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बादल सरकार की रंगचेतना और 'पगला घोड़ा'




                                भारतीय भाषाओँ में बांग्ला रंग-समृद्धि के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण भाषा है बांगला भाषा में योगेन्द्र चन्द्रगुप्तदीनबंधु मिश्ररवीन्द्रनाथ टैगोर आदि प्रसिद्ध नाटककार हुए इन्होने मुख्यतः सामाजिक ऐतिहासिक एवं काव्यात्मक प्रतीकात्मक नाटकों की सृष्टि की है |बदल सरकार ने रंगमंच पर रंग-संकेतों और नाटकों के माध्यम से जीवन को चित्रित किया है |बदल सरकार ने अपनी रचनाओं में समाज और व्यक्ति की परिस्थिति को सरलता सेपात्रों के माध्यम से मंचित करने के लिए अति सामान्य साधनों का प्रयोग करतेहैं वे पार्श्व संगीत प्रकाश व्यवस्था मंच उपकरण और वेशभूषा आदि का भी बखूबी प्रयोग अपनी रचनात्मकता को मूर्तता प्रदान करने के लिए करते है इन सभी के माध्यम से वे अपने नाटकों के लिए रंगभाषा का निर्माण करते हैं |


गौरतलब है कि बादल सरकार ने परम्परागत रुढ़िग्रस्त उपकरणों को त्यागते हुए नवीन उपकरणों की सहायता से नाटक लिखे है नाट्यशास्त्र में उल्लेखित रंगमंचीय वर्जनाओं को तोड़ते हुए दर्शकों से सीधा संवाद स्थापित करने की सफल कोशिश करते हैं नई राह तलाशते हुए वे कम खर्चीले रंगमंच (तीसरा रंगमंचकी भी परिकल्पना करते हैं और नाटक को आम आदमी तक पहुँचाने का कार्य करते हैं बकौल जयदेव तनेजा तीसरा रंगमंच- शहरी आभिजात्य एवं देहाती लोक रंगमंच के संश्लेष से जन्म लेता है | रंगकर्म को वस्तु ,रंगकर्मी को विक्रेता तथा दर्शक को खरीदार उपभोक्ता बनने से रोकता है टिकट -बिक्री का विरोधी है रंगकर्म को 'कला कला केलिएशुद्ध सौंदर्यवादी प्रदर्शन या व्यवसाय बनाने के बजाय कला को जीवन एवंसमाज को बेहतर और जागरूक बनाने का माध्यम समझता है |[1] बादल सरकार ने नाटकों का प्रणयन करने के क्रम में नाटकों को दृश्यों और अंको में नियोजित ढंग से बाँटने काल को एक क्रम में सजाने ,स्पेस कीसीमाओं को बाँधने आदि के यांत्रिक नियमों से खुद को अलगाते हैं उनका कहना है मैंने मंच को एक ही साथ विभिन्न काल और स्थान के लिए प्रयोग किया साथ ही मेरा आग्रह समूह अभिनय मूकाभिनयछंदमय गतिगीत और नृत्य परज्यादा रहा और इस प्रकार 'भाषाके महत्त्व को हम काफी हद तक कम कर सके सेट आदि इतने साधारण थे कि उन्हें कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता था |"[2]


बादल सरकार की खासियत यह रही है कि पात्र के माध्यम से ही समाज के कड़वेसत्य को उद्घाटित करते हैं जीवन के यथार्थ को दर्शकों के सम्मुख लाने के लिए वे पात्र के मुख से ही जीवन के सार को भी व्यक्त करते हैं उनका मानना था कि नाटक एक जीवंत प्रस्तुति है वह स्वाभाविक रूप से मनुष्य पर ज्यादा निर्भर करता है तो अभिनेता और दर्शक भी है इसी से उसे इस बात का भी गहरा एहसास होता है कि रंगमंच की कला का मूलभूत उपकरण मनुष्य का शरीर हीहै प्रकृतिवादी रंगमंच से बेहतर उसके इन एहसासों को एक नया आधार मिला |"[3] बादल सरकार रंगमंच को जनता के लिए सहज बनाना चाहते थे ,जिसके लिए नाटक का मंचन सामान्य करना आवश्यक था बादल सरकार ने प्रश्न उठाया है कि रंगमंच के लिए उपकरणों की क्या आवश्यकता है मंचन के लिए साधारण मंच भी सफल अभिनय से प्रभावी बन जाता है गौरतलब है कि बादल सरकार के नाटकों के संवादों में नैरेशन होता है प्रश्न होते हैं अभिनेता से अभिनेता के संवाद हैं तो वहीँ समूह में संवादों को दोहराने की प्रक्रिया भी है |

                                  

           बात जब हम 'पगला घोड़ाकी करते है तो यह नाटक स्त्री-विमर्श के इस दौर  में पुनर्व्याख्या की भी मांग करता है जहाँ चारों स्त्री पात्र अपनी अतिभावुकता असफल प्रेम और सामजिक छद्म का शिकार हो मृत्यु का वरण कर लेती हैं पुरुष के छद्म प्रेमबनावटी सामजिक मर्यादा और पुरुषवादी मानसिकता किस तरह स्त्री मन का शिकार का करती है उसे यहाँ पर सहज देखा जाताहै ख़ामोशी जो एक चीख बनकर पाठक और दर्शक का ह्रदय झकझोर देती है जहाँ तक रंगशिल्प की बात है इस पूरे नाटक में एक ही दृश्यबंध है |  सभी स्त्री चरित्रों की मूलभूत समानता और विडम्बना दिखाने के लिए नाटककार ने एक ही अभिनेत्री द्वारा विभिन्न नारी चरित्रों के अभिनय की परिकल्पना की है,जिसका प्रयोग आगे चलकर मुद्राराक्षस .विजय तेंदुलकर और मोहन राकेश भी करते हैं वे नाटक के सन्देश को भाषित करने के लिए एक निर्जन गाँव के शमशान ,जिसके पास एक कोठरी जिसमें मुर्दा जलाने वाले रुकते हैं ,का चयन करते हैं |इसी केअनुरूप मंच का सयोजन करते हैं मंच को दो भागो में विभाजित किया गया है ,जिसमे दाहिनी ओर की जगह कोठरी के बाहर का है जहाँ दूर जलती हुई चिता है |रात का समय है और कमरे में पेट्रोमेक्स जल रहा है खिड़की खुली हुई है दरवाजे के पीछे दूर कहीं आग जलने का आभास मिलता है ,उसकी लाल रौशनी रह-रह कर नाच उठती है कोठरी के पीछे की ओर एकदम अँधेरा है मंच पर पर्दा खुलने पर कोठरी में चार आदमी सातूकार्तिकहिमाद्रीशशि बैठे 'ट्वेंटी नाइन खेल रहे हैं दो चौंकी पर बैठे हैं दो स्टूल पर खेल 'एक हाथपूरा होने के बाद उनके बीच बातचीत शुरू होती है यहीं से बदल सरकार के रंगशिल्प की चेतना का निदर्शन होने लगता है |

चिता जलाने आए चारों आदमियों की बातचीत शुरू होती है और "अचानक अन्धकार भेदकर लड़की की हँसी सुनायी पड़ती है कमरे के बाहर का अँधेरा हिस्सा आलोकित हो उठता है लड़की के बाल खुले हैंआँचल कमर में बंधा है वह हँसे ही जारही है कमरे की रौशनी बुझ गई हैतीनों छाया जैसे दिख रहे हैं वे तीनों स्थिर हैंउनमें से किसी ने लड़की की हँसी नहीं सुनी है |"[4] लड़की जलती चिता से उठकर आती है वह मुर्दा जलाने आए चारों पुरुषों को छेड़कर उनके अवचेतन में दबी-घुटी उनकी दमित इच्छाओं और जीवन के प्रेम-प्रसंगों को याद करने के लिए उकसाती है यहाँ तक बादल सरकार ने मंच को बहुत ही सामान्य रखा है वे जीवन के शाश्वत सत्य मृत्यु जैसे प्रसंग से नाटक का प्रारम्भ करते हैं यह एक प्रकार से उनकी गहरी प्रयुक्तात्मक नजरिए का परिणाम है और वे इस नाटक के द्वारा समाज में व्याप्त हताशानिराशाकुंठा आदि को दर्शाने का प्रयास करते हैं वे मानव जीवन में प्रेम के आभाव के पक्ष को सामने लाने का प्रयत्न करते हैं साथ ही आदिकाल से स्त्री की अतिभावुकताजिसका शिकार वह स्वयं होती आयी है उसे भी स्वर दिया है |

ध्यातव्य है कि लड़की अपने जीवन में एक पागल की विवाहिता और एक नपुंसक अय्याश (मलिक बाबूके मन-बहलावका साधन रह चुकी है कभी किसी का प्रेम न पा सकने की पीड़ा को सहने में असमर्थ होकर और इसी कारण जीवन को अर्थहीन मानकर वह आत्महत्या कर लेती है यह लड़की शराब से शिथिल चेतन हुए चारों आदमियों के आसपास मंडराती है और उन्हें छेड़कर अपने अतीत में झाँकने को विवशकरती है लड़की के द्वारा प्रेरित करने पर वे चारों पुरुष जीवन के उन प्रेम प्रसंगों को जीने लगते हैंजिनमे उनकी कायरतानपुंसकताउपेक्षाअहंकार भाव आदि के कारण उनकी प्रेमिकाओं को विवश होकर आत्महत्या करनी पड़ती है प्रतिभा अग्रवाल लिखती हैं  " नाटक की लड़की का प्यार खोजना उसके लिए तड़पना ,भटकना आज के इस युग के वैयक्तिक अकेलेपन का तीव्र एहसास है जो हम बार-बार महसूस करते हैं कोई अपना नहीं अपने भी अपने नहीं हम सन कटेकटे अकेले आकाश की सीमाहीनता में भटकती उल्काएँ और जो कहीं कुछ अपना मिलने की आशा होती है ,वहां हम उसे आगे बढ़कर ले नहीं पाते हमारी कायरता हमारी अकर्मण्यता और नपुंसकता हमारे सामने दीवार खड़ी कर देती है |"[5]  

             

                                         'पगला घोड़ाके सन्दर्भ में प्रतिभा अग्रवाल जी का कथन एकदम सटीक है बादल सरकार 'पगला घोड़ाको 'मिष्टी प्रेमेर गल्पअर्थात 'मधुर प्रेम कहानीकहते हैं यहाँ पर शमशान और मृत्यु की बीभत्सता को बादल सरकार ने प्रेम की मधुरता में रूपांतरित कर दिया है जिसमें पुरुष के तथाकथित संभ्रांत रवैये को भी देखा जा सकता है जहाँ वह अपनी कायरतानपुंसकताद्वंद्व ,कमजोरी आदि को छिपाता है तो वहीँ स्त्री के शोषित रूप को भी देखाजा सकता है और इन सब के बीच बादल सरकार के जीवन के प्रति आस्था का अवलोकनभी संभव है जयदेव तनेजा लिखते हैं  "एक ही लड़की बार-बार कभी उच्च वर्ग की आधुनिक मिली कभी मध्यवर्ग की आदर्शवादी पढ़ींलिखी मालती और कभी निम्न वर्ग की अनपढ़ किन्तु मानी और अनन्य प्रेमिका लक्ष्मी बनकर आना और पुरुष के अहंकार अथवा कायरतापूर्ण स्वार्थ से टकराकर आत्महत्या के लिए विवश होना ...आदिकाल से लेकर आज तक अलग-अलग रूपों में पुरुष द्वारा स्त्री के शोषण की बेबस स्थिति का जीवंत रेखांकन कर देता है |"[6] नाटककार के शब्दों में “लड़की का एक मात्र दोष यह था कि वह लड़की थी |”[7]

         किन्तु ध्यातव्य है कि लड़की मानती है कि प्रेम में पीड़ा पाकर मार जाना भी जीवन की सार्थकता है | इसलिए लड़की मालती, मिली और लक्ष्मी को भाग्यवान समझती है क्योंकि ये सभी प्रेम पाकर और प्रेम देकर मरती है |

                                बादल सरकार ने रंग-संकेतों के माध्यम से कोठरी के पात्रों और कोठरी के बाहर जलती चिता को प्रस्तुत किया है लेकिन नाटक में रौशनी का प्रयोग भी एक चलते और संवाद करते हुए पात्र के भांति हुआ है | पीछे मंच पर रह-रह कर चिता की आग की रौशनी दिखाई पड़ती है जो चेहरों के दुःख –दर्द और खालीपन को उभारती चलती है |

नाटककार ने नाटक में बांग्ला बाल कविता के माध्यम से दर्शकों के भाव–संवेदना के तंतुओं को हिलाने का प्रयास किया है | लड़की की वेदना कविता के स्वर की तरह उसके चेहरे पर भी उभरने लगती है –

                                  “आम का पत्ता जोड़ा –जोड़ा 

                                   आम का पत्ता जोड़ा-जोड़ा 

मारा चाबुक दौड़ा घोड़ा |

छोड़ रास्ता खड़ी हो बीबी 

                     आता है यह पगला घोड़ा |”[8]   

वास्तव में यह एक बाल कविता है लेकिन उस लड़की के आंतरिक भावनात्मक उथल पुथल को भी स्पष्ट करता है | जयदेव तनेजा लिखते हैं-“ बादल सरकार ने बांग्ला के इस लोकप्रिय बाल –गीत में आए पगला घोड़ा का शीर्षक में ही नहीं बल्कि नाटक के कथ्य और मूल चरित्र को उद्घाटित करने में भी एक प्रतीककी तरह अत्यंत रोचक और नाटकीय प्रयोग किया है | जीवन शक्ति या ऊर्जा के उन्मत्त और अनियंत्रित रूप ‘प्रेम; को ‘पगला घोड़ा’ कहना वास्तव में इस परिचित शब्द का व्यंजनापूर्ण एवं सार्थक प्रयोग ही कहा जायेगा |”[9]      

                               ‘पगला घोड़ा’ प्रेम के पागलपन का बिम्ब तैयार करता है ,जिसे एक ट्रेजिक बिम्ब कहा जा सकता है | इस पागलपन का शिकार चारों स्त्रियाँ हो चुकी हैं | चरों ने एक तरह से अपने जीवन काक अंत कर लिया | रंगमंच पर नाटक के प्रभाव को बनाए रखने के लिए बादल सरकार ने शमशान , आधी रात , जलती चिता ,कुत्ते का रोना , सातू का अट्टहास ,लड़की की हंसी ,शराब की उन्मुक्तता आदि का कल्पनाशील, एवं नाट्यानुभूति  की दृष्टि से सारगर्भित प्रयोग किया है | सम्पूर्ण नाटक को प्रभावपूर्ण बनाये रखने के लिए नाटककार ने जिस प्रकार पूर्वदीप्ति तथा स्थिरीकरण की तकनीक का उपयोग किया है वह भी अनुकरणीय है | 

                               गौरतलब है कि विरोध वैषम्य के माध्यम से बादल सरकार ने अद्भुत नाटकीयता पैदा की है | कहानियों को तोड़ने और जोड़ने के लिए मनोविज्ञान के साहचर्य नियम का अत्यंत कुशलता के साथ प्रयोग किया है जो रंगशिल्प की दृष्टि से महत्वपूर्ण है | सातू के संवाद में आए खाते-पीते शब्द से ‘पीते’ शब्द को पकड़कर कार्तिक पीने के लिए बोतल निकालने की बात कहता है | कुत्ते के रोने की आवाज से सातू को लक्ष्मी के कुत्ते भुलुआ की स्मृति ,उसे बार–बार अतीत में ले जाती है | शराब पीते ही शशि का सर भारी होने लगता है और मन में उमड़ता-घुमड़ता मालती प्रसंग मुखर हो उठता है | कार्तिक के सामान्य से प्रश्न “क्या वैसी कोई चीज आपको नहीं मिली ?” तथा सातू के साधारण से उत्तर “कहाँ मिली?” में अनायास आ गए ‘मिली’ शब्द से हिमाद्री को अपनी प्रेमिका ‘मिली’ की याद में खो जाना स्वाभाविक ही है |  

              कहना न होगा कि बादल सरकार संवादों के माध्यम से दृश्य-बिम्ब तैयार करने में माहिर थे | वे स्थितियों और संवादों  के नाटककार थे | लड़की कहती है –“क्या करोगे जानकार ? उससे क्या बनता – बिगड़ता है ? मैं जिंदा ही क्यों रही ? मैंने जिंदगी में क्या पाया ? किसी को क्या दिया ,कोई बता सकता है |”[10] यहाँ इस संवाद से पता चलता है कि लड़की अपने जीवन में घटी घटनाओं से विचलित होकर आत्महत्या कर लेती है | मन की दबी हुई पीड़ा भी इस संवाद के माध्यम से मुखर होता है | बादल सरकार की विशेषता है कि वे मंच परिकल्पना के द्वारा ही पातेरों केव अभिनय को अधिक विश्वसनीय बना देते हैं |बकौल जयदेव तनेजा “संवाद इस नाटक की प्रभावशीलता का एक प्रमुख तत्व है | चरित्रों के शारीरिक-मानसिक और परिस्थितिगत भेद को रचनाकार ने व्यवहार और कथोपकथन की विशिष्ट शैली द्वारा बड़ी विश्वसनीयता से स्थापित किया है | चरों पुरुष पात्र समय-असमय हँसते हैं लेकिन नाटककार ने चारों की हंसी के फर्क का स्पष्ट निर्देश भी गाहे-ब-गाहे आलेख में किया है | कार्तिक का तकिया कलाम की तरह बार-बार ‘तारा-तारा काली ब्रहमई माँ’ की गुहार लगाना उसे फ़ौरन बांकी सबसे एक अलग पहचान देता है |यही बात निम्नवर्ग की अपढ़-गंवार लक्ष्मी के संवादों के ग्राम्य-स्पर्श के बारे में कही जा सकती है |मार्मिकता ,विदग्धता, हास्य-व्यंग्य, विडंबना और प्रभावशीलता इन संवादों की प्रमुख विशेषताएँ हैं |”[11] 

                                              

कहना न होगा कि बोलचाल के शब्दों और मुहावरों का प्रयोग भाषा को  प्रभावी बनता है |वह किरदार की आंतरिकता से जुड़कर उसे ज्यादा मुखर बना देता है | सातू के द्वारा- ‘बावन तोले पाव रत्ती’, ‘चक्कर में पड़ना’,’सोलह आने खड़ी’,’न घर का न घाट का’ , जैसे मुहावरों का प्रयोग करना उसके चरित्र को अधिक स्पष्टता के साथ सामने लाता है |बादल सरकार ने चरित्रांकन में मनोविज्ञान का सराहनीय प्रयोग किया है |’गलतियों का मनोविज्ञान’ इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है |अवचेतन की दमित भावनाओं के जोर और चेतन पर शराब के प्रभाव के कारण पात्र असली बात को छिपाने और बताने के द्वंद्व में कई जगह बोलने का कुछ बोलता कुछ और है जो उसके अतीत के पन्ने तो खोलता ही है साथ ही उसके व्यक्तित्व को समझने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मालूम होता है |

रंगमंच की दृष्टि से यह नाटक के रंगशिल्प की उपलब्धि है जिसे यथार्थवादी मंच सज्जा में भी मंचित किया जा सकता है |इस नाटक में प्रकाश व्यवस्था और ध्वनि व्यवस्था का माकूल प्रयोग किया जा सकता है |नाटक की प्रस्तुति में बदल सरकार द्वारा प्रणीत दृश्य अत्यंत प्रभावी है | इसके लिए वे लिखित रूप से स्पष्ट निर्देश देते हैं-“लड़की अंधकार में खो जाति है | बाद की बातें अँधेरे में ही उसकी रुलाई में डूब-सी जाती है |”[12] वस्तुतः इस नाटक का रंगशिल्प संवादों के आधार पर ही खड़ा है | नाटककार ने संवाद के माध्यम से कार्य-व्यापार को बढ़ाने,वर्तमान जीवन की यांत्रिकता ,एकाकीपन ,और विसंगत स्थिति में व्यक्ति की छटपटाहट और आक्रोश को शब्द देने में अद्भुत सफलता हासिल की है |संवादों के माध्यम से जीवन के प्रति साकारात्मक और नकारात्मक दृष्टिकोणों के द्वंद्व और अंततः जीवन के प्रति साकारात्मक  दृष्टि की जीत को बहुत प्रभावशाली रूप में व्यक्त किया गया है |

रंगशिल्प पर विचार करते हुए जयदेव तनेजा लिखते हैं –“रंगशिल्प की दृष्टि से पगला घोड़ा एक अनूठी रचना है |मृत लड़की का जलती चिता से उठकर आना और जीवित व्यक्तियों से छेड़छाड़ करके उन्हें मन के अवचेतन में दबी-घुटी स्मृतियों को याद करने के लिए प्रेरित करना ,अतीत के क्षणों को वर्तमान में जीते इन पात्रों के लिए उनकी पप्रेमिकाएँ बनना ,अतीत और वर्तमान की काल-विभाजक सीमाओं को मिटा देना एक ऐसी अद्भुत रंग-युक्ति है,जो नाटक को यथार्थ से हटाकर अयथार्थ या फैंटेसी की दुनिया में ले जाती है |”[13] नाटक के रंगशिल्प और कथ्य की प्रासंगिकता ने श्री टी.पी. जैन, शम्भू मित्र, श्यामानंद जालान, सत्यदेव दुबे,दिनेश ठाकुर,जैसे रंगकर्मियों को अपनी ओर आकर्षित किया और उन्होंने उसका सफल मंचन भी किया |


‘पगला घोड़ा’ बादल सरकार की रंग चेतना की महत्तम उपलब्धि है | जिस तीसरे रंगमंच की परिकल्पना बादल सरकार ने की उस दृष्टि से भीं यह नाटक सफल है | नाटक जहाँ शिल्प और कथ्य की दृष्टि से भारतीय नाट्यशास्त्र की वर्जनाओं  को तोड़ता वहीँ मृत्यु के माध्यम से जीवन को देखने –समझने का जो अवसर प्रदान करती वह महत्वपूर्ण है | प्रकाश और ध्वनी इस नाटक इस नाटक के रंगशिल्प में अत्यंत महत्वपूर्णबनकर सामने आते हैं |यह नाटक महज प्रेम कहानी नहीं है बल्कि इसके माध्यम से नाटककार पुरुष के अहम् ,मिथ्या डर,छद्म मानसिकता और तथाकथित नैतिकता पर भी आघात करता है | वहीँ स्त्री-मन के कोमल पक्षों को शब्द देकर नाटककार उसे संवेदनात्मक धरातल पर मार्मिक बना देता है |वहीँ नाटककार जिंदगी के प्रति ललक पैदा करता है और दर्शाता है कि जिंदगी हर हाल में खुबसूरत है क्योंकि जिंदगी है तो संभावनाओं का खुला आसमां हमारे पास है |अंततः यही कह सकते हैं ‘जिंदगी महज एक उम्र नहीं ,जिसे यूँ ही बर्बाद किया जाए|’






गौरव भारती 

शोधार्थी 

भारतीय भाषा केंद्र 

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय 

कमरा संख्या-108

झेलम छात्रावास 

पिन कोड-110067

मोबाईल-9015326408

इमेल-sam.gaurav013@gmail.com




सन्दर्भ :- 

[1] . आधुनिक भारतीय रंगलोक, जयदेव तनेजा ,पृष्ठ संख्या 132, भारतीय ज्ञानपीठ , प्रथम संस्करण -2006, नई दिल्ली

[2] . बादल सरकार व्यक्ति और रंगमच अशोक भौमिक ,पृष्ठ संख्या 51 ,अंतिका प्रकाशन ,पेपरबैक संस्करण 2009

[3] .वहीँ ,पृष्ठ संख्या -81

[4] . पगला घोड़ाबादल सरकारअनुवाद-प्रतिभाअग्रवालपृष्ठ 29, राजकमल प्रकाशनदूसरा संस्करण-2014

[5] पगला घोड़ाबादल सरकारअनुवाद-प्रतिभा अग्रवालपृष्ठ 13, राजकमल प्रकाशनदूसरा संस्करण-2014

[6] .आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श जयदेव तनेजापृष्ठ संख्या 223-224, राधाकृष्ण प्रकाशन ,प्रथम संस्करण -2010 


[7] .पगला घोड़ा, बादल सरकार, अनुवाद –प्रतिभा अग्रवाल,पृष्ठ संख्या -29 

[8] . वही ,पृष्ठ संख्या- 35 

9 . आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श जयदेव तनेजापृष्ठ संख्या – 220राधाकृष्ण प्रकाशन ,प्रथम संस्करण -2010

[10] .पगला घोड़ा, बादल सरकार, अनुवाद –प्रतिभा अग्रवाल,पृष्ठ संख्या -112

[11] . आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श जयदेव तनेजापृष्ठ संख्या – 228-229 राधाकृष्ण प्रकाशन ,प्रथम संस्करण -2010

[12] पगला घोड़ा, बादल सरकार, अनुवाद –प्रतिभा अग्रवाल,पृष्ठ संख्या -79

[13] . आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श जयदेव तनेजापृष्ठ संख्या – 229राधाकृष्ण प्रकाशन ,प्रथम संस्करण -2010