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कफ़न की तलाश

जिन्दगी बोझल सी बेमन सी हो गई थी दूर तक देखने पर भी न कोई राह न मंजिल मिल रही थी , सांसें मेरी मुझे अब लंबी लग रही थीं सुबह निकलता था घर से लेके खाली हांथ साम को लौटूंगा कुछ लेके इस उम्मीद के साथ , दिनभर की मशक्कत के बाद भी जब न लगता था कुछ हाँथ तब नज़र आते थे भूख से तङपते कलपते अपने बच्चों के चेहरे और मन हो जाता था उदास , ऐसे घुट घुट कर जीने से तो अच्छा मैं मर जाऊं आज , और खत्म हो मेरी ये कफ़न की तलाश !