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साहित्य समाज का दर्पण होता है। किसी भी कालखण्ड की सामाजिक व्यवस्था, रीति-रिवाजों, तत्कालीन स्थितियों और परिस्थितियां  उस समय के साहित्य में स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित होती हैं।
ऐसा साहित्य जो राजाओं-महाराजाओं के संरक्षण के स्थान पर सामान्य लोगों के द्वारा सृजित किया गया हो वही वास्तविक सामाजिक व्यवस्था की सटीक जानकारी देता है।हर काल की तरह वर्तमान समय में साहित्यकार पूर्ववर्ती साहित्य का अध्ययन करते हैं। पूर्वकालीन साहित्य से प्राप्त जानकारी और अनुभव के आधुनिक परिस्थितियों का अवलोकन करते हुए दोनों समयों की घटनाओं का सम्मिश्रण प्रस्तुत कर प्राचीन और आधुनिक समय की विचारधाराओं में समानता के साथ-साथ परिवर्तित नवीनतम अवधारणाओं को भी प्रदर्शित करते हैं।यह प्रस्तुतीकरण समाज को उसकी  अपनी मूलभूत संस्कृति से जोड़े रखते हुए नवाचार के माध्यम से उत्तरोत्तर विकास को गति प्रदान करता है।निशिथ एस. पारिख की कृति " साइनबोर्ड ऐट धोलावीरा "ऐसा ही एक उत्कृष्ट साहित्यिक प्रस्तुतीकरण है।यह महाभारत के समय को आधुनिक समय के साथ हमें बड़ी ही सुंदरता से जोड़े रहती है।
कुछ क्षेत्रों में पाए जाने वाले कुछ स्थल हमें हमारे प्राचीन गौरव से जोड़े रहते हैं।यह जुड़ाव पीढ़ी दर पीढ़ी बना रहे इसलिए कुछ परंपराओं के निर्वहन का निश्चित समयावधि के अंतराल पर किया जाता है। भगवान विष्णु के परशुराम के अवतार को उत्तर प्रदेश राज्य के शाहजहांपुर जिले के कस्बे जलालाबाद को परशुरामपुरी के रूप में सामाजिक मान्यता प्राप्त है। प्रशासनिक स्तर पर यह तहसील स्तर का तेजी से विकसित होता हुआ एक अति महत्त्वपूर्ण कस्बा है। भगवान परशुराम का मंदिर इस क्षेत्र का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। विविध तीर्थ स्थलों की भांति दूरदराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु धार्मिक भ्रमण के लिए आते हैं। लोगों की मान्यता है कि यहां श्रद्धा भाव से प्रार्थना -उपासना करने के साथ लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। इन मनोकामनाओं के पूर्ण होने पर श्रद्धालु अपने इष्टदेव के प्रति आभार व्यक्त करने हेतु मनोकामना पूरी होने के बाद कम से कम एक बार फिर आते हैं। भगवान परशुराम के  मंदिर के साथ ही एक पवित्र तालाब है जिसे राम ताल कहा जाता है। मंदिर के प्रांगण में विविध धार्मिक अनुष्ठान पूरे वर्ष अनवरत पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ चलते रहते हैं। दशहरे के शुभ अवसर पर रामलीला आयोजित की जाती है अपनी एक विशेषता रखने के कारण रामलीला के दर्शनार्थ आसपास के क्षेत्रों से भारी भीड़ उमड़ती है।
परशुराम जी के मंदिर से दूर उनके पिता ऋषि जमदग्नि का मंदिर यहां स्थित है। प्रतिवर्ष वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को इस मंदिर क्षेत्र में मेला लगता है जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं । शाहजहांपुर जनपद का यह तीर्थ स्थल अपने घर में आस्था का केंद्र होने के कारण एक उत्कृष्ट पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो रहा है। प्रशासनिक रूप से राज्य सरकार की इस पर्यटन स्थल को विकसित करने में अपना सहयोग दे रही है। प्राचीन महत्व के ऐसे पर्यटन और तीर्थ स्थल हमारी सनातन भारतीय संस्कृति के दृढ़ स्तंभ हैं। ऐसे सभी पर्यटन स्थल हमारे देश के धार्मिक सांस्कृतिक और आर्थिक विकास केंद्र के रूप में विकसित होकर समाज में जागरूकता समरसता अपनी संस्कृति और देश से प्रेम करने के लिए जनमानस को प्रेरित करते हैं। इनका अपना विशिष्ट पौराणिक महत्व है।आधुनिक समय में लोगों के सामाजिक ,सांस्कृतिक एवं आर्थिक विकास के ऐसे केंद्र-बिंदु सामाजिक व्यवस्था को शक्तिशाली बनाकर गतिशील बनाए रखते हैं।ऐसे तीर्थ स्थलों का भारतीय संस्कृति को जीवन्त बनाने एवं उसके रक्षण- पोषण में अपनी महत्वपूर्ण योगदान है।