदि इस बात को स्वीकार करती हैं कि

वर्तमान कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के काश्यप गोत्र से जो दूबेतिवारी,

अवस्थीदीक्षितअग्निहोत्री और मिश्र प्रभृति उपाधियों (आस्पदों या

पदवियों) वाले ब्राह्मण हैंवे सभी भूमिहार ब्राह्मणों की सन्तान हैं,

तो फिर यही सिद्ध हो गया कि सम्पूर्ण कान्यकुब्जवंश ही इस बात को स्पष्ट

रूप से मानता हैं कि ये जमींदार या भूमिहार ब्राह्मण लोग ब्राह्मण ही

क्या बल्कि बहुत से कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के पूर्वज हैं। यह बात जिस

कान्यकुब्ज वंशावली को आप देखेंगे उसी में काश्यप गोत्र के निरूपण में

पायेंगे। भूमिहार और ब्राह्मणों की लड़ाई ठंडी पड गयी थी। स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने ब्राह्मणों के पाखंड को समाप्त करने हेतु 1400 पन्ने की एक उत्कृष्ट रचना " कर्मकलाप" के नाम से की थी।स्वामी सहजानन्द सरस्वती के वर्षों पूर्व देव के सूर्य मंदिर के पुजारी भूमिहार ब्राह्मण थे। कर्मकलाप की रचना उन्होने सामान्य जनों को जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों से परिचित कराने के उद्देश्य से लिखी थी। अप्रैल 1949 में पूज्य शंकराचार्य की उपस्थिति में उन्होने 'विरक्त महामंडल की अध्यक्षता और संबोधित किया। आजादी के बाद भी भारत साधु समाज की अध्यक्षता एक भूमिहार ब्राह्मण संत ने एक लंबे अरसे तक की। अयोध्या, काशी और त्रिवेणी के अनेक मठों, मंदिरों के पुजारी “भूमिहार” हैं जिसे ब्राह्मण अपने पेशे के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं, उन्हें लगता है कि ये भूमिहार उनकी अच्छी-ख़ासी चल रही दुकान बंद न करवा दें।  20वीं सदी के अंतिम दशक में साप्ताहिक हिंदुस्तान ने अथ भूमिहार गाथानामक शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया जिसमे भूमिहारों को ज्वाला प्रसाद मिश्र रचित श्लोक के माध्यम से ब्रह्म-क्षत्रिय सिद्ध करने की कोशिश की, हालांकि इसी लेख मे उन गाँवों की चर्चा भी की गयी, जहां मैथिल और भूमिहार परस्पर वैवाहिक सम्बन्धों से जुड़े हैं। इसका प्रतिवाद (इस लेख के प्रत्युतर में)  प्रो. कामेश्वर ओझा के लेख भूमि-अग्रहार ब्राह्मण के नाम से प्रकाशित हुआ। इसके पूर्व में भी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी प्रसिद्ध रचना बाण भट्ट की आत्म-कथा” के नवम उच्छ्वास में लिखते हैं कि “उत्तर का काशी श्रौर दक्षिण का करूष जनपद इस समय न तो मगध के गुप्तों के हाथ में हैं और न अपने महाराजा- धिरज के ज्येष्ठ ने यहाँ बड़ी कुशलता की नीति वर्ती थी। उन्होंने उत्तरी तट के कुछ ब्राह्मणों को भूमि का अग्रहार देकर अपने पक्ष में कर लिया है। ये भूमि अग्रहारभोजी ब्राह्मण समस्त जनपद में प्रधान हो उठे हैं। वे ही इधर के सामन्त हैं। उनमें वैदिक क्रिया लोप होती जाती है। अब वे खुलकर बौद्ध राजा का समर्थन करने लगे हैं।” नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित विश्वकोश मे भूमिहार शब्द की व्याख्या में लिखा है, “भूमिहार उत्तर भारत की एक प्रसिद्ध जाति। पंजाब के मोहियाल, मेरठ रूहेलखण्ड के त्यागी (तगा), महाराष्ट्र के चितपावन, गुजरात के अनावले(देसाई), मगध के बाभन, मिथिला के पश्चिमा और प्रयाग के जमींदार इसी जाति वर्ग के कहे जाते हैं।        कान्यकुब्ज वंशावलियों से विदित होता है कि कान्यकुब्ज प्रदेश स्थित मदारपुर के अधिपति भूमिहार कहलाते थे।सहजानन्द सरस्वती और हंसानंद सरस्वती भूमिहार का अर्थ “भूमि छीनने वाला” या “स्वीकार करने वाला”, स्वामी लक्ष्मणाचार्य और पंडित अयोध्यादास “भूमिभूषण”, पंडित योगेंद्रनाथ भट्टाचार्य, डॉ सुनीति कुमार चटर्जी और डॉ रामप्रसाद चंदा “जागीरदार” तथा श्री मजहर हसन जमींदार करते हैं। पं० किशोरी प्रसाद वाजपेयी “भूमिधर” तथा पांडे सूर्य नारायण शर्मा ने “भूमिसुर” से की है। डॉ हजारीप्रसाद द्विवेदी भूमिहारों को राजाओं द्वारा अग्रहार पानेवालों की वैदिक परंपरा में मानते हैं। यह बात अनेक ताम्रपत्रों से सिद्ध है। श्री इलियट और डॉ राजेंद्र लाल मित्र भूमिहारों को कान्यकुब्जों की शाखा, श्री शेरिंग अधिकांश सरवारिया और कुछ कान्यकुब्जों की, श्री दुर्गा दत्त लाहिडी मैथिल की शाखा, श्री दुर्गा दत्त जोशी सारस्वत की शाखा मानते हैं। श्री ओल्डहम, बीम्स, शेरिंग, इलिअट, बुकानन के अनुसार ये शुद्ध आर्य रक्त हैं। (कु.ना.झ)

महापंडित राहुल सांकृत्यायन राहुल यात्रावली” के अंतर्गत “मेरी लद्दाख यात्रा” में मेरठ के वर्णन में लिखते हैं- ‘तगा’ त्यागी की  वही स्थिति है जो पूर्व में भूमिहारों की। इसी पुस्तक में पंजाब के वर्णन में लिखते हैं “ब्राह्मणों में तगा या दानत्यागी (जो बिहार के भूमिहार ब्राह्मणों की तरह हैं) जैसी जाति भी यहाँ कसरत से हैं। पुन रावलपिंडी के वर्णन में लिखते हैं कि यहाँ सभी ब्राह्मण सारस्वत और भूमिहार हैं। पंजाब के वर्णन में मोहियल भूमिहार ब्राह्मण ही अधिक हैं। इस यात्रा संस्मरण के माध्यम से यह बात निकलकर सामने आती है कि भूमिहार केवल बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक ही नहीं हैं, वरन इनका विस्तार सम्पूर्ण भारत वर्ष में है। इस बात को कोई यायावर साहित्यकार ही जान सकता है।