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हर सफ़र कुछ न कुछ सिखाता है. कई बार जब निराशा से भरा होता है पूरा मन, तो जीने का ज़ज्बा भी दे जाता है.

सफ़र ज़रूरी है, चाहे वो कहीं से कहीं को भी हो. या फिर खुद से खुद की ओर हो. दुनियादारी में उलझे हुए जब दिमाग काम करने में कंजूसी करता है, बार बार हैंग होने लगता है. जब जरूरत होती है एक नेचुरल ‘फॉर्मेट’ की. वो ‘फॉर्मेट’ ‘जिसके बाद जहाँ प्रकृति के करीब होने के ‘ड्राइवर’ दिमाग में ‘इंस्टाल’ होते हैं.

इससे खुद को महसूस करने वाला वर्ज़न अपडेट हो जाता है. जहाँ ठंडी सी हवा का एक झोंका शरीर की डॉक्टरी कर जाता है बिना फीस वसूले. जहाँ अपने आप सारी ‘इनर इंजीनियरिंग’ भी हो जाती है.

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सफ़र… यात्रा.. घूमना.. कहने को जितने छोटे ये शब्द हैं इनके मतलब उतने ही गहरे निकला करते हैं. आप अगर किसी से भी ये पूछेंगे की उन्हें क्या करना पसंद है तो वो बिना झिझके सिर्फ एक जवाब देंगे. ‘घूमना’

हर तीसरे इंसान के मुंह से आपको यही सुनने मिलेगा. पर घूमना बस एक शौक नहीं होता है कुछ लोगों के लिए. ये एक जूनून बन जाता है. ताकि वो कहीं खुद को पा सकें.


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हम सभी के साथ ऐसा अक्सर होता है कि प्लान तो ढेरों रहा करते हैं जेहन में लेकिन उनको पूरा करने के लिए कुछ जरूरी सा हो जाना काफ़ी जरूरी रहता है.

हम अपनी निजी जिंदगियों में इतने ज़्यादा उलझे होते हैं कि उन सपनों को जीने के सपने तो बहुत देखते हैं पर उनको पूरा करने के लिए एफर्ट्स चाहिए होते हैं. ऐसे एफर्ट्स जिनसे एक नया नजरिया मिल सके.

बस ऐसा ही कुछ था जिसके कारण एक लड़की निकल पड़ी खुद को ढूंढने. खुद से दूर ढूंढने. जहाँ उसने पाया कि खुद को पाने के लिए कहीं दूर नहीं बल्कि बस खुद तक आना ज़रूरी होता है.


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लड़की बचपन से ऐसी रही है. घुमक्कड़ किस्म की. कहीं भी जाने की बात पर सबसे पहले वो ही तैयार होती थी. जब थोड़ी और बड़ी हुई तो साइकिल ले कर कहीं को भी निकल जाती थी. तेजी पसंद रही. वक़्त बीतता गया और उसकी घुमक्कड़ी की प्यास भी बढ़ती गयी.

छोटे से शहर की लड़की थी, कई बार डर लगा करता था. पर ‘डर के आगे जीत है’ वाला जुमला तो रटा था ही. फिर क्या था एक दिन इस लड़की ने उठाया बैग और निकल पड़ी कुछ अनजान रास्तों से दोस्ती करने. कुछ अनजान लोगों को जानने. और सबसे ज़्यादा खुद को ढूंढने.

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लड़की जिसे इंसानी भाषा में इंसान कहते हैं. लड़की के मन में ये सवाल हमेशा से था कि दूसरे प्राणियों की कोई भाषा होती है क्या? होती भी है तो उसे उस भाषा में वो बात कैसे करते होंगे? बात करते होंगे तो क्या वो भी हमको इंसान ही कहते होंगे? या कोई अलग नाम हैं उनकी भाषा में हमारा?

लड़की सवाल बड़े करती थी. अजीब सवाल करती थी. इसलिए साइंस की पढ़ाई चुन ली. लॉजिक से लगाव था. हर चीज को जान लेने क्युरियोसिटी भी.

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फिर लड़की ने डॉक्टरी की पढ़ाई चुन ली. लोगों से बातें करने और उनको जानने में बड़ा मजा आता था. फिर क्या लड़की निकल पड़ी घूमने, जानने को उन पन्नों के बारे में जिन पर किताब नहीं लिखी गयी.

Original blog: https://roamingbaba.com/2018/03/09/story-of-a-solo-traveler-girl/

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