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मुण्डा , संथाल , बीरहोर, उराँव, हो - ये झारखण्ड की जनजातियाँ नहीं बल्कि यहाँ की संस्कृति हैं । उसी प्रकार अण्डमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में "जारवा" जनजाति , आंध्र प्रदेश में "चेंचू" जनजाति , मध्य प्रदेश के "कामर" , "भील" एवं "बाईगा" , गुजरात के "कोकना" "टोडिया" , छत्तीसगढ़ में "कोरकू" , "पहाड़ी कोरवा" , "माड़िया", "बीसोन होर्न माड़िया " एवं "अबूझ माड़िया" ,महाराष्ट्र के "गोंड" , "ठाकर " एवं "वारली" , कर्नाटक में "कोलीधर" , ओड़िसा में "बोण्डा" , राजस्थान में "मीणा" "गरासिया" "सहरिया" , केरल में "पनियान" , अरुणाचल प्रदेश में "जिन्गपो लोग", असम में "देओरी लोग" इत्यादि इत्यादि नाम से भारत के हर कोने में ट्राइबल बसे हुए हैं । राँची का एयरपोर्ट बिरसा मुण्डा के नाम पर है तो स्टेडियम जयपाल सिँह मुण्डा के नाम पर । दुमका में सिद्धू कान्हू के नाम पर यूनिवर्सिटी है तो डाल्टनगंज में नीलांबर-पीताम्बर के नाम पर वहीँ बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) के तहत दुमका में फूला-झानो डेयरी टेक्नोलाॅजी काॅलेज संचालित है ।

सीमित संसाधनों का उपभोग करने वाले ट्राइबल असीमित क्षमता के धनी हैं । स्वतंत्रता की लड़ाई से लेकर आज तक विभिन्न क्षेत्रो में ट्राइबल्स का अविस्मरणीय योगदान रहा है । आजादी के बाद जब भारत के सबसे विवादास्पद *कश्मीर मुद्दे* में जब एक नया मोड़ आया तो उस वक्त एक ट्राइबल को ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई । दिनांक 31 अक्टूबर 2019 को केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर के पहले लेफ्टिनेंट गवर्नर के रूप में गिरीश चंद्र मुर्मू को नियुक्त किया गया । मयूरभंज ओड़िसा में जन्में गिरीश चंद्र मुर्मू 1985 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं । नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के सीएम हुआ करते थे तो मुर्मू उनके प्रमुख सचिव थे। बाद में वो वित्त मंत्रालय दिल्ली में व्यय विभाग के सचिव पद पर भी आसीन रहे ।

वहीं श्रीमती द्रौपदी मुर्मू  झारखण्ड की प्रथम महिला राज्यपाल हैं, इनकी नियुक्ति 18 मई 2015 को हुई थी , इसके पूर्व वो ओडिशा विधानसभा में रायरंगपुर से विधायक तथा राज्य सरकार में मंत्री भी रह चुकी हैं ।

'पद्मश्री'

वर्ष 2020 की सूची में एक नाम है कर्नाटक की 72 वर्षीय पर्यावरणविद् और ‘जंगलों की एनसाइक्लोपीडिया’ के रूप में प्रख्यात तुलसी गौड़ा का,
जो एक आम ट्राइबल महिला हैं, ये कर्नाटक के होनाल्ली गांव में रहती हैं औऱ पिछले 60 वर्षो में एक लाख से भी अधिक पौधे लगा चुकी हैं।

ट्राइबल समुदाय से संबंध रखने के कारण पर्यावरण संरक्षण का भाव उन्हें विरासत में मिला । दरअसल धरती पर मौजूद जैव-विविधता को संजोने में ट्राइबल्स की प्रमुख भूमिका रही है। ये सदियों से प्रकृति की रक्षा करते हुए उसके साथ साहचर्य स्थापित कर जीवन जीते आए हैं। जन्म से ही प्रकृति प्रेमी ट्राइबल लालच से इतर प्राकृतिक उपदानों का उपभोग करने के साथ उसकी रक्षा भी करते हैं। ट्राइबल्स की संस्कृति और पर्व-त्योहारों का पर्यावरण से घनिष्ट संबंध रहा है। यही वजह है कि जंगलों पर आश्रित होने के बावजूद पर्यावरण संरक्षण के लिए ट्राइबल सदैव तत्पर रहते हैं। ट्राइबल समाज में ‘जल, जंगल और जीवन’ को बचाने की संस्कृति आज भी विद्यमान है ।

हल्दी की खेती संबंधी मुहिम चलाने वाले मेघालय की ट्राइबल महिला किसान 'ट्रिनिटि साइऊ' को उनके द्बारा की जा रही हर्बल खेती व प्रशिक्षण के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया , इनके साथ मुलीहा गाँव की लगभग 800 महिलाएँ औऱ उनके 98 सेल्फ हेल्प ग्रुप जुड़े हुए हैं ।

संथाली भाषा की साहित्यकार एवं कवि 'डॉ. दमयंती बेसरा' को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्मश्री से पुरस्कृत किया गया , इन्होंने संथाली भाषा में पहली पत्रिका 'करम धर' का प्रकाशन किया । इन्हें साहित्य अकादमी से भी पुरस्कृत किया जा चुका है ।

वर्ष 2019 झारखण्ड के पूर्वी सिंहभूम जिले के चाकुलिया प्रखंड की रहनेवाली 'जमुना टुडू ' को पर्यावरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया , लेडी टार्जन के नाम से लोकप्रिय जमुना ने पेड़ों को माफियाओं से बचाना शुरू किया. साथ ही नये पौधे भी लगाने शुरु किये । जमुना की इस लगन को देखकर आसपास के गांवों की महिलाएं जंगल बचाने की उनकी मुहिम में उनके साथ जुड़ती चली गईं । जमुना ने इन महिलाओं को लेकर वन सुरक्षा समिति का गठन किया। आज चाकुलिया प्रखंड में ऐसे तीन सौ से ज्यादा समितियां हैं । हर समिति में शामिल 30 महिलाएं अपने-अपने क्षेत्रों में वनों की रखवाली लाठी-डंडे और तीर-धनुष के साथ करती हैं ।

ओडिशा के क्योंझर जिले के खनिज संपन्न तालबैतरणी गांव के रहने वाले ट्राइबल किसान 'दैतारी नायक' ने सिंचाई के लिए 2010 से 2013 के बीच अकेले ही गोनासिका का पहाड़ खोदकर तीन किलोमीटर लंबी नहर बना दी थी । इस नहर से अब 100 एकड़ जमीन की सिंचाई होती है । केनाल मैन के नाम से लोकप्रिय नायक को उनके द्बारा एक कुदाल और बरमा के सहारे पहाड़ में तीन किलोमीटर लंबी नहर खोद डाली , समाज के सामने प्रस्तुत इस अप्रतिम उदहारण के लिए नायक को पद्मश्री सम्मान दिया गया ।

ओडिशा के कोरापुट जिले में जन्मीं 'कमला पुजारी' को पारंपरिक धान के बीज के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया। कमला विलुप्त प्रजाति के धान की किस्म की सुरक्षा के क्षेत्र में कई वर्षों से काम करती आई हैं। अनपढ़ होने के बावजूद कमला पुजारी ने धान के विभिन्न किस्म के संरक्षण को लेकर अपनी अलग पहचान बनाई है। पुजारी ने लुप्तप्राय और दुर्लभ प्रकार के 100 से ज्यादा बीज जैसे धान, हल्दी, तिल्ली, काला जीरा, महाकांता, फूला , घेंटिया आदि एकत्र किए हैं।

वर्ष 2018 में झारखण्ड जमशेदपुर के संथाली भाषा के विद्वान ' प्रो. दिगम्बर हांसदा' को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया । उन्होंने भारतीय संविधान का संथाली भाषा में अनुवाद करने के साथ ही कई पुस्तकें भी लिखीं । ट्राईबल्स और उनकी भाषा के उत्थान के क्षेत्र में प्रोफेसर हांसदा का महत्वपूर्ण योगदान है। वे केन्द्र सरकार के ट्राईबल अनुसंधान संस्थान के सदस्य रहे और उन्होंने सिलेबस की कई पुस्तकों का देवनागरी से संथाली में अनुवाद किया। उन्होंने इंटरमीडिएट, स्नातक और स्नातकोत्तर के लिए संथाली भाषा का कोर्स संग्रहित किया। इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं सरना गद्य-पद्य संग्रह, संथाली लोककथा संग्रह, भारोतेर लौकिक देव देवी, गंगमाला आदि। प्रो. हांसदा लालबहादुर शास्त्री मेमोरियल कॉलेज के प्राचार्य एवं कोल्हान विश्वविद्यालय के सिंडिकेट सदस्य भी रहे ।  

केरल के तिरुवनंतपुरम में कलार जंगलों में रहने वाली ट्राइबल महिला 'लक्ष्मीकुट्टी' को पारम्परिक दवाइयों के क्षेत्र में सराहनीय कार्य के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया। जंगल की दादी के नाम से लोकप्रिय लक्ष्मीकुट्टी को सांप काटने के बाद उपयोग की जाने वाली दवाई बनाने में महारत हासिल है ।

अपनी कृतियों के लिए दुनियाभर में ख्याति अर्जित कर चुके ' भज्जू श्याम' मध्यप्रदेश के जबलपुर के पास पाटनगढ़ गांव के निवासी हैं। गोंड कलाकार भज्जू श्याम की पेंटिंग की दुनिया में अलग ही पहचान बनी है। गरीब ट्राइबल परिवार में जन्म भज्जू श्याम ने अपने संघर्ष के दिनों में सिक्योरिटी गार्ड व इलेक्ट्रिशियन की नौकरी भी की है। अपनी गोंड पेंटिंग के जरिए भज्जू यूरोप में भी प्रसिद्धी हासिल कर चुके हैं। उनके कई चित्र किताब का रुप ले चुके हैं। 'द लंदन जंगल बुक' की 30000 कॉपी बिकी और यह 5 विदेशी भाषाओं में छप चुकी है। इन किताबों को भारत और कई देशों (नीदरलैंड, जर्मनी, इंग्लैंड, इटली, कर्जिस्तान और फ्रांस) में प्रदर्शित व पसंद किया गया है।

वर्ष 2017 में झारखण्ड के सिमडेगा जिले के बोब्बा गाँव में जन्में 'मुकुंद नायक' को कला एवं संगीत के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया गया । वे एक लोक गायक, गीतकार और नर्तक हैं । मुकुंद नागपुरी लोक नृत्य झुमइर का प्रतिपादक हैं। इन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है ।

वर्ष 2016 में झारखण्ड के जल पुरुष के नाम से लोकप्रिय 'राजा सोमेन उराँव मिंज' उर्फ सोमेन बाबा को जल संरक्षण, वन रक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए किए गए उनके अतुलनीय योगदान के लिए सम्मान दिया गया । राँची के बेड़ो प्रखण्ड में जन्में सिमोन ने साठ के दशक में बांध बनाने का अभियान जोरदार ढंग से चलाया। उन्होंने सबसे पहले नरपतरा में बांध बनाया, दूसरा बांध अंतबलु में और तीसरा बांध खरवागढ़ा में बनाया। आज इन्हीं बांधों से करीब 5000 फीट लंबी नहर निकालकर खेतों तक पानी पहुंचाया जा रहा है ।   सिमोन बाबा कहते हैं अगर विकास करना है तो आदमी से नहीं, जमीन से लड़ो, उसपर अन्न का कारखाना तैयार करो । अगर विनाश करना है तो आदमी से लड़ो।

वर्ष 2010 में पद्मश्री सम्मान से पुरस्कृत 'डॉ रामदयाल मुंडा'  न सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के भाषाविद्, समाजशास्त्री और आदिवासी बुद्धिजीवी और साहित्यकार थे, बल्कि वे एक अप्रतिम आदिवासी कलाकार भी थे। उन्होंने मुंडारी, नागपुरी, पंचपरगनिया, हिंदी, अंग्रेजी में गीत-कविताओं के अलावा गद्य साहित्य रचा है। उनकी संगीत रचनाएं बहुत लोकप्रिय हुई हैं और झारखंड की ट्राईबल्स लोक कला, विशेषकर ‘पाइका नाच’ को वैश्विक पहचान दिलाई है। वे भारत के दलित-ट्राइबल और दबे-कुचले समाज के स्वाभिमान थे और प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को "वर्ल्ड ट्राइबल डे" मनाने की परंपरा शुरू करने में उनका अहम योगदान रहा है। रामदयाल मुंडा भारत के एक प्रमुख बौद्धिक और सांस्कृतिक शख्सियत थे। ट्राइबल्स के अधिकारों की आवाज उन्होंने रांची, पटना और दिल्ली के साथ यूएनओ में उठाई। उन्होंने पूरी दुनिया के ट्राइबल समुदायों को संगठित किया और झारखंड के जमीनी सांस्कृतिक आंदोलनों को नेतृत्व दिया। 2007 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी का सम्मान मिला तो वर्ष 2010 में वह राज्यसभा के सदस्य भी बने , डॉ मुण्डा रांची विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। 30 सितंबर 1911 को कैंसर से उनका निधन हो गया।

वर्ष 2001 में उड़ीसा की प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता 'तुलसी मुण्डा' को पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।तुलसी मुण्डा ने ट्राईबल्स के बीच साक्षरता के प्रसार के लिए उल्लेखनीय कार्य किए । मुंडा ने उड़ीसा के खनन क्षेत्र में एक विद्यालय स्थापित कर सैकड़ों ट्राईबल्स बच्चों को शोषित दैनिक श्रमिक बनने से बचाया है। जबकि स्वयं उन्होंने इन खानों में मजदूर के रूप में काम किया । ' तुलसीपा' वंचितों के बीच साक्षरता फैलाने के लिए अपने मिशन के लिए जानी जाती हैं। विनोबा भावे से प्रभावित अविवाहित तुलसीपा का कर्मक्षेत्र लौह अयस्क खानों के लिए प्रसिद्ध जोड़ा से लगभग 7 किमी दूर सारंडा जंगल के आस पास है ।

भागलपुर के बांका जिला के बांसी गाँव में जन्में 'चीत्तु टुडू' को कला के क्षेत्र में वर्ष 1992 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया । टुडू बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे , साहित्यकार , नर्तक , गायक , वादक , समाज सुधारक औऱ इन सबसे बढ़कर एक महान इंसान । संथाली लोक गीतों का संग्रह 'जवांय धुती' उनकी महत्वपूर्ण कृति है । उन्होंने कई जीवनियों एवं नाटकों का अनुवाद संथाली में किया । टुडू नई दिल्ली स्थित नृत्य कला अकादमी के सदस्य भी रहे , इन्होंने अपने पैतृक गाँव में विद्यालय निर्माण हेतू दो एकड़ भूमि दान की ।

पद्मश्री की सूची वैसे नामों के बिना अधूरी है जिन्होंने गैर ट्राइबल होते हुए ट्राइबल हित में उल्लेखनीय कार्य किए यथा झारखण्ड के अशोक भगत , छत्तीसगढ़ के दामोदर गणेश बापट , मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के गांधी कहे जाने वाले महेश शर्मा, छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के धर्मपाल सैनी उर्फ ताऊजी, महाराष्ट्र के मराठी चित्रकार एवं कलाकार जिव्या सोमा मशे , वर्ष 2005 झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की पत्नी मीरा मुंडा द्बारा खरसावां में स्थापित अर्जुन आर्चरी अकादमी ज्वाइन कर अपना कैरियर प्रारम्भ करने वाली अन्तराष्ट्रीय तीरंदाज दीपिका कुमारी , ओडिशा से राज्यसभा सांसद व हॉकी खिलाड़ी दिलीप तिर्की एवं इग्नेस तिर्की , सुषमा स्वराज की किडनी ट्रांसप्लांट करने वाले सर्जन व ट्राईबल बहुल क्षेत्र सुंदरगढ़ ओड़िसा में जन्में डॉ मुकुट मिंज , 1963 में समाजसेवा के लिए सम्मानित देव जॉयल लकड़ा इत्यादि ।

पद्म भूषण सम्मान

देश में बहुमूल्य योगदान के लिये भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण है । पंद्रहवी लोकसभा के उपसभापति व आठो बार खूँटी से सांसद रहे 'कड़िया मुण्डा' को वर्ष 2019 में सार्वजनिक मामलों में उल्लेखनीय कार्य के लिए पद्मभूषण सम्मान प्रदान किया गया । लोकप्रिय सांसद मुण्डा जी तीन बार केन्द्र सरकार में मन्त्री भी रहे , 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार में भी इस्पात मंत्रालय में राज्य मन्त्री थे । झारखण्ड ही नहीं पूरे भारत की राजनीति में कड़िया मुण्डा जैसे सादगी पसन्द व ईमानदार नेता बिरले ही हैं । कड़िया मुण्डा झारखंड के पहले राजनेता हैं जिन्हें पद्म सम्मान प्राप्त हुआ है । इन्हीं की लोकसभा सीट से वर्तमान में अर्जुन मुण्डा सांसद चुने गए हैं ।

'खेल'

आईए कुछ खेल की बात करें , वर्ष 1903 में झारखण्ड के छोटानागपुर में जन्में जयपाल सिंह मुंडा हॉकी के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी थे , जिनकी कप्तानी में 1928 के ओलिंपिक में भारत ने पहला स्वर्ण पदक प्राप्त किया।मुण्डा ट्राइबल्स और झारखंड आंदोलन के एक सर्वोच्च नेता थे। वे एक जाने माने राजनीतिज्ञ, पत्रकार, लेखक, संपादक, शिक्षाविद् और ‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ का खिताब पाने वाले पहले ट्राइबल थे । इनके जीवन पर अश्विनी कुमार पंकज ने 'मरङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा' नामक पुस्तक लिखी । खेल के अलावा जयपाल सिंह मुंडा ने जिस ट्राइबल दर्शन और राजनीति को, झारखंड आंदोलन को अपने वक्तव्यों, सांगठनिक कौशल और रणनीतियों से राजनीति और समाज में स्थापित किया, वह भारतीय इतिहास और राजनीति में अप्रतिम है ।

झारखंड के सिमडेगा जिले के कसिरा बलियाजोर गांव की बेटी और भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान 'सुमराई टेटे' ध्यानचंद लाइफ टाइम अवार्ड पानेवाली देश की पहली महिला हॉकी खिलाड़ी हैं । सुमराई टेटे ने लगभग एक दशक तक भारतीय महिला हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व किया । वर्ष 2002 में टेटे की कप्तानी में भारतीय महिला हॉकी टीम ने मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण जीती थी । उनके नेतृत्व में भारतीय टीम ने कई अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट जीते । सुमराई ने भारतीय हॉकी टीम में सहायक प्रशक्षिक की भूमिका भी निभायी ।

झारखण्ड के सरायकेला खरसांवां जिले के राजनगर प्रखंड के पहाड़पुर गांव की मूल निवासी विनीता सोरेन दुनिया के सबसे ऊँचे पर्वत शिखर एवरेस्ट फतह करने वाली पहली ट्राइबल युवती है । इको एवरेस्ट स्प्रिंग 2012 अभियान के तहत विनीता अपने दो साथियों क्रमश: मेघलाल और राजेंद्र :के साथ 20 मार्च 2012 को जमशेदपुर से अभियान की शुरुआत की। 26 मई 2012 को सुबह 6 बजकर 50 मिनट पर विनीता ने एवरेस्ट के शिखर पर तिरंगा फहराया ।

मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में एक ट्राइबल किसान के परिवार में जन्मी 'एम सी मैरीकॉम' छह बार विश्व चैंपियनशिप जीतने वाली पहली भारतीय महिला हैं । मैरी कॉम ने सन् २००१ में प्रथम बार नेशनल वुमन्स बॉक्सिंग चैंपियनशिप जीती। उन्होंने 2019 के प्रेसिडेंसीयल कप इोंडोनेशिया में स्वर्ण पदक जीता।
बॉक्सिंग में देश का नाम रोशन करने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2003 में उन्हे अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया एवं वर्ष 2006 में उन्हे पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वर्ष 2009 में मैरी कॉम को भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार प्रदान किया गया । मैरीकॉम भारतीय ट्राईबल्स द्वारा निर्मित उत्पादों की बिक्री करने वाले 'ट्राइब्स इंडिया' की ब्रांड एंबेस्डर एवं राज्यसभा सांसद भी हैं।
 
भारतीय तीरंदाज कोमालिका बारी ने विश्व युवा तीरंदाजी चैंपियनशिप के रिकर्व कैडेट वर्ग के एक तरफा फाइनल में जापान की खिलाड़ी को हराकर स्वर्ण पदक हासिल किया। जमशेदपुर की टाटा तीरंदाजी अकादमी की कोमालिका अंडर-18 वर्ग में विश्व चैम्पियन बनने वाली भारत की दूसरी तीरंदाज बनीं।

ओड़िसा के सुंदरगढ़ जिले के उरांव परिवार में जन्में 'वीरेंद्र लकड़ा' ने 2012 में सम्पन्न लंदन ओलम्पिक में भारतीय हॉकी टीम में खेलकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया । इसके पहले वे चैंपियन ट्राफी , वर्ल्ड लीग , एशियन गेम्स में भी कई बार खेल चुके हैं ।

वहीं ओड़िसा की 'सुनीता लकड़ा'  भारतीय महिला हॉकी टीम की डिफेंडर के रूप में लोकप्रिय खिलाड़ी रही हैं ।सुनीता ने 2008 से टीम से जुड़ने के बाद 2018 की एशियाई चैम्पियंस ट्रोफी के दौरान भारत की कप्तानी की जिसमें टीम दूसरे स्थान पर रही थी। उन्होंने भारत के लिए 139 मैच खेले और वह 2014 के एशियाई खेलों की ब्रॉन्ज मेडल विजेता टीम का भी हिस्सा रहीं।

सरायकेला-खरसावा जिला अंतर्गत चाडिल के गांव पथराखून के बादलाडीह टोला में जहां मात्र 13 ट्राइबल परिवार रहते हैं। यहां की रहने वाली स्नातक प्रथम वर्ष की छात्रा ' सावित्री मुर्मू ' ने मात्र नौ महीने में देश के 29 राज्यों के अलावे भूटान और नेपाल का साइकिल से भ्रमण किया । यात्रा के दौरान सावित्री ने लोगों को आदर्श नागरिक समाज का निर्माण करने और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का संदेश दिया। सावित्री की यात्रा पटना एनआईटी घाट से 13 अक्टूबर 2017 को शुरु हुई और 14 जुलाई 2018 को समाप्त हई । यात्रा के दौरान 261 दिनों में उन्होंने कुल 14600 किलोमीटर की यात्रा साइकिल से पूर्ण की ।

'साहित्य'

पारसी सिञ्ज चांदो (संथाली भाषा के सूरज) ' पंडित रघुनाथ मुर्मू ' संथाली भाषा की लिपि ओल चिकी के जन्मदाता थे ।
गुरु गोमके के नाम से प्रसिद्ध पंडित रघुनाथ का जन्म 5 मई 1905 को ओडिशा के मयूरभंज ज़िले के डांडबूश गाँव में हुआ था। उन्होंने महसूस किया कि उनके समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपरा के साथ ही उनकी भाषा को बनाए रखने और बढ़ावा देने के लिए एक अलग लिपि की जरूरत है । इसलिए उन्होंने संथाली  लिखने के लिए ओल चिकी लिपि की खोज के काम को प्रारम्भ किया जो 1925 में पूर्ण हुआ। उपरोक्त लिपि का उपयोग करते हुए उन्होंने 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जैसे कि व्याकरण, उपन्यास, नाटक, कविता और सांताली में विषयों की एक विस्तृत श्रेणी को कवर किया, जिसमें सांलक समुदाय को सांस्कृतिक रूप से उन्नयन के लिए अपने व्यापक कार्यक्रम के एक हिस्से के रूप में ओल चिकी का उपयोग किया गया। "दरेज धन", "सिद्धु-कान्हू", "बिदु चंदन" और "खरगोश बीर" उनके कामों में से सबसे प्रशंसित हैं। बिहार , पश्चिम बंगाल और उड़ीसा सरकार के अलावा, उड़ीसा साहित्य अकादमी सहित कई अन्य संगठनों ने उन्हें सम्मानित किया, रांची विश्वविद्यालय द्वारा माननीय डी लिट की उपाधी से उन्हें सम्मानित किया गया। महान विचारक, दार्शनिक, लेखक और नाटककार ने 1 फरवरी 1982 को अपनी अंतिम सांस ली।

ओत् गुरु कोल लाको बोदरा हो भाषा के साहित्यकार थे। हो भाषा-साहित्य में ओत् गुरू कोल "लाको बोदरा" का वही स्थान है जो संताली भाषा में रघुनाथ मुर्मू का है। उन्होंने १९४० के दशक में हो भाषा के लिए ह्वारङ क्षिति नामक लिपि की खोज की व उसे प्रचलित किया।
उसके प्रचार-प्रसार के लिए ‘आदि संस्कृति एवं विज्ञान संस्थान’ (एटे:ए तुर्तुङ सुल्ल पीटिका अक्हड़ा) की स्थापना भी की। यह संस्थान आज भी हो भाषा-साहित्य,संस्कृति के विकास में संलग्न है। "ह्वारङ क्षिति" में उन्होंने ‘हो’ भाषा का एक वृहद् शब्दकोश भी तैयार किया जो अप्रकाशित है। झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम ज़िले के खुंटपानी ब्लॉक में स्थित पासेया गाँव में जन्में लाको बोदरा होमियोपैथी चिकित्सक भी थे । इन्होंने 29 जून 1986 को देह त्याग किया।

'वासवी किड़ो' की लेखनी ट्राईबल्स के प्रति आपका नजरिया बदलने के लिए पर्याप्त है । रमणिका गुप्ता द्वारा सम्पादित एवं किडो द्बारा लिखित पुस्तिका 'भारत की क्रांतिकारी आदिवासी औरतें' में इतिहास द्वारा तिरस्कृत व उपेक्षित वीरांगनाओं की ऐतिहासिक भूमिका को समझने की कोशिश की गयी है। ट्राईबल महिलाओं के शौर्य को तलाशती यह पुस्तिका जीवन मूल्यों को व्यापकता प्रदान करती हुई उल्लेखनीय भूमिका अदा कर रही है ।

रांची के लाल सिरम टोली में जन्मी 'एलिस एक्का' हिंदी की पहली ट्राइबल लेखिका हैं। उन्होंने पचास के दशक में हिंदी साहित्य में पर्दापण किया। सन् 1947 में शुरू हुई साप्ताहिक ‘आदिवासी में वह लिखती थी। ‘आदिवासी' के सभी अंक प्राप्य नहीं हैं , इसलिए उनकी सभी रचनाओं और उनके साहित्यिक अवदान से पाठक वर्ग अभी तक अपरिचित है। अब तक उनकी ये कहानियां प्राप्त हुई हैं-‘वनकन्या', ‘दुर्गी के बच्चे और एल्मा की कल्पनाएं', ‘सलगी, जुगनी और अंबा गाछ’ ‘कोयल की लाड़ली सुमरी', ‘पन्द्रह अगस्त, बिलचो और रामू’ और ‘धरती लहलहाएगी झालो नाचेगी गाएगी।' वनकन्या उनकी पहली प्राप्त रचना है जो ‘आदिवासी’ के अंक 17 अगस्त 1961, वर्ष-15, अंक 28-29 में छपी है। एलिस एक्का एक रचनाकार होने के साथ-साथ एक अनुवादिका भी थी। उन्होंने खलील जिब्रान के साहित्य का अनुवाद किया है जो ‘आदिवासी’ अंकों में प्रकाशित हुए हैं।

लेखिका ' ममांग दाई' अरुणाचल प्रदेश की पहली महिला थी, जिन्होंने आई.ए.एस. क्वालीफाई किया। इसके बावजूद ममांग दाई ने जर्नलिज़्म और लेखन चुना। उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स, द टेलीग्राफ और सेंटिनल समाचार पत्रों के साथ काम किया है और अरुणाचल प्रदेश यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स की प्रेसिडेंट भी रही हैं। इनके अन्य काम हैं 2003 की रिवर पोएम्स। इनकी किताब अरुणाचल प्रदेश: द हिडेन लैंड के लिए इन्हें वेरियर एलविं अवॉर्ड से भी नवाजा गया है। इनकी अन्य पुस्तकें हैं द स्काई क्वीन, स्टुपिड क्युपिड और माउंटेन हार्वेस्ट : द फूड ऑफ अरुणाचल प्रदेश।

नागालैंड की आओ ट्राइबल साहित्यकार ' तेमसुला आओ' वर्ष 2013 की साहित्य अकादमी अवार्ड विनर लेखिका है , उन्होंने अपने आओ नागा ट्राईबल्स के जीवन को कहानियों में ढाला है। एक कहानी में एक लड़की को लबुर्णम के फूल अपने बालों में पहनने की बहुत ख्वाहिश होती है। लेकिन जीते जी उसे वह फूल नसीब नहीं होता, इसलिए उसकी अंतिम इच्छा होती है कि मरने पर उसके कब्र पर ये फूल चढ़ाएं जाएँ ।

2008 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रथम रानी दुर्गावती राष्ट्रीय सम्मान और समय-समय पर अनेक क्षेत्रीय व राज्य स्तरीय पुरस्कारों-सम्मानों से सम्मानित
रोज केरकेट्टा खड़िया और हिन्दी की एक प्रमुख लेखिका, शिक्षाविद्, आंदोलनकारी और मानवाधिकारकर्मी हैं। सिमडेगा के कइसरा सुंदरा टोली गांव में जन्मी रोज केरकेट्टा झारखंड की आदि जिजीविषा और समाज के महत्वपूर्ण सवालों को सृजनशील अभिव्यक्ति देने के साथ ही जनांदोलनों को बौद्धिक नेतृत्व प्रदान करने तथा संघर्ष की हर राह में आप अग्रिम पंक्ति में रही हैं। ट्राइबल भाषा-साहित्य, संस्कृति और स्त्री सवालों पर डा. केरकेट्टा ने कई देशों की यात्राएं की है। इन्होंने प्रेमचंद की कहानियों का अनुवाद खड़िया मे किया है - ' प्रेमचंदाअ लुङकोय' , इसके अलावा इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं - खड़िया लोक कथाओं का साहित्यिक और सांस्कृतिक अध्ययन (शोध ग्रंथ), सिंकोय सुलोओ (खड़िया कहानी संग्रह), हेपड़ अवकडिञ बेर (खड़िया कविता एवं लोक कथा संग्रह), पगहा जोरी-जोरी रे घाटो (हिंदी कहानी संग्रह), सेंभो रो डकई (खड़िया लोकगाथा) खड़िया विश्वास के मंत्र (संपादित), अबसिब मुरडअ (खड़िया कविता संग्रह) और स्त्री महागाथा की महज एक पंक्ति (वैचारिक निबंधों का संग्रह)

झारखंड के साहित्यिक-सांस्कृतिक मोर्चे पर सक्रिय ' वंदना टेटे' लगातार लहूलुहान की जा रही ट्राइबल अस्मिता के पक्ष में एक मज़बूत आवाज़ बनकर उभरी हैं। उनकी मुख्य कृतियाँ हैं पुरखा लड़ाके , किसका राज है , झारखंड एक अंतहीन समरगाथा , असुर सिरिंग, पुरखा झारखंडी साहित्यकार और नये साक्षात्कार , आदिम राग , आदिवासी साहित्यः परंपरा और प्रयोजन , आदिवासी दर्शन कथाएँ । इनके उल्लेखनीय आदिवासी पत्रकारिता के लिए झारखंड सरकार का राज्य सम्मान 2012 एवं संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 2013 में सीनियर फेलोशिप प्रदान किया गया । वहीं 2019 में वंदना को राँची में  शैलप्रिया स्मृति सम्मान प्रदान किया गया ।

झारखण्ड के दुमका के दुधानी कुरुवा गांव में जन्मी ' निर्मला पुतुल' हिंदी कविता में एक परिचित ट्राइबल नाम है। इनकी प्रमुख कृतियों में ‘नगाड़े की तरह बजते शब्द’ और ‘अपने घर की तलाश में’ हैं। इनकी कविताओं का अनुवाद अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, उड़िया, कन्नड़, नागपुरी, पंजाबी, नेपाली में हो चुका है। अनेक राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय सम्मान हासिल कर चुकी निर्मला अपनी गाँव की निर्वाचित मुखिया भी है।

नीलगिरि के पहाड़ों पर रहने वाली इरुला आदिवासी समुदाय की ' सीता रत्नमाला' की अंग्रेजी में लिखी हुई भारत की पहली ट्राइबल आत्मकथा ‘बियोंड द जंगल’ की हिंदी प्रस्तुति है जँगल से आगे । इसका मूल अंग्रेजी संस्करण भारत में प्राप्य नहीं है और अब यह दुर्लभ है। ट्राइबल दृष्टि और अनुभवों से लिखा गया यह आत्मसंस्मरण कई मायने में पाठकों का ध्यान खींचता है। अद्भुत कथा, मार्मिक और दिल को छू लेने वाली घटनाएं, कहने की बहुत ही सरल लेकिन जानदार शैली वाली इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद सुपरिचित अश्विनी कुमार पंकज ने किया है, जो आदिवासी अध्ययन के लिए जाने जाते हैं।

साहित्य सृजन में कई ट्राइबल नाम राष्ट्रीय क्षितिज पर अंकित हैं यथा- वाहरू सोनवणे, मोतीरावण कंगाली, वाल्‍टर भेंगरा 'तरुण', शांति खलखो, अनुज लुगुन आदि। वहीं कई ऐसे नाम हैं जिनका जीवन चरित्र अलिखित या अधूरा लिखा ही रह गया यथा मुंडारी के प्रथम लेखक-उपन्यासकार ' मेनस ओड़ेया हों' , संथाली  कवि पाउल जुझार सोरेन, धर्मग्रंथ धरमपुथी के रचयिता रामदास टुडू,  नागपुरी के ' धनीराम बक्शी ' , पाकुड़ के संथाली गोरा चाँद टुडू ,हिंदी के विमर्शकार हेरॉल्ड एस. तोपनो, ट्राइबल इन्साइक्लोपीडिया महली लिविन्स तिरकी, आदिवासी महासभा के मुखपत्र आदिवासी के संपादक जूलियस तीगा ।

 ट्राइबल साहित्यकारों की सूची में अन्य लोकप्रिय नाम हैं कवयित्री और संपादक ' सुशीला सामद हों, प्यारा केरकेट्टा, कानूराम देवगम, आयता उरांव, ममांग दई, बलदेव मुंडा, दुलाय चंद्र मुंडा, पीटर पॉल एक्का, हरिराम मीणा, महादेव टोप्पो, ग्रेस कुजूर, उज्ज्वला ज्योति तिग्गा, काजल डेमटा, सुनील कुमार 'सुमन', केदार प्रसाद मीणा, जोराम यालाम नाबाम, सुनील मिंज, ग्लैडसन डुंगडुंग, रूपलाल बेदिया, गंगा सहाय मीणा, ज्योति लकड़ा, नीतिशा खालखो, अनु सुमन बड़ा, हीरा मीणा, अरुण कुमार उरांव, जसिंता केरकेट्टा, ज्योति लकड़ा , श्रृष्टि किंडों , बन्नाराम माणतवाल, राजस्थान के पूर्व डीआइजी हरि राम मीणा , रानी मुर्मू ।

हाल ही मे झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखाड़ा ने ट्राइबल साहित्य की विभिन्न शाखाओं में लेखन कार्यो में सक्रिय प्रतिभाओं को पुरस्कृत किया । असुर साहित्य के लिए मेलन असुर व संपति असुर , हो साहित्य के लिए कमल लोचन कोड़ाह व दमयंती सिंकु, खड़िया साहित्य के लिए विश्राम टेटे व प्रतिमा कुल्लू, खोरठा साहित्य के लिए डॉ. नागेश्वर महतो व पंचम महतो , कुड़मालि साहित्य के लिए भगवान दास महतो व सुनील महतो, कुड़ुख साहित्य के लिए अघनु उराव व फ्रासिस्का कुजूर
, मुंडारी साहित्य के लिए मंगल सिंह मुंडा व तनुजा मुंडा
, नागपुरी साहित्य के लिए डॉ. वीपी केशरी व डॉ. कुमारी बासंती, पंचपरगनिया साहित्य के लिए प्रो. परमानंद महतो व विपिन बिहारी मुखी, संताली साहित्य के लिए चुंडा सोरेन 'सिपाही' व सुंदर मनोज हेम्ब्रम।

'शिक्षा'

शैक्षणिक संस्थानो में कई महत्वपूर्ण पदों पर ट्राइबल समुदाय सुशोभित हो रहा है । श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्व विद्यालय रांची के उप कुलपति रांची यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. सत्यनारायण मुंडा हैं । वहीं मध्यप्रदेश के अमरकंटक में अवस्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के उप कुलपति प्रो टी व्ही कट्टीमणी रह चुके हैं । रांची विश्वविद्यालय में डॉ. करमा उरांव जनजातीय क्षेत्रीय भाषा विभाग के एचओडी तथा सोशल साइंस के डीन रह चुके हैं तो जमशेदपुर के कॉपरेटिव कॉलेज के प्राध्यापक जीतराई हांसदा हैं। वर्ष 2016 में आदिवासी संघर्ष मोर्चा ने राँची में कई शिक्षाविदों को सम्मानित भी किया था - बेड़ो कॉलेज के प्राचार्य गुनी उरांव, लापुंग कॉलेज के प्राचार्य बिरसो उरांव, संत पॉल उवि की प्रिंसिपल उषा लकड़ा, पूर्व प्राचार्य ज्योत्सना कुजूर, आशिड़ किड़ो, प्रो. अजय बाखला, अशिसन तिड़ु, अनिता हेम्ब्रम ।

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ की अध्यक्ष प्रोफेसर सोना झरिया हैं , वहीं सी के तिर्की, योजना आयोग के पूर्व सदस्य हैं । भारत सरकार के भू वैज्ञानिक डॉक्टर अशोक बक्सला, वकील निकोलस बारला, समाज वैज्ञानिक डॉक्टर ए बेंजामिन, शोधार्थी डॉक्टर विसेंट एक्का जैसे लोग ट्राइबल समुदाय में शिक्षा की अलख जलाए हुए हैं ।

शिक्षा के क्षेत्रो में योगदान की कहानी एक नन ट्राइबल के बिना पूरी नहीं की जा सकती , वो थे दिल्ली विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. प्रभुदत्त खेड़ा । छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के घने जंगलों के बीच मौजूद लमनी गांव में डॉ खेड़ा तीस साल तक कुटिया बनाकर रहे और ट्राईबल्स के बीच रहकर शिक्षा का उजियारा फैलाते रहे ।

राजस्थान के बांसवाड़ा में गोविंद गुरु जनजातीय यूनिवर्सिटी का संचालन हो रहा है, जहाँ हर साल कई ट्राइबल उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं ।

यह जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि अमेरिका में 32 ट्राइबल कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी हैं , जिनमें 358 तरह के एप्रेण्टिस , डिप्लोमा , सर्टिफिकेट व डिग्री प्रोग्राम चल रहे हैं और लगभग तीस हजार छात्र पढ़ रहे हैं । ये संस्थान कोलर्डो स्थितअमेरिकन इण्डियन कॉलेज फण्ड के अन्तर्गत संचालित होते हैं ।

'पत्रकारिता'

झारखंड की दयामणि बारला एक लोकप्रिय पत्रकार एवं कार्यकर्ता हैं। ट्राईबल्स के अधिकारों के लिए लड़ने वाली सामाजिक कार्यकर्ता दयामणि बारला को एलेन एल लुज अवार्ड से सम्मानित किया गया। न्यूयार्क की मैसाच्युसेट्स के एक एनजीओ ने इस अवार्ड के तहत तहत दयामणि को 10,000 डॉलर दिए। उनको वर्ष 2000 में ग्रामीण पत्रकारिता के क्षेत्र में काउंटर मीडिया अवार्ड भी प्राप्त हुआ था।

हालाँकि इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि देश के मीडिया में ट्राइबल पत्रकारों की स्थिति और उपस्थिति न के बराबर है और यही कारण है कि ट्राइबल्स की मूल संस्कृति, संस्कार, समस्याएं देश और विश्व के पटल पर नहीं आ पातीं ।

' पुलिस , पारा मिलट्री एवं सेना'

पुलिस , पारा मिलट्री एवं सेना में लाखों की संख्या में ट्राइबल जवान मिलेंगे । झारखंड के गुमला जिला के डुमरी ब्लाक के जरी गांव में जन्में लांस नायक अलबर्ट एक्का पहले ट्राइबल सैनिक थे जो भारत-पाकिस्तान युद्ध में 3 दिसम्बर1971 को हिली की लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हो गए एवं इन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

' स्वतंत्रता संग्राम'

भारत का स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास कई अनकही अनपढ़ी या आधी अधूरी कहानियों से भरा पड़ा है , जिसमें कई नायकों के नाम छुपे पड़े हैं । ऐसे ही कुछ नायक ट्राइबल समुदाय से हुए जिनके किस्सों को इस आलेख में समेटना मुश्किल है , उसके लिए केवल उनके जीवन चरित्र पर एक पुस्तक लिखी जा सकती है । जैसे झारखण्ड में धरती आबा बिरसा मुण्डा , सिद्धू और कान्हू मुर्मू , चांद, भैरव, उनकी बहन फूलो और झानो मुर्मू , टाना भगत , तिलका माझी , सिंदराय और बिंदराय मानकी, गंगानारायण सिंह ,लुबिया मांझी, बैस मांझी और अर्जुन मांझी , पीताम्बर साही और नीलाम्बर साही , जतरा भागत, बुधू भगत , तेलंगा खड़िया, छतीसगढ़ के गुंडाधुर , हीरासिंह देव उर्फ कंगला माझी, वीर नारायण सिंह, महाराष्ट्र के भीमा नायक , नागालैंड की रानी  गाइदिन्ल्यू, चेन्नै के अल्लुरी सीतारमण राजू, ओड़िसा के राजा सुरेन्द्र साए, हैदराबाद निजाम
विरुद्ध संघर्ष करने वाले गोंड ट्राइबल कुमराम भीम ।

आजाद भारत में भी विभिन्न मुद्दों पर समय समय पर ट्राइबल आन्दोलनकारी मुखर होते रहे हैं जैसे छत्तीसगढ़ के फेटल सिँह खरवार और कूच नाम विवादों के साये में रहे जैसे झारखण्ड में के सी हेम्ब्रम ।

' राजनीति'

राजनीति और ट्राइबल्स यह टॉपिक इतना वृहत हैं कि इस पर काफी लम्बी चर्चा हो सकती है , मेरी समझ से इस शीर्षक पर एक अलग आर्टिकल लिखने की आवश्यकता है । परन्तु कुछ नामों की चर्चा किए बिना आजके आर्टिकल क़ा समापन करने का जी नहीं कर रहा । जिनमें झारखण्ड आन्दोलन के महानायक दिशोम गुरु शिबू सोरेन , भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय में केंद्रीय मन्त्री अर्जुन मुण्डा , झारखण्ड के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन , केन्द्रीय इस्पात राज्यमंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते , पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पी ए संगमा , निर्दलीय मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा, लोहरदगा से तीन बार सांसद सुमति उरांव। लोकसभा में अनुसूचित जनजाति के लिए कुल 545 सीटों में से 47 सीट आरक्षित हैं वहीं झारखण्ड में 81 सीटों में 28 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं ।

ट्राइबल्स के महान गुणों को एक पंक्ति में समेटते हुए आस्ट्रेलिया की दार्शनिक कैथ वाकर लिखती हैं कि 'आपकी धरती, जहां आप रहते हैं और आपका समुदाय, जिसके साथ आप रहते हैं, आपसे पहले है - यही आदिवासियत है ।'