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#केवल सत्य बोलने को या झूठ न बोलने को ही
सत्यधर्म कहा जाना चाहिए ? .........नहीं।
-तो फिर?
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भाई, सत्य वचन तो बोलना ही चाहिए,
पर उत्तम सत्यधर्म का सत्य बोलने या झूठ
न बोलने से कोई संबंध नहीं है, केवल वाणी
से सत्य उच्चारण सत्यधर्म की संज्ञा नहीं पा
जाता|

#सत्य की खोज---
(वस्तु, ज्ञान और वाणी की सत्ता में)
-उदाहरण- कोई वस्तु हम कहीं सुरक्षित
रखकर भूल गए हैं, और उसपर हम कह
रहे हैं वो वस्तु खो गई।
तो यहाँ-

वस्तु- वस्तु की सत्ता तो हमेशा सत् ही होती है।
(अर्थात अगर कोई वस्तु है तो उसकी कोई
सत्ता तो होगी ही ना)

ज्ञान- वह हमारे ज्ञान के अभाव के कारण मिल
नहीं रही तो यह हमारे ज्ञान का दोष हुआ ना।

वाणी- हम बोल रहे हैं कि वह वस्तु खो गयी
तो वस्तु खोई तो नहीं है, हम ही उसे रखकर
भूल गए हैं, तो यह वचन भी असत्य हुआ ना।

अर्थात असत्य या तो ज्ञान में होता है
या वाणी में; वस्तु में नहीं होता।
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अतः जहाँ गलती हो वहाँ सुधार किया जाना चाहिए,
जैसे यहाँ वस्तु को नहीं उसके ज्ञान को खोजने की आवश्यकता है।
(जब दाग चहरे पर लगा है तो दर्पण को साफ करने से क्या होगा)

"उत्तम सत्य"
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