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आप भी सोच रहे होंगे इस बार लेखक के दिमाग में क्या कीड़े चल रहे हैं जो अपने लेख का ऐसा विषय रखा है! ये विषय दरअसल शेक्सपीअर के प्रसिद्ध उक्ति से लिया गया है और शायद इन्होनें ये उक्ति भारत की प्रसिद्ध कहावत, "आँखों के अन्धे नाम नयनसुख!" को बिना सुने या जाने बोला होगा! दरअसल ये विषय मुझे हमारे घर के पास की ही एक परचूनी की दुकान के मालिक के नाम से मेरे दिमाग में आया था! जी उनका नाम है मिश्री लाल जी! नाम भले ही मिश्री लाल है इन साहेबान का मगर अपने दुकान पे मौज़ूद मातहतों से ऐसा कड़वा बोलते हैं कि एकबारग़ी नीम और करेला भी अपने कड़वे होने की पदवी से इस्तीफ़ा दे दें! तो ख़ैर नाम और स्वाभाव का आपस में सम्बन्ध वैसा है जैसा पाकिस्तान और इंसानियत का! यानि की दोनों एक दूसरे की तरफ पीठ दिखाकर खड़े हुए प्रतीत होते हैं!
गोया हिंदुस्तानी भी बड़े अजीब लोग हैं नाम से ही किसी व्यक्ति में मीन-मेख निकलते हैं अगर व्यक्ति फलां प्रदेश से है जिसका एक बड़ा हिस्सा हमारे पडोसी के पास है और बड़ा ही उर्वर प्रदेश हैं, वहां के लोग या तो ट्रक ड्राइवर होंगे या ढ़ाबा चलते होंगे या फिर भारतीय सेना में होंगे! या फिर एक विधर्मी लोग (ऐसा आज की दायीं-तरफ़ी सरकार का आरोप है) कि वो पँक्चर ठीक करने का काम ही करेंगे! तो साहब! नाम या उपनाम तो सिर्फ आपको बुलाने का तरीक़ा है या फिर आपके पारिवारिक पृष्ठभूमि को ज़ाहिर करने का तरीक़ा है वरना उन लोगों से ब्रिग. कुलदीप सिंह चांदपुरी भी निकले हैं और रंगा-बिल्ला जैसे कुख़्यात मुज़रिम भी! क़लाम साहब भी निकले हैं तो बुरहान वानी भी! तो ख़ैर नामक और कार्मिक गधे हर जगह मिलते हैं बरहाल बात ये है कि हम इन गधों को सिर पे बैठाते हैं या अस्तबल में!
सबसे मज़े की बात है नाम को लेकर वो मिलती है हमें हमारी राजनैतिक दलों के नामों में अधिकांश दलों के नाम में एक शब्द आता है और वो है "जनता"! ख़ैर बात आगे बढ़ने से पहले आज मैं अंग्रेजी शब्दकोष में किसी शब्द का मतलब ढूँढ रहा था तो अचानक मेरी नज़र पढ़ी और वो शब्द था "कांग्रेस"! शब्दकोष के मुताबिक़ कांग्रेस का अर्थ होता है बंदरों का समूह, ख़ैर हमारे यहाँ ये समूह इंसानों का है जो राजनीति के पेड़ पे एक डाल से दूसरे डाल पे कूदने के लिए बहुत ही प्रसिद्ध हैं! तो ख़ैर मैं कह रहा था कि हर दल के नाम में जनता नामक शब्द आता है और हास्यास्पद ये है कि समस्त तथाकथित राजनैतिक दल जिनके भी नाम में जनता आता है, दरअसल समस्त जनता ही इन्हीं राजनैतिक दलों से त्रस्त है! सभी पार्टियाँ कहतीं हैं कि हम जनता का भला करेंगे मगर जनता शब्द के ऊपर वैसे ही एक "स्टार" लगा हुआ है जैसे म्युचुअल फंड की "टैग-लाईन" कि म्युचुअल फंड सही है के सही के ऊपर एक "स्टार" दिखने के बाद एक व्यक्ति तेजी से बोलता हुआ निकल जाता है की म्युचुअल फंड बाजार के खतरों से निरपेक्ष नहीं है और आप अपना पैसा देखभाल कर लगाएं! संक्षेप में ये कहना चाहता हूँ कि हर दल में जो जनता नामक शब्द आता है वो सिर्फ उसी जनता से समबद्ध है जिनसे दल के नेताओं की नज़दीकियां हो! मज़ा तो ये भी है कि एक दल कहता है कि हिन्दू खतरे में हैं, कोई मुस्लिमों को खतरे में बताते हैं, किसी की राजनीति सिखों के भय पे चल रही है और कइयों की राजनीति में आर्य-अनार्य की विभेद पर चल रही है परन्तु खतरे में भारतीय-जनता है हर कोई भूल जाता है!
एक मेरे पड़ोस में रहनेवाले जोड़े को पिछले ९-१० साल से संतान नहीं थी और अन्य तरीक़े भी कारगर सिद्ध नहीं हुए तो उन्होनें आपस में विचार-विमर्श कर ये फ़ैसला लिया कि वो एक नवजात को गोद लेंगे! जोड़े में जो पुरुष थे उनकी माँ को ये बात नागवार गुज़री कि जिसके माँ-बाप का नाम-पता मालूम नहीं है और ख़ून किसका है वो पता नहीं है? ऐसे बच्चे को मेरे घर में "नो-एंट्री" है! मित्र जब ये "घरेलू समस्या" हल हेतू मेरे पास लाया तो मैंने उनकी माताश्री से बात करने की कुचेष्ठा की! संवाद इस तरह का है:
मैं: आंटी जी! आपको किस बात से समस्या है उस बच्चे के अनाम होने की या उसके खून की?
आंटी जी (विस्मयपूर्वक घूरने लगीं मेरी तरफ़): दोनों से है!
मैं: चलिए अगर बात करें अनाम होने की तो नाम तो आप रखेंगी और वही नाम वो आगे भी अपने साथ जुड़ा रखेगा या रखेगी! रही खून की बात तो मुझे पता है ये किसका खून है?
आंटी जी (आश्चर्यचकित होकर): तुम्हें पता है?
मैं: जी बिल्कुल पता है!
आंटी जी: किसका ख़ून है ये? हिन्दू का या मुसलमान का? ऊँची जाति का है या फिर... (उन्होनें बड़ा ही ख़राब शब्द इस्तेमाल किया था जो मैं यहाँ नहीं लिख रहा हूँ)? बताओ किसका है ये ख़ून?
मैं: आंटी जी! आपकी और मेरी तरह एक इंसान का है!
और मैं गुस्से में उठकर चला आया और मित्र से मिलने का सौभाग्य नहीं हो पाया और न ही उनके सम्बन्ध कोई खबर मिली! शायद उनके फैमिली ट्विटर पे मुझे "ब्लॉक" कर दिया गया था!
तो नाम का आपसे नाता आपके देहावसान तक होता उसके बाद तो सब कहते हैं कि चलिए शरीर को अंतिम यात्रा पे ले चलते हैं! नाम का गोलमाल ही है कि एक ही नाम के दो व्यक्ति अलग-अलग स्वभाव के हो सकते हैं जैसे कि एक सुखदेव आज़ादी के परवाने हुए हैं और एक सुखदेव सिंह सुक्खा मेज. जन. अरुण बैद के हत्यारे थे हालाँकि दोनों फाँसी पे चढ़ाये गए थे परन्तु दोनों के सज़ा के सन्दर्भ में लोगों के मत अलग-अलग है! नाम आपको बुलाने का साधन है कृपया इसका सामान्यीकरण न करें कि इस नाम या उपनामवाला व्यक्ति ऐसा या वैसा ही होगा! आज भी मिश्रीलाल जी अपने मातहतों पे अपनी कड़वाहट बरसा रहे हैं, आज भी आंटी जी नाम और खून के सम्बन्ध के मार्फ़त अपनी शोध जारी रखे हुए हैं, आज भी लोगों के नाम को लेकर "परसेप्शन" या छवि बनाई जा रही है परन्तु सवाल आज भी यथावत है कि व्हाट्स लाइज़ इन द नेम? ख़ैर! कोई मेरा नाम लेकर मुझे बहुत गालियाँ दे रहा है क्यूंकि उधार बहुत ले रखा है और मैं उस गलियाते हुए आदमी की तरफ बढ़ रहा हूँ हए सोचते हुए कि इस रौद्र-मूर्ति का नाम शांतिलाल किसने रख दिया?