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मैं शेखर, सूचना और तकनीकी क्षेत्र में इंजीनियर हूँ | अभी तक की अपनी उपलब्धियों से मुझे ऐसा लगता था कि आज तकनीकी विकास और विज्ञान के बढ़ते कदम ने दुनिया को अपनी मुट्ठी में समेट लिया है | थोड़े दिनों पहले तक मैं सोचता था कि हम मनुष्यों ने प्रकृति की हर एक देन पर विजय प्राप्त कर ली है | परंतु पिछले कुछ दिनों की घटनाओं से मेरी यह सोच विचारणीय बन गई है | 

आज सुबह जब मैं अख़बार उठा रहा था, तभी अचानक से जैसे मेरे बढ़ते हुए हाथ थम गए | मैं सोचने के लिए विवश हो गया कि कहीं इसमें वायरस तो नहीं है | तभी मुझे उन सभी लोगों की याद आई जो पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं | ऐसे कठिन पल में भी वे देश के कोने-कोने से समाचार और सूचनाएँ एकत्रित और लिपिबद्ध कर, उन्हें हमारे जानने योग्य बनाकर हमारे सामने प्रेषित करते हैं | इसके साथ ही अख़बार विक्रेता एवं उनसे जुड़े लोग जो घर-घर जाकर हमें ये पत्र उपलब्ध कराते हैं, वे तमाम लोग मेरी स्मृतिपटल पर छा गए | धनोर्पाजन करने के लिए कौल्हू की बैल की तरह जुटे लोगों के जीवन पर इस वैश्विक उठा-पटक का क्या प्रभाव पड़ रहा होगा |

इन बातों पर विचार करते हुए, मैंने पत्र उठाया ही था कि भीतर से श्रीमती जी की पुकार सुनाई दी – ‘अरे, सुनिए जी ! आज दूध वाला दूध के पैकेट नहीं दे गया, अब आप कहीं से भी दूध की व्यवस्था कीजिए | मैं फिर चिन्तन करने लगा कि उन ग्वालों का क्या हाल हो रहा होगा, जिनके पास सैकड़ों गाय और भैंसे है | उनके दूध की खपत कैसे हो रही होगी ? कैसे वह पशुओं के चारे की व्यवस्था कर रहे होंगे, जब सारे शहर में अनिश्चित काल के लिए कर्फ्यू जैसा माहौल है | इन्हीं अहीरों के साथ ही साथ मुझे उन लोगों की भी याद आयी जो ‘दुग्ध उद्योग ‘ से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं | 

समाचार पत्र जैसे का तैसा रख मैं दूध लेने के लिए निकला ही था कि तभी मुझे एक सफाई कर्मचारी नज़र आया | मैं फिर मनन करने लगा कि ये किस तरह अपनी जान की परवाह किए बिना सफाई के कार्य को तल्लीनता से कर रहा है | मैंने पूछा, ‘क्यों भाई, सब ठीक, तुम घर से यहाँ कैसे आए? उसने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘साहब, सब ठीक है | वैसे तो मैं हर रोज़ बड़ी ऑटो में बैठकर आता हूँ क्योंकि मेरा घर यहाँ से लगभग ५ किमी की दूरी पर है, लेकिन आज सभी बंद है तो मैं पैदल ही चला आया |’ 

यहाँ फिर मैं बेबसीवश विचार करने लगा कि आज क्या हाल हो गया है ! मनुष्य के जीवन को गतिमान बनाने वाले आज ये बड़े-छोटे सभी वाहन ऑटो, बस, केब, मेट्रो और तो और रेलगाड़ी एवं विमान तक थम गए हैं | रोज़ के लाने-खाने वाले ऑटो चालकों पर क्या प्रभाव पड़ रहा होगा | तभी मेरी तंत्रिका भंग हुई और सफाई कर्मचारी को हिदायत देने लगा कि अपना भी ध्यान रखे | अपने भोलेपन में वह बोला, ‘साहब हमारा क्या, हमें तो आदत है इन सबकी, बस हमारे बाल-बच्चे सलामत रहें | घर में सिर्फ दो दिन का राशन-पानी है तो सोचा क्यों न शीघ्रता से काम निपटा कर समय पर दाने-पानी की व्यवस्था कर दूँ | उसकी बात सुन, मैं हतप्रभ रह गया | इन्हीं उधेड़ बुन के बीच मैं अपने काम से पास के सुपर मार्केट की तरफ बढ़ने लगा | 

इमारत के बाहर निकलते समय मेरी दृष्टि हमारे सुरक्षाकर्मी पर पड़ी और अपनी आदतवश मैं उससे पूछने लगा, और भाई सब ठीक ! मुस्कराता हुआ वह बोला, सब ठीक साहब, बस कल से कुछ खाया नहीं है | आश्चर्य भरी दृष्टि से मैंने पूछा, क्यों ? वह कुछ बोलता कि मैं असहाय होकर उन छोटे-मोटे टिफिन की बंडी वाले से लेकर सम्पूर्ण ‘होटल उद्योग’ और उससे जुड़े लोगों को याद करने लगा | मेरी आँखों के सामने होटल मालिक, प्रबंधक, रसोइया, बैरा सभी की छवि सामने आ गई | मैं और तो कुछ ना कर सका, बस उस सुरक्षाकर्मी को सांत्वना देते हुए आगे बढ़ चला | 

रास्ते पर चलते-चलते न जाने कितने लोगों के बारे में मैं चिंतन करने लगा, चाहे वो गली की नुक्कड़ पर बैठने वाला नारियल पानी वाला हो, चाहे मोची हो, चाहे वो फुटकर विक्रेता हो | मेरे मन में रह रह कर यह विचार उमड़ रहा था कि इन लोगों की जीविका कैसे चल रही होगी जिनकी आजीविका रोज़मर्रा के कार्यो पर निर्भर होती है | इसी कशमकश मैं मैंने जैसे-तैसे सुपर मार्केट में कदम रखा | 

वहाँ नकाबपोश लोगों को देखकर मुझे ऐसा लगा मानो मैं कोई दूसरे ग्रह पर आ गया हूँ और चारों तरफ एलियंस घूम रहे हों | भय भरे इस माहौल में धीरे-धीरे डग भरते हुए मैंने सबसे पहले दूध के पैकेट लेने के लिए अपने हाथ बढाए | तभी मुझे किसी ने टोका, ‘श्रीमान आपएक बार में सिर्फ दो पैकेट ही ले सकते हैं , ये सुनकर मेरे हाथ वहीं जड़ हो गए | आगे-पीछे और दाएँ-बाएँ अपने आप को बचाते हुए मैंने आवश्यकता की सभी वस्तुएँ ले ली | लेकिन इस खरीदारी में लोगों का एक-दूसरे के प्रति व्यवहार देखकर मुझे ऐसा लगा, मानो एक साथ कई मानव बम घूम रहे हैं | और यदि कोई एक-दूसरे से टकरा जाए तो बस समझ लो हो गया विस्फोट | बिल भुगतान की कतार में खड़ा हो मैं अपनी बारी का ऐसा इंतजार करने लगा, जैसे चिड़ियाघर में बंद जानवर और पक्षी अपने आहार की प्रतीक्षा करते हैं | 

अंत में मेरी बारी आ ही गई, मेरी हालत उस चातक पक्षी के समान थी, जिसे बरसात की सिर्फ एक ही बूँद उल्लासित कर देती है | भुगतान करने के लिए मैं अपने बटुए की तरफ हाथ बढ़ाकर नोट निकालने ही वाला था कि पता नहीं किसी अनजान ताकत ने मेरे हाथ रोक लिए | मैं दर्शनशास्त्र के ज्ञाता की भांति चिंतनशील हो विचार करने लगा कि पता नहीं किन-किन व्यक्तियों के हाथ से होते हुए ये नोट मेरे पास आए होंगें | तभी मुझे अपनी तकनीकी की याद आई और गूगल पे के माध्यम से मैंने भुगतान किया | वापसी के समय, मैं मनन करने लगा कि जिन रुपयों के लिए लोग दिन-रात एक कर देते हैं, उन नोटों को हाथ लगाने में मुझे इतना सोचना पड़ रहा है | और फिर मैं सोचने के लिए मज़बूर हो गया .....