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बचपन से सुनती आयी हूँ कि आज के ही दिन 1947 में हमारा देश अंग्रेजों से आजाद हुआ. हम सब गुलामी की जंजीरों से बाहर आ गए और इस कारण स्वतंत्रता दिवस पूरे देश में राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मनाते हैं. पर क्या आजाद भारत के साथ हम सब सच में गुलामी की जंजीरों से बाहर आ पाए? अपनी समस्याओं से आजाद हो पाए? हमारे देश की आधी आबादी आज भी अपनी आजादी को पूर्ण रूप से महसूस नहीं कर पायी है. आज भी वह अत्याचारों की जंजीरों में खुद को जकड़ी हुई ही पाई है. आखिर कब तक वो भ्रूण हत्या, बलात्कार, दहेज प्रथा, यौन हिंसा, घरेलू शोषण जैसे अत्याचारों से घिरी रहेगी. महिलाएं आज भी चाहे वो गर्भ में हो, 8 वर्ष की हो, 18 वर्ष की हो, या 80 की ना घर के भीतर ना घर के बाहर वह पूर्ण रूप से सुरक्षित महसूस कर पा रही है. ना अपनों के बीच ना गैरों के पास वो खुद को आजाद महसूस कर पा रही है. आते जाते हर पल एक अनजाने ड़र, एक अनहोनी के भय से वह  घिरी हुई है.
आजाद होते हुए भी आखिर कब तक वह इन कुप्रथाओं, व हिंसा की बेड़ियों मे जकड़ी रहेगी? आखिर कब वह अपनी आजादी को महसूस कर पाएगी?

आजाद हुई बेड़ियों से
पंखों की जमानत पर
और मुक्त हुई उस दर्द से
जिन्दगी की जमानत पर
ये कैसी आजादी है
जो उसने(दामिनी) पायी हैं!