Image

आत्ममंथन

...................


इंसान की एक स्तिथि पत्ती जैसी होती है। पानी की बूँदें जब  पत्तियों पर रुकती हैं। पत्तियों की सुंदरता उनकी चमक से कई गुना बढ़ जाती है।लेकिन ये भी एक सच्चाई है कि पत्ती उसे  कुछ पल बाद अपनी चिकनाहट से फिसला के नीचे गिरा देती है। और फिर से उसी तरह नई नई बूंदों का स्वागत करती है। पत्ती को पता ही नही चलता कि बरसात कब चली गई और बूंदों ने कब आना ही बंद कर दिया। ऐसे में केवल जड़ों में समाहित जल ही उसका साथ देता है।


इंसान का व्यक्तित्त्व भी इसी पत्ती की तरह ही है वो रोज़ नए नए साथी के पीछे भागता रहता है।  वो भूल जाता है कि जीवन के रिश्ते किसी अपने के साथ ही चलते हैं। फिर चाहे उस रिश्ते में ताजग़ी अभी भी हो या न हो। भले ही हमारा रिश्ता थोड़ा उबाऊ हो गया हो लेकिन याद रहे, काम हमेशा अपने ही आएंगें।

इसलिए अपनों की कद्र करो और नई दुनिया की चमक के पीछे भागना बंद करो।


कुछ लोग कहेंगे कि हम उन पत्तियों में से नहीं है। फिर भी इसके विपरीत लोगों को हमारी क़द्र नहीं है। ये दूसरी परिस्थिति होती है। तो उनके लिए कहना है कि क्या आपने कभी धूप में चमकता हुआ पत्थर देखा है।

धूप में पत्थर खूब चमकता है लेकिन एक निश्चित समय बाद धूप अपनी सुविधानुसार अपना रुख बदल कर उसको छोड़ के चली जाती है। और पत्थर फिर अगले दिन उसी जगह पर उसी धूप का इंतज़ार करता रहता है। पत्थर के इसी वविश्वास,लगाव और समर्पण को देखते हुए रोज़ वही धूप उस पत्थर पर आने को विवश हो जाती है। इसलिए हमेशा रिश्तों में वविश्वास, लगाव और समर्पण रखिए। रिश्ता कभी आपसे दूर हो ही नही सकता।


और एक तीसरी स्तिथि ये भी होती है कि सब कुछ करने के बाद भी कोई हल नहीं निकलता और  लोग अपनी जरूरत के अनुरूप आपका प्रयोग करते हैं।

ऐसे में आप अपने आपको प्रयोगशाला न बनाएं। उनसे दूर होना ही आपके लिए समझदारी है। उनसे दूर हो जाएं और अपने जीवन को एक ऐसी ऊंचाई दें जहाँ पहुँचना लोगों का सपना बन जाए। और तब आप ये तय करें कि आपको अपने जीवन में किसे जगह देनी है और किसे नहीं।


😊सिद्धी दिवाकर बाजपेयी😊