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"तमस": साम्प्रदायिकता बनाम मानवता





साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत  "भीष्म सहनी " का " तमस " विभाजन की पृष्ठभूमि पर  लिखा  गया बहुचर्चित उपन्यास है | "तमस "साम्प्रदायिकता की उन्माद के बीच मानवीय मूल्यों के धराशाही होने का कारुणिक दस्तावेज है |विभाजन की त्रासदी  के पीछे की राजनीति ,पूंजीपति वर्गों की स्वार्थ लोलुपता ,धार्मिक सगठनों की धर्मान्धता  आदि का अत्यंत तटस्थ एवं पैना विश्लेषण जैसा "तमस "  में मिलता हैं वैसा हिंदी के किसी अन्य उपन्यास में नहीं |नृशंश अत्याचार ,साम्प्रदायिकता के वहशी जूनून ,अमानवीय स्थितियां ,भयंकर मारकाट आदि के बारीक़ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के  साथ -साथ अंग्रेजो की साम्राज्यवादी नीति की गहरी     चालो को समझने की दृष्टि प्रदान करता हुआ "तमस "साम्प्रदायिकता या विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखित "झूठा सच " ,"कितने पाकिस्तान " आदि से कई कदम आगे निकल अपनी प्रासंगिकता को सिद्ध करती है |यह उपन्यास हमारे राष्ट्रीय जीवन की एक ऐसी धधकती चिंगारी एवं भयावह  त्रासदी की तरह है ,जिसमे मानवीय संबंधों की पहचान साम्प्रदायिक नफरत की भीषण लपटों में झुलस कर बार -बार खो जाती हैं |जिसे खोजना एक तरह से जलते में पगडण्डी तलाशने की अबोध कोशिश की तरह है |

                                                                           सामान्यतः एक धार्मिक समुदाय जब दुसरे धार्मिक समुदाय से वैमनस्य एवं हिंसा पर उतारू हो  नेतिकता को धत्ता बताकर अमानवीय कृत्य करने को प्रेरित होता है तो वह अविवेकी भावना साम्प्रदायिकता की श्रेणी में आता है |साम्प्रदायिकता मूलतः ऐसी विचारधारा है ,जिसका हमारे बीच लम्बे समय से   अस्तित्व रहा है |ऐतिहासिक घटनाचक्रो पर दृष्टिपात करें तो हम पाते हैं  कि भारत के इतिहास में साम्प्रदायिकता की समस्या का अर्थ हैं विभाजन से पूर्व के 26 करोड़ हिन्दू समुदाय का 9 करोड़ 40 लाख मुस्लिम समुदाय के साथ संबंधों का विश्लेषण |गौरतलब है कि ब्रिटिश सत्ता की स्थापना से पूर्व भारत के दो प्रमुख समुदायों हिन्दू और मुस्लिम में सांप्रदायिक संघर्ष के उदाहरण नह्गिन मिलते |इसका अर्थ यह नहीं है कि मुस्लिम शासको के विरुद्ध कोई विरोध या विद्रोह नहीं हुआ |केन्द्रीय सत्ता के शिथिल पड़ते ही सामंती विद्रोहों की घटनाओ से मध्यकालीन इतिहास भरा पड़ा है ,परन्तु मुस्लिम सत्ताधारियों के विरुद्ध इन चुनौतियों का आधार सांप्रदायिक नहीं था | कहने   का तात्पर्य यह है कि ब्रिटिश सत्ता से पूर्व इस तरह के सांप्रदायिक दंगों का जिक्र नहीं मिलता | मतलब साफ है कि औपनिवेशिक ताकत ने अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए फूट -नीति का जो मनोवैज्ञानिक सहारा लिया वहीँ से यह आवाम की मानसिकता में घर कर गई जो बार -बार सामने आ विनाश रूप धारण कर लेती हैं |"तमस " में इस नीति का पर्दाफाश भी अत्यंत सहजता के साथ किया गया है |

                                                                      गौरतलब है कि इस मानसिकता का निर्माण भी एक लम्बी प्रकिर्या के तहत हुआ ,1857 की क्रांति के समय भारत के क्रांतिकारियों में हिन्दुओं एवं मुसलमानों में जो एकता की भावना थी उसने अंग्रेजो को भारत में अपना आधिपत्य बनाये रखने के लिए फूट -नीति अपनाने के लिए तत्पर किया |1909 में भारत में चुनाव पद्धति लागु करने का अधिनियम तथा  1905 में बंगाल विभाजन का मुख्य मकसद साम्प्रदायिकता का जहर घोलना ही था |वहीँ दूसरी ओर हिन्दू तथा मुस्लिम सम्प्रदायों में आपसी विद्वेष तथा पृथकता में वृद्धि के लिए कुछ हद तक हिन्दू संप्रदाय को भी उत्तरदायी ठहराया जा सकता हैं |कट्टर पंथी हिन्दुओं ने धर्म के आधार पर अपना अलग राजनितिक संगठन "हिन्दू महासभा " बनाया |अनेक अवसरों पर महासभा के नेताओ द्वारा अनुत्तरदायित्वपूर्ण भड़कीले भाषण के प्रतिक्रिया स्वरुप  मुस्लिम लीग ने भी सांप्रदायिक विष उगलना शुरू कर दिया |16 अगस्त 1946 से  20 अगस्त 1946 तक चलने वाला दंगा ,पूर्वी बंगाल के नोआखली जिले में 10अक्तूबर 1946 के दंगे और परिणामस्वरूप  25 अक्तूबर1946 को छपरा,मुंगेर और भागलपुर आदि क्षेत्रों में हुए दंगे इसी के परिणाम थे |गौरतलब है कि जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री "एटली " ने सत्ता हस्तांतरण की तो इस घोषणा ने मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस के नेताओ के विवेक को विचलित कर दिया ,उन्होंने स्वार्थ आकांछाओ और सत्ता सुख के आगे नतमस्तक हो आपसी सदभाव में जीने वाले आम जनता को विभाजन की रेखा के बीच नरसंहार के तांडव में झुलसने को मजबूर कर दिया |इस प्रकार सत्ताधारियों के दूरगामी स्वार्थी रवैयो के सामने साम्प्रदायिकता की आग  में मानवीय मूल्यों की चिता जलती रही |

                      भीष्म साहनी कृत  "तमस " विभाजन  के फलस्वरूप घटित इसी त्रासदी के बीच"साम्प्रदायिकता बनाम मानवता " के बीच की जद्दोजहद  को बयां करता हुआ औपनिवेशिक तथा राजनितिक तत्वों के ऐतिहासिक तथ्यों को उजागर करता हुआ मनुष्यता का पशुता में बदलने की कहानी है |वस्तुतः साम्प्रदायिकता एक ऐसी घातक मनोवृति और सामाजिक प्रवृति  रही है ,जिसने दक्षिण एशिया के जनजीवन को तहश -नहश करके रख दिया है |साम्प्रदायिकता का सवाल आते ही हम इतने संवेदनशील हो जाते है कि विचार प्रवाह और पद्धतियों में तेज घुर्निया बनने लग जाती हैं |इन घुर्नियो से विचार निकाल ले जाना बड़ा मुश्किल होता है ,हम एक ऐसे आत्म -विरोध और अंतर्विरोध  में फंस जाते है कि कई बार साम्प्रदायिकता के हल को नही सांप्रदायिक नजरिये से ही ढूंढने लगते हैं  |यहीं साम्प्रदायिकता सफल होती है और मानवीय मूल्य इसकी आग में झुलस झुलस कर दम तोड़ देती है |  "तमस " के भीतर मानवीय सदभाव को बचाने की हरसंभव कोशिश करता हुआ कम्युनिष्ट देवदत्त ,और उसके साथी सोहन सिंह और मीरदाद जैसे पात्र समाजवाद की स्थिति को चित्रित करता है |यह ऐतिहासिक तथ्य है की कांग्रेस और मुस्लिम लीग समाजवादियो का विरोध भी करते थे थे ,और जरुरत पड़ने पर अंग्रेजो की मदद से इन्हें प्रभावित भी काया जाता रहा|यहाँ पर साम्प्रदायिकता की आग के लपटों के बीच भी मानवता ,इंसानियत ,सदभाव को बचने की कोशिश में संघर्षरत ये पात्र कांग्रेस  ,मुस्लिम लीग और ब्रिटिश हुकूमत से भी संघर्ष करते हुए नजर आते है |अंग्रेज शासक "रिचर्ड " जो सांप्रदायिक दंगो को रोकने में समर्थ है फिर भी उसका खामोश बैठे रहना और दंगे का तांडव घटित होने के बीच अपनी पत्नी "लीजा " के साथ रोमांस करना उसकी कूटनीति और अमानवीयता का विघटित रूप ही है जिसे  निर्दोष लोगों की मौत का कोई फर्क नहीं पड़ता |पंद्रह वर्षीय "रणवीर " के मुर्गा मरकर दीक्षा लेने -देने वाला प्रसंग इस अर्थ में विशेष है की किशोर मानसिकता को धर्म और संस्कृति का कुपाठ पढ़ाकर ,चिंतन की कारुणिक निर्धनता के कारण गुमराह किया जाता हैं |आज के परिपेक्ष्य में जिहाद के नाम पर किशोर मानसिकता को पढाया जाने वाला  यह कुपाठ अवलोकनीय ह| मानवीय सदभाव को खंडित करने में तथाकथित धार्मिक संगठनों का भी विशेष हाथ रहा है ,यहीं से अबोध मानसिकता वाले युवा आपसी वैमनष्य को बाधा सांप्रदायिक दंगो में सूली चढ़ जाते हैं ,जिसके उदहारण "तमस" में भी यत्र -तत्र मिल जाते हैं |

                                                     साम्प्रदायिकता और मानवता की स्पष्ट लड़ाई शहनवाज के प्रसंग में दृष्टिगत होता है ,शहनवाज जो अपने हिन्दू मित्र रघुनाथ के परिवारों को दंगों के बीच सुरक्षित स्थान पर पहुंचाता हैं  ,जो मानवीयता के शेष रहने की तरफ इशारा है किन्तु यहाँ भी साम्प्रदायिकता के उन्मादी वातावरण में वह नेतिकता को भूल जाता है और रघुनाथ के नौकर की चोटी पर नजर पड़ते ही लात मारकर पटक देता है और उसे अधमरा करके छोड़ जाता हैं |मानवता और साम्प्रदायिकता के बीच की जद्दोजहद में साम्प्रदायिकता के बलवती होने वाला यह दृश्य अत्यंत कारुणिक है |वहीँ नत्थू का साम्प्रदायिकता के योजनाबद्ध उद्देश्य का मोहरा बन जाने पर उसकी छट- पटाहट ,अपराधबोध ,अंतर्द्वंद्व ,मानवीय चेतना के अंतर्द्वंद्व को दर्शाता है जो उसे सहानुभूति के केंद्र में ला हमें इस विषय पर सोचने को मजबूर कर देता है |साम्प्रदायिकता की लपटों के बीच गली -गली घूमकर मजदूरी करने वाले इत्रफ़रोश के ऊपर एक अबोध लड़के का अंजन वार सचमुच व्यथित करने वाला है |वहीँ साठ साल के बुजुर्ग हरनाम सिंह और उसकी पत्नी बन्तो का भागकर प्राणरक्षा करना तथा पड़ोसी गाँव में मुस्लिम औरत रजो के यहाँ शरण मिलना सांप्रदायिक उन्माद के बीच मानवता के शेष रहने की जुबानी है तो वहीँ इक़बाल सिंह का शेख इक़बाल अहमद बनना नैतिकता के पतन को दर्शाता है |बदलते वक़्त और निजाम के कारण मानवीयता मुंह बाए खड़ी रह जाती है और उसके सामने वहशी दरिंदगी का नंगा नाच खेला जाता हैं |

                                                                                                                                                                           "तमस"-सांप्रदायिक  दंगो में सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले स्त्री -वर्ग को भी रेखांकित करता है ,|अपनी अस्मत की रक्षा की खातिर मासूम बच्चो के साथ कुँए में कूदती महिलाऐं ,धर्मान्धता की पराकाष्ठा केबीच  लूटपाट और वासना पूर्ति का सरल उपाय ,बलात्कार जैसी अमानवीय कृत्य इस सत्य को उद्घाटित कर देती है |इस नरसंहार के बीच अवसरवादी मध्यवर्ग की टुच्ची मानसिकता ही कहे कि वह दुसरे के धन का लूटपाट करने के अवसर से चूकना नहीं चाहता ,"रमजान "के द्वारा "हरनाम सिंह " के घर का लुटा बक्शा और अंकरा का उसे खोल के देखने का उतावलापन मानवीय चेतना को को निचोड़ कर रख देती हैं |सांप्रदायिक शक्तियों के जाग्रत होते ही धार्मिक वैमनष्य बढ़ जाट है ,समानता ,सहधर्मिता ,सदभाव कुंठित हो जाते हैं  ,जनतंत्रीय इच्क्षाएं तालाबंदी का शिकार हो जाती है ,आदमी अपनी सुरक्षा की भावना से अब हमलावर हो उठता है |"तमस " की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है |यह स्वतंत्रता पूर्व और विभाजन की कथा होते हुए भी अपने विचार बीज के महत्त्व के चलते अपनी प्रासंगिकता में स्वातंत्र्योत्तर भारत की एक महाकथा बन गई है |अंग्रेजो के भारत से जाने के बाद भी और विभाजन की त्रासदी लिख जाने के बाद भी साम्प्रदायिकता की समस्या  कहीं गायब नहीं हुई  है|इसकी प्रासंगिकता इस बात में निहित है की इस समय भी सत्ता के लिए धर्म का सहर लिया जा रहा है |1984 का सिख दंगा ,1992 का बाबरी मस्जिद को लेकर होने वाला दंगा , 2010 में अयोध्या में मंदिर -मस्जिद भूमि विवाद पर आने वाले फैसले के दरम्यां बनने वाला सांप्रदायिक उन्माद की आशंका ,हाल ही में  उत्तरप्रदेश में हुए धर्म परिवर्तन का मसला ,मुस्लिम जनसँख्या के बढ़ने पर आने वाली रिपोर्टो को लेकर होने वाली बहसे आदि "तमस " को आज के दौर में भी प्रासंगिक ठहराती है |आज हमारे देश की राजनितिक पार्टियाँ अंग्रेजी साम्राज्यवादी सोच को सीचते हुए नजर आते हैं ,व़े उनके अभिकर्ता के रूप में अपने स्वार्थ को बड़ा पेचीदा तथा चालाक हरकतों के साथ जरी रखे हुए है |यहाँ" रिचर्ड " जैसे सत्ताधारियो की कमी नहीं है जो इस बात को ज्यादा ध्यान में रखते है कि  जनता किस बात को लेकर आपस में बंटे हुए है ताकि उनका इस्तेमाल व़े राजनितिक रोटी सेकनें  में कर सकें |जनता आपस में लडती रहे यही तो उन्हें शक्ति प्रदान करता है और उनकी सत्ता बची रहती है |गौरतलब  है कि साम्प्रदायिकता  के जहर को निष्प्रभावी करने के लिए हमें शिक्षा के ढांचे में भी परिवर्तन लाना होगा |उसमे आपसी भाईचारे ,सदभाव ,तथा धार्मिक सहिष्णुता के पाठों को भी उसमे समाविष्ट करना होगा |किन्तु यदि राजनितिक सत्ता यु ही टुच्ची राजनीति करती रही तो यह साम्प्रदायिकता और भी भयावह रूप लेता जाएगा और तमस का यह अंधकार गहन होता चला जायेगा जहा मानवता की बारीक़ रेखा खोज पाना भी मुश्किल होगा |जैसा माहौल आतंकवाद ,नक्सलवाद ,सम्प्रदायवाद आदि के द्वारा बन रहा है और राजनितिक सहयोग भी इसे जिस तरह से मिल रहा है उससे पुनः एक गृहयुद्ध हो जाना कोई बड़ी बात नहीं होगी |आज की राजनितिक पार्टियाँ जो खेल खेल रही है उसे देखकर "तमस" का याद हो आना स्वाभाविक ही है |




गौरव भारती 

शोधार्थी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय 

मोबाईल- 9015326408