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पंचलैट देखिये ताकि सोंधी महक मिले आपको गाँव की,ताकि हूक उठे जिया में कि काश 1954 वाले दौर में हम जन्मे होते बिहार के किसी गाँव में...
जब सलम(सनम)चाँदी का झुमका प्रसाद संग मुट्ठी में बंद कर नज़ाकत से मुस्कुराती हैं तब बनावटी नहीं लगती,न ही लगता कुछ अजब भी,जब महतो टोला के सरपंच की खूबसूरत बीवी को कोई आँख भर देख रीझ जाता हैं तब कैसे सरपंच मन ही मन खीज कर बीवी को कोठरी में छुपा कर रखने का जुगत करते हैं।अब इसे आज क्रूरता कहिये तब ये प्यार ही था न ....सहज सरल लोग लकड़ी के चूल्हे पर आलू बैगन की तरकारी बनाते,सील पर मसाला पीस झट सीधे कढ़ाई में डालते,ताखे पर रखा नमक खुले सिकोरे में रहता,लेकिन वो अनहैजिनिक नहीं कहलाता था। जब खटिया के चार पावे अलग-अलग दिशा में भागते से दिखते थे,मुज ज़मीन से बीतते भर ही ऊपर लेकिन सब से प्यारी नींद ,बीना acकी।
जब दो सूती लूगा(साड़ी)में सुन्नर मामी भौजी लगती थी।जब गाँव भर मिलकर एक पैट्रोमैक्स जला ख़ुश होता था....तब सच गाँव,गाँव होता था।

धूल जम गई थी मेरी यादों के गाँव पर,साफ क्या धुंधला भी न दिखता था वो।
लेकिन पंचलैट में इतनी बारीकी से इन सारी चीज़ो को पिरोया हैं प्रेम मोदी जी ने कि मेरा खोया गाँव मुझे दुबारा मिला सा महसूस होता है।