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केवल मैं नहीं, आप भी नहीं, वरन् हम सब हमारे देश की पूरी आबादी, १३५ करोड़ इंसान, इंसान कहें या कुछ और, चल रहें हैं, दौड़ रहे हैं या स्थिर हैं, लेकिन जी रहें हैं एक जिन्दगी जिसका अर्थ समझते-समझते इतनी देर हो जाती है कि अंतहीन दौड़ या स्थिरता शून्य में विलीन हो जाती है. मानव देह का अस्तित्व भी नहीं रह जाता. यह भी कह सकते हैं कि अर्थहीन जिन्दगी का अर्थ हम सब जानते हैं लेकिन फिर भी अथक प्रयास जारी हैं, दूसरों को समझाने के “अर्थहीनता का अर्थ”.


उस समाज की बुद्धि के विकास का कोई जोड़ होगा जो अर्थहीन का अर्थ जानता हो. हम केवल उस अर्थहीन जिन्दगी बेमानी जिन्दगी को जी ही नहीं रहें हैं वरन् निरंतर प्रयतनशील हैं कि हमारे बाद केवल १३५ करोड़ नहीं बल्कि और अधिक लोग इसका कोई नया अर्थ खोज सकें. लेकिन खोज की चेष्टा तो तब हो जब हम ऐसा समय निकाल पायें जिसमें हमें कल लगने वाली भूख का डर ना हो. इससे पहले कि हम अपनी आवश्यकताओं की ज़द्दोज़हद की पूर्ति के लिए कोई साधन ढूँढ़ पाते हैं, एक से दो हो चुके होतें हैं और दो के बाद, चार या आठ की तेजी तो हमें नहीं होती, लेकिन तीन, चार, पांच .........   और उसके बाद पड़ोसी अबलू, बबलू, टीनू, नीटू.....   के नाम याद रखते हैं. 


जब मनुष्य पत्थरों पर चलने के लिए आमदा हो तो उसे ठोकर तो ज़रूर लगेगी, लेकिन धन्य हैं हमारे प्रयास कि कम से कम समय में अधिक अधिक से ऐसे कामरेड खड़े कर देना चाहते हैं जिनके चलने के लिए या तो पत्थर कम पड़ जाएँ या फिर ठोकरें इतनी अधिक लगें कि पैर की जगह पत्थर छोटे-छोटे टुकड़ों में विभक्त हो जाए, और फिर इन विभक्त टुकड़ों से पैर की बजाय एक दूसरे का सिर फोड़ा जा सके. 

विश्व के अन्य देश बेजान चीजों को सिंगल स्टोरी (एकमंजिल) से मल्टी स्टोरी (बहु-मंजिल) तक पंहुचा रहे हैं जैसे इमारतें व् यातायात के साधन और हम अपने खानदान की ऐसी स्टोरी (कहानी) बनाने में व्यस्त हैं जिसका हर पात्र मुंशी प्रेमचंद की कहानियों का नायक है. खतरों से खेलने का और खून बहाने का शौक हमें विरासत में मिला है. कौन कहता है कि हमारे भारत में ट्रेन डबल स्टोरी नहीं है, अरे ऊपर वाले माले पर छत ही की तो कमी है. कौन-सी पैसेंजर ट्रेन की डबल स्टोरी भरी नहीं रहती और एक आधा ऊपर से लुढ़क भी गया तो क्या हमारी १३५ करोड़ की गिनती पर कोई आंच आएगी. 


हमारे देश में हर रोज पैदा होने वाले ५० हज़ार बच्चों का भविष्य निर्माण या राष्ट्र चरित्र निर्माण करने की चेष्टा कुछ इसी प्रकार है जैसे सीमेन्ट के अभाव में बेबुनियाद बहुमंजिल इमारत खड़ी करने की एक कोशिश. 


वास्तविकता तो यह है कि इन रोज पैदा होने वाले ५० हज़ार बच्चों में से ४० हज़ार को “शिक्षा” शब्द से अवगत ही नहीं कराया जाता और बाकी के मानस पटल पर आजादी के बाद भी सामाजिक परिवेश में चल रही द्वन्दताओ के बीच (चाहे वह विशेष जातियों के लिए आरक्षण पक्ष या विरोध में हों या फिर मंदिर मस्जिद मुद्दा हो या फिर अन्य कोई विषय) ऐसी आड़ी-तिरछी लकीरें खीची जाती हैं कि बौद्धिक व् आर्थिक विकास की जगह सर्वनाश होता रहता है. 


कौन जिम्मेदार है इस सबका ? सभी ! गुजरे  कल के ३५ करोड़, आज के १३५ करोड़ और शायद आने वाले कल के २३५ करोड़ भी. 


जब खिसकते-खिसकते कुछ शिक्षा से अवगत हो भी जाएँ जिसका रूप भले ही व्यवहारिक न हो, क्या मिलता है, एक डिग्री, एक रोज़गार की तलाश. 


हमारी रोज की जिन्दगी में समय ही समय है, नितान्त खाली, अतः नारे हैं, मांगे हैं, हड़ताले हैं, विरोध है, पत्थरबाजी है, कचहरी के चक्कर हैं और सबसे ऊपर एक और जिम्मेदारी है, बच्चे पैदा करने की. 


राष्ट्र चरित्रनिर्माण कहें या निर्वाण कहें, एक तरफ स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों की कहानियां हैं तो एक तरफ मिलावट व् करों की चोरियां हैं.  काश बच्चा पैदाइश पर भी कोई कर होता तो हमारी भरसक यही कोशिश रहती कि हमारे बच्चे का कर हमारा पड़ोसी दे. 


बेहताशा बढ़ती जनसंख्या, बेहताशा बढ़ती बेरोजगारी, बेहताशा बढ़ता क्राइम. 


धर्म की, जाति की, पैसे की, ताकत की लड़ाइयों में जब भी कभी अपने आपको जीता हुआ या हारा हुआ महसूस करते हैं, एक और बच्चा पैदा करते हैं, ताकि वह लड़ाई जारी रख सके.