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देश को आजाद हुए मात्र सात वर्ष हुए थे जब उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक गाँव ‘कोट अंजोरपुर में  मेरा जन्म हुआ (16.3. 1954) हमारा घर गंगा जी जी के तट पर था, अपने दरवाजे से हम उनकी उठती-गिरती लहरों को देखा करते थे। पिता जी ने मेरा नाम तुलसी रखा क्योंकि वे तुलसी कृत रामायण के बड़े अध्येता थे। दादाजी तीन सौ बीघे जमीन के स्वामी थे।  फिर भी हमारा परिवार तंगहाल था । कोट गंगा,सरयू और सोन नदी से घिरा है ( ऐसे बहुत से गाँव हैं)पिछली भीषण बाढ़ ने हमारे अधिकांश खेतों को रेत के ऊँचे-ऊँचे टीलों में बदल दिया था। तब से उसी प्रकार की बाढ़ की प्रतीक्षा किया करते थे गाँव के लोग । हर साल बरसात में तीनों नदियाँ विकराल होकर अपने ‘दियर‘ में बसे गाँवों को जलमग्न कर देतं । रहवासी बाढ़ उतरने के बाद फिर से सरपत की छावनी वाला घर बनाते, खरीफ की फसल के समय तो खेत पानी में होते, बाद में बोये जाते, सिचाई का कोई साधन न होने के कारण कभी कभार ही ऐसा होता कि साल भर खाने लायक अन्न पैदा हो जाय। गाँव के अघिकांश लोग काम की तलाश में किशोर वय में ही बंगाल, असम, या महाराष्ट्र के लिए निकल पड़ते। मेरे पिताजी भी बाहर ही रहते थे। 

अतः  जैसे-जैसे बड़ी होती गई अपने छोटे भाई बहनों की जिम्मेदारी संभालने लगी। उस समय सवर्णों में पर्दा प्रथा का बहुत जोर था। माता जी घर से बाहर निकलती नहीं थीं, बाहर की सारी व्यवस्था जो एक मुखिया करता है मुझे ही करनी होती। मेरे गाँव मे एक स्कूल था जहाँ लड़के लड़कियाँ पढ़ते थे। मैं स्कूल जाने के लिए रोती थी किन्तु जा नहीं पाती थी। रसोई के लिए जंगल से लकड़ियाँ एकत्र करके न लाती तो माँ भोजन कैसे बनाती? छोटी बहन को न संभालती तो माँ जांत  से अनाज कैसे पीसती? ऐसे ही ढेरों आवश्यक कार्य जो मुझे स्कूल नहीं पहुँचने देते थे। वैसे स्कूल के मास्टर ने मेरा नाम कक्षा एक में लिख रखा था। वर्ष में एकाध दिन किसी प्रकार स्कूल पहुँच भी जाती तो वहाँ पढ़ने वाली लडकियाँ मिल कर मुझें बहुत मारतीं, उनकी नजर में मेरा प्रति दिन स्कूल न आना उन्हें यह अधिकार देता था कि वे मुझे  पीटें ।  दो-तीन साल में मेरा नाम न जाने किस प्रकार कक्षा दो में आ गया। वैसा ही बिरला दिन था जब बड़ी माँ ने अपने छोटे बेटे द्वारा की गई गंदगी साफ करने मुझे माँ से कह कर स्कूल भेज दिया था। मैं कक्षा में बैठने का लोभ संवरण न कर सकी। उस दिन गुरूजी आम की घनी छाया में कुर्सी डाल कर हिन्दी पढ़ा रहे थे। पाठ का थोड़ा-थोड़ा अंश प्रति छात्र से पढ़वाया जा रहा था।। मेरी बारी आई तो मेरे पढ़ पाने का प्रश्न ही कहाँ से उठता था? उनके सब्र का बांध टूटा और उन्होंने पुस्तक उठा कर दूर फेंक दी । पुस्तक के फड़फड़ाते पन्नों का हा-हाकार आज भी मेरी आत्मा में शोर मचाता है कभी-कभी। छुट्टी हुई तो लड़कियों ने खबर ली। मैंं रोती हुई घर आई। (बलिका शिक्षा के लिए कार्य इसी हा-हाकार ने कराया) माँ ने मेरी गोद में मेरी छोटी बहन को डाल दिया और घर के काम जल्दी-जल्दी निबटाने लगी।

मैं बसंत पंचमी को स्कूल अवश्य जाती थी चाहे जिस प्रकार हो। उस साल सरस्वती पूजा के दिन सुबह से वर्षा हो रही थी, मैंने माँ से पूजा के लिए दो पैसे लिए और स्कूल के लिए निकली, रास्ते में कनेर के पीले फूलो को तोड़ कर अपनी फ्राॅक में जमा करती करती, पानी में भीगती स्कूल पहुँची । दो पैसे की लेमन जूस का प्रसाद चढ़ाकर पीले फूलों से माँ की पूजा की । मैंने मांगा ’’ मँा मैंे रोज स्कूल आना चाहती हूँ बस और क्या मांगू?’’मैंने अपना सारा प्रसाद स्वयं ही खा लिया। इससे सबने मेरी खिल्ली उड़ाई । मैं उस दिन प्रसन्न मन घर आई ं आखिर स्कूल से आई थी।उन्हीं दिनो की बात है, एक सुबह मेरे ददेरे भाई जो कक्षा दो में पढ़ते थे, धूप में बैठ कर अपनी नई आई भाषा की पुस्तक देख रहे थे।,खुले पन्ने में सीता स्वयबर का सुन्दर सा रेखा चित्र था। बालसुलभ उत्सुकता से मैंने पुस्तक अपने हाथ में लेनी चाही, उन्होंने बेदर्दी से मेरे हाथ से पुस्तक छीन ली ’’ फाड़ देगी! तू क्या जाने किताब क्या होती है? जा बरतन मांज!’’ उनके व्यवहार से मेरा बाल मन गहरे तक आहत हो गया। मैं बड़ी देर तक हिलक-हिलक कर रोती रही। माँ को उलाहना दिया कि मुझे स्कूल क्यों नहीे जाने देती? हैैं’’

माँ एक पल के लिए अपनी विवशता पर बहुत उदास हो गई  उसने भैया से एक बार पुस्तक दिखा देने के लिए बहुत निहोरा किया परन्तु वह न माना , अपना बस्ता लेकर बाहर भाग गया। माँ ने आव देखा न ताव, चुल्हे के पास पड़े कोयले को उठा लिया । ’’ आव बबुनी हम पढ़ा दी तोके!’’ वह मुझे प्यार से स्ंाभाल कर  आंगन की कच्ची दीवार के पास ले आई और कोयले से हिन्दी के अक्षर लिख दिये। ’’ लऽ ! अइसे लिखऽ!’’मैंने आँसू पोंछे और दीवार के श्यामपट पर लिखना सीखने लगी। मुझे लोक गीतों में गहरी रुचि थी। उन्हे काॅपी पर लिखने का उद्देश्य मेरे सामने था।

यूंं  तो माँ भी साक्षर मात्र थी चिट्ठी पत्री बाँचने, कहीें दस्तखत आदि के उदेश्य से पिता जी ने थोड़ा पढ़ा दिया था। अटक-अटक कर रामायण आदि पढ़ लेती थी। बाद में गाँव की औरतों को सीता जी का दुःख सुनाकर रोती थी।पिता जी आसनसोल बंगाल में कहीं नौकरी करते थे। साल में एकाध बार आना जाना करते थे, किन्तु दो जगह के खर्चे के कारण दिक्कतें बरकरार थीं। किसी मित्र से उन्हे कोरबा का पता मिला  कि वहाँ रोजगार आसानी से मिल सकता है। ंवे अपने मित्र के साथ बंगाल छोड़ कर छत्तीसगढ़ आ गये। कोरबा में नये बन रहे पावर हाउस में उन्हें सिक्यूरिटी गार्ड की नौकरी मिल गई। कुछ महिने बाद वे हम लोगों को भी अपने पास ले आयें । तीस मई 1964 को हम लोग कोरबा पहुँचे ,देश के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल  नेहरू का देहावशान हुए दो चार दिन ही हुए थे देश में अफरा-तफरी का माहौल था। हम अपने पहनने के कपड़े और थोड़े से बर्तन ले कर पुराने पावर हाउस के टट्टा खोली में किराये से रहने लगे। पिता जी ने मुझसे छोटी बहन एवं भाई का नाम स्कूल में लिखा दिया । मेरी तो पढ़ने की उम्र निकल गई थी नऽ ?अभी हमारी गृहस्थी जमने का आरंभ भी नहीं हुआ था कि लार्सन एन्ड टूब्रो कंपनी में कर्मचारियों की हड़ताल हो गई, जो सभी कर्मचारियों की छंटनी से समाप्त हुई। अपने गाँव-घर से दूर हम फाकामस्ती की कगार पर आ खड़े हुए। यहाँ हमारे खेत नहीं थे जिन्हें बंधक रख कर हमें तुरंत पैसा मिल जाता न जान पहचान के लोग  थे जो हमें उधार दे देते। पिताजी को उस समय दिहाड़ी मजदूर बनना पड़ा और मुझे बाल श्रमिक ।

कुछ महिनों के बाद बांकी मांेगरा में कोयला खान के लिये कर्मचारियों की भर्ती का समाचार मिला । वहाँ यू. पी. बिहार के बहुत से लोग काम पर लगे हुए थे। पिता जी ने वहाँ जाकर अपनी समस्या बताई , उन्हें मदद मिल गई। हमारे जिले के जग्गू प्रसाद गोंड़ ने (जो वहाँ युनियन के नेता थे) बड़े अपनेपन से पिता जी को भर्ती करवाया। कुछ ही दिन में हम लोग कोरबा से बांकी आ गये। वह सन् पैंसठ का जुलाई का महिना था। पिताजी ने सबसे पहला काम जो किया वह था स्कूल में हमारा नाम लिखवाना। गाँव से मेरी दूसरी कक्षा की टी. सी. मंगवाई गई। आदिम जाति कल्याण विभाग प्राथमिक शाला बांकी में हम लोग पढ़ने लगे। मुझे कुछ आता नहीं था पिता जी ने स्वयं मुझे पढाना प्रारंभ किया। पढ़ने लिखने की इतने दिनों से बाधित मेरी क्षुधा जाग उठी। मैंने मन लगाया। मुझे एक बार सुन कर ही पाठ अच्छी प्रकार याद हो जाता था। बचे समय में मैं अन्य किताबें पढ़ती थी । बृहद् सुखसागर जो सभी वेद पुराणों का सार है मैंने कक्षा दो में ही पढ़ा था। । पुस्तकें खरीदने के लिए पिता जी खदान में ओवर टाइम ड्यूटी करते थे। कुछ ही समय में हमारे घर में पुस्तकों की भरमार हो गई। हम न केवल पुस्तकेंं पढ़ते थे उस पर चर्चा भी करते थे। पिता जी काम से आने के बाद स्नान ध्यान से फारिग होकर उच्च स्वर में रामचरित मानस का गायन करते, टीका करते, जिसे  घर का काम करते-करते मैं सुनती समझती। हमारे घर पढ़ने-लिखने के शौकिन और भी लोग आने-जाने लगे। स्कूली जीवन के छः वर्षों में मैंने सात उपन्यास लिखे थे जो आज अप्राप्त हैं । उस समय के अनुसार कक्षा छः पास करते-करते मेरी उम्र विवाह योग्य हो गई और मेरी शादी करके मुझे इलाहाबाद भेज दिया गया। सौभाग्य से वहाँ का माहौल पढ़ने पढ़ाने का था।

 मेरा स्वाध्याय निरंतर जारी रहा। किंतु स्कूली शिक्षा में व्यवधान आ गया। अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने के लिए सदा छटपटाहट बनी रहती मन में । समय पाकर जब पति के साथ आकर रहने लगी तब सन्1975 में मैंने आठवीं की परीक्षा स्वाध्यायी के रूप में दी। जिसमें सभी विषयों में विशेष योग्यता प्राप्त हुई। उसी वर्ष श्रीमान् का तबादला बिलासपुर हो गया। अब जिन्दगी के फैसले मेरे पक्ष में होने लगे। आर्थिक विषमता, गृहस्थी की हजारों समस्याएं  जन्म लेते बच्चों की जिम्मेदारी , यहाँ तक मुझे स्ट्रीट लाइट में भी पढ़ना पड़ा किन्तु नतीजे मेरे पक्ष में आते रहे सन्1977 में मैट्रिक , सन्1980 में स्नातक और सन्1982 को स्नातकोत्तर की परीक्षा पास कर ली । उसी वर्ष शिक्षक चयन परीक्षा पास कर के शिक्षिका बन गई । इस बीच मेरा कहानी लिखना और समाचार प़त्रों में छपना लगातार जारी था। सन् 2008 में पहली पुस्तक पिंजरा के प्रकाशन से मेरा विधिवत साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ। इन दस वर्षों में ग्यारह कहानी संग्रह, एक वृहद् उपन्यास,चार यात्रा संस्मरण, और चैदह बालोपयोगी पुस्तकें प्रकाशित र्हुइं ( सम्मानों की सूची लेखिका परिचय में देखें )।पुस्तकों के प्रकाशन, विक्रय, प्रचार प्रसार आदि की सुविधा के लिए मैंने  2012 में अपने कनिष्ठ पुत्र विवेक तिवारी के साथ मिलकर श्री अक्षय पब्लिकेशन की स्थापना की। जिसमें लगातार क्षेत्र के साहित्यकारों की पुस्तकें छप रहीं हैंं।आज मैं अपने को संसार की सबसे सम्पन्न महिला समझती हूँ क्योंकि मैं जितना पढ़ सकती हूँ उससे अधिक पुस्तकें हैं मेरे पास, जितना लिख सकती हूँ उससे अधिक विचार हैं, जितना लिखा है उससे बहुत अघिक मुझे पढ़ने वाले हैैं।