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           यदि नितांत सत्य कहा जाय तो रिक्तिता लोगों का वास्तविक जीवन त्रुटियाँ, असुरक्षा की भावना और आशंकाओं से प्रारम्भ होता है और संसार सागर में इन्हीं लहरों के थपेडे खा - खाकर जीवन आखिरी दहलीज पर पहुँच जाता है I लोग अपूर्णता लिए जन्म लेते हैं और यही अधूरापन ही लोगों को वास्तविकता का अनुभव प्रदान और अन्तर्व्दन्व्द का सृजन करता है Iजैसे अक्सर यह महसूस होता है कि हमें किसी चीज की जरूरत है,पर यह क्या ? कुछ कहा नहीं जा सकता, एक अधूरापन सालता रहता है Iनियति निर्धारित यह कमी को मानव द्वारा स्वीकार करने और जीने का जज्बा बना लेने के बावजूद भी उसको अपनी जीवनयात्रा के हर क्षण ठोंकरें खानी पडती हैI कहावत है कि मौत की पीडा तो केवल लोगों में भय उपजाने के हेतु होता है, पर असली पीडा तो मानव जीवन के अधूरेपन से भरी पगडंडी से होता है I अधूरेपन की हकीकत ,शब्दों के सूनेपन की विदीर्णता से पोषित होता है पर यह उत्कंठा के साथ जीवन को सिंचित करता है,यह मानव के लिए एक प्रेरक का काम करता है , मानव इस खालीपन को भरने हेतु अपने काम की ओर झुकता है जैसे रासायनिक तत्व अपने स्वभाव के अधूरेपन के कारण एक दूसरे से विभिन्न प्रकार के संयोंगो से रासायनिक क्रियायें करते हैं जैसे दाता और ग्राही उर्जा अंतरण के रूप में (वैद्युत संयोजकता) अथवा परस्पर ऊर्जा साझा करके (सहसंयोजकता) I अगर जीवन में कमी न हो तो जीवन का अंत सा प्रतीत होने लगता है जिस प्रकार रासायनिक तत्व में ऊर्जा की संतृप्तता होने से वे निष्क्रिय हो जाते है I हम कह सकते हैं कि अधूरापन क्रियाशीलता का सबसे बडा भंडार होता है, साथ ही साथ जब भी कोई घटना मानव जीवन में असंतुलन लाती है तो वह इसे संतुलन की दिशा की ओर लाने का प्रयास करता है I जीवन उस बीज के ससान है जिसे पंच तत्व संपूर्णता में गढ्ने का प्रयास करते हैं पर होता नहीं है जिसके कारण वह विभिन्न आकारों में अंकुरित होता है Iयही अधूरापन,जीवन की निरन्तरता का अहसास कराता है यह जीवन का ईंधन है और पूर्णता मृत्यु का द्योतक है और यह कई तहों के मानव चरित्र का निर्माण भी करती है, जैसे अपूर्णता जीवन की सच्चाई है,पूर्णता मिथक है I ठीक उसी तरह जैसे आधा दिन और आधी रात मिलकर मानव के अधूरेपन की वास्तविकता का अहसास कराते हैं हर सांसारिक सम्बन्ध में एक खालीपन है , यह अभिशाप नहीं ,प्रेरणा है Iकभी यह अपने में कई उत्तर समाहित करता है जैसे ऐसा क्यूँ लगता है, हमारे पास धन है पर मन की शांति नही होती ; शान शौकत है पर स्वास्थ्य नहीं होता ; सफलता मिलती है पर मन में खुशी नहीं होती I इसमें मुख्य बात यह है कि जिन्दगी का अधूरेपन का अपना एक अर्थ है। जैसे अपरिपक्व प्रेम ही उसकी परिपक्वता है और इसी भ्रमजाल में लिप्त रहना ही प्रेम का संजीवन है I उसकी इस अर्थ को समझने के लिए आवश्यक है कि हमने अर्थवत्ता की जो परिभाषा बनी हुई है,उसमें थोडा सा सुधार कर लिया जाय, कहने का मतलब यह है कि हमें अपने सपनों के पर समेटने की कोशिश कर लेने चाहिए।