Image

किसी छोटी सी घटना के बाद हमारे देश की जनता से लेकर नेताओं तक का क्या खून उबलने लगता हैं,आप सब जानते ही होंगें।आप सब जानते ही होंगें कि किसी मंदिर या मस्जिद का मामला हो या बीफ का मामला हो ,गाय का मामला हो,किसी व्यक्ति के अपराध पर हो रही बातें हो,सब में हमारा वीर रस फूट पड़ता हैं,देश भक्ति का नशा रंग दिखाने लगता हैं।कई बार तो फिल्मों की काल्पनीक बातों पर ही हम कितने दूरदर्शी बनकर देश के पहरूवे बनकर खड़े हो जाते हैं।पिछले कुछ वर्षों में देश भक्ति का उपदेश कुछ ज़ादा ही परोसा जा रहा हैं।हमारा मिडिया हो ,नेता हो,समाज सेवी हो,सब को देश भक्ति का पाठ पढाते मैंने देखा है।
एक फिल्म के सीन के विरोध में देश को जलते देखा होगा,बीफ के नाम पर या गाय के नाम पर हमारे वीरों को जूझतेे भी देखा होगा,पाकिस्तान का जनाज तो लगभग हर भारतीय हर रोज एक बार निकाल कर ही चैन पाता हैं।कश्मीर का भारत का हिस्सा होते हुए भी हमारा दिल नहीं भरता और हम उसे अखण्ड भारत बनाने की कसमेें खाकर अपना पौरूषत्व दिखाते हैं।कहीं भी हम कम समझदार या कम सूरवीर नहीं दिखते।इतना ही नहीं गाहे वगाहै हम दुनिया को अपनी वीरता व कुटनीति ताकत की दुहाई देते नहीं थकते।
सब कुझ है,मुझे भी कहीं शक नहीं ,लेकिन मेरी मोटी अक्ल को एक बात कतई समझ नहीं बैठ रही की जिस देश के अंदर इतना राष्ट्रवाद मौजूद हो,किसी मामूली बात पर आसमान पाताल एक करने वाला जूनून पाया जाता हो,जहां घर घर देश भक्त एक नहीं हजार हो।दुनिया की ताकतों को चीर फाड़ देने की ललकार देने वाले हम जहां हो,उन्हीं के बीच ,देश की धरती पर ही, ऐसा तंत्र  मौजूद हो,जिसके पास इतनी ताकत हो कि उसे हमारी इस सारी सूरवीरता की परवाह ही नहीं हो?
जी हां हम सब अपनी बाहें चढाकर देश की घरेलू खपत की रोटियां पकाते रहते हैं,और वो सूकमा जैसी वारदातों को बड़े आराम से अंजाम दे देते हैं।
बात एक ही घटना की नहीं है,एक घटना तो  चलो मामूली मानी जा सकती हैं,लेकिन सवाल मेरा अलग हैं।
हर बात पर हाय तोबा मचाने वाला हमारा वो मानस इस मुद्दे पर इतना खामौस क्यों?
सवास इतना ही नहीं हैं,सवाल बहूत कडवा है,समझ मैं नहीं आता कि ये नक्सली जो किसी समुन्द्र पार देश में नहीं रहते, बल्कि हमारे देश में ही रहते हैं,वहीं जहां हम घर घर राष्ट्रभक्त होने का दावा करते हैं।आखिर हम उन्हे कैसे नहीं पहचानते?
हां अगर इन नक्सलियों की संख्या कुछ सैकड़ा या हजार हो तो माने कि कहीं छुपे रहते होंगे,लेकिन इनकी तो हथियारबरदारदस्तों की संख्या ही हजारों में है।
उनके पास हथियार है राशन है,वाहन है,संचार साधन हैै,टैक्नोलोजी है,ये सब कहां से आता है,इलजाम भी किस पर दे? यह सब कुछ हम सब जानते हैं।लेकिन किसी का वीर पौरूषत्व नहीं जागता,किसी को कोई आंदोलन चलाने  की फुरसत नहीं,कहीं पर विरोध प्रदर्शन वगैरा की जरूरत नहीं!सड़कों पर देशभक्त जो तांडव दिखाते हैं वे भी खामौस!
जो काबूल पार के तालेबान,दजला पार की आईसिस  के खतरे को तुरन्त भांप कर देश में असुरक्षा माहोल पैदा करते नहीं थकते,उनको अपने आस्तीन का सांप क्यों दिखाई नहीं देता?
                            चलो कुछ बात मैं भी कह दूं ,जहां तक मैं जानता हूं इन नक्सलियों का अपना भी एक राष्ट्र वाद हैं,येे भी अपने को राष्ट्र के लिए समर्पित मानते हैं ,ये भी अपना संघर्ष राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर कर रहे हैं।और जब एक देश के अंदर ही राष्ट्र वाद का आंदोलन विकसित हो गया हो,और हमारे सैन्य दलों को ललकार रहा हो और हम गाय के नाम पर या मंदिर या मस्जिद के नाम पर या अपने धार्मिक सिद्धातों के परचार परसार पर या अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिए संघर्ष कर रहे हों,तो यह मान कर चलो की हमारी राष्ट्भक्ति खोखली है और उन नक्सलियों की राष्ट्भक्ति पक्की है,और हमारी हार पक्की!
                      याद रखना मेरे देशवासियों दुनिया में वतन परस्तो के दीवाने पन की कई मिसाले मौजूद है,उनका जजबा,हुबवल वतनी,उनकी जांबाजी एसी नहीं होती जैसी आजकल हमारे देश में उन लोगों की दिखाई देती है जो भारत माता की जय जय कह कर अपने आप को वीर सपूत कहते हैं।वे लोग कायर ही नहीं बल्कि मौका परस्त व स्वार्थी हैं जो देेश में घरेलू खपत के लिए देश भक्ति का चोला ओढ़े रहते हैं,लेकिन देश के अंदर इतने बड़े खतरे को नजर अंदाज कर रहे हैं।नक्सलियों से निपना सिर्फ हमारी फौज का ही काम नहीं है। क्या हमारा समाज व जनमानस इस खतरे को समझता हैं? क्या हम हर नक्सली को नफरत से देखते है?कहीं न कहीं हम इन का सहयोग तो नहीं कर रहे?क्या इन सब बातों का सऊर हम देश में फैला रहे है?
जहां तक मैं जानता हूं,ऐसा नहीं हैं,सब के लिए यह हल्का मामला हैं।सबके अपने अलग देश भक्ति के मायने है,सब अपने मायने में लगेे है,नक्सली तो सिर्फ सैनिकों के हिस्से की समस्या है!
जब देश में ऐसी ताकते पनप चुकी हो और हम घरेलू खपत की राजनिति मैं अपना गौरव खोज रहे हों,मैं समझता हूं हम बहूत गलत राह पर हैं,हमारा भविष्य असुरक्षित नजर आता हैं।
हम अपनी मिथ्या गौरव गाथा गढ़ कर अपना मन बहला रहे है और देश अंदर दूसरा देश पैदा हो रहा है।जहां हम चार कोडी के लिए लोगों पर तुष्टीकरण का रोना रोते है वहीं देश की सुरक्षा जैसे मामले के तुष्टीकरण को नजरअंदाज कर रहे हैं जो कि घातक होगा।