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नमस्कार,मैं नेहा "अनाहिता" श्रीवास्तव, यूँ तो मैं स्वयं एक नारी हूँ लेकिन मैं स्वयं अपने मन को जान नही पाती हूँ,एक साथ कई विचार मन को घेरे रहते हैं।
नारी मन,एक अनसुलझी गुत्थी,एक रहस्य और रहस्य इसलिए क्योंकि किसी ने उस रहस्य को सुलझाने की कोशिश ही नही की।
नारी मन के उन बंद दरवाजों पर किसी ने दस्तक ही नही दी।अधिकतर नारियों ने अपने मन के स्वप्नद्वारों को बंद करके रखा है,जिसके भीतर रंगबिरंगे छोटे-बड़े अनगिनत स्वप्न बंद हैं,जो आज़ाद होने की प्रतीक्षा कर रहें हैं।

नारी इस जीवन के रंगमंच की सबसे बेहतरीन अदाकारा है,जो मन के भावों को चेहरे तक आने ही नही देती है,शायद शुरूआत में वो ऐसी न रही हो लेकिन वक्त के साथ वह अपने किरदार में ढलती चली गई ,उस आवरण,उस मुखौटे को वह उतार ही नही पाई।वो अपने स्वप्न जी ही नही पाई।उसकी तस्वीर में सबने अपनी-अपनी पसंद के रंग भर दिये,किसी ने पूछने की कोशिश भी नही की कि उसे कौन सा रंग पसंद है।उसे रंगों की कैद दे दी गई,लाल रंग उसकी खुशी,उसके सौभाग्य और काला,सफेद रंग उसके दु:ख,उसके दुर्भाग्य से जोड़ दिया गया।सबकी नज़र रहती है,उसके ख़्वाबों पर ।रंग-बिरंगे ख़्वाबों को देखते ही ,आ जाते हैं लोग कीचड़ भरी बाल्टियाँ लेकर।उन्होंने स्त्री की तस्वीर को एक फ्रेम में कैद कर दिया है,आधुनिकता के नाम पर मामूली से बदलाव भी किये जाते हैं लेकिन उसका आस्तित्व आज भी उसी फ्रेम में ,वक्त की दीवार पर टँगा हुआ है।इस फ्रेम को केवल स्त्री ही तोड़ सकती है,अपने सपनो को आज़ाद कर सकती है,
चुप क्यों हो नारी?उठाओ न हथौड़ा।

©नेहा "अनाहिता" श्रीवास्तव

ओ स्त्री,जाग तू,
बरसो से उर्मिला सी सोई है,
उठ,ये नींद त्याग तू,
खुली आँखों से देख,
नये स्वप्न तू,
छीन ले लोगों के हाथ से,ये तूलिका,
रंग अपने ख्वाबों के,
अपनी चुनरी में डाल तू,
पीड़ा मन की,
यूँ न छिपा तू,
बेवजह यूँ न मुस्कुरा तू,
चुभता है ये मन भी,
जो बना हो,यदि काँच से,
मन कठोर चट्टान सा,
बना तू,
आज ज़माने के तूफान से
जा टकरा तू,
हाथों से जोड़ती जा हाथ तू,
राघव को न पुकार तू,
दशानन को स्वयं ललकार तू,
शिला बन अहिल्या सी
क्यों बैठी है तू?
स्वयं अपना उध्दार कर,
आस्तित्व में अपने प्राण फूँक तू,
चीरहरण करने से पहले ही
काट दे वो हाथ तू,
दुर्गा है,
चण्डी है,
काली है तू,
समरभूमि में हाहाकार कर तू,
ओ स्त्री,जाग तू।"

©नेहा "अनाहिता" श्रीवास्तव
स्वरचित,मौलिक