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 सभी को नमस्कार,

 इस समय में आपको  जीवन में आने वाली  कुछ समस्याओं  के बारे में बात करूँगा क्या आपको किसी समय ऐसा महसूस होता है कि आप जो भी करना चाहते हैं वह नहीं कर पाते और जो नहीं करना चाहते या नहीं होना चाहिए वह जाने अनजाने में ना चाहते हुए भी हो जाता है इसके कई कारण हो सकते हैं आप सोचे तो आपके हिसाब से यह ग्रह गोचर, भाग्य दशा और उनके विभिन्न फल- फलादेश एवं आपके कर्म बंधन हो सकते हैं इन सब के समाधान  प्रत्येक  के / सब के हिसाब से अलग अलग हो सकते हैं किंतु फिर भी कुछ लोगों का यह विचार है कि हम अपने कर्मों का फल जो भी हो प्राप्त करते हैं . कर्म अच्छे भी हो सकते हैं कर्म  बुरे भी हो सकते हैं अच्छे कर्मों का फल अच्छा ही मिलता है और बुरे कर्मों का  बुरा फल भी हमको भोगना पड़ता है  मैं यदि किसी के मार्ग  में काँटे डालूंगा  तो यह निश्चित है कि  काँटे मुझे ही   तकलीफ पहुंचाएंगे .  जब भी में किसी के साथ अच्छा कर्म करूंगा या  भलाई  करूंगा तो निश्चित मानना कि यह  भलाई  भी मेरे साथ ही  बंध जाती है और इसका अच्छा फल भी मुझे ही प्राप्त होता है और यह मुझे भी नहीं मालूम कि वह सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा इसका फल मुझे कहां पर दे देता है यह भी मान्यता है कि यदि कोई भी  कर्म  बगैर  फल की प्राप्ति के लिए किया जाता है तो बंधन के रूप में हमारे साथ नहीं  बंधता और उसका अच्छा फल या    बुरा फल भी हमको नहीं प्राप्त होता इसी को भगवान श्री कृष्ण ने गीता में निष्काम कर्म की तरफ बढ़ने के लिए हम सब को मार्गदर्शित किया है .


यह भी निश्चित है कि यदि कोई भी   कर्म किसी भी फल के लिए या किसी को परेशान करने के लिए किया जाता है तो वह हमको बंधन में   डालता है और इसको हमको अच्छे या बुरे रूप में भुगतना पड़ता है आज के समय में निष्काम कर्म के बारे में बहुत मुश्किल से ही सोचा जा सकता है क्योंकि इस  युग धर्म  के अनुसार हर  कर्म किसी न किसी भाव   या फल के लिए ही किया जाता है और यदि किसी देवता के,  देवी के चरणों में  या उनके मंदिर में भी  हम देखें तो सभी भक्त भगवान से कुछ ना कुछ मांगते हुए दिख जाते हैं और कई दफा तो हमको यह भी सुनने में मिल जाता है कि भक्त भगवान से व्यापारिक सौदेबाजी की तरह सौदा करता दिखाई देता है कि भगवान मेरा यह कार्य करो, मदद कर दो, यह करो ,वह करो, मैं वहां आऊंगा,  प्रसाद चढ़ा दूंगा ,   ब्राह्मणों को भोजन  करवा दूंगा  या इतने रुपए चढ़ा दूंगा इत्यादि इत्यादि. यह क्या है? क्या हम भगवान से भी सौदेबाजी करने से नहीं चूकते. जब भक्त की भावना भगवान के प्रति ऐसी हो जाती है तथा भक्तों की श्रद्धा भी  व्यापार -तोल-मोल हो जाती है तो देव मूर्ति भी भक्तों की प्रार्थना उसके हिसाब से ही सुनती है इसलिए हमारे यहां यह   भी कहा गया है कि जैसी रही भावना जैसी  प्रभु मूरत तिन देखी तैसी. क्या वह सर्वशक्तिमान हमारे धन का, रुपयों का  भूखा है बिल्कुल भी नहीं .यह सब श्रद्धा एवं भावना की बात होती है इसलिए हो सके तो  हमको हमारी इस व्यापारिक  सोच से मुक्त होकर ही देवालय में जाना चाहिए किंतु इसका कहीं भी यह मतलब नहीं है कि हम को अपनी देव प्रतिमा के प्रति श्रद्धा भक्ति को  प्रदर्शित नहीं करना चाहिए.  देवालय  में हम देव  प्रतिमा के समक्ष नमस्कार कर, प्रणाम कर, सिर झुका कर अपनी श्रद्धा और भक्ति दिखा सकते हैं


 फिर भी यही करनी चाहिए कि यदि हम किसी के साथ अच्छा न कर सके तो उसका बुरा भी नहीं करें क्योंकि यह निश्चित है कि बुराई का फल हम को भुगतना ही पड़ता है और यही बंधन है .  हम यह कह सकते हैं कि अच्छे या बुरे कर्म हमको बंधन में डालते हैं और उनका फल हमको निश्चित रूप से भुगतना पड़ता है इसलिए कई दफा हमारे चाहते हुए भी या न चाहते हुए भी वह कुछ घटित हो जाता है जिसकी उम्मीद हमको पहले से नहीं होती है क्योंकि यह हम नहीं जानते क्यों  और कैसे समय के चक्र के हिसाब से कौन सा अच्छा फल या बुरा फल हमको कब कहां और कैसे भुगतना पड़ जाए.  इसलिए कोशिश यही होनी चाहिए कि हम प्रत्येक कर्म बगैर किसी फल के,  निष्काम रुप से करें यदि कोई भी कर्म निष्काम रूप से भी नहीं कर पाए तो  हमारी भरसक कोशिश यही होनी चाहिए कि किसी दूसरे प्राणी मात्र के साथ हम किसी भी रूप में मन, कर्म, वचन से कोई भी बुरा कार्य नहीं करें क्योंकि यह परमपिता ही जानता है कि किस वक्त  उसने किस प्राणी को किस तरह  का फल  भुगतने का समय निश्चित किया हुआ है. 

यह मेरे निजी विचार हैं.इनको यहां तक पढ़ने के लिए आपका कोटि - कोटि धन्यवाद .